आज भी याद है वह किताब,
खोलूँ तो महके जनाब,
उड़ते हैं पन्नों से अलसाए ख़्वाब,
भीग उठे मन का शबाब।
बीच पन्नों में सूखा गुलाब,
दबा हुआ कोई अनकहा जवाब,
हल्की सी खुशबू, हल्का सा हिसाब,
और धड़कनें बेहिसाब।
कहीं शार्पनर से छिली पेंसिल की कुरचन,
कोनों में अटकी बचपन की धड़कन,
स्याही के धब्बे, आधी सी रचना,
जैसे समय की कोई अटकी कम्पन।
कभी नाम लिखा था चुपके से,
कभी आँसू गिरे थे पन्नों पे,
कभी हँसी छिपी थी लफ़्ज़ों में
सब दर्ज है उस किताब में।
कैसे भूलें वह किताब,
जिसमें उम्र का हर पड़ाव,
कुछ यादें थीं बेहद ख़ास,
और कुछ सपने… बेहिसाब।
- सविता सिंह मीरा
*****
मदद के हाथ
मदद के हाथ अब लिबास देखते हैं,
फिर ज़रूरतों का हिसाब देखते हैं।
कभी दिल से जो बाँटते थे उजाले,
अब हर रौशनी में नक़ाब देखते हैं।
जो रोटी के बदले दुआएँ लिया करते,
वही अब हर दुआ में ख़िताब देखते हैं।
ये कैसा दौर आया है शहर-ए-इंसाँ में,
जहाँ चेहरे नहीं, बस किताब देखते हैं।
कभी दर्द पर मरहम बनकर जो उतरे,
वो अब ज़ख़्म का भी हिसाब देखते हैं।
'शशि' ये मदद भी अजीब सी तिजारत है,
पहले हाल नहीं, बस जनाब देखते हैं।
- शशि धर कुमार
*****
तेरी हुकूमत में आम आदमी को बसर नहीं मिलता,
सुबह जिस घर छोड़ कर जाता है शाम को वो घर नहीं मिलता।
पूछता है भारत आखिर क्यों किया सरेंडर,
पहले मिलता था अब सिलेंडर नहीं मिलता।
बमुश्किल से दो रोटियां की खातिर कमाए आटा,
लाया मगर जलते चूल्हे का मंजर नहीं मिलता।
किसको दे आया अपने हक की बुलंदी का आवाज,
अनारकली! अब तो अपनी नजर से नजर नहीं मिलता।
एक के बाद एक जख्मो से जिस्म छलनी किया,
आंखों से अब आंसू निकलने का अवसर नहीं मिलता।
इस तरह मर जाएंगे एहसास तेरे मालूम नहीं था विकास,
जिंदगी! कहाँ खपाऊं माथा फोड़ने को भी पत्थर नहीं मिलता।
- राधेश विकास
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पृथ्वी जैसे मेरा घर
मैं गया अंतरिक्ष में
अंतरिक्ष में जाकर देखी मैंने पृथ्वी
पृथ्वी पर देखा मैंने अपना घर
अंतरिक्ष से देखी मैंने अपने घर में
एक स्त्री
एक स्त्री अपने घर में
अपने बच्चों के साथ
जैसे समूची पृथ्वी पर खेल रही है वह
बच्चे देखते हैं घर की तरफ़
घर देखता है स्त्री की तरफ़
स्त्री देखती है मेरी तरफ़
और मैं देखता हूॅं पृथ्वी की तरफ़
पृथ्वी जैसे मेरा घर।
*****
कुछ-कुछ
कुछ -कुछ उसकी नींद में हूॅं मैं
कुछ -कुछ उस नींद से बाहर भी शायद
जिस तरह छोड़कर चली जाती है
वह नींद मुझे
मैं भी छोड़कर चला जाता हूं
असहाय उसे
पता नहीं,पता नहीं
अब किसका बिस्तर गरमाएगी वह
मैं देखता हूॅं, मैं देखता रहता हूॅं
उसका कातर चेहरा।
*****
अनहद
ताॅंबे के ख़ाली घड़े में
खनखनाता है चाॅंदी का सिक्का
घन- घनघन,घन-घनघन
पानी हुआ जाता है ग़ायब सब
मनुष्यों ने ली है शपथ
पूर्ववत खाऍंगे धोखा
एक -दूसरे की मुठ्ठियों में छुपे हैं पत्थर
जो भी, जैसे भी, जहाॅं भी
तलाश करते हैं उन-उन दिमाग़ों की
जो सोचते हैं सच और-और
ख़ालिस -ख़ालिस अब भी
ताॅंबे के ख़ाली घड़े में।
- राजकुमार कुम्भज
*****
सोच की बेड़ियाँ
अपनी ही सोच के दायरे में,
हमने कितने बंधन गढ़ डाले।
जो सच बोले, उसे विद्रोही,
और चुप रहने वाली को साधे।
हँसती हुई आँखों को हमने
लापरवाही का नाम दिया,
जो अपने सपनों में खोई,
उसे भी इल्ज़ाम दिया।
प्रेम करे तो दोषी ठहराई,
ना बोले तो खोई सी कही।
हर रूप में कसौटी बदली,
हर बार फिर वही कहानी रही।
विचित्र है यह समाज हमारा,
जहाँ मापदंड बदलते रहते हैं।
जो जैसी है, वैसी रहे तो,
फिर भी क्यों प्रश्न उठते रहते हैं?
अब तो तोड़ो ये बेड़ियाँ सारी,
खुद को पहचानो, खुद को जियो,
हर लड़की बस इंसान है पहले,
इसे मानो और सच में जियो।
- डॉ. सरिका ठाकुर "जागृति"
*****
एक माँ की व्यथा…
आजादी के दीवानों को…
नमन मैं दिल से करती हूँ…
एक माँ हूँ मैं,
और मां का दर्द समझती हूँ।
हर रोज़ मैं
भगतसिंह की माँ की
कल्पना में खो जाती हूँ।
क्या बीती होगी उस माँ पर,
जिसने सजाए थे अनगिनत सपने-
बेटा घोड़ी चढ़ेगा,
दुल्हन घर आएगी,
माँ बेटे-बहू पर वारी-वारी जाएगी।
पर बेटा तो देश का दीवाना था,
उसे तो आज़ादी का सपना दिखाना था।
बारात तो उसने भी सजानी थी,
पर दुल्हन नहीं-
आज़ादी को घर लाना था।
नहीं कहा होगा माँ ने कभी-
"जा बेटा, अपनी जान जोखिम में डाल दे,"
वह तो हर पल रब से यही कहती होगी-
"हे रब, मेरे बेटे की मौत को तू टाल दे।"
कैसे काटी होंगी वो लंबी रातें,
जब फाँसी का मंजर सामने था,
क्या सो पाई होगी वो माँ,
जिसका बेटा खुद ही झूलने को तैयार था।
जानती थी वो-
तैयार है वह फंदा,
जिसे था
भगत सिंह का इंतज़ार।
जानते थे भगत भी
अपनी माँ के दर्द को,
पर कैसे अनदेखा करते
मातृभूमि के कर्ज को।
आखिरी संदेश उनका
उजागर करता है इस मर्म को-
"माँ, मत आना मिलने मुझसे तुम जेल में,
ऐसा न हो कि तेरी नम आँखों को देखकर
कोई कह दे-कायर है इसकी माता।"
माँ की ममता से भी ऊपर
था उनके लिए एक ही नाता-
मेरी भारत माता।
आजादी के दीवानों को
नमन मैं दिल से करती हूँ,
लेकिन मैं एक माँ हूँ-
एक माँ का दर्द समझती हूँ।
- कंचन चौहान
*****
सकेता री नलवाड़ी
जिहां जे चैत्र महीना शुरू हुंदा
सकेता री नलवाड़िया रा मेला लगी जांदा।
बौहलदा रे मेले ने शुरुआत थी हुंदी
सभणी ते पहले गढ़ा थी इन्हा री खुंडी।
नगौण खड्डा चहल पहल थी बढ़दी
नीले ,खैरे लाल बोलूआ री जोड़ियां एथी थी बझदी।
बौहलदा रा खूब बपार था हुंदा
जम्मू ,यूपी हरियाणा कने पंजाबा रे बपारी एथी थे पूजदे।
बौहलद ता हुंण बिकणे नी औंदे
पर खुंडी गडणे जो टोली ने एक दो ल्यावणे पौंदे।
नवरात्रे भी सौगी सौगी लगी जांदे
देवी देवतेयां रे दर्शन पाणे लोक दूरा दूरा ते औंदे।
देव माहूनाग हुंदे मेले री शान
अन्न ,धना री कदी कमी नी हो एहड़ा देई जांदे वरदान ।
दिना जो लोका ने जवाहर पार्क पूरा भरदा
कोई अंढोला झूलदा ता कोई तंबोला खेली ने मज़ा करदा।
राती जो सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुंदे
देशा प्रदेशा रे कलाकार लोका रा मनोरंजन भी खूब करी जांदे।
मेले आसारी संस्कृतिया री हुंदे पहचान
पर इन्हा खा लोका रा हुण केथी रही रा ध्यान।
- विनोद वर्मा
*****
मेरे बाद
मैं नहीं तो
तुझे संभालेगा कौन,
अगर ना रहे माली,
बीज को सींच
बटवृक्ष बनाएगा कौन।
बहुत है टिड्डे, पंछी, भंवरे और
मौसम बेदर्द यहां।
मेरे जाने के बाद
हिफाज़त करेगा कौन।
फूल से ही माली है,
फूल से दूर रहकर,
माली का जीवन खाली है।
तेरे पास नहीं मैं,
अहसास सदा रहता है
खुद को डूबो दूं दुनियादारी में।
मिलने की प्यास तो रहती है।
बिन पानी के पनघट हूं,
दुल्हन बिन घूंघट हूं।
किरदार बिन कहानी हूं,
राजा बिना रानी हूं।
चाभी हूं बिन ताले का,
मकड़ी हूं बिन जाले का।
तू अक्स मेरी,
मैं छवि तेरा,
धड़कन से तेरी,
नब्ज़ मेरी चला करती है।
वो बात और है कि नजरों से,
लब्ज़ बयां होती है।
हम दो किनारे बन गए है,
साथ चलते चलते।
किनारा जो टूटा एक भी,
फिर जो सैलाब आएगा,
इतिहास लिखा जायेगा वही।
- रोशन कुमार झा
*****
असंभव को भी संभव कर दें
ऐसा जिगर में माद्दा रखो ,
हर काम जो आसान बना दें
फौलादी दिल में ऐसा हौसला रखो
मुश्किलें आएं ग़र जिन्दगी की राह में
डट कर उनका सामना करो,
चुनौती को चुनौती से अगर चुनौती मिले
दिल में ऐसा जज़्बा रखो,
मेहनत की राह पर चलो
सपनों को सच करने के लिए,
मिले हर कदम पर जीत
मन में ऐसा विश्वास रखो,
मत हार मानो कभी जिन्दगी की जंग में
सदैव आगे बढ़ते जाओ मन में ऐसा विश्वास रखो,
जीत जाएंगे एक दिन जंग जिन्दगी की ऐ दोस्त,
मत देखो पीछे, अपने लक्ष्य पर हमेशा नज़र रखो।
- बाबू राम धीमान
*****
दादा
इक ब तो आज्या मेरे दादा
मनै याद घणी थारी आ'व है।।
जद मेरा दादा जिया करता,
कोई आँख उठाता ना,
मेरे दादा की देख क जूती,
कोई घर म लखाता ना।
सूनी गुवाड़ी थारे बिन दादा
खावण न मनै आ'व है।
इक ब तो आज्या मेरे दादा...
जै कोई ल्यादे मेरे दादा न,
उसका गुण मैं भूलूँ ना।
मेरा दादा झूला झुलावै,
मैं के झूला झुलूँ ना
नाम लिख्या थारा जठै जठै पाउँ,
झुर-झुर आँसू आ'व है।
इक ब तो आज्या मेरे दादा...
जमात तीसरी म जद पढ़ता,
मैं कोई पोथी पढ़ता ना।
जै मेरा दादा ना मनै कूटै,
मैं कोई माणस बणदा ना।
जद भी मिल है कोई सफलता
याद थारी आ'व है।।
इक ब तो आज्या मेरे दादा...
संत ज्ञानी था मेरा दादा,
ओछी बात करदा ना।
भजनां म जद गाया करता,
कई-कई घण्टे डटदा ना।।
हेली गावण म आज भी दादा,
ना कोई नेड़े आ'व है।।
इक ब तो आज्या मेरे दादा...
राम ईश्वर था मेरा दादा,
कदै मर्यादा तोड़ी ना।
जो भी दादा बोल्या करदा,
बात किसी न मोड़ी ना।।
मन सुं जन्मदा(मनोज)थारा पोता,
झुक-झुक शीश नवाव है।
इक ब तो आज्या मेरे दादा...
- मनोज कुमार भूपेश
*****
अस्तित्व विहीन
बड़े-बड़े सिकंदर
यहाँ आये
मानते थे खुद को
बड़े बलशाली धुरंधर।
फिर भी बचा न सके
अपने अस्तित्व को
समेट लिया
मिट्टी ने अपने अंदर।
खुद को खुदा जाना थे
मगर औरों को
सदा गधा पहचानते थे।
खुदा ने उनको भी
अपना अस्तित्व दिखा दिया
मिट्टी में मिलकर
मिट्टी ही कर दिया।
- डॉ. राजीव डोगरा
*****
काला सोना और रोती हुई आजादी
आज शब्द नहीं लिख रहा हूं,
आज मैं घाव लिख रहा हूं
उन घावों के,
जो किसी एक शरीर पर नहीं,
बल्कि पूरी सभ्यता की आत्मा पर लगे हैं।
वहां…
जहां सूरज हर सुबह
रेत के माथे को चूमता है,
वहीं कहीं
धरती के गर्भ में
एक काला सपना पलता है,
तेल,
जिसे लोग दौलत कहते हैं,
पर जिसने कई देशों को
दरिद्र बना दिया।
कभी वहां
एक सपना था,
जनता का,
अपनी ही जमीन पर
अपने हक़ का
उस सपने का नाम था,
मोहम्मद मोसाद्देग
वह कोई राजा नहीं था,
न ही तलवार लेकर निकला योद्धा,
वह तो बस एक आवाज था,
धीमी, मगर सच्ची,
जो कहती थी,
जो धरती हमारी है,
उसकी दौलत भी हमारी होगी।
उसने जब
तेल को अपना कहा,
तो यह सिर्फ एक निर्णय नहीं था,
यह सदियों की बेबसी का उत्तर था।
पर स्नेहा,
सच की कीमत
हमेशा सबसे अधिक होती है।
दूर कहीं
लालच के महलों में बैठे लोग
चौंक उठे,
उनकी आंखों में
न्याय नहीं,
बल्कि नुकसान का डर था।
सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी
और
एम सोलह
ने मिलकर
एक ऐसा जाल बुना
जिसमें फंसना तय था,
एक देश,
एक सपना,
और एक सच्चा इंसान।
यह युद्ध नहीं था,
क्योंकि युद्ध में
दो सेनाएं आमने-सामने होती हैं,
यह तो एक साजिश थी,
जहां दुश्मन दिखाई नहीं देता।
लोगों के हाथों में
पत्थर थमा दिए गए,
और दिलों में
नफ़रत बो दी गई।
भीड़ बनाई गई,
भीड़ को भड़काया गया,
और फिर उसी भीड़ से
अपने ही घर को
तबाह करवाया गया।
सड़कें चीख रही थीं,
अराजकता।
और सत्ता मुस्करा रही थी,
क्योंकि यही तो चाहिए था।
फिर आया वह काला दिन,
1953 ईरान का तख्ता पलट
जब लोकतंत्र
किसी किताब का शब्द बनकर रह गया,
और सत्ता
एक कठपुतली के हाथों में सौंप दी गई।
मोहम्मद रजा पहलवी
को ताज पहनाया गया,
पर उस ताज में
हीरे नहीं,
जनता की टूटी हुई उम्मीदें जड़ी थीं।
मोसद्देग,
उसे मारा नहीं गया,
क्योंकि कभी-कभी
जिंदा रहना ही
सबसे बड़ी सजा होती है।
वह अपने ही घर में
कैद हो गया,
और उसकी खिड़की से
झांकता हुआ आसमान
उसे हर दिन याद दिलाता,
तुमने जो सपना देखा था,
वह अब किसी और की जेब में है।
स्नेहा,
तेल बहता रहा,
नदियों की तरह,
पर उस बहाव में
गरीबों की प्यास नहीं बुझी,
बल्कि और बढ़ती गई।
वक्त बीतता गया,
पर दर्द नहीं बीता।
फिर एक दिन
जनता का ग़ुस्सा
ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ा,
क्रांति हुई,
तख़्त हिल गया,
सत्ता बदल गई,
पर क्या बदली जिंदगी?
नहीं…
क्योंकि जो पेड़
ज़हर से सींचा गया हो,
उस पर फल
मीठे नहीं लगते।
आज वहां
विद्यालय हैं,
पर विचारों पर पहरा है।
किताबें हैं,
पर सवालों पर ताले हैं।
औरतें पढ़ती हैं,
पर उनकी आवाज
अब भी दीवारों से टकराकर लौट आती है।
और फिर,
कभी-कभी
आसमान से आग बरसती है,
और धरती
लहू से भीग जाती है।
किसी मिनाब की गलियों में
जब मासूम बच्चियां
धुएं में खो जाती हैं,
तो वह सिर्फ एक हादसा नहीं होता,
वह एक इतिहास होता है,
जो फिर से दोहराया गया।
सत्ता फिर कहती है,
हम निर्दोष हैं।
पर सच…
वह किसी अख़बार के कोने में
धीरे-धीरे उग आता है,
जैसे अंधेरे में
एक जिद्दी दीपक।
दि न्यूयार्क टाइम्स
जैसी आवाजें
जब परतें हटाती हैं,
तो झूठ की दीवार
ढहने लगती है।
स्नेहा,
लोकतंत्र कोई उपहार नहीं होता,
जिसे कोई बाहरी शक्ति दे दे,
वह तो एक बीज है,
जो भीतर से उगता है।
और जब कोई
उस बीज को कुचल देता है,
तो सिर्फ एक पीढ़ी नहीं,
कई पीढ़ियां
बंजर हो जाती हैं।
तेल…
वह सिर्फ एक तरल नहीं,
वह एक श्राप है,
जब तक वह जमीन में है,
तब तक उम्मीद है,
पर जैसे ही वह बाहर आता है,
वह इंसानियत को जला देता है।
यह कहानी ईरान की है,
पर यह चेतावनी पूरी दुनिया के लिए है,
जब भी कोई ताकत
भलाई के नाम पर
किसी और की दहलीज पार करे,
तो उसके कदमों के निशान देखना,
कहीं वे तेल से सने तो नहीं।
क्योंकि…
जब लालच प्रार्थना बन जाए,
तो मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर,
सब छोटे पड़ जाते हैं,
और इंसानियत
सबसे पहले कुर्बान हो जाती है।
और तब,
इतिहास
फिर एक नई कविता लिखता है,
पर वह कविता
कभी पढ़ी नहीं जाती,
सिर्फ रोई जाती है।
- स्नेहा सिंह
*****
तुम्हारी याद
तुम सूर्य की किरण हो,
तुम सूर्य की रोशनी हो,
तुम्हारी प्यारी मुस्कान में
जैसे खिलती चांदनी हो।
तुम्हारी मुस्कान कुछ कहती है,
जैसे दिल में छुपे कई राज हों,
तुम्हारी बातों की मिठास में
जैसे मधुर से साज हों।
तुम अपने घर की शान हो,
तुम सबके दिल की जान हो,
तुमसे ही खुशियों का आंगन है,
तुमसे ही रोशन जहान हो।
अगर तुम न हो इस दुनिया में,
तो हर खुशी वीरान लगे,
तुम हो तो हर सुबह सुनहरी,
हर सपना आसान लगे।
तुम सबके दिलों पर राज करती हो,
सबको अपना बना लेती हो,
सच में तुम वो किरण हो,
जो जीवन में उजाला भर देती हो।
- गरिमा लखनवी
*****
मानव
गुलमोहर के पत्ते पर
बिल्कुल आगे लटकती हुई
ओस की इकलौती बूंद के प्रति
क्या तुम्हारे मन में संवेदना जगती है
जिसका अस्तित्त्व पल भर में
मिट्टी में मिलने को आतुर है
क्या तुम्हारे तथाकथित विशाल हृदय में
भावनाएँ तरंगित होती हैं उसके प्रति
पत्तों के हिलने के साथ-साथ
क्या उसे देखकर तुम्हारे मन की पीड़ा
'गीता-पाठ'करने को कहती है
ओस की बूंद के मुख में
तुलसी दल डालने को प्रेरित करती है
नहीं ना उसे संभालने,
बचाने के भाव भी उत्पन्न नहीं होते
तुम्हारे मन में
तुम इस कलियुग के
स्व-अभिप्रमाणित मानव हो
दानवीय चेतना से बहुत दूर
एक सच्चे मानव।
- अनिल कुमार मिश्र
*****














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