साहित्य चक्र

28 March 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 28 मार्च 2026






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'सब एक साथ'

सब अलग-अलग हैं-
झंडों के रंग में,
भाषण के शोर में।

पर भूख के सामने
सब एक जैसे हैं-
खामोश।

एक कहता है विकास,
दूसरा सुरक्षा,
तीसरा न्याय-
और थाली तीनों के बीच
खाली।

चुनाव आते हैं,
तो गरीब
याद आता है,
चुनाव जाते ही
गरीब
आंकड़ा बन जाता है।

वे लड़ते हैं
कुर्सी पर,
हम लड़ते हैं
रोज़ी पर।

इसलिए
हम किसी एक से नहीं,
पूरी राजनीति से
सवाल करते हैं-
क्यों हर बार
वादा जीतता है,
और आदमी हारता है ?


- प्रिंसी यादव


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यादों के तराने गूंज रहे हैं, मेरे दिल में, ऐ दोस्त!
अनजाना सा दर्द उठता है कभी-कभी
खालीपन सा छा जाता है मन पर कभी-कभी
पर फिर भी दिल को दे जाता है एक सकून

कभी बह जाता हूं यादों के दरिया में
कभी तैरता हूं लहरों पर,
कभी खो जाता हूं ख्वाहिशों में
एक अनजाना सा दर्द फ़िर भी होता है महसूस

झूम उठती हैं यादें मेरे दिल में ऐ दोस्त!
बचपन की खुशबू भर जाती है रगों में,
बीते हुए लम्हें जब आते हैं पास मेरे
खुशी की लहरें उठती हैं दिल के कोरों में,

बन कर गुलकारी यादों की
रंग भर देती है,
तस्वीरें बनती हैं दिल की आँखों में
यादों के फूल खिलते हैं,दिल के बाग़ में
यादों के तराने फ़िर भी गूंज रहे हैं मेरे दिल में ऐ दोस्त!


- बाबू राम धीमान


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आधुनिक युग की मीरा- महादेवी वर्मा

आधुनिक युग की मीरा,
छायावाद की चौथी स्तम्भ,
कवयित्री, शिक्षिका गद्यकार,
ज्ञानपीठ, पदम् विभूषण विजेता,
जयंती पर तुम्हारी,
शत-शत नमन तुम्हे बारम्बार।

संघर्ष की प्रणेता,
सन्यासी जीवन प्रेरणा देता,
साहित्य जिनका कर्मक्षेत्र,
नारी वेदना, विरह वेदना,
सदा रहा जिसका आधार।
जयंती पर तुम्हारी,
शत-शत नमन तुम्हें बारम्बार।

लेखन, संपादन, शिक्षण,
रहे तुम्हारे प्रखर हथियार,
कुरीतियाँ रही निशाने पर,
थी पीड़ा की तुम कलमकार,
जाग तुझको दूर जाना,
स्वतंत्रता सेनानियों को जगाया बार-बार,
जयंती पर तुम्हारी,
शत-शत नमन तुम्हे बारम्बार।

दुःख,पीड़ा, संघर्ष की गाथा,
निहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत,
का हर शब्द सुनाता,
“मेरा परिवार, स्मृति की रेखाएं, पथ के साथी,
का हर पन्ना जीवन राह पर चलना सिखाता,
है खजाना रहस्यवाद, प्रेम, करुणा का,
तुम्हारे सृजन में अपार,
जयंती पर तुम्हारी,
शत-शत नमन तुम्हें बारम्बार।


- धरम चंद धीमान


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पाग़ां रा सूरज

बच्चेयाँ रे हूण हुई गए पेपर,
हूण सारे हुई गईरे मस्त।

पूरा साल पढ़ाईया कने थे दिमाग पस्त,
थोड़ा घूमी फिरी कने हूंणा दिमाग चुस्त।

हूण कोई नानके ता कोई बुआ ले,
ता कोई मासिया ले होई रे मस्त।

कोई नी हूण प्यागा उठदा,
सौणे बिच ई हूण सारे मस्त।

पढ़ने रा नियां हूण फिकर फाका,
खेलां बिच ई रहन्दे हूण मस्त।

रिजल्टा रा फिकर अजकले कट ही करदे,
रहन्दे सारे बच्चे अप्पू बिच ही मस्त।

कोई कोई अऊंदे हल्ले बी स्कूला जो,
लाइब्रेरिया रियाँ कताबाँ पढ़ने च रहन्दे मस्त।

पर से जे करदा हर बेले तगड़ी मेहनत,
तिसरे पाग़ां रा सूरज कदी नी हुँदा अस्त।


- राज कुमार कौंडल


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इज़हार के ख़ौफ़ में डूबा डूबा,
लबों को जुंबिश भी नहीं देता है।
इंसान बड़ा अजीब सा है,
ख़्वाबों में जीता रहता है,
ख्याली इंसान की सुरत को,
दिल में बसाए चाहता रहता है।
ख़्वाबों के तारों में उलझा,
हर पल भटकता रहता है,
चाँद को मालूम  ही नहीं है,
चकोर उसे तकता रहता है।
भावनाएँ हैं ये गहरी सी हैं,
सैलाबे मुहब्बत उमड़ता रहता है,
इज़हार के ख़ौफ़ में डूबा डूबा,
लबों को जुंबिश भी नहीं देता है।
निगाहों में वो हसीन ,मासूम,
ख़यालों में समाए रहता है,
आतिशे इश्क़ में वो नादान,
पल हर पल ही मरा जाता है।
हक़ीक़त की दूरियों को वो,
कभी मिटा ही नहीं पाता है,
ख़्वाबों की दुनिया में ही,
जज़्बात  लुटाता रहता है।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद


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दर्दे दिल यू सबको सुनाना

दर्दे दिल यूं सबको सुनाना अच्छा नहीं अब लगता है
हंस हंस के यूं दर्द छुपाना अच्छा नहीं अब लगता है

क्या बतलाएं इश्क में हमने कौन से जख्म नहीं खाए
जख्मी दिल यूं सबको दिखाना अच्छा नहीं अब लगता है

जब से दूर गए तुम मुझे हाल हुआ दीवाने सा
तेरे बिन यूं सजना सवरना अच्छा नहीं अब लगता है

अच्छा हुआ तुम भूल गए सारी कसमें उन वादों को
भूली कसमें याद दिलाना अच्छा नहीं अब लगता है

जलती है गर इश्क में समा जल जाने दो तुम साहिल
राहे वफा में दिल को जलाना अच्छा नहीं अब लगता है


- इसरार साहिल


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मैं नीर भरी बदली

मैं नीर-भरी नीरव बदली,
व्योम-विहग की व्यथा अनोखी;
निशि के नीरव नील नयन में
ढूँढ़ूँ अपनी छवि लोकोत्ती।

पीड़ा की पायल पहने मैं
चलती पथ पर मौन अकेली,
स्वप्न-शशि की शीतल छाया
साथ निभाए बन अलबेली।

अश्रु-अंकित उर की वीणा
करुण रागिनी रोज़ सुनाती,
विरह-वेदना के वन-प्रांतर
मेरी स्मृति-सरिता बह जाती।

ओ अनदेखे! ओ अज्ञाते!
किस लोक-दीप में तुम छिपे ?
मेरे अंतर के निर्जन में
किस मधु-स्मिति से तुम निपे ?

क्षणभंगुर जीवन की रेखा
रेत-तट पर लिखती जाऊँ,
लघु लहरों में लय पाकर
अनंत-नील में खोती जाऊँ।

मैं नीर-भरी नीरव बदली,
बरसूँगी बन मौन करुणा
जब तक अंतर का तम न टूटे,
जब तक मिल न जाए तरुणा।


- डॉ सारिका ठाकुर 'जागृति'


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संचय

हम शहर से तेरे आ गए तो मगर,
सुन मेरे साथिया दिल वही रख दिए।
देख जबसे लिए तुझको यह दो नयन
इस अधर ने सखे प्रीत रस चख लिए।

तुझको छू न सके पर तसल्ली तो है
तेरी परिधि में हम तो समा भी गए,
साथ तेरा मिला बस क्षणिक ही सही
इस ह्रदय में तुझी को बसा आ गए।

प्रज्वलित कर दिए बाती यूँ प्रेम की
लौ से उसकी तुम रौशन जगत कर गए।

हम शहर से तेरे आ गए तो मगर...

यह पवन सुन प्रिये अभी कह कर गई,
हाल तेरा भी कुछ-कुछ हमारे सा है,
कैसे कह दे सखे अपने एहसास को
हाल मेरा भी अब तो तुम्हारे सा है।

इस हृदय ने संचित किये हर क्षण हर पल
धार उसको ह्रदय मे सनम आ गए।

हम शहर से तेरे आ गए तो मगर...
सुन मेरे साथिया दिल वही रख दिए।
देख जबसे लिए तुझको यह दो नयन
इस अधर ने सखे प्रीत रस चख लिए।


- सविता सिंह मीरा


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आदत

मुझ तुम संग
रहने की आदत है।
मुझ तुमसे बाते
करने की आदत है।
मुझ तुम संग सब
कहने की आदत है।
मुझ तुम संग
जीने की आदत है
मुझ तुम संग हर लम्हा
बीताने की आदत है।
मुझ तुम संग मस्ती में
खोने की आदत है।
मुझ तुम संग
मुस्कुराने की आदत है।
मुझ तुम संग हर खामोसी
कहने की आदत है।
मुझ तुम संग हर गम
भुलाने की आदत है।


- डॉ. राजीव डोगरा


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पीछा नहीं छोड़ेगी हताशा

खमोश सी ठंडी सर्द रात में दरवाजे पर दस्तक हुई
कम्बल लपेटे कांपते कांपते मैंने दरवाजे की कुंडी खोली
बाहर खड़ा था कोई साया थर थर कांप रहा था
मैंने धीरे से पूछा कौन हो तुम मैं हूँ हताशा वह बोली

मैं एकदम से डर गया लगा करने दरवाजा बंद
वह बोली डरो मत मुझसे मैं हूँ यहां बिल्कुल अनजान
अंदर आकर वह सोफे पर बैठ गई ठंड से परेशान
बगल में कुछ छुपाया था उसने जब गया मेरा ध्यान

अंदर ही अंदर डर रहा था पर बाहर हौसला दिखा रहा था
कहीं पिस्तौल तो नहीं मन ही मन सोच कर घबरा रहा था
हताशा बोली ठंड बहुत है क्या एक कप चाय मिलेगी
क्या करेगी वह मुड़ मुड़ कर देखता किचन को जा रहा था

चाय पीकर हताशा बोली क्यों इतना घबरा रहे हो
चेहरे से तुम्हारे लग रहा मन की बात छुपा रहे हो
मैंने कहा मुझे किसी का डर नहीं क्यों घबराउंगा
कुछ नहीं है मेरे दिल में क्या तुमसे छुपाऊँगा

मैं तो खुश रहता हूँ मन पसंद का खाता हूं
घूमने का मन हो तो कहीं भी चला जाता हूँ
सेवानिवृत हूँ अब नहीं कोई बंदिश किसी की
माता पिता की छत्रछाया में समय बिताता हूँ

हताशा ने बगल से कुछ निकालते जोर का ठहाका लगाया
वह क्यों हंस रही थी यह मैं समझ नहीं पाया
बोली यह सूची है उनकी जो रहते हैं हताश
उत्सुकतावश मैं अपना नाम देखने उसके नज़दीक आया

हताशा बोली इस सूची में है उनके नाम जो है जिंदगी से निराश
कभी किसी ने मुस्कुराते नहीं देखा उनको रहते हैं हताश
तुम्हारा नाम नहीं है क्योंकि तुम हो जिंदादिल इंसान
चली मैं अब उनके पास जिन्हें जीवन से नहीं है कोई आस

हताशा चुपके से उठी कमरे से बाहर निकल गई
दम घुट रहा था उसका मेरे कमरे में थी विराजमान आशा
उम्मीद रखना मत पास आने देना तुम निराशा
वरना चिपक जाएगी पीछा नहीं छोड़ेगी हताशा


- रवींद्र कुमार शर्मा


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आखिर क्यों 

मन में किसी के प्रति कोई द्वेष नहीं
फिर भी गुनाहेगार होते हर कहीं।
गुनाहेगार कौन ये जानते हैं सभी
पर ये बात मुंह पर कही नहीं कभी।
अपने भले बुरे की जानकारी जब है होती
दुनिया तब जीने की राह में रोड़े है ढोती।
हक की बात जब जब कही
खरी खोटी भी सुनते जिससे उम्मीद थी ही नहीं।
बुरा तो वही बनता जिसने अपनी बात कही
फिर भी बदले की भावना उसमें नजर आई नहीं।
जिंदगी एक फूल की तरह खिलती है यहीं
मुरझाने के बाद यहां नजर आती भी नहीं।


- विनोद वर्मा


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उड़ने के लिए

परिंदा जन्म लेता है उड़ने के लिए,
अनंत नीलिमा को चूमने के लिए,
वो उड़ता है सलाखों को तोड़ कर,
जाता है आसमान में, वापस न आने के लिए,
वो स्नेह का भूखा नहीं है,
इसीलिए तो अभी तक रुका नहीं है,
उसे संकेत मत दो कि वो वापस आ जाए,
इंसानों की तरह वो भौतिकवाद का भूखा नहीं है,
उड़ने दो उसको तन के,
वह लौटेगा नहीं बिना मन के,
उड़ने दो उसको दूर कहीं गहन में,
जीने दो उसे आजादी तन के।


- प्रणव राज


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नहीं है कोई उत्तर

युद्ध के पास नहीं है कोई उत्तर
वह जो ख़ुद ही एक सवाल है आजीवन
किसी को भी,कोई भी उत्तर देगा ही क्या
क़ीमत और उत्तर तो देते हैं नागरिक
लड़ते हैं,मरते हैं देश के लिए दिन-रात
और फिर एक दिन कर दिए जाते हैं दफ़न
कभी विश्व-शांति के नोबेल सम्मान में
तो कभी तुच्छ-अभिमानी आत्मसम्मान में
तब हुई प्राणों की क़ीमत क्या ?


- राजकुमार कुम्भज


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वो मार देंगे

मैं हिंदू लिखूंगा,
तो वो मेरी जाति पूछ लेंगे।
मैं जाति लिखूंगा, तो वो
उच्च-नीच का भेद खोज लेंगे।
और मेरी जाति या जात
उनके अनुसार छोटी
या नीच निकली,
तो वो मुझे 'मार' देंगे।


- दीपक कोहली


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