अनंत अमर
कविता, सुख दुःख प्रेम परिभाषा,
कविता मान अभिमान अभिलाषा।
कविता पाना और खोना,
समझ और नासमझ
की अति अनमोल भाषा।
कविता जीवन के साथ साथ प्रवाहित नदी
कविता मृत्यु उपरान्त, जैसे पवित्र अग्नि
अतः कविता अनंत, अमर...
कविता केवल कवि की नहीं,
कविता पाठक की श्रोता की,
कविता चहु दिशाओं की,
अंधेरों की उजालों की,
कविता शून्य की और पूर्ण की,
कविता अन्तर्मन की, कविता समय से परे,
बंधन मुक्त स्वाधीनता की,
कविता अनंत काल की।
- सुतपा घोष
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बड़ी ही सूझ से
कविता में छुपा,
शब्द धारदार,
के शायद कर दे घातक वार,
कहे बिना ही कर दे बयां
चाहत-ए-दीदार.
बर्फ़ ठंडी दर्द हो,
या प्रेम का इज़हार,
इक भाव का ज्यों पहाड़ हो,
या बातें हो हज़ार.
कवि कह लेगा,
अकेला सब सह लेगा,
बस तुम कविताएं पढ़ना
और समझ लेना
के वो महज़ कविता नहीं है...
- भाग्यश्री मिश्रा
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शब्दों की फूलवारी कविता
करती हसीं ठिठोली कविता
कभी भावुक कर देती कविता
भावनाओं की शब्दावली कविता
दिल की गहरी सांस कविता
मन की सुन्दर आभास कविता
कवि की चैन ओ शुकुन कविता
ऐसी हैं ये प्यारी कविता
- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'
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लिख लिये दिल की बातें,
जो भाव मेरे मन में है आते,
छंद, रस, अलंकार ना देखें
दोहा, मुक्तक, गजल ना सोचे।
मात्रा, वर्ण, मापनी को छोड़े,
बस, मन की भाव को पकड़े,
दिल की बातें, भाव के साथ,
दिल की वेदना, मन के साथ।
उकेर दी कोरे कागज में,
और ना तो गा दिये भाव में,
हो गयी ना कविता, और क्या ?
भाव अपनी जता ना दिया ?
आज विश्व कविता दिवस है,
मन में अति हर्ष है,
सब कवि-कवियत्री जनों को,
पढ़ने वाले शुभचिंतकों को
चुन्नू कवि का नमन है,
हौसलाफजाई हेतु अभिनंदन है,
भूल चूक मेरी माफ करना,
बस लिखते रहूँ का आशीष देना।
- चुन्नू साहा
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कवि और कविता का प्रेम
मानो सांस और हृदय का है।
जो एक-दूजे के बिना,
नहीं रह पाते... बिना प्रेम और
बिना शब्दों के आलिंगन किए
कवि का कविता के प्रति समर्पण
प्रेम की पवित्रता को दिखाता है।
- दीपक कोहली
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विचार बेचारे अलबेले,
घूमे-घुमाए चहुंओर,
भाव टकराए बुद्धि से
कल्पना करवाए काज
सुर ,ताल ,लय ,संग,
पारखी बन शब्दों का
कवि बजाए सब साज,
गति,यति के पहन आभूषण
करतब अपना दिखलाए,
छंद, अलंकार का ओढ़ लबादा,
देख नृत्य कविता का
कवि देखता ही जाए।
- बाबू राम धीमान
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कविता कांई हुवें,
कविता कांई एक दिन
रौ विसै है
कविता नित नूवा
सिरजण रौ थंब हैं,
कांई काम करता बगत
गुणगुणावणों
हरेक काम नै
अळगै भाव सूं
निरखणों
कविता रा मंडाण हैं
नदी नाळा सूं लै'र
महासागरा तांई कविता हैं
उतराध सूं दिखणाद
अस्ताचल सूं सूरज रै
उजास तांई कविता हैं
सुई री नोक सूं लै'र
अनन्त तांई कविता हैं
अन्तिम छोर सूं लै'र
महानगरां तांई कविता हैं
हळ चलाती बगत
हाळी रै मूठ सूं टपतों बीज
ओरणों सूं उठतीं धून
कविता री सांगोपांग राग हैं
पाखंड र अंधारा सूं लै'र
मनड़ा रौ सचन्नण कविता हैं
परकत रा सगळा सुख दुःख
मांय सीर रळावणों कविता हैं
निज पीड़ रौ ऊथळों कविता हैं
सांच नै सांच कैवणों कविता हैं
मनड़ा रौ भाव कविता हैं
समाज रौ दरसाव कविता हैं
दीवला सौ ऊजास कविता हैं।
- जितेन्द्र कुमार बोयल
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