साहित्य चक्र
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21 June 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 21 जून 2026





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पिता ने सिखाया

सिखाया पिता ने यही सिखाया
हार जाना पर कभी भी हार नहीं मानना
हार जो मानोगे तो लड़ना भूल जाओगे
शत्रुओं से फिर कभी भी लड़ नहीं पाओगे
ग़ुलामी करोगे, ग़ुलाम ही कहलाओगे
सड़ा दिए जाओगे दलदली-यातनाघरों में
ज़रा भी पूछना नहीं पड़ेगा पता नरक का
नरक होगा पल-पल पूरा आमने-सामने
नहीं चाहोगे अंतत: फिर भी भुगतोगे
ऑंखें होते हुए भी मगर जान नहीं पाओगे
करोगे क्या ऐसा जातक जीवन पाकर
चाहोगे पर चाहकर भी मर नहीं पाओगे
सिखाया पिता ने यही सिखाया।


- राजकुमार कुम्भज


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दिल में दबाते हो दर्द को तुम, लवों पर क्यूँ लाते नहीं हो,
समंदर समेटे हो अश्कों का भीतर, आँखों से क्यूँ इन्हें बहाते नहीं हो।
हँसते रहते हो फीकी सी हंसी, नकाब क्यूँ हसी का हटाते नहीं हो,
चाहते हो बताना हर बात तुम, चाहकर भी क्यूँ मगर बताते नहीं हो।
दिल में दबाते हो दर्द को तुम, लवों पर क्यूँ लाते नहीं हो।

कशमकश बहुत है भीतर-भीतर, बाहर क्यूँ इसे लाते नहीं हो,
आँखे बंद करके करते हो इबादतें, मंदिर मस्जिद क्यूँ जाते नहीं हो।
लाख पूछने पर भी हमें तुम, बात दिल में दबी क्यूँ बताते नहीं हो,
झुकी नज़रों से देखते हो तुम, नज़र से नज़र क्यूँ मिलाते नहीं हो।
दिल में दबाते हो दर्द को तुम, लवों पर क्यूँ लाते नहीं हो।

गहरी किसी ठोकर से घायल हो तुम, जख्मों को क्यूँ दिखाते नहीं हो,
महफ़िल में भी रहते हो गुमशुम, वजह क्यूँ इस चुप्पी की बताते नहीं हो।
गुनगुनाते हो तन्हाई में बहुत, राग-ए-दिल क्यूँ महफ़िल में गाते नहीं हो,
आ जाने दो आँधियों को एक बार तुम, उठते तूफानों को यूँ दबाते नहीं है।
दिल में दबाते हो दर्द को तुम, लवों पर क्यूँ लाते नहीं हो।


- धरम चंद धीमान



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इतनी सी जिंदगी

दो जून की रोटी,
दो कपड़े,
दो ईंटों का घर,
दो मीठे बोल,
दो कदम हमसफ़र
दो पल का चैन-
बस इतनी सी तो होती है ,
दो दिन की असल जिंदगी।


- रोशन कुमार झा



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बड़ा बड्डीखणा बी खरा नी हुन्दा
एड़ा गल्लांन्दे आए स्याणे,
कर ले सब्र, जे आई ख़बर
फेरी बादा बिच पऊंणा पच्छ्ताणे

ओच्छे बणी कन्ने, कुछ नी मिलदा
चार दिना री हुन्दी बड्डीयाई,
फेरी नी पूछदा कोई भाईयों
याद आऊँदी फेरी अपणी कमाई,

ओच्छे अपणा, ओच्छपण नी छड्डदे
चाहे बादा बिच पओ पच्छ्ताणे,
चौहट्टे-चबारे फेरी गल्लां लगदिया
लोक हंसदे,तान्ने कसदे, याद आऊँदे फेरी स्याणे,

अक्कड़ बुरी, अकड़ना तिस दे बी बुरा
न मिलदा कुछ कुसी जो, ना ई आऊँदा पूरा,
कर सुरत, रह नीठा,छड्ड दे बड्डीखणा ओ बन्देया
निवां बणी कन्ने चल, आई नी पऊणा पच्छ्ताणे,

गल्लां हुंदियाँ सच्चीयाँ, लोक बणादें ख्वाणे
जीभा ज़बानी ये गल्लां चड़दियाँ स्वाद कोई क्या जाणे ?
कर ले अम्ल, बान गठ्ठी, याद आऊँदे फेरी स्याणे
रसभरूरिया ये गल्लां लोकों, कीमत कोई क्या जाणे ?


- बाबू राम धीमान



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-पिता कब अच्छे दोस्त बन गए... पता ही नहीं चला!

बचपन में जिनसे सबसे ज़्यादा डर लगता था,
आज उन्हीं से हर बात कहने का मन करता है।

जो कभी कहते थे- "इतना मत हँसो..."
"समय पर घर आना..." "पढ़ाई पर ध्यान दो..."
तब लगता था, ये सिर्फ़ रोकते-टोकते हैं।
लेकिन समय ने धीरे-धीरे बताया...
वे रोक नहीं रहे थे,
वे जीवन की ठोकरों से बचा रहे थे।

एक उम्र के बाद एहसास हुआ कि
पिता के पास हर सवाल का उत्तर नहीं होता,
लेकिन हर मुश्किल में कंधा ज़रूर होता है।

अब उनसे बातें होती हैं... कभी व्यापार की,
कभी परिवार की, कभी जीवन की,
और कभी बिना किसी वजह के भी।

अब समझ आता है, वे केवल पिता नहीं,
मेरे सबसे सच्चे, सबसे मौन और
सबसे भरोसेमंद दोस्त हैं।
दोस्त वह नहीं जो हर बात पर "हाँ" कह दे,
दोस्त वह है जो आपकी भलाई के लिए
ज़रूरत पड़ने पर "ना" भी कह सके।

शायद इसी लिए... पिता पहले अनुशासन बने,
फिर सहारा बने, और एक दिन...
पता ही नहीं चला कि वे सबसे अच्छे दोस्त बन गए।

जो लोग आज भी अपने पिता के साथ
बैठकर दो पल हँस सकते हैं,
उनसे अधिक अमीर शायद ही कोई होगा।


- नरेंद्र मंघनानी


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बीत गए वह दिन पर उनकी यादें पास हैं,
दूर हो तुम पर तुम्हारी यादें पास हैं।

हर वक्त मुझे याद आती है तुम्हारी,
तुम्हारे वापस आने की खास है,

मैने हमेशा तुम्हें याद किया है,
इसलिए शायद बस यादें पास है,

तुम्हारा जिस्म नहीं है मेरे पास,
पर तुम्हारे होने का एक एहसास है,

कई समय से मैं रह रहा हूं अकेला,
अकेलेपन से लड़ने का मुझे अभ्यास है,

जब हम पहली बार मिले थे,
तब से तुम्हारी धड़कन मेरे पास है,

तुम दिया थी मेरी जिंदगी की,
पर अब दिया- बत्ती नहीं बस प्रकाश है,

शाम को घर की ओर जाने लगता हूं,
घर पर तुम देखोगी ये आस है,

मैं तो कब का दफन हो जाता,
वह तो तुम्हारी यादें मेरे पास हैं,

साथ हमारा कभी छूट नहीं सकता,
तुम हो वहां पर दिल मेरे पास है,

हमारी कुछ बातें अधूरी रह गई,
उनके पूरे होने की आस है,

तुम्हें देखूं तो ग़ज़ल बन जाए,
पर अब यह कागज एक लाश है,

तुम गई तो स्याही भी ले गई,
पर फिर से लिखूंगा ग़ज़ल ये आस है,

कुछ यादें हमेशा साथ में रह जाती हैं,
जैसे तुम्हारी मेरे पास है,

रात को कमरे में बैठे गुनगुनाता हूं,
तुम्हारे लिए लिखे गीत आज भी पास हैं,

तुम्हे आज भी रोज देखता हु,
तुम्हारी तस्वीर आज भी पास है,

तुम जब आई थी मेरी जिंदगी में,
वह पल आज भी खास है,

इसीलिए तो जिंदा है "राज",
तुम्हारी यादें अभी भी पास है।


- प्रणव राज


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व्यक्तित्व

व्यक्तित्व केवल रूप नहीं,
न ही वाणी का श्रृंगार।
यह तो अंतर्मन की सुगंध है,
जो देती जीवन को आकार॥

विपदा में जो धैर्य रखे,
सफलता में रहे विनीत।
वही व्यक्तित्व उज्ज्वल होता,
जिसके भाव रहें संगीत॥

सत्य, करुणा, प्रेम और सेवा,
जिसके जीवन का आधार।
उसके पदचिह्नों से महके,
धरती, अम्बर और संसार॥

चमक नहीं पहचान बनाती,
न ही ऊँचे पद का मान।
व्यक्तित्व वही श्रेष्ठ कहलाए,
जो जीते सबके हृदय-प्राण॥


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


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शिकायत

वह कभी प्रेम का इज़हार नहीं करता था,
पर शिकायतों का कोई अवसर नहीं छोड़ता था।

तब समझ में आया,
कभी-कभी प्रेम शब्दों में नहीं,
इसी तरह की शिकायतों में रहता है।

एक दिन न दिखूँ,
तो वह दो दिन गायब हो जाता।
उससे शिकायत करती,
तो बड़ी सहजता से कहता
"पहले तुम तो उस दिन नहीं दिखीं थीं।"

उसकी हर नाराज़गी में
मेरा हिसाब छिपा होता था,
और हर शिकायत में
एक अनकहा अधिकार।

शायद प्रेम हमेशा
"मैं तुमसे प्यार करता हूँ" नहीं कहता,
कभी-कभी वह शिकायतों का लिबास पहनकर भी
हमारे पास आ बैठता है।


- सविता सिंह मीरा


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मेरा पहला प्यार है तू...
हां! तुझसे ज्यादा मैं
पिता से प्यार करता हूं।
मगर तेरी हिफाजत
और सम्मान से
कोई नहीं खेल सकता,
जब तक मैं जिंदा हूं।
तेरे लिए मैं सारे
जगत से लड़ सकता हूं।
हां! गुस्सा होता हूं तेरे से...
कभी लड़ लेता हूं तेरे से...
मगर तेरा अंश हूं तेरे से
बड़ा थोड़ी हो सकता हूं।
तेरे दूध का कर्ज थोड़ी ना
मैं अदा कर सकता हूं।


- दीपक कोहली



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दिव्या अनुराग

जन्म जमांतर की मेरी
अतृप्त इच्छाएं
मुझे छूने लगी है।

देख कर तुमको
मुझ में प्रेम जिज्ञासा
फिर उत्पन्न होने लगी है।

तुम्हारे अस्पर्श अहसास
मेरे सहस्रार को
जागृत करने लगे है।

न चाहते हुए भी
मेरे अनाहत में
तुम्हारे स्वर को गूंजने लगे हैं


- डॉ. राजीव डोगरा



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ज़िन्दगी कटी है

जितनी भी ज़िन्दगी कटी है सब तेरे नाम
बुरा किया अच्छा किया है सब तेरा काम
जैसी बुद्धि दी तूने है उसी का परिणाम
अपने कर्मों का फल भुगतेगा क्यों बन रहा अनजान

जिंदगी में किससे मिलना है तुझे नहीं मालूम
किससे मिलाना है यह वही तय है करता
मालूम है तुझे कि जाना पड़ेगा एक दिन खाली हाथ
मोहमाया में फंस गया जाने से बहुत है डरता

बने बनाये खेल को बिगाड़ना
या बिगड़े हुए खेल को बनाना
किसी के हाथ में तो कुछ भी नहीं
अपनी मर्जी से आता है उसको नचाना

कभी करता है वह दिल्लगी
कभी उपहास है उड़ाता
भटकाता है अकेली राहों में
तो फिर राह भी है दिखाता

जिंदगी को जो यूं ही तमाम कर दिया
जिसने दिया सब कुछ उसी को बदनाम कर दिया
अवसर जो मिले आगे बढ़ने के उन्हें गंवा बैठा
दूसरों का जीना भी हराम कर दिया


- रवींद्र कुमार शर्मा


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मौत सच है रहेंगे सदा हम नहीं।
जीने का भी यहाॅं पे मज़ा कम नहीं।।

ज़िंदगी चार दिन की जियो शान से।
बाटो खुशियाॉं जहाॉं में मगर ग़म नहीं।।

ज़ुल्म सहते रहे उनके हॅंसते हुए।
रोए ऐसे की ऑंखें हुई नम नहीं।।

ज़ेहनी कमजोर जो लड़ते फिरते हैं वो।
गुस्से में कांपते जिनके कुछ दम नहीं।।

जंग बल से नहीं तुम लड़ो अक़्ल से।
नज़रें दुश्मन पे हों ये मगर ख़म नहीं।।

चढ़ने के बाद जल्दी न उतरे मिरी।
फूल महवे की पीता कभी रम नहीं।।

लोग क्यूॅं डर रहे देख मुझको निज़ाम।
ठर्रा बोतल में है ये कोई बम नहीं।।


- निज़ाम फतेहपुरी



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24 April 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 24 अप्रैल 2026










चाहत

तेरी आंखों में दिखती है चाहत
तभी तो जी रहा हूं
जिंदगी ने दिए हैं ढेरों गम
जिंदगी ने दिए हैं बेहिसाब ज़ख्म
पर तेरी आंखों में देख कर चाहत
गम के कड़वे घूट भी
हंस हंस के पी रहा हूं
तेरी आंखों में दिखती है चाहत
तभी तो जी रहा हूं
तेरी आंखों में दिखती है चाहत
मैं समझता था खुद को बेसहारा
मैं समझता था,मेरा जीवन है निरर्थक
मैं समझता था,स्वयं को प्रेम वंचित
मैं समझता था,स्वयं को अभागा
पर तेरी आंखों में देखकर चाहत
मुझे लगता है
कोई नहीं है इस जग में
मुझ सा खुशनसीब
मुझ सा किस्मत वाला
तेरी आंखों में दिखती है चाहत
तभी तो जी रहा हूं


- प्रवीण कुमार


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दुनिया से गिला

जुस्तजू मंज़िल की है, पाँव में ज़ंजीर पड़ी है,
रास्ते हमवार कहाँ, राह में दीवार खड़ी है।
तेरे लम्स की ख़ुशबू अभी तक गई नहीं है,
यादें किताबों के सूखे फूलों से जुड़ी है।
दुनिया से गिला भला हम क्योंकर करते,
अपने ही अंदर कोई वहशत सी पड़ी है।
जज़्बों की सदाक़त पे न शक नहीं करना,
ख़ामोश निगाहों में मोहब्बत की लड़ी है।
तूफ़ान-ए-बला में भी ईमाँ है सलामत,
इश्क़ क़यामत है तो हिकमत भी बड़ी है।
तारीकियों से राह की घबराना नहीं तुम,
अफ़लाक के माथे पे चमकने को एक घड़ी है।
मिन्नतें न उठाना ज़माने की कभी ऐ दिल,
'मुश्ताक़' तेरे दर पे सख़ावत की झड़ी है।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़


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मां-पापा अब चुप हो जाओ

उठ जाओ अब मां और पापा,
और न अब तुम आँसू बहाओ।
रोना-धोना छोड़ दो अब ये,
सिया नाम की कसम ये खाओ।

बहनें मेरी कमजोर बनें न पापा,
ढेर बारूद का तुम उन्हें बनाओ।
शोक धुनों से उदास न हो यें,
आदत रणभेरी की इन्हें लगाओ।

रोने सिसकने की आदत बने न,
शेर सा दहाड़ना इन्हें सिखाओ।
खून पी जाए दरिंदों का ज्यूँ पानी,
तन-मन इनका कठोर बनाओ।

डोली नसीब न थी मुझे तो कुछ न,
अर्थियां बनाना तुम इन्हें सिखाओ।
जल्लादों सी बे रहम इन्हें बनाना,
लाशों से खेलना तुम इन्हें सिखाओ।

मेरे लिए बस इतना करना पापा,
नशे से इस समाज को तुम बचाओ।
गुड्डे -गुड्डियों की कहानियां न सुनाना,
बेटियों को जिन्दा हथियार बनाओ।

आउंगी नहीं अब वापिस मैं मां- पापा,
आंसूओं की गंगा न व्यर्थ तुम बहाओ।
कोई और सिया न बनें शिकार नशेबाजों की,
बस जीते जी कुछ ऐसा कर जाओ।


- धर्म चंद धीमान


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“प्रेम"
प्रेम के
घाट नहीं होते,
धारे होते हैं…!
घाट ठहराव देते हैं,
सीमाएँ बनाते हैं,
जहाँ लोग आते हैं,
कुछ देर रुकते हैं,
और फिर लौट जाते हैं।
पर प्रेम…
वह तो धारा है,
जो निरंतर बहती है,
न किसी एक किनारे की,
न किसी एक पल की।
वह बिना शर्त बहता है,
हर दिशा में फैलता है,
और जिसे छू ले,
उसे जीवन से भर देता है।
सच्चा प्रेम वही है,
जो बंधे नहीं,
बस बहता रहे…
शांत, गहरा और अनंत।


- नरेंद्र मंघनानी


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शिक्षा संगठन संघर्ष

जीत सुनिश्चित हो अपनी,
और कोई अब हार नहीं,
जीवन है एक चुनौती बड़ी,
जिसमें डर का कोई सार नहीं।

ये बात सभी में फैला दो,
अब सहना अत्याचार नहीं,
हम शांति-अहिंसा के दूत सही,
पर दुर्बल और लाचार नहीं।

पढ़कर पाठ हम पुरखों से,
शिक्षित बने, हथियार नहीं,
सत्य और धैर्य के पथ पर चलें,
मन में कोई अहंकार नहीं।

संगठित होकर आगे बढ़ें,
एकता से इंकार नहीं,
संघर्ष होता मानवता के लिए ,
उग्र, घृणा का व्यवहार नहीं।

जीत सुनिश्चित हो...
और कोई अब हार....


- नरेन्द्र सोनकर बरेली


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पता नहीं कैसे अकेला हो गया हूं

रात के अंधेरे में चुपचाप बैठा रहता हूं,
पहले हंसा करता था खूब जोर से,
चांदनी रात में अपने नज़्म गाया करता हूं,
अब तो मुस्कुराया भी नहीं हूं कई रोज से,
यारों ने छोड़ा न था,
न तोड़ा था दिल ने,
पता नहीं कैसे अकेला हो गया हूं?
न करते हैं वह लोग याद मुझे,
न खत, न कोई पुकार,
पता नहीं कैसे भुला दिया गया हूं?
रोज सुबह होती, रोज डाकिया आता है,
रोज खामोशी छाती, रोज आंखें भरता हूं,
पता नहीं कैसे इतना शांत हो गया हूं?
रोज कानों को तरसता हूं,
सुनने को उनके बोल,
पता नहीं कैसे उनके लिए गायब हो गया हूं?
पहले कई लोग थे मेरे पास,
अब तो कोई नहीं है,
बस मैं ही रह गया इस कमरे में,
पता नही कैसे उनके लिए मिट - सा गया हु?
जब कभी उनकी याद आती,
तो पुरानी तस्वीरें देख लिया करता हूं,
उस पर धूल जमी रहती है,
पता नहीं कैसे उनके लिए धुंधला- सा हो गया हूं?
या, जीवन के उस मोड़ पर हु,
जहां कोई नही होता है साथ,
इसलिए शायद मैं अकेला हो गया हूं।


- प्रणव राज


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स्त्री संवेदना

स्त्री केवल देह नहीं होती,
वह मन की गहराई होती है।
घर-आँगन की हर धड़कन में,
उसकी ही परछाई होती है।

ममता की मधुरिम सरिता बन,
सबके दुख अपने में भरती।
आँसू पीकर मुस्काती रहती,
हर पीड़ा चुपचाप ही सहती।

कभी बहन बन स्नेह लुटाती,
कभी माँ बन जग को सँवारती।
पत्नी बन संगिनी कहलाती,
हर रिश्ते में प्रेम उभारती।

उसकी आँखों में स्वप्न अनेक,
हृदय में साहस का उजियारा।
टूटे पथ को जोड़ बनाती,
जीवन करती फिर से प्यारा।

मत आँको उसको सीमाओं से,
वह शक्ति, करुणा, चेतना है।
हर रूप में जग को महकाती,
स्त्री सृष्टि की अनुपम रचना है।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


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भीगा मन

बारिश के बाद......
हमेशा सुखाती आईं है स्त्रियां
सीली हुई दाल , सीले बिस्तर ,
सीले हुए मठरी और पापड़ ।
अक्सर धूप में सुखा देती हैं
गीले तौलिए , गीले कपड़े ।
लेकिन क्या कभी सुखा पाईं हैं ?
अपना भीगा सा मन और भीगे नयन !
क्या कभी खोल पाई हैं
वो अपने मन की खिड़कियां ?
क्या कभी दे पाई हैं हवा ,
मन की सीली हुई दीवारों को
बड़ा आसान है सबको सुरक्षित रखना
सबका ख्याल रखना ,
और बड़ा ही कठिन है ,
खुद के अंदर खुद को सहेजना ,
मौन रहकर ,
अपने अंतर्मन का सब कुछ
अपने ही अंदर व्यवस्थित करना ।


- मंजू सागर


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आत्मा का मोक्ष हैं पुस्तकें

काॅंप रहा है आदमी
पुस्तकें हाॅंफ रही हैं विचारों से
एक आदमी फटी कमीज़ में सड़कों पर
कटोरा लिए हाथों में माॅंगता है अभय
हथियारबंदी का आग्रह है पुनः पुनः
संसारभर के शासनाध्यक्षों से
विनय है,विनम्र है,निवेदन है,अनुरोध है
कि भूलें सब संहार,सॅंवारें सारा संसार
सफ़र छोटा है,लंबा है,हैं मुसीबतें भी
पहले से ही जूझ रहे हैं कई-कई सवालों से
अब और नहीं,और नहीं हत्याऍं
खिलाऍं फूल खिलाऍं समूची पृथ्वी पर
भिन्न-भिन्न ख़ुशबुओं पर सवार हों हवाऍं
जल सारा जो खारा है अभी हारा है आदमी
उसी की चिंता में दुबली हुईं जाती हैं पुस्तकें
पुस्तकें देती हैं,पुस्तकों ने ही दिया है रास्ता
क्षितिज हैं पुस्तकालय,पार जिनके अंतरिक्ष
कोई बंधन नहीं,बाॅंधती हैं मुक्तिबोध से
पुस्तकें दिलातीं हैं हर अंधेरे से मुक्ति
आत्मा का मोक्ष हैं पुस्तके


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ईश्वर नहीं है कहीं भी नहीं
अगर है कहीं तो है यहीं पुस्तकों में
सपने हैं तो हैं यहीं,नींद है तो यहीं
मुक्ति यहीं,मुक्तिबोध यहीं,मुक्तिमार्ग यहीं
दु:ख और उदासी यहीं होते हैं असहाय
असहमतों को भी मिलती है जगह यहीं
भीड़ में आता है रास्ता पुस्तकों से ही
पुस्तकों से ही आता है जीवन में लोकतंत्र
लोकतंत्र से ही आता है पुस्तकों में जीवन
ख़तरा है सभी जगह ख़तरा है आजकल
बचाना है सभी को छोड़कर ईश्वर


- राजकुमार कुम्भज


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आसा री बोली पहाड़ी

इतने साल हुई गए  आज 
पर पहाड़िया  रा नी पूछया  किन्हिए  हाल।
अपणे अस्तित्व जो लगीरा बड़ा डर
एसा जो  पराया लगी करां आज अपणा ही घर।
पहाड़ी बोलणे ते लोक शर्मांदे
जे कोई बोलो तां स्यो गरौंजढ़ कहलांदे।
आसा री पहाड़िया च हुंदी बड़ी मिठास
इदी जो बोलणे ते मित्र बणदे खास।
आसे हिमाचली ता पहाड़ी आसा री शान
इदी जो संवैधानिक दर्जा दिलवाणे
जो देओ अपणा ध्यान।
देशा प्रदेशा तांजे आसे कदी जाओ
तां उथी भी कदी कदी पहाड़िया मंझ गलाओ।
दूजे प्रदेशा च आसा जो पहाड़ीए  बोलदे
फेरी आसे पहाड़ी बोलणे ते कां पीछे रैहंदे।
पंजाबा च पंजाबी,गुजराता च गुजराती बोलाएं 
फेरी आसे पहाड़ी बोलणे ते कां परहेज कराएं।
पहाड़ी आसे, पहाड़ी आसा री पछयाण
इदी जो संवैधानिक दर्जा मिलणे ते ही
हुणा आसा रा कल्याण।


- विनोद वर्मा गांव


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अगर मैं, फिर से शुरू करूँ ?

अगर मैं फिर से शुरू करूँ, नयी जिंदगी संग तेरे ?
तो बोलो, साथ दोगी ना इसबार तुम मेरे ?
बीते दिनों की बातें भुलाकर, हमदोनों ही साथ आएँ
फिर से एक नयी जिंदगी शुरू कर एक दुजे को अपनाएं।
जहाँ मै नही बल्कि हम दोनों का ही होगा समभाव
हमारे बीच किसी अन्य जन का नहीं रहेगा प्रभाव।
हम दोनों ही मिलकर,हर एक सुख -दुख को बाँट लेंगे,
कसम से ,हमारे ये नयी जिंदगी मे अन्य का ना सुनेंगे।
हाँ कह दो ना तुम एकबार ,मुझे तेरे ही संग है अब रहना
अगर मै फिर से शुरू करूँ तो, तुम भी साथ मेरा देना ।


- चुन्नू साहा


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भंगे बणाये भंगड़िये चिट्टे बणाये चटेड़ी

नशा पहले हुँदा था सिर्फ शराबा रा
इक्का दुक्का लैंदे थे कदी कदाईं अफीम
पर एह नशा मितरो हुँदा बौहत खराब
नशे पीछे लोकें बेची दित्ती अपणी जमीन

शराबा रे नशे रा इतना बुरा नी थे मनान्दे
हुण नशेयाँ रे हुई गए कई नांव
इतने गुलाम बणी गए नशे रे
कईयें छडी दित्ते घर बार कईयां ते छुटी गए गांव

भंग पीणे वाल़े जो बोलदे भंगड़िया
सैजे सब नशे करदा तिसजो गलांदे नशेड़ी
दारू पीणे वाले जो गलांदे सब शराबी
अज्जकल चिट्टा लैणे वाल़े जो बोलदे चटेड़ी

बच्चेयाँ रा कसूर घट कने मावां बुढेयाँ रा ज़्यादा
जे नज़र रखदे बच्चेयाँ पर तां एह छापा नी पौन्दा
भाई बहण बेटा बेटियां किसी रे नी मरदे इस नशे कने
जे अणजाण नी बणदे टैमा पर सब संभाल़ी रा हुँदा

एह वक्त जे खुंजी गया तां दोबारा नी औणा
शर्म नी करो लोको फेरी बाद च पछताणे पौणा
जे बच्चा कोई पिहंगल़ी गया तां सब्र करा
कोशिश करनी सबीं कने सै इसा बमारिया ते छुड़ाणा


- रवींद्र कुमार शर्मा


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अपाहिज़

नशे के जाल ने कितना अंधा बना दिया,
भले चंगे इंसान को इसने हैवान बना दिया।

सोच समझ की शक्ति को नशे ने कुंद कर दिया,
इस नशे ने न जाने कैसा क्रूर विनाश कर दिया

चिरागे नशेमन थे जो कई घरों के,
उन्होंने अब अपने घर को ही जला दिया।

बांटनी थी सबको अथाह खुशियों की सौगात
बेदर्द नशे ने सबको जहर का घूंट पिला दिया।

जानवर से बदतर हालात कर दिए इस नशे ने,
मासूम सी बच्ची का जीवन खत्म कर दिया।

क्या क्या सपने संजोऐ थे उन मां बाप ने,
जिनके अरमानों पर इस दरिंदे ने पानी फेर दिया।

क़ाफ़िर नशे ने किस कदर क़ाफ़िर बना दिया,
चलते फिरते इंसान को पल में लाश बना दिया।

यूं भी पत्थर दिल जिंदा लाश बनकर भी क्या,
अपनों को भी जीते जी लाश ही बना दिया।

किससे कहें किसको अपना दुखड़ा सुनाएं,
छीन सहारा सदा के लिए अपाहिज़ बना दिया।


- राज कुमार कौंडल


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अनुराग वृष्टि

नव जलधारा अवतरित धरा पर,
सिक्त हुआ अंतर्मन,
विकसित हुईं हृदय-कलिकाएँ,
सुरभित गृह-प्रांगण।

अव्यक्त भाव हैं अंतस में,
विरह-वेदना तज देना,
नव आगमन हो तो नयन भरें फिर,
प्रेम-वृष्टि में बह लेना।

अश्रु-धारा ने प्रक्षालित किया,
नयनों का शून्य प्रांगण,
विगत स्मृतियाँ विलीन हुईं सब,
भार-रहित हुआ यह मन।

शुष्क कोण भी सिक्त हुए अब,
पिपासा शांत हुई मन की,
स्नेह-बिंदु से महक उठी है,
पावन बेला जीवन की।

मंद पीड़ा अब द्रवित हो रही,
बनकर मधु-रस धारा,
सिक्त हृदय में प्रतिध्वनित है,
प्रीति-राग का एकतारा।

तुम संग प्रतिपल कोमल है,
जैसे श्रावण गाता है,
श्रवण कर मानस का मधु-गुंजन,
हृदय-मयूर थिरकता है।

गहन स्नेह हृदय में स्थित,
जैसे शांत प्रकाश हो,
स्मृतियों की कोमल छाया,
जैसे पीयूष-कलश हो।

तुम बिन सर्वत्र शून्य सा,
रिक्त भाव का डेरा है,
बनकर मधुर स्वप्न आ जाओ,
तुम बिन घोर अंधेरा है।

निशि-बेला के इन क्षणों में,
पक्ष्मों पर तुम आ जाना,
हृदय-मौन भंग कर प्रिये अब,
स्वर्ण-स्वप्न सजा जाना।

पूर्ण करो प्रतीक्षा मेरी,
अब न हमें तरसाना तुम,
प्रेम-दीप प्रज्वलित कर पथ में,
जीवन-मार्ग आलोकित करना तुम।


- सविता सिंह मीरा


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पुरखों की विरासत...
हम बंटवारे में छोड़ आए हैं।
हमारे चेहरे पर... जो चमक है
वो हमारी खुद की बनाई है।
तुमने अपने पूर्वजों के लिखें
सारे ग्रंथ, कहानी छोड़ दिए
सच कहूं तो तुम गद्दार हो...
ना अपने पूर्वजों के हुए...
ना संस्कृति और सभ्यता के
तुमने जिस-जिस को मां बोल!
उसकी हालत बदतर कर दी
सच बोलूं तुम स्वार्थी हो।
अपने पूर्वजों की तुमने!
भाषा छोड़ दी...
वेशभूषा छोड़ दी...
रहन-सहन छोड़ दिया... और
थोड़ी लाभ के लिए जाति बचा ली
सच कहूं! तुम्हें तुम्हारे
पूर्वजों का श्राप लगेगा।
मेरा क्या! मैंने अपने
पूर्वजों की विरासत छोड़ी
मेरी आने वाली पीढ़ी
मेरी विरासत छोड़ देगी।


- दीपक कोहली


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प्यार है ईश्वर की उपहार

प्यार की बन्द कर जग में बाजार
प्यार नहीं है रे। मूरख कोई व्यापार
प्यार है ईश्वर का अनमोल उपहार
प्यार के काँधे पे टिका जीवन संसार

प्यार का मत लगा कोई कहीं दाम
प्यार है खुशियों का एक पैगाम
प्यार दो दिलों का है मधुर अंजाम
प्यार से जिन्दगी है रंगीन गुलफाम

प्यार समर्पण का है पावन नाम
प्यार में अपर्ण हो सुबह व शाम
प्यार मोहब्बत में लिखी है पयाम
प्यार में जीवन का बृहत आयाम

प्यार से जीवन है सबका गुलजार
प्यार से बंधा है दो दिल की तार
प्यार है लैला मजनू की गले हार
प्यार से है बागों में मस्त वयार

प्यार को मत कर जग में बदनाम
प्यार से सजा है जीवन की जहान
प्यार है चैन सुकुन का एक। धाम
प्यार प्रेम मोहब्बत प्रीत की जुवान


- उदय किशोर साह


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