साहित्य चक्र

28 March 2026

बुद्धिमान जीव क्यों नहीं बना पाया समानतामूलक समाज!


हम इंसान इस पृथ्वी के सबसे बुद्धिमान जीव हैं, जिसने लगातार विज्ञान के साथ-साथ अपने रहन-सहन और खान-पान का विकास किया है। आदिमानव से हमारी कहानी शुरू होती है और आज चंद्रमा, मंगल ग्रह तक हम पहुंच चुके हैं। विज्ञान से हमने अपनी दिनचर्या को इतना आसान बना लिया है कि हम अपना अकेलापन दूर करने के लिए विज्ञान का ही सहारा ले रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या विज्ञान हमारा विनाश का कारण तो नहीं बनेगा ?







विज्ञान में हम इंसानों का जीवन बहुत ही आसान बनाया है, मगर हमारे समाज में अमीरी-गरीबी की खाई लगातार गहरी होती जा रही है। रिश्तों में संवेदनाएं, आपसी भाईचारा और अपनापन शायद ही अब शायद ही दिखाई देता है। हम इंसान वक्त के साथ-साथ अपनी बुद्धि का विकास करते तो जा रहे हैं, मगर अपने समाज में समानता नहीं ला पा रहे हैं। आज भी अफ्रीका में क‌ई ऐसे देश हैं, जहां के नागरिक एक वक्त के खाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वही अमेरिका और इंग्लैंड जैसे अमीर देश के लोग आराम से घर पर बैठकर खाना ऑर्डर करके खाते हैं। इतना ही नहीं बल्कि उनके पास इतना पैसा है कि उनकी 4-5 पीढ़ियां आराम से बैठकर खा सकती है।





जापान, चीन जैसे देशों में बुलेट ट्रेन चल रहे हैं जबकि अफ्रीका के कई ऐसे देश हैं जहां आज भी बिजली, पानी और यात्रा के लिए गाड़ी तक उपलब्ध नहीं है। अगर हम भारत की ही बात करें तो हमारे देश में अमीरी और गरीबी का फैसला इतना है कि गरीब, अमीर बनने का सपना तक नहीं देख सकता है क्योंकि उसके अमीर बनने के सारे रास्ते लगभग बंद है। शिक्षा जो मूलभूत अधिकारों में आती है, वह इतनी महंगी हो चुकी है कि गरीब का बच्चा सिर्फ साक्षर हो सकता है या अधिक से अधिक एक सरकारी नौकरी प्राप्त कर सकता है। देश के अधिकांश सरकारी नौकरी से एक गरीब सिर्फ अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को दूर कर सकता है या अधिक से अधिक लोअर मिडल क्लास तक पहुंच सकता है। उसमें भी अगर उसकी आने वाली पीढ़ी को सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी तो उसकी वह स्थिति और कमजोर हो जाएगी। ऐसे में सवाल उठता है- आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ?




हम इंसानों द्वारा चंद्रमा और मंगल ग्रह पर जाना सब फिजूल है, जब तक हम अपने मानव समाज में समानता नहीं ला पाते हैं। आखिर हम ऐसा नियम क्यों नहीं बनाते हैं कि कोई व्यक्ति एक स्तर तक ही अमीर हो सकता है! और ऐसे में हमारे समाज में अमीर बनने की प्रतिस्पर्धा भी काम हो जाएगी। इतना ही नहीं बल्कि मानव समाज का जीवन चक्र भी बेहद आसानी से घूमता रहेगा और हम अपनी प्रकृति, नदियां और प्राकृतिक संपदा को भी इस विनाशकारी विकास के दौड़ से बचा पाएंगे। कही ऐसा ना हो कि इस विकास की दौड़ में हम स्वयं के लिए मौत का कुआं बना लें। वक्त रहते हमें बतौर बुद्धिमान मानव अपने समाज को समानता मूलक बनाने की कोशिश करनी चाहिए। हमने बहुत लड़ लिए युद्ध, बहुत बना ली संपत्ति और बहुत कमा लिया धन, मगर बतौर मनुष्य हम सभी आज भी सामान जीवन क्यों नहीं जी पा रहे हैं ?


                                                  - दीपक कोहली



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