साहित्य चक्र

19 December 2025

आज की प्रमुख रचनाएँ- 20 दिसंबर 2025




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जहाँ मौन भी लड़ता है!
चेतन- अवचेतन

बाहर मौन, भीतर रण छाया,
अनदेखा युद्ध निरंतर आया।
न शस्त्र, न शंख, न ध्वज, न तीर,
फिर भी जीवन घायल गभीर।

चेतन बोले- आगे बढ़ना,
नव पथ चुनना, भय को छोड़ना।
अवचेतन चुप, पर दृढ़ खड़ा,
कहे- पुराना दर्द बड़ा।

तर्क कहे- अब खतरा नहीं,
भाव कहे- यह राह सही नहीं।
एक खींचे कल, एक आज पुकारे,
मन दो धाराओं में बिखरारे।

अवचेतन दोषी नहीं यहाँ,
वह तो रक्षक है, बूढ़ा सा।
सुरक्षा माँगे, शांति चाहता,
जीवन को जोखिम से बचाता।

जब चेतन ने आदेश त्यागे,
और संवाद के दीप जगाए,
तब डर पिघला, मौन खुला,
भीतर का युद्ध शांति में ढला।

जो इससे भागा, स्वयं से हारा,
जो समझा, उसने राज सँवारा।
बाहर जीतना सरल कार्य,
भीतर मिलना-यही आधार।


- नरेंद्र मंघनानी


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मन ही मन 
से जुड़ गया था

न जाने कैसा 
रिश्ता था
मन ही मन से जुड़ 
गया था
मन ने तो चाहा एकाकी
रहना था
पर उसके चेहरे ने
ही ना जाने
क्या कहा था
मन अपने ही वश में
फिर कहाँ रहा था।

थी खामोश नदी
की धारा
चाँद भी चुपचाप
बादलों में
जा छुपा था
हवाएँ चुपचाप जुल्फों
को सहलाने लगीं
रोम-रोम में फैली
सिहरन
मन के भेद लगी
खोलने
प्यार की मीठी 
अगन में जलते
मन ही मन से जुड़
गया था।

ना जाने कैसे आँख
के झरोखों के
पलक-पर्दा हिला था
दो मंत्रमुग्ध नयनों
से मिलन हुआ था
हड़बड़ाकर हया ने
अवगुण्ठन डाल लिया
पर रक्ताभ चेहरे
पर लिखा
प्यार का इजहार 
साया हो गया था
मन ही मन से 
जुड़ गया था।

धड़कनें बदहवास
सीने से
निकलने को
बेकरार
साँसों में शर्म का
फेरा था
लबों की खामोशी
ने ना जाने
क्या बोला था
खामोशियों ने जज्बातों
को खोला था
लरजता हाथ हाथ से क
क्या मिला 
दो बदन जुदा मगर...
मन ही मन से जुड़
गया था।


                                    - डॉ. नीलम


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नशीली नींद

नशे के खिलाफ अब ये हुंकार काबिले तारीफ है,
नशा नाश है जीवन का इसको मिटाना जरूरी है।

ये हुंकार नशे के खिलाफ जंग में एक वार है,
इस जंग में हर इंसान का शामिल होना जरूरी है।

नशे का हाथ पड़ गया है आज हर गिरेबान पर,
गिरेबान तक पहुंचे हाथ को तोड़ना जरूरी है।

कितने परिवार नष्ट हो गए इसकी मार से,
उनके जख्मों पर मरहम लगाना जरूरी है।

चाहते हैं अगर मेरे देश का युवा रहे तंदुरुस्त,
तो इस नशे का नाश हर हाल में जरूरी है।

इस तरह की चोट जो इस नशे के खिलाफ हुई है,
वक्त से नशे पर ऐसी चोट पड़ना बेहद जरूरी है।

आज जगाया आपने सबको नशे के खिलाफ,
इस नशीली नींद से सब का जागना जरूरी है।


- राज कुमार कौंडल


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जलन

जो बराबरी नहीं कर सकते 
वो बदनामी आसानी से कर लेते।
घुट घुट कर बातें हैं करते 
दूसरे के जीवन कौशल से है जलते।
एक पल बेकार नहीं जाने देते 
सफलता की  सीढ़ी चढ़ने
वालों पर तंज भी है कसते।
जलन तो बड़ी है करते
पर इसके अलावा कुछ नहीं कर सकते।
ये इंसान के अवगुण है होते
जो आसानी से नहीं है छुपते।
लाख कोशिश जलन छुपाने को करते
पर कहीं न कहीं उसके अवशेष रह जाते।
रंजिश की जगह रीस करना अगर सिखते
तो दुनिया की भीड़ में वो पीछे नहीं दिखते।
गर बराबरी नहीं कर सकते
उनके जीवन के सफल तरीकों को तो हर लेते।
दोस्तो जीवन सफल वही है बनाते
जो दिन रात मेहनत करने में ही बिताते।
मेहनत करने की आदत जो नहीं है पालते
"विनोद" दूसरों के सुख की
पीड़ा से वही है कहराते।


- विनोद वर्मा


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तुमने क्या रख दिया है यहां घोल कर?
यहां परिंदे नहीं आ रहे हैं चल कर।

इतना खौफजदा मंजर कर दिया है यहां
की अब कफस में भी जी रहे हैं डर कर ।

सितमगर के ताप से चमन सुख गया है;
माली फलक देख रहा है अंशु भर कर।

जहां हरियाली है, रुख है घटाओ का
दरार है नहीं देखा है वहां से गुजर कर।

पत्थर भी खूब आजमाइश कर रह हैं ;
चेहरा देखा नहीं कभी आईना बदल कर ।

लबों पर पपड़ी पड़ गया खामोशियों से;
कभी शबनम नही देखा है ठहर कर।

दयार में इतने धुंध छाए है” सदानंद” की;
कभी सुहाना रुत नहीं देख है निकल कर।


- सदानंद गाजीपुरी


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ये दोस्ती

विश्वास, प्रेम बढ़ाती, करा देती दिलों का मेल,
खूबियों को निखारती, खामियों को जाती झेल,
जिन्दगी की कठिन राहों पर, है साथ निभाती,
बुरे वक्त में ढाल बने जो, वही दोस्ती कहलाती।

एक-दूजे का मान है होता, डिगता नहीं ईमान,
भाव निस्वार्थ जगता, रिश्ता बन जाता है शान,
निराशा के बादल छाते तो, है हौंसला ये पोषती,
जीवन पथ जो संवारती, वही कहलाती दोस्ती।

हाथ थाम ले मुसीबत में, रोते को भी जो हँसाए,
सूनी जीवन बगिया में, बहार ख़ुशी की ले आए,
गिरते की हिम्मत बंधाती, कभी न उसे कोसती,
भटके को राह दिखलाती, वही कहलाती दोस्ती।

बिन कहे ,बिन देखे ही, जो मनोभाव पढ़ जाए,
कैसे भी हालात हो फिर, हर पल साथ निभाए,
आत्मविश्वास का दीप जलाती, मन नहीं मसोसती,
टूटती आस जिन्दा कर दे, वही कहलाती दोस्ती।


- लता कुमारी धीमान


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मांडवी बोल उठी

जनकनंदिनी सीता कहलायी,
उर्मिला की साधना भी गायी,
पर मेरे हिस्से मौन रहा
मैं थी, मैं हूँ, पर कहीं न बतायी।

भरत का संग था संकल्प,
उनका वनवास मेरा भी तप,
मैंने भी रत्नजटित सुख त्यागे,
पर मेरे व्रत पर न श्रवण हुआ,
न कोई कथानक रचा गया।

राजमहल का हर कोना पूछे
क्या प्रेम की परिभाषा मैं नहीं?
क्या मेरी प्रतीक्षा अनाम रही,
क्या स्त्री वही, जो सीता कही?

उर्मिला ने लक्ष्मण को समझा,
विरह में भी स्नेह बरसाया,
मैंने भी हर क्षण भरत की पूजा,
पर मेरी पीर को शब्द न पाया।

ना चित्रकूट गई, ना वन-पथ अपनाया,
पर मन ने बनवास स्वयं ओढ़ लिया,
हर दीप, हर पूजा में उनका नाम जपा
क्या यही कम था, जो मैंने किया?

शब्दों की सीमाएँ मेरी कथा चुराती रहीं,
इतिहास की दृष्टि मुझे अनदेखा करती रही,
पर एक स्त्री जानती है दूसरी का मौन
वही मौन अब बना मेरा स्वर, मेरी पहचान।


- सविता सिंह मीरा


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ऐसा गांव

वो भी क्या दिन थे जब हम ऐसे गांव में थे रहते
जहां रिश्ता लगा कर थे सब को बुलाते
कोई बंदिश नहीं होती थी ऐसा था ज़माना
बेरोक टोक एक दूसरे के घर थे आते जाते

छोटे थे जब पड़ोसी के घर थे खाना खाते
भरी दोपहरी में कई बार वहीं थे सो जाते
टाट पर बैठते थे स्कूल में कलम दवात के साथ
दोपहर को धोते थे पट्टी धूप में थे सुखाते

त्योहार के दिन हर घर में बनते थे पकवान
घर में रौनक होती थी आते थे बहुत मेहमान
पड़ोसियों के घर भी दे आते थे अपने घर का बना
पड़ोसी भी दे जाते थे खाने का बहुत सामान

फसल बीजने से लेकर कटने तक करते थे मिलकर काम
पीछे न रह जाये कोई रखते थे एक दूसरे का ध्यान
बैलों की घण्टियों से गूंज उठते थे खेत खलिहान
आगे बैल पीछे हाली खुशी से झूमते गाते थे किसान

बिजली तो थी नहीं लैंप की रोशनी में होती थी पढ़ा
शक्कर बांटी थी जब पहली बार बिजली थी आई
पानी घड़ों में लाना पड़ता था दूर बौड़ी और कुएं से
गर्मियों में बौड़ी पर पानी के लिए हो जाती थी लड़ाई

बसंत में झूले में झूलने को लगती थी कतारें
दधोनु में जब कढ़ता था दूध बनती थी मोटी मलाई
दधोनु के नीचे लगा जला दूध होता था बहुत स्वादिष्ट
उसे खाने के लिए बच्चों में हो जाती थी लड़ाई

घरेलू पशुओं के रखे होते थे प्यार के नाम
बुलाते थे जब उनको नाम से तो खड़े हो जाते थे कान
प्यार से तो जीती जा सकती है दुनियां भी
आदमी मतलबी प्यार से जानवर भी बन जाते हैं गुलाम

कितने भोले होते थे लोग कितने भोली उनकी बातें
ऊन के कम्बल में गुजरती थी वह जाड़े की शरद रातें
सुख दुख में होता था सारा गांव एक साथ
रिश्तेदार बहुत आते थे अक्सर होती थी मुलाकातें


- रवींद्र कुमार शर्मा


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मेरी परिभाषा

मैं तो अनंत हूँ आकाश की तरह,
मेरा छोर पाना इतना आसां नहीं,
यहाँ से वहाँ तक मैं ही व्याप्त हूँ,
सारे हल है विवेक में कोई सवाल नहीं,
हार जाते है सारे विषय मेरे तक आकर,
प्रलोभन मात्र भी नहीं,
सकारात्मक ऊर्जा स्वभाव से हूँ,
किसी मुकाम की तलाश नहीं,
अपूर्ण में भी मैं सम्पूर्ण हूँ,
आश्रित नहीं,आसक्त नहीं,
विषय भोग से विरक्त हूँ ,
इक स्वतंत्र सामराज्य हूँ,
स्पष्ट ज्ञान की परिभाषा हूँ,
स्वयं में परम आन्नदित हूँ,
अनादिकाल से शाश्वत हूँ,
अंश हूँ परमाणु का, कण का,
तने का, वृक्ष का,
चेतना का, बह्म का,
संस्कार का, संस्कृति का,
पाश्चात्य में रहकर,
भारत की जन्मभूमि में,
अंशिता का 'अंश' हूँ।


- अंशिता त्रिपाठी


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व्यभिचार कभी सदाचार का
रूप नहीं ले सकता,
निकृष्ट, घिनौनी सोच व्यक्ति की
दुष्कर्म की पशुतुल्य भावना
हैवानियत पर उतर जाता है कैसे मानव ?
पलभर में, कोई सोच भी नहीं सकता
व्यभिचार कभी सदाचार का
रूप नहीं ले सकता...
कैसे खो देता है, आत्म संयम अपना
पल भर में मानव,
कोई सोच भी नहीं सकता,
कदम उठाने से पहले अपने परिवार
माता, बहन और बेटियों की ओर
देखता क्यों नहीं ?
क्षणिक प्यार की अनुभूति पाने के लिए
कैसे हवस शान्त करने के लिए ?
हैवानियत पर उतर जाता मानव
कोई सोच भी नहीं सकता ?
व्यभिचार कभी सदाचार का
रूप नहीं ले सकता...
कदम उठाने से पहले अपने गिरेबान में
कोई झांकता क्यों नहीं ?
कुकर्म, दुष्कर्म करने पहले अंजाम
पर तनिक सोचता क्यों नहीं ?
रहना तो उसी समाज पड़ता है
फिर भी उसके प्रभाव को
अपनी आंखों से अनुभव करता क्यों नहीं ?
इस जटिल और जवलंत मुद्दे पर
हम अपनी लेखनी से बेवाक चिन्तन और चर्चा
कर समाज को जागरूक करते क्यों नहीं ?
क्या आपको नहीं लगता कि इस तरह के
मुद्दे पर हमें संजीदगी से लेखनी चलानी चाहिए,
समाज में रहते हुए क्या सभी को जागरूक नहीं
करना चाहिए ?
हैवानियत को कैसे रोक पाए?
कोई सोचता क्यों नहीं ?
जड़ से कैसे मिटाएं इस जघन्य अपराध को ?
क्या कोई सोच भी नहीं सकता ?
समाधान कैसे हो इस समस्या का ?
निदान इसका बता नहीं सकता
व्यभिचार कभी सदाचार का
रूप नहीं ले सकता...

- बाबू राम धीमान



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सच्चा आनंद
करो निरंतर स्वाध्याय
रहो नित्य योग- प्राणायाम में संलग्न
परोपकार का तुम्हारे ह्रदय में भाव हो
महापुरुषों का करो नित्य सत्संग
हे मानव ! ईश्वर का सुमिरन भी
तुम भूल न जाना
अगर सच्चा आनंद जीवन में पाना है
वर्तमान में जीना तुम
प्रकृति से जुड़े रहना तुम
जीवन में सदैव रहना कृतज्ञ तुम
सकारात्मक सोच से जीवन जीना तुम
अगर सच्चा आनंद जीवन में पाना है
अपना कर्तव्य सदैव करना होगा
सन्मार्ग पर चलना होगा
दान-तप कर स्वयं को करो निष्पाप
निरंतर भजन- कीर्तन से
प्राप्त होगा आत्म साक्षात्कार
पवित्र -पावन आत्मज्ञान का होगा प्रादुर्भाव
मोक्ष का दिव्य स्वप्न होगा साकार
जो है अनंत,चिरस्थायी आनंद का आधार


- प्रवीण कुमार


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वो लड़की

ओझल हुए कुछ सपनों में
नई उम्मीदें डाल रही है
वो लड़की हमें पहचान रही है।
अपने प्रेम का इजहार वो कुछ यूं करती है
वो मेरे लिए ही मुझसे लड़ती है।
उसको कोई दिक्कत नहीं है जमाने से
दिक्कत है तो वो हमारे ना मुस्कुराने से
हिलोरे लेते नदी रूपी इस जीवन में
संयम और विश्वास का पुल बांध रही है
वो लड़की हमें...
उसकी उम्मीदें जैसे पूरा आसमान है
सपनों में उसके हमारे प्रेम की उड़ान है
आजकल माधव से वो
सिर्फ हमारी मुस्कान मांग रही है
वो लड़की हमें पहचान रही है।


- आकाश आरसी शर्मा


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लाडली

क्या कुसूर ऐ मेरे यार ?
क्या हुआ ऐ तुझे संसार ?
क्या है नहीं बचा अब इंसा ?
क्या बंद नहीं होगी अब हिंसा ?

क्या कातिल पकड़ा जाएगा ?
क्या जिन्दा ओ बच जाएगा ?
क्या सुनाई देती ओ चित्कार ?
क्या रुक पाएगा बलात्कार ?

क्यों दरिंदगी अब बढ़ रही ?
क्यों इंसानियत अब मर रही ?
क्यों लुटती आज जिंदगी ?
क्यों इंसानियत होती शर्मिंदगी ?

क्यों हुआ ये हल्ला है ?
क्यों डरा ये मुहल्ला है ?
क्यों उठी ये लहर है ?
क्यों लगी ये नज़र है ?

कारण किस आवाज ये उठती ?
कारण किस कलम ये रूकती ?
कारण किस चुप रहती जनता ?
कारण किस रोती माँ की ममता ?

कारण किस गिरती मानवता ?
कारण किस मीटती डॉ मौमिता ?
कारण किस जलती मोमबत्ती ?
कारण किस चुप रहती लालबती ?

कैसे कहुँ तू बेफिक्र रह...
कैसे कहुँ तू सब्र कर।
कैसे कहुँ तू सब जानती...
कैसे कहुँ तू है लाडली।

होश मे आओ शर्म करो...
तेरी भी है लाडली रहम करो।
मानव हो दानव ना बनो...
शपथ लो मानव ही बनो।


- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'


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अन्नदाता

देखो कौन है,
जो इस ठंड में अकड़ा है,
तन पर नहीं, कोई कपड़ा है।

ठीक ही जाना वही है,
हमारा अन्नदाता।
दूर बस्ती के किनारे
एक टूटा सा झोपड़ा है।

खेतों में बहाते अपना पसीना,
हल और बैल ही इनके साथी।

इन्हीं के साथ इनका जीना
और मरना।

जरूरत इनकी शायद,
ही होती कभी पूरी।
कभी खाए आधी पेट,
कभी की रखीवली,
रही नींद भी अधूरी।

क्या यही विधान है,
जो भरे पेट सभी का,
पेट खाली वो सोता है।

बोए खेतों में हरियाली,
जीवन की राह
उसका कांटों भरा होता है।

कभी बहुत मेघ बरसते,
कभी वो बारिश को तरसते।
कभी टिड्डिया करती उनका नुकसान।

हाय, पग पग लेती कुदरत
उनका इंतहान।

फिर भी खुश रहता हर हाल में वो,
मेहनत से जी ना चुराता।
जाने किस मिट्टी का बना होता,
जो हमारा होता अन्नदाता।

हाँ, वही जो ना बदला सदियों से,
जिन्हें कहते हम किसान।


- रोशन कुमार झा


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आलोचना

आलोचना है नहीं घबराना
न कभी आलोचना से डरना
लोगों का काम ही है आलोचना करना
भले तुम अच्छा काम करो ना
उसमें भी, उसे है खोट निकालना
कि उसे है आलोचना करना
ऐसे लोगों से हरेक जगह होता है मिलना
लक्ष्य प्राप्ति की राह में रोड़े अटकाना
इसका तो बस, काम यही है करना
किसी भी प्रकार से बदनाम कराना
लेकिन, धैर्यवान व्यक्ति,
तुम्हें है सर्तक रहना
फूंक-फूंक कर राह में कदम रखना
एक तरह से, ये जो व्यक्ति,
जिसका काम है आलोचना करना
तेरे गलत, कार्य होते हो,
यदि तो सावधान कराना
इसे तुम कभी नजरंदाज ना करना
सदैव अपने आस-पास इसे रखना
इसे ही देख तुम्हें, निज लक्ष्य को है साधना
लक्ष्य प्राप्ति को तरह-तरह की बुद्धि है अपनाना
चुन्नू कवि की भी हुई है खूब आलोचना
अतः फर्ज समझा, सबको बताना।


- चुन्नू साहा


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गलन बढ़ी, कोहरा कोहराम मचाये,
सुरुज छिपा बदरी मा,
काकी कउड़ा आँचे, काका कमरी ओढ़े,
लरिकन परे कथरी मा।
छीना झपटी मा रजाई बनी बैठी हरजाई बा,
पानी कै पानी उतरी बनी पूस कई जमाई बा।
इधर जाड़ा पाला, उधर रोज़हन के पड़ा पाला बा,
जात जात साल अइसन सालत अहइ,
उ का समझे जेकरे पास दुशाला बा।
जे बात बात पे गरमात रहे उहउ अकड़ा अहै,
निकुरा शारदा नहर भई, कान कंटोप से जकड़ा अहै।
गोरु चौउआ चउफेरी गिनगीनात अहेन,
कइसे कटी इ जाड़ा पाला बहुतइ
मुश्किल लखाट अहेन।
अलाव अलमस्त जलइ परधान जी के चउखटे मा।
चुनाऊ नियरान अहै जनता बटी बटे मा।
हाड़त काँपत नाना नानी का नाम
खोजी रहे वोटर लिस्ट दुइ हजार तीन मा,
केउ कहइ जाइ ससुर नाम कटि जाइ जब सब खेल बा मशीन मा।
सब प्रत्याशिन ओढ़ी के साल मचिया तोरी रहे साँझ सवेरे,
वोट कई गुणा भाग मा लगाई रहे फेरे पर फेरे।
इ जाड़ा पाला जाने कवन गुल खिलाये
अबकी, इहै सोचि सोचि रजाई में न आवई झपकी।
ठंडी कै मौसम देखि कुछ तौ अबहिन
बांटि रहे दारू, हमसे का पड़ी बा भले
लरिकन के दाँत लड़ई, चाहे लड़ई मनसेधु मेहरारू।
चबाई चबाई पान पारस, शुद्ध प्लस, दिलबाग, रजनीगंधा,
विकास इ जाड़ा पाला मा सब छोड़ऊ
चलऊ देखउ सब आपन आपन काम धंधा।


- राधेश विकास


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धौलाधार है सूनी

दिसम्बर आया, ठण्ड भी लाया,
पर धौलाधार है अब भी सूनी।
नंगे है पर्वत, सफ़ेद चादर बिन,
प्रकृति ने जाने, कौन राह है चुनी।

है सन्नाटा धर्मशाला में पसरा,
छत्त पर न टप-टप बारिश की धुन।
मंडराते, बिन बरसे छिटकते बादल,
बदल गया है क्यूँ ये ऋतु मन ?

हिम की आस में टिकी निगाहें,
बच्चे ,बूढ़े और किसानों की है चाह।
बरसें बूँदें और आए बर्फ बन-बन फाए,
हैं हैरान सब, जरूर कुछ तो है गुनाह।

हे अम्बर ,बरस जाओ अब तो तुम,
कर दो धौलाधार का श्रृंगार।
बरस-बरस अपने ऋतु कणों का,
सूखी सुस्त धरा को दे दो उपहार।


- धरम चंद धीमान


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पत्नी की खूबसूरती

किसी भी विवाहित
सुंदर स्त्री की खूबसूरती
जो बनाती है उसे
सौंदर्य की प्रतिमूर्ति
उसकी वह मंद मंद
मुस्कुराहट...
मानो वसंत की
हो सुमधुर आहट
सुंदर मुख की वह
खिलखिलाती हंसी
देख उसके ललाट की
वह मनमोहक छवि
लोगों का यह कहना
लगती नहीं हो
कि इतनी उम्र
की हो तुम...
और दो बच्चों की
मां भी हो तुम ..
तो बताते हैं आज
इस खूबसूरती और
खिलखिलाती...
हंसी का राज़
यह सब उसी से
मुकम्मल है
जो है उसका
हमसफर, हमराज़
जिसने रखा है
उसे रानी की तरह...
पहनाकर सुखों का ताज
खुद बाहर धूप में जाकर
जो कमाता है खूब...
ताकि हर सुख, सुविधा
में रहे उसका महबूब
खुद कम पैसों में
कर गुज़ारा...
सर्वस्व समर्पण करे
वह अपना धन सारा
यह सब उसी का ही
खूब नतीज़ा है
खुशियों से भरा...
तभी उसका बगीचा है
हर खुशी कर देता
वह उसे कुर्बान
ताकि हर पल...
खुश रहे उसकी जान
हर खूबसूरत...
महिला का सौंदर्य
उसके पति की ही
बदौलत है...
क्योंकि उसका सारा जहां
उसकी सारी खुशियां
उसकी खूबसूरत
पत्नी ही उसकी
असली दौलत है
हर खूबसूरत...
विवाहित महिला
का सुंदर चेहरा
यूं ही नहीं है खिला
उसे पति परमेश्वर
का भरपूर है
स्नेह मिला...


- वसुंधरा धर्माणी


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हम आदमी, तुम लोग हो गए।

सबको बनाकर मैं बना कुछ कम बना तो क्या हुआ,
सबको मिटाकर तुम बने ज़्यादा बने तो क्या हुआ।

मेहनत मेरी मिट्टी हुई, तुमने उसी पर ताज रखा,
मैंने पसीना बहा दिया, तुमने उसे ही राज रखा।

कल का हिसाब किताब जब समय स्वयं लिखेगा,
पूछेगा किसने क्या रचा, किसने क्या सिर्फ छीना।

जो बचा गया मनुष्यता, वही तो असली जीत है,
राजमहल हो या खँडहर, अंत में सब मीत है।

मैं हारकर भी सीख लूँ, तुम जीतकर भी खो गए,
फर्क बस इतना-सा रहा- हम आदमी, तुम लोग हो गए।

नाम तुम्हारे शोर बने, काम मेरे संस्कार बने,
भीड़ तुम्हारे साथ चली, सच मेरे हथियार बने।

अंत समय जब आईना, सबको सच दिखलाएगा,
कम होकर भी जो मनुष्य रहा, वही बड़ा कहलाएगा।


- डॉ सत्यवान सौरभ


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जी राम जी
कांई ?
जी राम जी
सवा सौ दिन री
काम री गारंटी
जी राम जी
साठ दिन
काम नीं करण री गारंटी!
जी राम जी
कैड़ा अधिकार,
कैड़ी गारंटी?
बदळग्या नियम अर कायदा!
बात मजदूर री,
पण किण रा फायदा!
जी राम जी
नित नियम बदळै है
कुदरत री चाल बदळै है
अरावळी री परिभास बदळदी
एक पेड़ मां रै नांव
सगळो जंगळ कार्पोरेट रै नांव
जी राम जी
मंशा मायं उपजे शंका!
प्रकृति ने बचावणो होसी
जल जंगल जमीन री खातिर
उल गुलान रो
इंकलाब जगाणो होसी
जी राम जी
कार्ल मार्क्स ने समझणो होसी
पूंजीवाद रा खतरा भांपणा पड़सी!
जी राम जी
नाम ढ़िढ़ोरा पिटण सूं
पेली काम री अलख जगाणी पड़सी!
जी राम जी
आखै मिनख!
मंहगाई री
चाबुक नित झैले है!
उज्ज्वळा हज़ारा पार उजळै है
जी राम जी
हवाई चप्पल रै
मिनख रा हवाई जातरा रा
सुपना मटियामेळ हुया!
जी राम जी
चांदी री चमक
दो लाखी हुई!
सोना री सुई मुघी हुई!
जी राम जी
लाइफटाइम वैलेडिटी री
सिम रा रिचार्ज मंहगा हुया
पूरी दुनिया मायं
तीस दिन रो महिनों हुवे
टेलिकॉम तो अठ्ठाइस दिन रो
महिनों बणावे!
जी राम जी
शिक्षा चिकित्सा रोजगार
सबरा हाल बेहाल है
जी राम जी
रिपियां रा हाल थे जाणों हो
नित उठ लुढ़कें है
जी राम जी
डीजल पैट्रोल
आंख दिखावें है
जी राम जी
कै बतावा
काम री मैदा कोनी,
रिपियां री पैदा कोनी
जी राम जी।


- जितेंद्र बोयल


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दर्द अपने जहाँ को दिखाया न कर,
राज दिल के सभी को बताया न कर।

जानते हैं ख़ता आज हमसे हुई,
दे सजा जो कहे दिल तु छोटा न कर।

देखते हैं सभी लोग श्रृंगार को,
भाव मन के सभी को जताया न कर।

आस की ज्योति दिल में जलाया तु कर,
दीप मन के जलाकर बुझाया न कर।

छा गया कोहरा आ गयी रात है,
अंधियारी गली में तु जाया न कर।

बस्तियाँ खौफ से निर्जन हुई,
घूमते आ गए अरि डराया ना कर।


- डॉ. अनुराधा प्रियदर्शिनी


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बेक़द्र

बेक़द्रों के हाथ अगर चाँद भी लग जाए,
वो उसको भी ग्रहण लगाने का हुनर रखते हैं।
दीये जलें तो हवा को दोषी ठहराते हैं,
ख़ुद अँधेरे पालने की पूरी क़सम रखते हैं।

फूलों को रौंदकर कहते हैं- मौसम ख़राब है,
आईने तोड़कर चेहरे से नज़र चुराते हैं।
जहाँ उजाला सच बोलने लगता है ज़रा सा,
वहीं ये लोग साज़िशों के बादल बरसाते हैं।

सूरज को भी तौलते हैं अपनी छाया से,
सच की ऊँचाई उन्हें अक्सर चुभती है।
जो स्वयं भीतर से खोखले हों साहब,
उन्हें हर चमकती चीज़ ही झूठी लगती है।

इतिहास गवाह है- रात ज़्यादा टिकती नहीं,
ग्रहण भी स्थायी नहीं होते ज़माने में।
चाँद फिर निकल आता है पूरी आभा संग,
और बेक़द्र रह जाते हैं अपने बहाने में।


- डॉ. प्रियंका सौरभ



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