साहित्य चक्र

17 December 2025

आज की प्रमुख कविताएँ- 17 दिसंबर 2025





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खामोशियाँ

कर देती है खामोशियाँ जब रिश्तों में घर,
लगती है फिर जिन्दगी ज्यूँ नरक का दर।
शांत,स्थिर मन में आता सुनामी सा कहर,
बन जाती खामोशियाँ, फिर धीमा सा जहर।

रहता है खामोशियों में छिपा असहनीय दर्द,
समझ जो इस दर्द को पाए, वो सच्चा हमदर्द।
बढ़ जाती तन्हाइयाँ, जो न पास हो हमसफ़र,
बन जाती है खामोशियाँ, फिर धीमा सा जहर।

गलतफहमियों का भी, बन जाती ये कारण कभी,
बाहर रखती शांत, शोर खूब मचाती भीतर दबी |
भावनाओं का हो जाता दमन, रखते-रखते सब्र,
बन जाती खामोशियाँ, फिर धीमा सा जहर।

कम हो जाती नजदीकियां, बढ़ जाती है दूरी,
संवादहीनता, औपचारिकता बन जाती मजबूरी।
बैचैनी का आलम रहता, मन पर छाया आठों पहर,
बन जाती खामोशियाँ, जब धीमा सा जहर।


- लता कुमारी धीमान


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गांव की सुबह

चौथे पहर मुर्गा बांग लगाए
सुबह होने को आई क्यों नींद में सोए जाए।
गांव की सुबह कुछ यूं ही आए।
कोयल भोर का राग सुनाए
नींद अब तो भागने को आए।
गांव की सुबह कुछ यूं ही आए।
कबूतर भी छत पर घूटर घूं करने आए
सब जग उठे तुम अब भी नींद में सोए जाए।
गांव की सुबह कुछ यूं ही आए।
गौरेया भी चीं चीं कर अपना संगीत सुनाए
उठ मुसाफिर अब तो भोर होने को आए।
गांव की सुबह कुछ यूं ही आए।
पशु भी अब  ज़ोर ज़ोर से रांभने को आए
अब तो सुबह हो गई ये अहसास जरूर करवाए।
गांव की सुबह कुछ यूं ही आए।
मोबाइल फोन का अलार्म तो बंद हो जाए
पर प्राकृतिक अलार्म कोई बंद न कर पाए ।
गांव की सुबह कुछ यूं ही आए।
हर कोई अब अपने कामों में व्यस्त हो जाए
मैं सुबह हूं जनाब अब तू क्यों घबराए।
गांव की सुबह कुछ यूं ही आए।


 - विनोद वर्मा


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थक्के हारे ये चेहरे

थक्के हारे ये चेहरे,
सुबह होते ही
खिल उठते हैं ये चेहरे,
नए ख्वाबों को बुनते है हर रोज़,
नए सपनों के साथ हर रोज़,
नए शब्दों को बुनते हैं हर रोज़,
और लिखते हैं कोरे कागज पर,
एक नई कविता को।


- सुनीता बिश्नोई


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जिंदगी के फासले

वक्त मेरी मुठ्ठी में कभी भी रहा ही नहीं,
और मैं कभी इसकी कैद से रिहा हुआ नहीं।

कितना सोचते थे कि हम छू लेंगे आसमान,
पर जो सोचा जिंदगी में वो कभी हुआ ही नहीं।

टिमटिमाते सितारों को जितना प्यार कर लें,
पर असल में कोई सितारा किसी का हुआ नहीं।

जब कभी कभार मिला पसंदीदा तोहफा,
उसमें भी रज़ा खुदा की थी मेरी औकात नहीं।

हाले पल का आनंद लेना ही है मौज़े जिंदगी,
वरना इस सच्चाई से मुंह मोड़ लेना जीना नहीं।

तय खुद ही करने होंगे सफरे जिंदगी के फासले,
वक्त के फेर से तो औलिया फकीर भी बचे नहीं।


- राज कुमार कौंडल


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डरो नहीं

फूल सा खिलो मगर,
धूप में झरो नहीं,
मृत्यु एक सत्य हैं,
डरो नहीं डरो नहीं,

सुगंध बिखेर दो यहॉँ
सुन्दर करो यह जहाँ
हँसी के आगोश में,
दुःख छुपा लो यहाँ,
काँटे है हर जगह,
विनिमय इसका करो नहीं
डरो नहीं डरो नहीं।

हो हार जीवन की
पर तुम डरो नहीं,
याद तुम्हें सब करें,
यह आश करो नहीं।
तन भले ही मरे
पर तुम मरो नहीं
डरो नहीं डरो नहीं।

जग यह नगण्य है,
न ही कुछ गण्य है
हार व जीत से ही
जीवन अक्षुण्य है
आत्मा की मोती को
ताज में जड़ो नहीं
डरो नहीं डरो नहीं।

जो भी यहाँ हो रहा,
होने दो होने दो,
एक खिवैया उसी को,
खेने दो खेने दो,
औरो की बात सुन,
व्यर्थ काम करो नही
डरो नहीं डरो नहीं

डूबने के भय से क्यों,
न हाथ मे पतवार लो,
जीवन एक नॉव है,
जिसे तुम सवाँर लो।
आँधिया हजार हो,
मन निराश करो नहीं।
डरो नही डरो नहीं।


- रत्ना बापुली


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इससे
ज्यादा पागल
न हो पाउँगा।
इतना
आवारा बादल
न हो पाउँगा।
मैं नहीं देख पाउँगा
दो आदमियों के
काम के समय से
दो घंटे अधिक
काम करना
मगर परिणाम
शून्य गुणे शून्य
बराबर शून्य?
कारण
अठारह घंटे
काम मतलब
स्वयं के साथ ज्यादती
और शोषण,
नियमानुसार
एक आदमी
का केवल आठ घंटे काम
विधि सम्मत है,
इस प्रकार
आठ घंटे के
अतिरिक्त दस घंटे
काम करना
एक आदमी की दिहाड़ी
और दूसरे आदमी कीआँखों
में दिहाड़ी की
चमक के दो घंटे
छीनना किसी अपराध से
कम नहीं है।
रोजगार छीनना
संज्ञेय अपराध है,
राष्ट्र की नींव को दरकाना है,
विकास पर ब्रेक लगाना है,
कायर और नपुंसक
इतिहास पर रोते हैं।
पराक्रमी, पुरुषार्थी
अतीत का रोना छोड़कर
वर्तमान को दृढता से मज़बूत
करते हैं
और
नापते हैं वो डग
जो बन जाती है
अनुकरणीय लीक...
जिस पर चलते हैं सब
जाति, मजहब से मुक्त होकर
त्यागकर समस्त संकीर्णतायें
निरपेक्ष भाव से...
मगर तुम
मज़बूत नहीं,
मजबूर
में अपना
अस्तित्व सुरक्षित देखते हो,
पर याद रखना मजबूर
जब मर्यादाएं लाँघता है...
तब उठती
ऊँची-ऊँची ज्वार भाटाएँ
दरकने लगती हैं
केवल अपने अस्तित्व की
रक्षा करती चहर दिवारियां...
ईमारतें करने लगती
खून की उल्टियां
याद रखना
सड़कों का नंगानाच
बहुत खतरनाक
होता है...


- राधेश विकास


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कुछ कहता हूं,
तो बात बढ़ती है।
कुछ ना कहूं !
ऐसा हो सकता नहीं।
कशमकश दिल की,
हिम्मत मेरे मन की,
उलझनें जीवन की,
कुछ परेशानियां हैं,
कुछ नादानियां हैं।
कुछ एहसास अजब हैं,
एक समंदर है भावनाओं का।
कुछ समझदारियां हैं।
कुछ फासले से हैं,
कुछ नजदीकियां हैं।
कुछ द्वंद्व हैं मन में,
कुछ अधूरे फैसले हैं!
आगे बढ़ता हूं,
तो कुछ छूट जाता है।
जो स्थिर हो जाए!
ऐसा मानव हो सकता नहीं।
कुछ जानता हूं,
कुछ सीख रहा हूं।
कुछ कल्पनाएं हैं!
कुछ संवेदनाएं हैं।
कुछ भ्रम भी हैं!
कुछ मनगढ़ंत रचनाएं भी हैं।
कुछ किस्से हैं,
कुछ कहानियां हैं।
कुछ सच्चाई भरी नादानियां भी हैं।
कुछ लिखता हूं ,
तो सच बाहर आता है
ओर न लिखूं
ऐसा ’अशोक’ हो सकता नहीं।


- अशोक कुमार शर्मा


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तुम-सा नहीं देखा
देखे हैं यहाँ लोग बहुत से
लेकिन तुम-सा नहीं देखा
पद, प्रतिष्ठा, धन मिलते ही
रूख जो तू ने यूँ बदला..
जैसे कि! वर्षों से पीछा
तुझे छुड़ाना था
बस तलाश एक मौके का था
और वो मिल भी गया
खैर! अफसोस की हमें कोई बात नहीं
ऐसा होना भी तो लाजिमी था
आखिर कितने दिन तक साथ चलता
लेकिन ये भी मत भूलो कि तुम
हम से ही निकल कर गए हो
और हम सब ने ही तुम्हें
एक पहचान दिलाई
संघर्ष के वक्त हम ही साथ थे
लक्ष्य भी तो एक ही था
लेकिन अफसोस कि
उस लक्ष्य में स्थान सीमित था
और तुम्हें वो स्थान मिल गया
इसका मतलब ये नहीं कि तुम
हम सब को अब छोड़ दोगे!
लेकिन तुम तो सचमुच में
हम सब को छोड़ दिया
इसीलिए तो चुन्नू कवि को
आज लिखना पड़ा रहा
कि तुम-सा नहीं देखा।


- चुन्नू साहा


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नहीं हूँ

थका हूँ लेकिन हारा नहीं हूँ,
हालातों का अभी मारा नहीं हूँ।

कर लेना कद्र जीते जी हमारी,
मरने के बाद तुम्हारा नहीं हूँ!

हाँ इश्क़ है तो सच में है तुमसे,
मैं आशिक़ हूँ आवारा नहीं हूँ।

कसक सी दिल में छुपी हैं कहीं,
जब से मिली हो कुंवारा नहीं हूँ।

देख लेना कोई मुझसे भी बेहतर,
शायद अब तुमको गवारा नहीं हूँ।

प्यार-व्यार की बातें व्यर्थ हैं सब,
लगता है अब तुम्हें प्यारा नहीं हूँ।

करके फासला कैसे पाओगे मुझे,
मैं इंसां हूँ कोई सितारा नहीं हूँ।


- आनन्द कुमार


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मंज़िल की तलाश में, मैं यूं ही भटकता रहा
मिली तो नहीं मंज़िल, फ़िर भी प्रश्न खटकता रहा
बीसियों बहाने बनते बिगड़ते रहे, अपने ही मन में,
दोष बिना जांचे परखें कैसे दे किसी को ?
बस यही सोचता रहा,
मंज़िल की तलाश में, मैं यूं ही भटकता रहा
मिली तो नहीं मंज़िल, फ़िर भी प्रश्न खटकता रहा...
आंख मिचौली होती रही, सोच आगे न बढ़ सकी
टीस उसकी भी,मेरे मन में बार-बार उभरती रही,
कभी मैं अपने मन को देखूं,कभी उसकी ओर देखूं
चक फेरी फिर भी वह मेरी आंखों को देती रही,
सोचता रहा मैं भी बड़ी गहराई से, उसकी ओर
तलाश उसकी फिर भी जारी रही,
कोई उत्तर पा नहीं सका, प्रश्न फ़िर भी खटकता रहा
मंज़िल की तलाश में, मैं यूं ही भटकता रहा
मिली तो नहीं मंज़िल, फ़िर भी प्रश्न खटकता रहा...
कौन पहुंचा है आज तक,अपनी आख़िरी मंज़िल पर ?
गणित में उसके मन विचलित होता रहा,
न कुछ सोच पाया और न ही अनुमान लगा पाया
अपनी ही उधेड़बुन में फंस कर,चिन्तन भी न कर पाया,
खैर छोड़ो इन बातों को, मिलेगा क्या इनसे?
यही सोच कर फ़िर भी कुछ सोच न पाया
उत्तर मिल न पाया, प्रश्न खटकता ही रहा
मंज़िल की तलाश में, मैं यूं ही भटकता रहा
मिली तो नहीं मंज़िल, फ़िर भी प्रश्न खटकता रहा...


- बाबू राम धीमान


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कितने चेहरे

न जाने कितने चेहरे लगाए,
लोग रहते है यहाँ,
एक पल जो दिखाते है,
दूसरे पल छिपा देते हैं कहाँ ?

हँसते-हँसते ठहाकों संग,
मगरमच्छी आंसू बहाते हैं कैसे ?
मन की ईर्ष्या और कुंठा पर,
मुस्कान का पर्दा गिराते हैं कैसे ?

मीठे-मीठे शब्द जाल से,
जंजाल षड्यंत्र का बुन जाते है क्यूँ ?
जहर की भर-भर कर शीशियाँ ,
शहद की चिप्पी लगाते हैं क्यूँ ?

जगजाहिर है चित्र और चरित्र ,
असलियत फिर छुपाते हैं कैसे ?
कर्म खलनायक के करके,
नायक खुद को बताते हैं कैसे ?

नहीं लायक जो देखने के भी,
वो आदर कैसे पा जाते हैं यहाँ ?
हैं जो पूजने के काबिल,
कर अपमानित ठुकराए जाते हैं यहाँ

सच्चा चेहरा रखने वाले,
नकाबपोशों का शिकार हो जाते यहाँ,
अति कठिन है पहचान कर पाना,
न जाने कितने चेहरे लोग रखते यहाँ ?


- धरम चंद धीमान


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