साहित्य चक्र

09 July 2026

मैं सोचती हूँ





कभी-कभी मैं सोचती हूँ...
क्या सचमुच मेरी ज़िंदगी में भी कोई ऐसा सवेरा आएगा,
जहाँ दर्द दरवाज़ा खटखटाए बिना लौट जाएगा,
और आँखें बिना किसी वजह के मुस्कुरा सकेंगी?

हर रात मैं अपने टूटे हुए हिस्सों को समेटकर सोती हूँ,
और हर सुबह फिर एक नई लड़ाई के लिए खड़ी हो जाती हूँ।

लोग कहते हैं, वक्त सब ठीक कर देता है...
मगर शायद उन्होंने उन लोगों का दर्द नहीं देखा,
जो बरसों तक उम्मीद और निराशा के बीच झूलते रहते हैं।

मेरे हिस्से की ज़िंदगी ने मुझे फूल कम,
काँटे ज़्यादा दिए हैं। मैंने अपनों को बदलते देखा है,
रिश्तों को बिखरते देखा है,
सपनों को आँखों के सामने दम तोड़ते देखा है।

और फिर भी... हर बार जब मैं पूरी तरह टूटने लगती हूँ,
मेरे भीतर कहीं एक छोटी-सी उम्मीद धीमे से कहती है-
"अभी नहीं... अभी तुम्हें और चलना है।"

जीवन की परीक्षाएँ अजीब होती हैं, इनमें न कोई घंटी बजती है,
न कोई प्रश्नपत्र मिलता है, न कोई समय सीमा होती है।

यहाँ हर दिन एक नया सवाल है, हर साँस एक संघर्ष,
और हर धड़कन हिम्मत का एक नया प्रमाण।

कई बार मैं मुस्कुराती हूँ,
लेकिन मेरी मुस्कान के पीछे दर्द का एक समंदर छिपा होता है।
कई बार मैं खामोश रहती हूँ,
क्योंकि शब्द भी मेरे घावों का बोझ नहीं उठा पाते।

कुछ लोग पूछते हैं- "तुम इतनी चुप क्यों हो?"
काश वे जान पाते, कि कुछ दर्द ऐसे होते हैं जो रोने से नहीं,
जीने से महसूस होते हैं।

मैं थकी हूँ... बहुत थकी हूँ... मगर रुकी नहीं हूँ।

क्योंकि मुझे पता है, मेरे संघर्षों की कहानी अभी अधूरी है।
और शायद एक दिन, जब यह लंबी अँधेरी सुरंग खत्म होगी,
तब मेरी आँखों से निकला हर आँसू मेरी जीत की गवाही देगा।

उस दिन मैं वक्त से सिर्फ इतना कहूँगी-
"देख, तूने मुझे तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी,
मगर मैं फिर भी बच गई...
क्योंकि मेरे भीतर उम्मीद अभी ज़िंदा थी।"


- आरती कुमारी (झाँसी)


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