साहित्य चक्र

10 June 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 10 जून 2026





साथ कुछ नहीं जायेगा

एक दिन ऐसा आयेगा,
साथ कुछ नहीं जायेगा।
इस धरा का इस धरा पर,
सब धरा रह जायेगा।
आपकी बनाई हुई योजनाएं,
किसी मेज की दराज में दम तोड़ेगी।
जिस देह पर आपको आज गुमान है,
एक दिन वही आपका साथ छोड़ेगी।
आपने जो दौलत कमाई है,
जिसके पीछे अपनी सारी जिन्दगी गंवाई है।
एक दिन वही कलह का कारण बनेगी,
उसके लिए आपकी संतानें आपस में लड़ेगी।
आपकी दौलत आपके कोई काम नहीं आनी है,
आपके साथ तो आपके कर्मों की पोटली जानी है।
इसलिए इस धरा से जाने से पहले,
कुछ काम ऐसे कर जाओ।
इस संसार के लोगों में,
प्रेम अपनत्व के भाव भर जाओ।
ताकि कई वर्षों तक आपका नाम अमर रहे,
इन्सान अच्छा था मरने के बाद सब कहे।


- भुवनेश मालव


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प्रेम पागल

इस पागल मन को  कैसे मैं समझाउँ
कौन सी ख्वाब अब इसको दिखलाऊँ
जब मोहब्बत हो तिलिस्म के   समान
फरेबी से होता जब जान      पहचान

दिल की धड़कन में उनको  था बसाया
जग वाले से टकरा उनको था अपनाया
झूठा बन गई मेरी प्रेम की  वो  दास्तान
पी रहा हूँ मैं जग में गम और  अपमान

प्रेम में वशीभूत हो खत उनको भिजवाया
मजमून में प्रेम की कथा था     लिखवाया
पर क्यूँ समझ आई उनको प्रेम    परवान
क्यूँ भूला दी मोहब्बत की मेरी    अरमान

दिलोअजीज जिनको दिल समझा    था
उसने ही तो हमें पागल आज कहा   था
क्या प्रेम में पगलपन की है  यहाँ सम्मान
जब कि दो दिल की प्रेम है अमिट निशान

तन्हाई ऑगन में खड़ा हो व्यंग मुस्कुराया
गम को मन में छुपा कर हमको समझाया
प्रेम शाप है ना है यह शुकुन का  वरदान
फिर भी क्यूँ दलदल में गिर जाता इन्सान


- उदय किशोर साहू



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ज़िंदगी को ज़िंदा रखती है

मुस्कानों को मुस्कान ज़िंदा रखती है,
जैसे फूलों को पहचान ज़िंदा रखती है।

थक जाते हैं जब राहों में चलते-चलते,
तब अपनों की एक जान ज़िंदा रखती है।

सूख न जाए मन का दरिया समय की धूप में,
यादों की हल्की बरसात ज़िंदा रखती है।

घर तो ईंटों-पत्थरों से बन जाता है लेकिन,
उसको रिश्तों की सौगात ज़िंदा रखती है।

हार के बाद भी जो फिर उठ खड़ा हो जाए,
उसको दिल की उम्मीद ज़िंदा रखती है।

दुनिया के इस शोर में खो जाएँ हम अक्सर,
हमको भीतर की आवाज़ ज़िंदा रखती है।

साँसें लेना ही केवल जीना नहीं होता,
जीने की कोई बात ज़िंदा रखती है।


- नरेंद्र मंघनानी



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चीख़ती धरती, उजड़ते वन
छलनी खड्डे, गिरता पानी का स्तर
विश्व पर्यावरण दिवस पर गूँज रहा-
एक मात्र यही सवाल:
आख़िर क्यों रो रही खड्डे ?

आसमान के रखवाले थे पेड़
बादलों के थे भाई,आज आरे की भेंट चढ़े,
कट-कट कर बिके सरेआम बाज़ार में
आज वही लकड़ी के ढेर में सड़े,
फिर खड़ा हुआ है वही प्रश्न-
गूंज रहा हर वीराने में:
आख़िर क्यों उजड़ रहे वन ?

नदियाँ बहती थीं चांदी बनकर
आज नाले में कफ़न ओढ़े,
संगीत सुनाती थीं जो पहाड़ों से
संग मीठा जल थी लाती
स्लम बस्तियों की गंदगी ढोती
आज वही नालों का ज़हर पीकर सड़े
खनन माफ़िया राज करते
सीना छलनी होता खड्डों का
सामने आता फ़िर वही सवाल:
आख़िर क्यों रो रही खड्डे ?
चीख पुकार मचाती धरती
छाती पीट-पीट कर कहती-
"बेटा मुझको मत नोंचो और!"
पर हम बहरे हो गए हैं -
न सुनते चीख उसकी, न सुनते उसका शोर
अगर अब भी नहीं जागे लोग
तो कल साँस भी कर्ज़ में मिलेगी
संकल्प करो,जल बचाओ, बीज बो दो माटी में
हंसेगी खड्डे, खड़े करने होंगे वन
तभी ठण्डी-ठण्डी बयार बहेगी,
बचेगा पर्यावरण, सार्थक होगा प्रयास
चले थे लिखने गाथा विकास की
सामने दिखता रहा विनाश।

- बाबू राम धीमान



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इंसानों को देखा है

मैने जानवरों को ठंड से कांपते देखा है,
कुचल दिए जाते हैं सड़कों पर,
उन्हें रोते, बिलखते,आंसू बहाते देखा है,
उनके दुख को नजर अंदाज करके,
इंसानों को चैन से सोते देखा है,
जंगलों में आग लगते,
पेड़ों को कटते देखा है,
पर, भरपूर ऑक्सीजन लेकर,
इंसानों को सांस भरते देखा है,
रोड पर कचरा,
दीवारों पर थूकते देखा है,
"एक के सफाई करने से क्या होगा?"
कहकर, इंसानों को रास्ता नापते देखा है,
कईयों को डूबते देखा है, मदद करने के बजाय,
हैवानों को फोटो, वीडियो बनाते देखा है,
नर्क मैने कहीं देखा नहीं, पर
नर्क के शैतानों को रोड पर घूमते,
टहलते देखा है।


- प्रणव राज



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गौरैया का मुकदमा

अदालत में आज अनोखा,
एक मुकदमा आया था,
वादी बनकर एक गौरैया ने,
अपना दुःख सुनाया था।

बोली "मेरा दोष बताओ,
मैंने किसका क्या बिगाड़ा ?"
फिर क्यों मेरे घर-आँगन को,
तुमने सबने यूँ उजाड़ा सारा ?

कभी छतों पर घर होते थे,
खुली हवा का डेरा था,
अब कंक्रीट के जंगल में,
खोया मेरा रैन बसेरा था।

पेड़ों को जब काटा तुमने,
मुझसे मेरा गाँव गया,
संग-संग मेरे बच्चों का भी,
सपनों वाला ठाँव गया।

सुनकर सारी बातें मानव,
कुछ पल बिल्कुल मौन रहा,
अपने ही कर्मों के आगे,
वह खुद ही खुद में शर्मिंदा रहा।

तब निर्णय यह सुनाया गया
"धरती का सम्मान करो,
जितना प्रकृति से लेते हो,
उतना उसको दान करो।"


- डॉ सारिका ठाकुर 'जागृति'



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बरसात

क्यों! तुम सारा गुस्सा उतार रही,
प्रलय जैसी हालात कर रही हो,
लोगों का जीना हराम कर रही,
आखिर क्या गुनाह किया लोगों ने!

बारिश बोली मूर्खों तुमने ही उजड़ा,
खुद ही नदिया घेरी, खाले घेरे,
काटे पेड़, मेरे सारे रास्ते कर दिए बंद ,
बता अब क्या करूं ? किधर जाऊं l

पहले जब सावन आता साथ में बारिश लाता,
धरती पर फूल खिलाता पेड़ों पर जीवन भरता ,
छतों पर बच्चे नहाते कागज की नाव चलाते ,
बारिश सबको खूब है भाती देख प्रकृति सब मुस्काते


- सुमन डोभाल



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शिकायत

वह कभी प्रेम का इज़हार नहीं करता था,
पर शिकायतों का कोई अवसर नहीं छोड़ता था।

तब समझ में आया,
कभी-कभी प्रेम शब्दों में नहीं,
इसी तरह की शिकायतों में रहता है।

एक दिन न दिखूँ,
तो वह दो दिन गायब हो जाता।
उससे शिकायत करती,
तो बड़ी सहजता से कहता
"पहले तुम तो उस दिन नहीं दिखीं थीं।"

उसकी हर नाराज़गी में
मेरा हिसाब छिपा होता था,
और हर शिकायत में
एक अनकहा अधिकार।

शायद प्रेम हमेशा
"मैं तुमसे प्यार करता हूँ" नहीं कहता,
कभी-कभी वह शिकायतों का लिबास पहनकर भी
हमारे पास आ बैठता है।


- सविता सिंह मीरा



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अधूरे जज्बात

मैं मंदिर गया
मैं मस्जिद गया
मेरी रगों में
मोहब्बत का गीत
फिर भी
ज़रे ज़रे में
बहता गया।

इश्क विश्क
थोड़ा-थोड़ा
हम भी
किसी न किसी से
करते रहे
इसीलिए गमों का
बोझ उठाए फिरते रहें।

कभी किसी को
समझाया
मान अपना
कभी खुद को
समझाया
हमदर्द
मान अपना


- डॉ. राजीव डोगरा



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मेरे प्यारे पिता जी

मेरे प्यारे पिता जी हैं,
सबसे अच्छे साथी।
मुझे खिलाते, मुझे हँसाते,
बातें करते प्यारी।
उँगली पकड़ चलना सिखाया,
सही राह दिखलाई।
गिर जाऊँ जब खेल-खेल में,
हिम्मत नई दिलाई।
मेहनत करके रोज़ कमाते,
घर में खुशियाँ लाते।
अपने दुख को भूल हमेशा,
हमको आगे बढ़ाते।
मैं भी खूब पढ़ाई करके,
उनका नाम बढ़ाऊँ।
मेरे प्यारे पिता जी को,
हर दिन शीश झुकाऊँ।


- गोपाल कौशल भोजवाल



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अभी कुछ वक़्त बाक़ी है

​सुनो! यह शाम आख़िरी तो नहीं,
कि जिसके बाद कोई सुबह न हो।
​अभी तो धड़कनों के बीच
जुदाई के दुख का धुआँ ज़रूर है,
मगर मोहब्बत का वो पुराना जादू
दिलों में हमारे कहीं कैद है।
​भले ही परिंदे थक चुके हैं,
और हवा का रुख़ भी ख़िलाफ़ है,
मगर सुनो! इसी काँपते हुए चराग़ में
अभी थोड़ा सा तेल बाक़ी है,
हमारी चाहतों का खेल बाक़ी है।
​तुम अपने शब्दों की गर्माहट से
मेरी ख़ामोश साँसों को ज़िन्दगी दे दो,
तुम अपनी आँखों की नमी से
इस सूखी हुई मिट्टी को ताज़गी दे दो।
​जो फ़ासला हमारे बीच आ गया है,
उसे एक ही क़दम में मिटा दो।
​अभी हमारी उँगलियों के पोरों में
वो पुरानी छुअन बाक़ी है,
अभी मोहब्बत के पूरा होने में
कुछ वक़्त बाक़ी है!
​सुनो! हमें हारना नहीं है,
इस बुझती हुई लौ को
फिर से एक आग बनाना है।
​देखो, अभी कुछ वक़्त बाक़ी है!


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह



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काश ! कोई सड़क

जब जब हृदय होता भावुक
मैं नील गगन तक जाती,
मन की बातें चांद में बैठी
सूत कातती अम्मा से बतियाती।
सोचती हूं अक्सर!
काश! कोई सड़क चांद तक जाती !
पलक झपकते ही होती मैं
तारों के उस मेले में,
बीनकर सपनों की कतरन
अम्मा के चरखे से
खुशियों की दरी बनवाती।
सोचती हूं अक्सर!
काश! कोई सड़क चांद तक जाती।
चंदा तेरे आंगन में,
इतनी शीतलता क्यूँ है ?
मेरा ये मन भटक रहा,
इतनी व्याकुलता क्यूँ हैं ?
रात अंधेरी है लेकिन
जलती है मन की बाती
बस में हो तो लिखकर भेजूं
तुमको मैं एक पाती।
सोचती हूं अक्सर!
काश ! कोई सड़क चांद तक जाती।
सुना है मैंने लोगों से
वहां बादल होते हैं ,
जब उमस बढ़ जाती है
वो रो देते हैं।
मैं भी मन में उठा बवंडर
बादल की तरह बरसाती,
सोचती हूं अक्सर!
काश! कोई सड़क चांद तक जाती।
इतना लंबा सफर,
आखिर कैसे कर जाते हैं ?
कहते हैं कि तारे बनकर चमकते हैं
जो मर जाते हैं।
जीवित रहकर मैं भी
अम्बर का सफर कर पाती,
मन के मीत जो बिछड़ गए
उन तारों से मिल पाती।
सोचती हूं अक्सर!
काश! कोई सड़क चांद तक जाती।


- मंजू सागर



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दो कौड़ी का शिक्षक

उस दिन जब समाचारों में
"दो कौड़ी का शिक्षक" सुना,
जाने क्यों मन रो पड़ा,
जाने क्यों कुछ भीतर टूटा।

जिसने उँगली पकड़ चलाया,
जिसने अक्षर का दीप जलाया,
जिसके शब्दों से जीवन ने
अपना पहला अर्थ पाया।

वह शिक्षक आज खड़ा था चुप,
न कोई उत्तर, न प्रतिकार,
बस उसकी नम आँखों में था
सम्मान खोने का संताप अपार।

सोचा होगा उस गुरु ने भी
"क्या इतना ही मेरा मान ?
जिन बच्चों के सपने सींचे,
क्या इतना सस्ता है ज्ञान ?"

पर सच तो यह इतिहास कहेगा,
शब्दों से गुरु छोटा नहीं होता,
जिसके कारण जग रोशन हो,
वह कभी दो कौड़ी का नहीं होता।

कौड़ी के यदि शिक्षक होते,
तो डॉक्टर, वैज्ञानिक, पत्रकार कहाँ होते ?
सच तो यह है गुरु स्वयं मिटकर भी
दूसरों के जीवन में उजाला बोते।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'



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"विरासत की गद्दी और खयाली महल"

बाप ने सींचा था उपवन, खून-पसीने के प्यार से,
बेटा गद्दी पा गया, बस विरासत के अधिकार से।
मैनेजर साहब नेक दिल, चाहते हैं कि बगिया खिले,
पर बगल में बैठे 'रिश्तेदार', बस जी-हुज़ूरी में घुले।

कंजूसी की इंतहा देखो, मैनेजर माँगे 'चाय-समोसा',
तो ये 'महोदय' सिर्फ 'चाय' थमा दें, यही इनका भरोसा।
मैनेजर तो फिर भी दरियादिल, पर ये महा-कंजूस शिरोमणि,
स्कूल के बजट की ये ऐसे, उतार लेते हैं पूरी मणी।

रिश्तेदारी की मजबूरी में, मैनेजर साहब हैं बंधे,
वरना इस पुरानी कुर्सी पर, चाहिए थे काबिल कंधे।
योग्य युवक की जगह यहाँ, एक 'चमचा' विराजमान है,
जो अपनी ही दुनिया में, खुद को समझता महान है।

चमचों की ऐसी टोली है, जो सुबह-शाम राग अलापती,
प्रिंसिपल की हर मूर्खता को, "अद्भुत प्रतिभा" है नापती।
मैनेजर उलझन में है कि, कैसे इस जड़ता को हटाए,
इन बिना रीढ़ के प्यादों को, कैसे बाहर का रास्ता दिखाए।

रात को सपना देखा कि, बाहर छात्रों का मेला लगा है,
सुबह आँख खुली तो पता चला, पुराना भी कोई भागा है।
लाइन की उम्मीद में, ये हर बार 'हग' मार जाते हैं,
फिर अपनी ही झेंप मिटाने, स्टाफ पर चिल्लाते हैं।

नकल करेंगे औरों की, पर खर्च का नाम न लेंगे,
रिपोर्ट कार्ड के नाम पर, पुराने रद्दी ही देंगे।
किसी संभ्रांत ने आजतक, स्कूल की चौखट न चूमी,
कंजूसी की ऐसी फितरत, दुनिया में और कहीं न घूमी।

ऐ मैनेजर साहब! अगर संस्थापक का सपना बचाना है,
तो इस 'अयोग्य रिश्तेदार' और चमचों को, अब घर पहुँचाना है।
जब तक ये दीमक कुर्सी पर, अपना डेरा जमाएंगे,
आप चाहे जितना जोर लगा लो, बस 'सपनों' में छात्र पाएंगे।

लिखा नहीं है नाम किसी का, जो भी जलता जाए,
समझ लेना कि ये मरहम, उसी के घाव पर भाए।


- देवेश चतुर्वेदी



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