साहित्य चक्र

22 December 2025

आज की प्रमुख रचनाएँ- 23 दिसंबर 2025





जन्म और जंग

मुनाफाखोर, भ्रष्टाचारी अनाज
के गोदामों में आग लगाते।
गरीबी पेट की आग
बुझा नहीं पाते।

महंगी हुई हर चीज यहां,
क्या दवाई, क्या राशन,
क्या कपड़े या फिर मिठाई।

जो थे किसान पहले, मजदूर बन गए।
जो थे मजदूर अब वो भी
घर की खातिर, घर से दूर हो गए।

कैसे पले बच्चे इनके,
पहले भरे पेट, ये शिक्षा की सोचे,
दवा की जरूर शायद ना हो,
दर्द को ही दवा बनाते हैं।

ये किस्सा नहीं हकीकत है,
जो असहाय चुपचाप आंसू बहाते हैं।
दुनिया से इनको कोई उम्मीद नहीं।
इसने की कोई ताकीद नहीं।

इनका बस जन्म ही हुआ है,
अपना मत देने को।
क्या समाज, क्या देश,
कोई तैयार नहीं इन्हें सहने को।
यह जीने का जंग अनंत है,
जन्म से होती शुरू, और
मृत्यु होती इनकी, हार से
वहीं पर इस जंग का अंत है।


- रोशन कुमार झा


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ऐसा लगता है

कभी कभी लगता है कि
तुम्हे शब्दों की माला में पिरोकर
अपनी कविता बना लूँ!
या फ़िर शायरी में शामिल करके,
लिख दूं एक सुहानी ग़ज़ल!
तुम्हें अपने हृदय में बसाकर,
मंत्र की तरह कंठस्थ कर लूँ।
या तुम्हारी भक्ति से परिपूर्ण
किसी भजन की रचना करूँ।
नहीं तो अपनी प्रेरणा बनाकर
तुम्हारी हर मुस्कान पर
एक गीत ही लिख दूँ!
मेरी हर कहानी का किरदार सिर्फ़
तुम पर ही आकर सिमटेगा।
क्योंकि तुम मेरी कल्पना में शामिल
वो सुनहरे अल्फाज़ हो,
समझ लो मेरी ज़िंदगी का संगीत हो
सुर, लय और साज़ हो!
तुम एक खूबसूरत कल्पना हो
तुम ही मेरी आवाज़ हो।
अब कैसे कहूँ तुमसे मैं,
कि तुम मेरे सिर का ताज हो।
तुम जैसे भी हो क़बूल हो मुझे,
तुम सदा मेरे लिए बेहद ख़ास हो।


- आनन्द कुमार


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फ़रेबियो पर वक्त जाया न करो
विष को लब से लगाया न करो।

जो दिल तवायफखाना हो गया
टेढ़ी पूंछ में तेल लगाया न करो।

यहां अश्कों से लोग नहाने वाले है
पूरे शहर में पानी बरसाया न करो।

ये सब फकत अंधों का शहर है
आईना यहां पर दिखाया न करो।

अजाब का हल खुद तलाश करो
बहरों के इलाकों मे चिल्लाया न करो।

दरिया खुद ही तैर कर पार करना सीखो
किनारे बैठ कर हाथ पैर हिलाया न करो।

सदानंद कोई जुगनुओं से घर रौशन किया
तो तू चांद तारों से शहर को जगमगाया करो।


- सदानंद गाजीपुरी


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बरस जा मेघा

मेघ हैं जो नहीं बरसते,
पर्वत हैं बर्फ को तरसते,
नदियाँ हैं बिन पानी सब प्यासी,
घाटियों में छाई है अजब उदासी,
हैं खेत सब खाली और फसल विहीन,
हरियाली भी हुई है बहुत ग़मगीन,
दिखते हैं उद्यान पड़े सुन्न,सुनसान,
शुष्क ठण्ड से सब, बनें हैं शमशान,
मनुष्य, पशु और पक्षी, हैं सभी परेशान,
धुएं और धुल का है उठा, अंतहीन उफान,
दुआ हर दिल से अब यही उठ रही है,
अब तो बरस जा मेघा,
इंतज़ार की घड़ियाँ, लम्बी खीच रही हैं,
इंतज़ार की घड़ियाँ लम्बी खीच रही हैं।


- धरम चंद धीमान


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रात में महकी मिलेगी रातरानी
वादियों में खिल रहे सब फूल होंगे
मोर का नर्तन मिलेगा बाग में
और हर मौसम मेरे अनुकूल होंगे

मेड़ पर फूली मिलेंगी बालियां
देखना पनहर के झूले गांव में
देखना हर घर में एक तुलसी मिलेगी
बैठना तुम पीपलों की छाँव में

और इन नदियों की कलकल देखना तुम
देखना झरने पहाड़ों से झरेंगे
देखना ये आसमां के काले बादल
आँख से काजल तेरा चोरी करेगें

देखना दुनिया लगेगी खूबसूरत
साथ में गर तुम चलो तो घूम लूं।
ग़र इजाजत हो तो माथा चूम लूं
आज संडे है तो थोड़ा झूम लूं।


- विनय आनंद


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पेड़ लगाएँ, पेड़ बचाएँ

किसकी है मर्ज़ी कैसा बरपा ये क़हर है
हवा में जानें कितना घुल गया ज़हर है

हो ज़िक्र जिसको फ़िक्र इस मसले में है
घुट रही है श्वांस हर जिंदगी ख़तरे में है

बस्तियाँ सहमी दिखीं खौफ का नजारा है
फूल सब मुरझाने लगे बेबस चमन सारा है

हर गुल गुलज़ार रहें, हो माली की तैयारी
जो भूले याद दिलाना अपनी है जिम्मेदारी

जीवन चुनौती बनीं विषम पहेली मिलकर सब सुलझाएं
पेड़ लगाये पेड़ बचाये यह सन्देश जन-जन तक पहुंचाएं

पेड़ लगाएँ, पेड़ बचाएँ... पेड़ लगाएँ, पेड़ बचाएँ....


- नरेन्द्र सोनकर बरेली


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हिंदुस्तान की जान अरावली

जिंदगी में इतनी आपाधापी हो गई,
खड़ी-खड़ी अरावली अपराधी हो गई।

वर्षों के सारे रिश्ते शर्मसार हो गए,
अरावली के सीने आर पार हो गए।

सरकार को इतना अधिक प्यार हो गया,
कि अरावली का खड़ा होना दुश्वार हो गया।

राजस्थान की शान हिंदुस्तान की जान,
अब तो खत्म हुआ तेरा अभिमान।

हर किसी को एक दिन नेस्तनाबूद होना है,
न चाहते हुए भी अरावली होना है।

आएगा एक दिन पूरा देश इसकी जद में,
सरकार करो ना ऐसा फैसला खून खराबा हो।


- मनोज कौशल


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परदे सब हट गए

ये जो एक कोमल-सा क़िस्सा है
उसमें सचमुच थोड़ा-थोड़ा मेरा भी हिस्सा है

जिस तरह चुप हैं सब, चुप हूँ मैं भी
जिस तरह देख रहे हैं सब, देख रहा हूँ मैं भी

जिस तरह डर रहे हैं सब,डर रहा हूँ मैं भी
देख-देख हत्यारों के हाथों में धर्मग्रंथ

नाच जो हो रहा है, हो रहा है सड़कों पर ही
परदे सब हट गए या हटा दिए गए हैं

पत्ता-पत्ता हाॅंफ रहा है,काॅंप रहा है
और यक़ीनन मैं भी।


- राजकुमार कुम्भज


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जीवन-नदिया

लाख भँवर 
जीवन- नदिया के
पर्ण-सी है जिंदगी 
उबर जाएगी
लाख लहरें समाज की
करवट बदल- बदल
डूबोने की करें
कोशिशें
हौंसलों से अपने
उबर जाएगी।
यूँ भी 
कब जिंदगी
इक धार में बहती है
कभी 
मंद-मंद खामोश
सफर तै करती
कभी अपनी ही
साँसों से
झगड़ती है
मगर...
हर बार डूब कर
उभर ही जाती है।
छोड़ आएगी 
नक्श अपनी करनियों
के
पानियों पर भी 
कहानी लिख जाएगी
जिस राह से
गुजरेगी 
ये पर्ण-सी जिंदगी
आँधियों से लिपट
तुफानों से
भिड़ जाएगी
पर्ण-सी जिंदगी ही सही
अपनी राह खुद
बनाएगी।


                            - डॉ. नीलम


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मुफलिसी में

गायब होते ही धूप के, साथ छोड़ गया अपना साया,
आया दौर मुफलिसी का, अपनों ने भी हाथ छुड़ाया।

खाकर कसमें जो कहते थे, हैं नहीं हम मतलबी,
गुजर गये पास से ऐसे, हों जैसे कोई अजनबी।
लगाई अपनी जिन्दगी, जिनकी जिन्दगी बनाने में,
हैं मशगूल वो हमें भूल, किस्से तरक्की के सुनाने में।

किये थे सजदे हमने, मांगी थी जिनके लिए दुआएं,
चढ़ते ही शोहरती चश्मा, वो गिरगिटी रंग दिखाए।
थकते नहीं थे जो दे-देकर, दोस्ती की अजब मिसालें,
भूल गये सब वो, कृष्ण-सुदामा की बातें करने वाले।

बनाकर उन्हें इज्जत काबिल, खूब दिया ऐशो-आराम,
मेरे मुफलिसी दौर में, हो गये सब क्यूँ नमक हराम।
गुजर जाएगा ये भी, फिर एक दौर नया आएगा,
शतरंजी इस दुनिया में जाने, फिर कौन मात खायेगा।

गायब होते ही धूप के, साथ छोड़ गया साया भी,
आया दौर मुफलिसी का, हाथ छुड़ा गये अपने भी।


- लता कुमारी धीमान


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मोह

मोह भ्रम है पालता
खोने का डर है दिखाता।

हर वक्त करीब करीब रहते
कहीं खो न जाए बस यही है कहते।

सबसे दूर हो जाते
पर मन की चाह पर काबू नहीं पाते।

डरावना सा मुहाल बना रहता 
दूरी बढ़े तो खोने का डर है लगता।

जिसकी चाह मन में पालते 
बस उसी के साथ की तमन्ना जताते।

विवेक बस में नहीं हो पाता 
वही दुःख का कारण बन जाता।

मन स्वार्थ से भरा होता 
फिर क्या चिंता और बेचैनी ही पाता।

मोह जहां जहां है पलता 
वहीं गलतफहमियों का जन्म है होता।

इस जाल से बाहर जो है निकलता 
उसका जीवन ख़ुशी ख़ुशी है बीतता।


- विनोद वर्मा


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हां, मैं औरत हूं…

हां, मैं औरत हूं,
जो खुद के बारे में नहीं सोचती,
हर किसी की ख्वाहिशें पूरी करना
जिसका मकसद बन गया है।
मां बनकर, बहन बनकर, बेटी बनकर,
सबके हिस्से के फ़र्ज़ निभाती हूं,
पर मेरी कौन सुनता है,
ये सवाल अक्सर खामोश रह जाता है।
दर्द मुझे भी होता है,
पर इसकी परवाह कौन करता है?
पूरे घर के लिए जीती हूं मैं,
बीमार पड़ जाऊं तो भी
मेरा हाल कोई नहीं समझता है।
हां, मैं औरत हूं,
ऑफिस जाकर काम करना मेरी मजबूरी है,
घर संभालना मेरी जिम्मेदारी है,
सबका ख्याल रखना
मेरा कर्तव्य मान लिया गया है।
पर मेरे बारे में कोई ना सोचे-
ये सबकी आदत बन चुकी है।
हां, मैं औरत हूं,
दिन-रात की परवाह किए बिना
सबको खुश करने में लगी रहती हूं,
हर रिश्ता मुझे ही निभाना है,
क्योंकि…
मैं औरत हूं।


- गरिमा लखनवी


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