साहित्य चक्र

12 April 2026

एक ही कोख- दो फर्क क्यों ?





एक पुरुष का स्पर्म मैं भी हूँ,
एक पुरुष का स्पर्म तू भी है।
माँ की कोख से तू भी जन्मा है,
माँ की कोख से मै भी जन्मी हूँ ।
9 महिने माँ तक माँ की कोख में तू भी था,
9 महिने तक माँ की कोख में मैं भी थी।
जितने दिन में तूने धड़कना शुरू किया,
उतने ही दिन में मैंने भी धड़कना शुरू किया।
जितने महीने में तूने लात मारना शुरू किया,
उतने महीने में मैंने भी लात मारना शुरू किया।
माँ तेरे एहसास से जितना खुश होती थी,
उतना ही मेरे भी एहसास से खुश होती थी।
पेट के अंदर तू भी बच्चा
कहलाता था,
पेट के अंदर मै भी बच्चा कहलाती थी।
कोख से बाहर आने पर,
तू जितनी जोर से चिल्लाया,
उतनी ही जोर से मैं भी चिल्लाई।
बस फर्क इतना था,
तू बच्चा कहलाया,
और मैं बच्ची कहलायी।
कोख से बाहर आने पर तू भी जोर से रोया था,
मैं भी जोर से रोई थी ।
तेरी भी नाल माँ से जुड़ी थी,
मेरी भी नाल माँ से जुड़ी थी ।
तेरी भी नाल को काट कर माँ से अलग किया गया,
मेरी भी नाल को अलग किया गया।
तूने भी माँ का ही दुध पिया था, मैंने भी माँ का ही दुध पिया था ।
तुझे भी माँ ने सीने से लगाया, मुझे भी माँ ने सीने से लगाया था।
तेरे भी पैदा होने पर बाप का कोई रोल नहीं रहा,
मेरे भी पैदा होने पर बाप का कोई रोल नहीं रहा।
तेरे भी लालन पालन से बाप ग़ायब था,
मेरे भी लालन पालन से बाप ग़ायब था।
जैसा तू दिखता था,
वैसे ही मैं भी दिखती थी।
सारे अंग तेरे मेरे एक ही जैसे, संख्या में भी बराबर ही थे।
नंगा तू भी पैदा हुआ था,
नंगी मैं भी पैदा हुई थी।
लिंग तुझमे भी था,
लिंग मुझमें भी था।
बस फर्क इतना था,
तेरा लिंग लिंग कहलाया,
मेरा लिंग योनि कहलाई।
तू बेटा कहलाया,
मै बेटी कहलाई।
इंसान तू भी है, इंसान मैं भी हूँ।
गर्मी सर्दी ठंड तुझे भी लगती है, मुझे भी लगती है ।
पसीना तुझे भी आता है,
पसीना मुझे भी आता है।
भावनाएँ तुझमे भी होती हैं,
भावनायें मुझमें भी होती हैं।
जिस चीज को जैसे तू महसूस करता है,
उस चीज़ को वैसे ही मैं भी महसूस करती हूं।
जिस चीज से जितनी चोट तुझे लगती है,
उस चीज़ से उतनी ही चोट मुझे भी लगती है।
जिस चीज़ से जितना दर्द तुझे होता है,
उस चीज़ से उतना ही दर्द मुझे भी होता है।
तकलीफ तुझे भी होती है, तकलीफ मुझे भी होती है।
आंसू तेरे भी निकलते हैं,
आंसू मेरे भी निकलते हैं।
जो तुझे पसंद होता है, वो मुझे भी पसंद होता है।
जो तुम्हें नहीं पसन्द होता,
वो मुझे भी नहीं पसन्द होता।
जो तुम्हें अच्छा लगता है,
वो मुझे भी अच्छा लगता है।
जो तुझे नहीं अच्छा लगता,
वो मुझे भी अच्छा नहीं लगता।
जिस चीज से जितनी खुशी तुझे होतीं है,
उस चीज़ से उतनी ही खुशी मुझे भी होती है।
गुस्सा तुझे भी आता है,
उतना ही गुस्सा मुझे भी आता है।
माँ बाप तुम्हें जितने प्यारे होते हैं,
उतने ही मुझे भी प्यारे होते हैं।
मेरी जगह खुद को और खुद की जगह मुझे रख कर,
हर दिन पल महसूस करो,
तुम्हें कैसा लगता है?
जाने क्यू दुनिया ने ये फर्क बनाई,
तू अपना खून कहलाया,
मैं पराया धन कहलायी।
तू लड़का कहलाया,
मैं लड़की कहलायी।
इस धूर्त दुनिया ने,
तुझे कितना क्रूर निर्लज्ज बेशरम और अत्याचारी बनाया।
और सारी शर्म, इज़्ज़त, संस्कार की चादर मुझे उड़ाई।
तू पुरुष कहलाया,
मैं स्त्री कहलाई।
शादी तो पुरुषों की भी हुई,
फिर महिला की ही केवल विदाई क्यू हुई।
ससुराल तो पुरुषों के भी हुए,
फिर महिला ही केवल ससुराल में जमाई क्यू गयी।
सास ससुर तो पुरुषों के भी हुए,
फिर महिला से ही केवल सेवा कराईं क्यू गयी।
दुल्हा तो पुरुष भी बने,
फिर महिला की केवल मुह दिखाई क्यू हुई।
बच्चे तो पुरुष ने ही पैदा कराए,
फिर महिला की ही केवल गोद भराई क्यू हुई।
धोती-कुर्ता तो पुरुषों के लिए भी है,
फिर साड़ी केवल महिला को ही पहनाई क्यू गयी।
शादी तो पुरुषों की भी हुई,
फिर सुहागन केवल महिला ही कहलाई क्यू गयी।
शादी तो पुरुषों की भी हुई,
फिर महिला ही केवल गुलाम बनाई क्यू गयी।
माँ बाप तो महिलाओ के भी हुए,
फिर महिला ही केवल अपनों की पराई क्यू हुई।
घर तो महिलाओ के भी हुए,
फिर महिला ही केवल अपने घर से भगाई क्यू गयी।
नंगी तो महिलाये भी पैदा हुई,
फिर महिला को ही केवल शर्म इज़्ज़त थोपाई क्यू गयी।
इंसान तो पुरुष भी थे,
फिर महिला को ही केवल संस्कारों की चादर उड़ाई क्यू गयी।
शादी तो पुरुषों की भी हुई,
फिर केवल महिला के ही बापों की बिकाई क्यू हुई।
शादी तो पुरुषों की भी हुई,
फिर महिला की ही केवल विदाई क्यू हुई।


- प्रीति जायसवाल


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