साहित्य चक्र

13 August 2016

मेरी जन्मभूमि

हम उस मिट्टी के है, जहां देवता निवास करते है।
मेरी मातृभूमि नहीं वो, पूरे विश्व की देवभूमि है।।


गंगा-यमुना बहते जिसमें, ऊँचा जहां हिमालय हो।
नमन करु इस भूमि को,केदार सा जहां शिवालय हो।।

जहां घर - घर में गाय माता को, आज भी पूजा जाता है।
वहीं घर- घर में तुलसी माता, आज भी लगी होती है।।


जहां हर पर्वत पे देवता बैठे हो, घर-घर में गोलू पूजा हो।
मिट्टी-पत्थरों से बने मकान हो, लकड़ियों से सजा शमशान हो।।




                                                                               कवि-  दीपक कोहली

11 August 2016

लिखता हूँ एक कविता, कुछ लाइनों में....|



लिखता हूँ एक कविता, कुछ लाइनों में,
ऐ मेरे वतन, तेके उन जवानों के लिए।
जिन्होंने अपना सीना चीर दिया गोलियों से,
और नहीं आने दी तेरे आंगन में कोई दरार।।



मुझे भी शौक था तेरी रक्षा करने करने का,
पर साथ नहीं दिया इस शरीर ने।
ऐ मेरे वतन तेरे उऩ जवानें को मेरा सलाम,
जिन्होंने तेरे लिए अपनी कुर्बानी दी।।



उन पहाड़ों और जंगलों में रहने का शौक था मुझे 
भी, पर क्या बताऊ मां ने मुझे कबूला नहीं।
ऐ मेरे वतन तेरे जवानों को मेरा नमन्,
जिन्होंने तेरे लिए अपना बलिदान दिया।।


आग और पानी से खेलना चाहता था तेरे लिए,
लेकिन उस खुदा को कबूल नहीं था मेरा यह खेल।
जिसने बना दिया मुझे एक कवि और एक मेल,
ऐ मेरे वतन तेरे उन जवानों को मेरा अदामा,
जिन्होंने हमारे लिए अपनी जान बाजी लगाई है।।


लिखता हूं एक कविता, कुछ लाइनों में.............।।




                                                                           दीपक कोहली


08 August 2016

मेरी सोच

                                          मेरी सोच

     
यहां नेता-अभिनेता सभी बिक जाते है,
कोई कौड़ियोंं के दाम तो, किसी का दाम करोड़।

चाहे राजतंत्र हो, या लोकतंत्र हो,
दिख जाता है  इन सब का कूड़ा राजनीति-तंत्र

बड़े-बड़े नेताओं की लगती है इसमें बोली,
देखो कैसे जनता से खेलते है ये आंख मिचोली।

राजनीति में देखो इनकी लीला, 
सियासत की कौम सड़ा रही कबीला।

यहां योग्य भी अयोग्य बन जाता और,
कमजोरी में यहां गंधा बाप कहलाता।

लोकतंत्र का पत्थर काट रहा है हीरा, 
नेता-अभिनेता सब चाट रहे है खीरा।

खेल-खिलाड़ियों में अब हो रहे है पंगे,
बाँलीबुड-राजनीति  में सब हो गये है नंगे।।



                                             दीपक कोहली
 


एक रचना

                                      

                                         एक रचना

                                        

                                        एक रचना सोचता हूं मैं अक्सर,
                                        मगर रच न सका आज तक...।
                                        संमदर से भी ज्यादा गहरा है ,वो
                                          पर्वतों से भी ज्यादा ऊंचा.....।।

                                                                                            




  हर वो लम्हा मैं रचना चाहता हूं,                                                                                            जो ईश्वर-खुदा  नहीं रच पाया ।                                                                                    आकाश से ज्यादा चौड़ा व  पाताल                                                                                          से ज्यादा गहरा,मैं रचना चाहता हूं।।


                                                                            हर वो चीज मेैं रचना चाहता हूं,
                                                                            जो इस पृथ्वी लोक में बसा हो।
                                                                            चाहे यहां के मानव जाति हो, या
                                                                           यहां के ऊचे पहाड़ और गगन हो।।


हर उस भूमि को मैं रचना चाहता हूं. जो
मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारा में लिप्त हो।
चाहे कैलाश-महादेव हो या ख्वाजा अली
-अमृतसर गुरुद्वारा क्यों ना हो।।

                                                                      एक रचना सोचता हूं मैं अक्सर ,
                                                                      मगर रच न सका आज तक..।।

                                                                                                                          दीपक कोहली

05 August 2016

* बूढ़े मां- बाप का सहारा कौन....?

                     * बूढ़े मां- बाप का सहारा कौन....?



"ढलते सूरज की तरह है, पर उनके बिना घर अधूरा है"
मानो या ना मानो फिर भी अपनों का हाल जानते है।।

बूढ़े मां-बापें का सहारा कौन...? जी हां आज दुनिया जितनी आधुनिक और आगे बढ़ रही है उतने ही बूढे़ मां-बाप अपनों से दूर होते जा रहे है। आज का युग जितना ही अधिक विकसित हो रहा है उतने की हमारे मां-बाप अकेले होते जा रहे है। मेरा कहने का अर्थ ये है कि आज हमारे पूर्वज (दादा-दादी) अकेलापन सह रहे है। क्योंकि कुछ पूर्वजों (लोगों) का कोई सहारा नहीं है और कुछों का सहारा होने के बावजूद  भी वे अकेले रह रहे है। जिसका एक कारण हम ये मान सकते है कि समय आधुनिक होना। आज हमारे देश में कई बुर्जुगों की हालत काफी परे है। इसी को देखते हुए सरकार ने  देश में जगह-जगह वृद्ध-अाश्रम खाले है। जिस में बुर्जुग और बेसहारा लोग रह है। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती सवाल तो ये है कि हम उनके साथ ऐसा व्यवहार क्यो करते है.? जिससे उन्हें अकेलापन महसूस होता है। हमें सोचना ही होगा कि जिन मां-बापो ने हमारे लिए दर्र-दर्र की ठोकरें खाई और हम अपने पैरों पर खड़े होने का मौका दिया। जिसके चलते हम अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सके और आज हम अपने पैरों पर खड़े हुए। वहीं हमें अपनी अाने वाली पीढ़ी को भी बताना होगा कि हमारे पूर्वज कौन थे और कौन हैं। जिससे हमारे नई पीढ़ी परिचित हो सके।  जहां शहरों कुछ नई पीढ़ी के बच्चों को आज भी पता नहीं होता कि उनके दादा-दादी कौन है और कहां रहते है। क्योंकि इन बच्चों को उनके मां-बाप बाताते ही नहीं है कि उनके दादा-ृदादी और गांव भी है।  जिस देश में श्रवण कुमार जैसे सेवी पुत्र पैदा  हुए हो और आज उस देश में बूढ़े माता-पिताओं की ऐसी हालत देख बढ़ा ही दुख होता है। वहीं एक समय था जब भारत में बुर्जुगों का सम्मान हुआ करता था लेकिन आज देश  अपना यह  संस्कृति भूल रहा है। हमें इस बारे में सोचना होगा कि देश कि संस्कृति खतरे में हैं और पश्चिमी संस्कृति ्पना रही है। मुझे दुख इस बात का नहीं है कि हमारा  देश तरक्की कर रहा है, मुझे तो दुख इस बात का है कि भारत जैसे सभ्यता संस्कृति वाले देश में बूढ़े मां-बापों (बुर्जुग) के साथ ऐसा हो रहा है। क्या यह भारत जैसे देश को शोभा देता है, अगर देता है तो इसे  मातृभूमि नहीं कहना चाहिए क्योंकि जहां चंद रुपयों के लिए और बीबी बच्चों के लिए बुर्जुग माता-पिताओं का अपमान किया जाता है। जिससे उन मां-बापों के हौसलें और उम्मीदें खत्म हो जाती है और वे अंधकार से अपना जीवन त्याग देते है।


                                                                                       दीपक कोहली