कैमरों में कैद होती इंसानियत की मौत
यह सिर्फ एक मौत नहीं,जमीर के टूटने की करुण दास्तान है।
देखो,संघर्ष में रोती हुई हर जान कितनी परेशान है ?
सड़कों पर गिरती-फैलती दिखती संवेदनाएं, हमसे करती रहीं सवाल,
हम खड़े के खड़े बस देखते, नजरें घुमाते ये कैसा आज का इंसान है ?
मदद को निज हाथ बढ़ाने की जगह, लिए कैमरे रहे तान हैं,
वीडियो तो बन रही, लेकिन जा रही निर्दोष की जान है।
किसी की आखिरी सांस भी तमाशा बनती रह गई,
शर्म से झुक जाना चाहिए ये कैसा हमारा मान है ?
भीड़ का गुस्सा इंसाफ नहीं, बस अंधा एक तूफान है,
जिसमें डूबती इंसानियत और हर रिश्ता वीरान है।
क्या आंखों के आंसू भी अब सूख चुके हैं सबके,
या दिल के हर कोने में पत्थर-सा हुआ अरमान है ?
जो फोन उठाकर हंसते रहें, वह सोचें एक पल ठहर,
कल उनके अपने पर भी ऐसा ही कोई इम्तिहान है।
अब सोचता हूं उस रात को उनके घरों में क्या हुआ होगा,
कई माँओं के आंगन में गहरा सन्नाटा पसरा पड़ा होगा।
कैमरों की रोशनी में इंसानियत कहीं अंधेरे में खो गई,
आइए, हम इंसान बनें क्योंकि यही हमारी सबसे बड़ी पहचान है।
- फैय्याज अहमद फैजी
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नेह-विटप
चलो आज कुछ स्वप्न बुनें,
मन-उपवन से पुष्प चुनें,
कर लें सूक्ष्म संचय हम,
मृदा-हृदय में भाव गुनें।
जब अंकुरित हों भाव-सुमन,
नेह-जल से हों सिंचित तन,
सहेजूँ स्पंदन अंजूरी भर
हँस उठे हरितिम मधुवन।
जब-जब आए मधुप अलि,
पार्श्व बसाऊँ लज्जित कलि,
प्रीत-मकरंद संजो,
उड़े गगन ले सुवास चली।
पुष्प-पंखुरी से पुनः,
बीज रूप धरें जीवन,
मृदा-मिलन में लीन हो,
वृहत् वृक्ष से विकसित वन।
यह क्रम अनवरत ही चले ,
नव-रूपों में जीवन ढले,
यह शाश्वत गति अविचल,
लहरित हो सृष्टि के तले।
हम भी कुछ संकल्प गढ़ें,
संग-संग कुछ स्वप्न जड़ें,
स्नेह-लेपित धरा-तन पर,
एक प्रीति-विटप विकसित करें।
छाया तले फिर संग मिलें,
शांत हों संताप के छले,
जड़ दृढ़ हो अंतर-तल में,
ताप-दाह सब दूर चले।
दुःखाग्नि में दीप जले,
नेह-सिक्त उर दृढ़ पले,
मार्ग कठिन यदि आ पड़े,
पग न रुके, संकल्प चले।
- सविता सिंह मीरा
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उनकी क्या गलती है
जिनकी चलती है,
बताओ भला फिर उनकी क्या गलती है ?
चलती नहीं है जिनकी,
जिन्दगी उमीदों पर उनकी चलती है।
मिलता नहीं मौका है जिनको,
सौगातें धोखों की उन्हें मिलती है।
जान पहचान है जिनकी,
बिन प्रयत्न खुशियाँ उन्हें मिलती है।
छिन्न जाते अधिकार है जिनके,
उदासियाँ और आहें चेहरों से झलकती है।
आती नहीं बाधाएं पथ में जिनके,
आँखे उनकी जुगनू सी चमकती है।
सीधे साफ़ दिल होते जिनके,
बेरहम ये दुनिया उनको पग-पग छलती है।
एक हाथ से जखम है देती,
दूजे हाथ से दिखावटी मरहम मलती है।
होती है मंजिल पास ही जिनके,
अंतहीन पथ की दूरी जीवन भर खलती है।
पंहुच वाले पहुँच जाते पहले ही,
बाकियों की डगर की दूरी बढ़ती चलती है।
कटु वाणी कठोर शब्द होते उनके,
जुबाँ हर पल बस जहर ही उगलती है।
फिर भी वो सरताज हैं होते,
तांक-झाँक, चुस्ती, चालाकी की दुकान खूब चलती है।
मायूसियां होती न हिस्से उनके ,
फरियादें शायद उनकी ही ये कायनात सुनती है।
बताओ आखिर उनकी भी क्या गलती है,
जिनकी हर कहीं चलती है।
- धरम चंद धीमान
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ऐतबार
किसपे भरोसा करूं,
किसी पे ना करूं।
अब ऐतबार ना रहा,
बोलते हैं मीठी मीठी,
वो पहले वाला प्यार ना रहा।
सब को पड़ी हैअपनी अपनी,
झूठी तसल्ली देता हर कोई,
साथ देने का वादा ही रहा,
अब वो पहले वाला संसार न रहा।
रिश्ते रंग बिरंगे कागज के फूल बन गए,
अब न वो ताजगी ना वो महक रहा।
अपनों से गैर ही भले,जो कभी
पूछे हाल चल अपनी।
यहां अपनों से अपनों का
कोई सरोकार ना रहा।
खून के रिश्ते ने भी सकून खोया है,
बोए हुए आम पर भी बबूल हो आया है।
सबने कराए है, समझौते सिर्फ यहाँ,
कभी जिससे थी ना उम्मीदी,
वो अब फरिश्ता बन आया है।
जिंदगी सांप सीढ़ी का खेल बनी है,
अब चलना ही होगा,बात जिंदगी
और मौत में ठनी है।
ऐतबार क्या करूं, किसका करूं,
खुद के ही भरोसे रहना है अब,
किसी से कोई गिला, शिकवा नहीं,
किसी से नहीं कुछ कहनी है।
- रोशन कुमार झा
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दोस्ती जो मोहब्बत से ऊपर है
कुछ रिश्ते नामों के मोहताज नहीं होते,
बिन कहे भी दिल के पास होते।
ना इज़हार की कोई ज़रूरत पड़ती,
ना शब्दों में जज़्बात बयान होते।
वो दोस्ती भी क्या खूब होती है,
जिसमें अपनापन बेहिसाब होता है।
जहाँ हर दर्द बिना कहे समझा जाए,
और हर मुस्कान का हिसाब होता है।
ना हाथ थामने की शर्त वहाँ,
ना साथ निभाने की कसमें होतीं।
बस आँखों की खामोशी कह देती,
कुछ बातें कितनी गहरी होतीं।
वो रिश्ता पाक हवा सा लगता,
जिसमें कोई लालच नहीं होता।
दिल बस यूँ ही धड़क उठता है,
जब उसका ज़िक्र कहीं होता।
ना मोहब्बत कहो, ना दोस्ती कहो,
ये एहसास बड़ा निराला है।
कुछ लोग किस्मत से मिलते हैं,
जिनसे हर रिश्ता भी हारा है।
यकीन मानो इस दुनिया में,
सब बंधन शब्दों से नहीं चलते।
कुछ दोस्ती के रिश्ते ऐसे होते,
जो मोहब्बत से भी ऊपर निकलते।
- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'
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बचपन से मुलाकात
कल एक अजीब-सी बात हुई,
किसी और से नहीं,
खुद से ही मुलाकात हुई।
वह गुलाबी फ्रॉक, वह चमकती आँखें,
वह चहचहाती चिड़िया-सी मैं,
कूदती, फुदकती, उड़ती मैं-
आज फिर खुद के सामने आ बैठी।
पूछा मैंने धीरे से,
"क्या तुम वही हो बचपन वाली,
जिसे हर जवाब पता था?
जो सबकी आँखों का तारा थी,
जिसे हर सवाल पता था?"
जिसे आसमान छूना था,
लंबी उड़ान भरनी थी,
क्षितिज के उस पार कहीं
अपना आशियाना बसाना था।
एक फीकी-सी हँसी,
उदास आँखों की खामोशी
बिन कहे सब कह गई-
बचपन की वो उड़ान
कहीं आसमान में खो गई।
बचपन की ख़्वाहिशें, वो सपने,
जो थे कभी मेरे अपने,
नश्तर-से चुभते अब
जवाब मुझसे माँग रहे हैं।
क्यों न पकड़ा उन्हें मजबूती से,
क्यों टाँग दिए सपनों को
मैंने ही एक खूंटी पे?
खुशियाँ कम और आहें ज़्यादा,
ले आई हूँ मैं
बीते हुए कल से।
वो चमकती आँखें भी अब
किसी गर्दिश में बोझिल हो गईं।
सोचती हूँ…
क्यों आज फिर
बचपन से मुलाकात हो गई।
- कंचन चौहान
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लालच की मत पाल अरमान
लालच की मत पालो कभी अरमान
लोभ बना देता है मानव को बेईमान
लुप्त हो जाती है आपकी ईमान
अनीति जन्म देता है जग में शैतान
मत खाओ कभी अनीति की कमाई
हराम बदनाम है इस जगत में भाई
पाप है हड़पने की एक घर जमाई
जीवन में आता है कठिन दुखदाई
लालच है जगत में जानो बुरी बलाई
लोभ की पाप लोभी को है। रुलाई
मिहनत की खाना सब जग में कमाई
लालच लोक लज्जा लालची की लुटाई
लालची की होती है जग में भी हँसाई
जिस जिस ने लोभ को मन में है बसाई
परेशानी की सबब निश्चित है पाई
कष्टमय जीवन ज़ीता है वो कसाई
किस्मत में है जो वो चल कर आयेगा
सब्र संतोष का मीठा। फल दे जायेगा
सुख शांति की जीवन तेरा मुस्कुरायेगा
फटेहाल में भी सुकून जग में पायेगा
- उदय किशोर साह
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प्रियत्तमा की विरह-वेदना
नयनों से झरते नीर, झर झर
अश्क नाम कैसे दूँ इसे भला?
अश्क तो बूँद मे है होते
ये नीर से तो भरता है समुन्दर।
कहाँ हो तु सनम मेरी ?
कुछ तो पता नही है,तुम्हारी
ऐसे भला कोई है, छोड़ जाता
लौट आ वापस, ओ सनम मेरी।
अपने है न हम, ओ सनम
गुस्सा अब थूक दो ना,
जहाँ भी हो तू, लौट आ सनम
एक है,एक ही रहेगे दोनो हम।
तेरे यादो मे निशदिन हूँ रहता
कसम से,पलक ना है झपकता
बिताये तेरे संग की हर बातो का
याद कर, नयनों से नीर हूँ बहाता।
जमाने वाले तो, पागल मुझे है सोचते
तरह तरह के सलाह,आकर है देते
क्यों तु खुद को है, बर्बाद करते ?
सच्चे प्रेमी लौट, आ ही है जाते।
- चुन्नू साहा
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हम अगली पीढ़ी हैं
हमें कहा गया-
पढ़ो,
देश तुम्हारा है।
हमने किताबें उठाई,
पर नौकरियां
पोस्टरों में ही रहीं।
वे हमसे भविष्य मांगते हैं
वोट के बदले,
और बदले में,
सिर्फ
धैर्य देते हैं।
हम सवाल पूछते हैं
तो कहा जाता है-
उम्र छोटी है।
पर जब भीड़ चाहिए होती है,
तब
हम ही सबसे बड़े
नागरिक होते हैं।
हम अगली पीढ़ी हैं-
लेकिन हर दल के लिए
सिर्फ
अगला इंतजार।
- प्रिंसी यादव
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चलो खुशियां ढूढ़ते हैं
जो प्यासे हैं उन्हें पानी देकर
जो भूखे हैं उन्हें अन्न देकर,
निराश मन मे आशा गढ़ते हैं
चलो खुशियां ढूढ़ते हैं।
दिन तो कट जाती है खेल-कूदकर
रात कटती सुबह का इंतजार कर,
हे राम! किसे सुनाए हमारी व्यथा
भला कौन सुने हमारे कथा?
घोर बदल की घटा है छाई
देख भूख तुझे शर्म भी न आयी
अभी तो बारिश भी न छुटा था,
फिर भी द्वार पर मैं खड़ा था।
बहुत उड़ लिए ऊंचे आसमान में
बहुत वक़्त गुजरा भटकते हुए अंधेरे में,
इस अंधेरी रात की,एक नई सुबह ढूंढते हैं
चलो खुशियां ढूंढते हैं...
चलो खुशियां ढूढ़ते हैं।
- सूरजमल AKs
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इधर आरोह है, उधर अवरोह है,
खतरा है, नहीं कोई उहापोह है।
मुश्किल में अस्मत है खड़े सफेद पोश है,
चलो उधर जिधर डकैतों का गिरोह है।
अनजानी सड़क का सफर आसान है,
जान पहचान की खतरे में फंसा बटोह है।
अंधेरों से निपट लेते हर हाल में मगर,
कुछ दिखता नहीं सियासत चमचमाती खोह है।
सही गलत का कहीं कुछ भेद नहीं रहा,
हथोड़ा वही मारो जहां गरम लोह है।
गैरों की भूख, प्यास, नींद, हंसी बेमानी है,
जहां सिर्फ अपनी मलाई कटे बस उसी की टोह है।
राम राम जपना, पराया माल अपना की रट है,
विकास नारों में बताना सिर्फ सब माया मोह है।
- राधेश विकास
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बचपन
वो कच्ची सड़क, वो धूप, वो साया रह गया,
तरबूज की फाँकों में बचपन समाया रह गया।
पेड़ों पे चढ़ के तोड़ते थे कच्चे आम हम,
नमक-मिर्च में लिपटा हर इक साया रह गया।
पंप सेट का पानी था जैसे कोई जादू,
भीगते रहे हम, वक्त भी नहाया रह गया।
वो यारों की टोली, वो हँसी के फव्वारे,
हर एक लम्हा दिल में जगमगाया रह गया।
न कोई फिक्र थी, न कोई दौलत की चाह,
बस सादगी का रंग ही भाया रह गया।
अब शहर की भीड़ में खो गए हैं हम “शशि”,
गाँव का हर ख्वाब आँखों में छाया रह गया।
- शशि धर कुमार
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मेरे धरती पुत्र
देखता हूँ तेरी मेहनत को, पसीना आता है मुझे
कड़क धूप से करते हो मुकाबला,सलाम है तुझे
न देखा है तुझ जैसा कोई जांबाज,मैंने जमाने में
सदियां गुज़र गईं तलाश करते करते आख़िर तुझे,
मिला नहीं कहीं भी आप जैसा इस जमाने में मुझे
तेरी तपिश से सूरज भी शरमाकर ढल जाए
हौसले के आगे तेरे हर मुश्किल पिघल जाए
हे मेरेधरती पुत्र!इन खूबसूरत पहाड़ों की तू शान है
तेरे जैसे फ़ौलादी जांबाज़ पर मुझे भी तो मान है
देखें हैं बड़े-बड़े धुरंधर मैंने भी इस जमाने में
विशालकाय, अम्बर सदृश, औंधे मुंह गिरे महखाने में
तेरे हाथों की लकीरों में हल की रेखाएं देखी है मैंने
तेरी आंखों के सपने में सोने की बलाएं देखी है मैंने
ऐ नगतुल्य ! विशालकाय मेरे फौलादी धरतीपुत्र!
तेरी मेहनत के आगे सब फीके मिले मुझे
बीज बोए तो धरती हँसे, तू हँसे तो किस्मत खिले
तेरे पसीने की बूंदों से, मेहनत का आँगन भी मिले
ऐ धरतीपुत्र! तेरे नाम से, पहाड़ भी गर सिर उठाएँ
तेरी गाथा सुनके बादल भी, सावन बन बरस जाएं।।
- बाबू राम धीमान
*****
विधा गीत
कब तक अकेले मन को छलेंगे,
कभी तो वह आकर गले से मिलेंगे।
बहारों से आती उनकी जो खुशबू,
मेरी तरफ़ राह निकल ही पड़ेंगे ।
हो सके तो उनसे जाकर यह कहना
नज़र मेरी बस उनकी राह ही तकेंगे।
उपवन से जाकर ज़रा तुम कह दो,
फूल जो बिछाएं न मुरझाने लगेंगे।
सहनशील दिल मेरा बहुत है भोला
जनम जनम तक भी प्रतीक्षा करेंगें।
- रत्ना बापुली
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तुम्हारी चाहत
तुम्हारी चाहत को हम कभी मिटने नहीं देंगे,
तुम माँगोगे दर्द, हम खुशी ही देंगे।
तुम्हारी मुस्कान हमें सुकून देती है,
तुम्हारे आँसू हमें हर पल रुला देते हैं।
तुम्हारी हर ख्वाहिश हमें पूरी करनी है,
तुम्हारा हर सपना यकीन में बदलना है।
तुम्हारी राहों में फूल हम बिछाएंगे,
तुम्हारे हर ग़म को खुद में ही समाएंगे।
तेरी हँसी से ही मेरी दुनिया सजती है,
तेरी एक झलक से ये रूह महकती है।
रातों की खामोशी में तेरा नाम पुकारें,
दिन की हर धूप में तेरी छाया उतारें।
तुम हमें भूल जाओ, ये मुमकिन नहीं होगा,
हम तुम्हारी याद को दिल से जाने नहीं देंगे।
हर धड़कन में बस नाम तुम्हारा ही छाया है,
ये दिल हमेशा तुम पर ही आया है।
- गरिमा लखनवी
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टूटते रिश्ते और बदलती प्राथमिकताएं
आज प्राथमिकताओं के आगे रिश्ते कहाँ हैं टिकते
अनमोल जो होते थे कभी आज कौड़ियों के भाव हैं बिकते
कभी रिश्तों में हुआ करती थी शहद से भी ज़्यादा मिठास
घाव ऐसे मिल रहे हैं रिश्तों में जो ताउम्र धीरे धीरे हैं रिसते
आज प्राथमिकता नहीं है रिश्तों को बचाना
आज आदमी का लक्ष्य है केवल पैसा कमाना
हंसते हुए किसी को देख नहीं सकते
काम रह गया है केवल दूसरों को रुलाना
एक बच्चा है परिवार में उसे रिश्तों की क्या पहचान
भाई बहन बुआ मासी चाचा चाची का नहीं है ज्ञान
नारी का सम्मान कैसे करेगा दिल से कोई
जब उसके मन में ही नहीं है नारी का सम्मान
बूढ़े माता पिता को नहीं रखना चाहता कोई साथ
संवेदनहीन हम हो गए बिगड़ रहे हालात
सिर्फ पैसे की एहमियत है सबके लिए
ज़िंदा नहीं किसी के मन में अब जज़्बात
- रवींद्र कुमार शर्मा
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ये अप्रैल तू ऐसा न था
बेमौसमी सर्दी का आलम दिखा
वर्षा की फूहारों के साथ तू बिता
ये अप्रैल तू ऐसा न था।
धूप भी इतनी खिली
जून की तरह तपीस मिली
ये अप्रैल तू ऐसा न था।
फसल भी खेतों में खड़ी दिखती
अब तो मौसम को देख इंतजार है करती
ये अप्रैल तू ऐसा न था।
बादल आसमान में उमड़ते दिखते
तो कभी अंगारे भी खूब गिरते
ये अप्रैल तू ऐसा न था।
आमों के पेड़ पर बौर भी खूब दिखा पड़ता
ओलावृष्टि से पल में है वो झड़ता
ये अप्रैल तू ऐसा न था।
पपीहा भी भूल गया
शायद अभी गर्मी का मौसम नहीं है आया
ये अप्रैल तू ऐसा न था।
बेमौसमी सर्दी का आलम दिखा
वर्षा की फूहारों के साथ तू बिता
ये अप्रैल तू ऐसा न था।
धूप भी इतनी खिली
जून की तरह तपीस मिली
ये अप्रैल तू ऐसा न था।
फसल भी खेतों में खड़ी दिखती
अब तो मौसम को देख इंतजार है करती
ये अप्रैल तू ऐसा न था।
बादल आसमान में उमड़ते दिखते
तो कभी अंगारे भी खूब गिरते
ये अप्रैल तू ऐसा न था।
आमों के पेड़ पर बौर भी खूब दिखा पड़ता
ओलावृष्टि से पल में है वो झड़ता
ये अप्रैल तू ऐसा न था।
पपीहा भी भूल गया
शायद अभी गर्मी का मौसम नहीं है आया
ये अप्रैल तू ऐसा न था।
- विनोद वर्मा
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रिश्ते केवल भावनाओं से नहीं चलते…
वे ध्यान से साँस लेते हैं, और उपस्थिति से जीवित रहते हैं।
आज की दुनिया में हम सब व्यस्त हैं,
काम में, मोबाइल में, अपने-अपने विचारों में।
हम “साथ” तो होते हैं, पर “जुड़े” नहीं होते।
किसी के पास समय तो है, पर ध्यान नहीं…
और यहीं से रिश्तों में एक अनकही दूरी जन्म लेती है।
ध्यान का अर्थ केवल बातें करना नहीं है, ध्यान का अर्थ है,
किसी की आँखों में देखकर उसकी खामोशी समझना,
उसके छोटे-छोटे बदलावों को महसूस करना,
और बिना कहे उसके मन की थकान को पहचान लेना।
जहाँ ध्यान होता है, वहाँ अपनापन अपने आप खिल उठता है।
और जहाँ ध्यान कम हो जाता है,
वहाँ सबसे गहरा प्रेम भी धीरे-धीरे सूखने लगता है।
रिश्तों की सबसे बड़ी सच्चाई यही है,
कि उन्हें “बड़े-बड़े वादों” की नहीं,
बल्कि “छोटे-छोटे ध्यान” की ज़रूरत होती है।
वे ध्यान से साँस लेते हैं, और उपस्थिति से जीवित रहते हैं।
आज की दुनिया में हम सब व्यस्त हैं,
काम में, मोबाइल में, अपने-अपने विचारों में।
हम “साथ” तो होते हैं, पर “जुड़े” नहीं होते।
किसी के पास समय तो है, पर ध्यान नहीं…
और यहीं से रिश्तों में एक अनकही दूरी जन्म लेती है।
ध्यान का अर्थ केवल बातें करना नहीं है, ध्यान का अर्थ है,
किसी की आँखों में देखकर उसकी खामोशी समझना,
उसके छोटे-छोटे बदलावों को महसूस करना,
और बिना कहे उसके मन की थकान को पहचान लेना।
जहाँ ध्यान होता है, वहाँ अपनापन अपने आप खिल उठता है।
और जहाँ ध्यान कम हो जाता है,
वहाँ सबसे गहरा प्रेम भी धीरे-धीरे सूखने लगता है।
रिश्तों की सबसे बड़ी सच्चाई यही है,
कि उन्हें “बड़े-बड़े वादों” की नहीं,
बल्कि “छोटे-छोटे ध्यान” की ज़रूरत होती है।
- नरेंद्र मंघनानी (अम्मा हीं)
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