अपने-अपने कामों सब व्यस्त
किसके पास वक्त है साकी ?
मकड़जाल में ऐसे फंसे
नज़र रखना नहीं है बाकी,
पहले चाय पर घंटों बातें
अब मैसेज का ज़बाब नहीं है साकी,
दिल के रिश्ते रूक से गये हैं सब,
बस लाईक-कमेन्ट की जंग है बाकी,
फ़िर भी कोई पूछ ले-"कैसे हो" ?
तो लगता है दुनियां बची है अभी,
एक फ़ोन, एक मुलाकात से
मकड़जाल के तार कट जाते हैं सभी,
अँधेरे के बाद ही रोशनी
आखिरी उम्मीद बची है अभी बाकी,
दिल का चिराग़ जलाकर
चलना भी एक इबादत है साकी।
- बाबू राम धीमान
*****
मातृभूमि
मातृभूमि में होता मार्मिक शक्ति
कई जाती धर्मों की अपार भक्ति
भिन्नत्व में एकत्व का महान शक्ति
सब केलिए आवश्यक देश भक्ति।
मातृभूमि से मिला है पदार्थ
बहू मूल्य संपदा है यदार्थ
इसको बचाना है निस्वार्थ
हम को मिला है परमार्थ।
मातृभूमि पर होता मंदिर
प्रभू केलिए जाता अंदर
लोक पूजा करता प्यार
इसे मिला भक्ति अपार।
नदियां बहती निरंतर निर्मल
पेड़ पौधों देता है परिमल
प्रकृति शोभा बढ़ता बेमिसाल
स्वच्छ पर्यावरण बदलता सरल।
मातृभूमि हमारेलिए कर्मभूमि
मातृभूमि हमारेलिए शक्तिभूमि
मातृभूमि हमारेलिए स्वर्ग भूमि
मातृभूमि हमारेलिए पुण्यभूमि
इसे मातृभूमि का सम्मान करना।
- श्रीनिवास एन
आंध्रप्रदेश
*****
बरगी डैम को समर्पित
जंग लड़ रही हूँ, हारी तो तेरे साथ
जीती तो भी तेरे साथ
कोशिश सर से पाँव तक करूँगी
अपनी हर साँस तुझमें भरूँगी
जरूरत पड़ी तो खुद डूब जाऊँगी
पर तुझे अकेले नहीं छोड़ पाऊँगी
लड़ूँगी किस्मत से, भगवान से
जब तक हूँ तेरे साथ हूँ
लड़ूँगी इस तूफान से
नहीं हूँ तो मुझे माफ करना
एक माँ हार जायेगी,
फिर भगवान से...
- नंदिनी
*****
अब शौक़ क्या बाकी, क़लम-ए-बे-असर लिखने का,
खून ए जिगर से जो लिखा मैंने,उसने पढ़ा ही नहीं।
किताब-ए-इश्क़ में शामिल था मेरा ज़िक्र भी शायद,
उसे इतनी फ़ुर्सत ही कहां सफ़ा वो पलटा ही नहीं।
सीने में दबी ख़ामोशियाँ वो भी शोर से कम न थीं,
उसने कभी ग़ौर से उन लफ़्ज़ों को सुना ही नहीं।
बिख़र कर रह गए हम आईना-ए-दिल की तरह ऐसे,
कोशिश तो की, मगर टूटा जो दिल वो जुड़ा ही नहीं।
हजूम-ए-शहर में गुमनाम हम ऐसे हुए ,'मुश्ताक़'
न हुई ढूँढने की कोशिश और मैं मिला भी नहीं।
- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह
*****
उर्दू दोहे
इतना ग़ुरुर मत करो, कौन यहाॅं है साथ,
सब मरने के बाद में, छूकर धोते हाथ।
जीवन तो इक वहम है, कर्मों का है खेल,
सच तो है बस मौत ये, दुनिया है इक जेल।
कर्म सही तो सब सही, पटरी पर है रेल,
बुरा भला कोई नहीं, क़ुदरत का सब खेल।
वैद्य डॉक्टर को यहाॅं, सब कहते भगवान,
कुछ सौदागर लाश के, बेच रहे ईमान।
हिम्मत सब में है नहीं, सच कहने की बात,
सच को सच कहता वही, जो सच पर दिन रात।
आज यहाॅं तो कल वहाॅं, जग में फिरे फ़क़ीर,
अच्छे दिन के आस में, नैनन बरसे नीर।
सच से फ़ुर्सत है नहीं, कैसे बोले झूठ,
उसकी दुकान झूठ की, धन्था है मत रूठ।
भाग गया सलवार में, डर की ऐसी पीर,
सबको योग सीखा रहा, कहता खुद को वीर।
फ़रियादी अब कर रहे, क़ातिल से फ़रियाद,
बुज़दिल इतना मत बनो, सब कुछ हो बर्बाद।
राजा अच्छा है वही, कर जो करे मुआफ़,
भेद-भाव भी मत करे, सही करे इंसाफ़।
सजा ज़िना-बिल-जब्र की, फाॅंसी मिले कठोर,
मौत डरे जब मौत से, देख मौत का शोर।
- निज़ाम फतेहपुरी
*****
उम्र-सीमा
सबकी अपनी-अपनी सीमाएँ हैं,
पर, कवि की कल्पना की कोई सीमा नहीं है।
नौकरी में भी उम्र-सीमा है,
प्रतियोगिता कविता लिखने में भी उम्र-सीमा है,
लेकिन, लाचार , बेबस, बेसहारा
बेरोज़गार व्यक्ति की कोई उम्र-सीमा नहीं है।
- चेतना सिंह 'चितेरी'
*****
ऐ गुजरा जमाना तेरा शुकराना
तुझे मैंने जिया, तेरा शुकराना
तूने मुझे सीखों का समंदर दिया
मैं अदना सा मानुष,
तेरे एहसानों को कैसे चुकाऊं ?
बस लफ्जों से बार-बार, हर बार
तेरा शुकराना करूं...
- दीपक कोहली
तुझे मैंने जिया, तेरा शुकराना
तूने मुझे सीखों का समंदर दिया
मैं अदना सा मानुष,
तेरे एहसानों को कैसे चुकाऊं ?
बस लफ्जों से बार-बार, हर बार
तेरा शुकराना करूं...
- दीपक कोहली
*****
काश! मैं भी
एक पुरुष होती।
हर वो काम करती,
जो मेरा मन करता।
जहां दिल करता,
वहां घूमने जाती।
कभी अकेली तो
कभी दोस्तों के साथ
मौज करती... काश!
मैं एक पुरुष होती।
एक पुरुष होती।
हर वो काम करती,
जो मेरा मन करता।
जहां दिल करता,
वहां घूमने जाती।
कभी अकेली तो
कभी दोस्तों के साथ
मौज करती... काश!
मैं एक पुरुष होती।
- रेखा चंदेल
*****
कभी जब किसी से न हारी मुहब्बत।
मज़े में रही ये हमारी मुहब्बत।
कभी मिल गए हमसफ़र रास्ते में,
कभी बस अकेले गुज़ारी मुहब्बत।
निगाहें छुपाकर, निगाहें लगाकर,
यूंँही बच-बचा कर निहारी मुहब्बत।
जहाँ पास देखा इक मौका सुनहरा,
वहाँ ठीक हमने उतारी मुहब्बत।
बुलाकर,बताकर ,मनाकर,हँसाकर,
हमेशा यूँ हमने सँवारी मुहब्बत।
जहाँ भी मिले जान पहचान वाले,
वहाँ हमने अपनी बघारी मुहब्बत।
मज़े में रही ये हमारी मुहब्बत।
कभी मिल गए हमसफ़र रास्ते में,
कभी बस अकेले गुज़ारी मुहब्बत।
निगाहें छुपाकर, निगाहें लगाकर,
यूंँही बच-बचा कर निहारी मुहब्बत।
जहाँ पास देखा इक मौका सुनहरा,
वहाँ ठीक हमने उतारी मुहब्बत।
बुलाकर,बताकर ,मनाकर,हँसाकर,
हमेशा यूँ हमने सँवारी मुहब्बत।
जहाँ भी मिले जान पहचान वाले,
वहाँ हमने अपनी बघारी मुहब्बत।
- नवीन माथुर पंचोली
*****
नज़रिया
कोई सम्भलकर चला,
कोई गिरकर सम्भला है।
किसी को मालूम ही नहीं,
ये चलना क्या बला है।
क्या अच्छा, क्या बुरा—
सबका अपना पैमाना है।
जिस पर बीतती है,
उसी ने दर्द को जाना है।
कोई चाँद भी छू आया,
फिर भी ख़ुद को तन्हा पाया है।
कोई उलझनों में उलझकर भी,
हर रिश्ता दिल से निभाया है।
रूप अनेक हैं जग में,
हर चेहरे का अपना रंग है।
कोई बुरा होकर भी
किसी की दुआओँ के संग है।
सबकी नज़र अलग है,
सबका नज़रिया जुदा है।
किसी के लिए पत्थर में ख़ुदा,
तो कहीं ख़ुद ही पत्थर बना है।
इसलिए छोड़ो दुनिया की
अच्छी-बुरी सौ बातें।
बस ऐसा जीवन जी जाओ,
जो बन जाए सबकी सौग़ातें।
जब नाम तुम्हारा आए,
याद आएँ तुम्हारे कर्म।
यही रहे असली दौलत,
यही रहे जीवन का मर्म।
कोई सम्भलकर चला,
कोई गिरकर सम्भला है।
किसी को मालूम ही नहीं,
ये चलना क्या बला है।
क्या अच्छा, क्या बुरा—
सबका अपना पैमाना है।
जिस पर बीतती है,
उसी ने दर्द को जाना है।
कोई चाँद भी छू आया,
फिर भी ख़ुद को तन्हा पाया है।
कोई उलझनों में उलझकर भी,
हर रिश्ता दिल से निभाया है।
रूप अनेक हैं जग में,
हर चेहरे का अपना रंग है।
कोई बुरा होकर भी
किसी की दुआओँ के संग है।
सबकी नज़र अलग है,
सबका नज़रिया जुदा है।
किसी के लिए पत्थर में ख़ुदा,
तो कहीं ख़ुद ही पत्थर बना है।
इसलिए छोड़ो दुनिया की
अच्छी-बुरी सौ बातें।
बस ऐसा जीवन जी जाओ,
जो बन जाए सबकी सौग़ातें।
जब नाम तुम्हारा आए,
याद आएँ तुम्हारे कर्म।
यही रहे असली दौलत,
यही रहे जीवन का मर्म।
- रोशन कुमार झा
*****
बैल हूँ मैं कभी मेरा भी था ज़माना
जब निकला खाने की तलाश में इधर उधर
तो मैं आवारा हो गया
लोगों को अब मैं अच्छा नहीं लगता
मेरी शक्ल देखना भी ना गवारा हो गया
जब तक ताकत थी मुझमें
मैंने पूरा जोर लगाया
खेतों में फसलें लहलहाई
उम्मीद से ज़्यादा अन्न उगाया
कंधे मेरे दुख गए हल खींचते
फिर भी मैंने जोर लगाया
सुहागे पर बजन भी रखा खूब दबाया फिर भी
चुपचाप चलता रहा न चीखा न चिल्लाया
कभी खूब खिलाते थे मुझे
रखते थे मेरा भरपूर ख्याल
छोड़ दिया घर से अब हो गया आवारा
देखते ही दौड़ते हैं मारने ऐसा हो गया अब हाल
समय का खेल है बदल गया ज़माना
कभी सेवा की थी अब मुझ पर है सबका निशाना
ऐसा लगता है जैसे जीवन नरक बन गया
वह भी दिन थे जब मुझको मिलता था सबसे पहले खाना
जब निकला खाने की तलाश में इधर उधर
तो मैं आवारा हो गया
लोगों को अब मैं अच्छा नहीं लगता
मेरी शक्ल देखना भी ना गवारा हो गया
जब तक ताकत थी मुझमें
मैंने पूरा जोर लगाया
खेतों में फसलें लहलहाई
उम्मीद से ज़्यादा अन्न उगाया
कंधे मेरे दुख गए हल खींचते
फिर भी मैंने जोर लगाया
सुहागे पर बजन भी रखा खूब दबाया फिर भी
चुपचाप चलता रहा न चीखा न चिल्लाया
कभी खूब खिलाते थे मुझे
रखते थे मेरा भरपूर ख्याल
छोड़ दिया घर से अब हो गया आवारा
देखते ही दौड़ते हैं मारने ऐसा हो गया अब हाल
समय का खेल है बदल गया ज़माना
कभी सेवा की थी अब मुझ पर है सबका निशाना
ऐसा लगता है जैसे जीवन नरक बन गया
वह भी दिन थे जब मुझको मिलता था सबसे पहले खाना
- रवींद्र कुमार शर्मा
*****
हवा तुम कितनी कोमल हो कि तुम
लिपटी हो मेरे आसपास
चिपकी हो मेरे सीने से
बैठी हो मेरे काँधे पर
नन्ही बिटिया की तरह
पर तुम्हारे वज़न का अहसास ही नहीं होता
हवा तुम कितनी भारी हो
कि तुम्हारे वज़न से दबकर
बड़े बड़े पेड़ उखड़ जाते हैं
छोड़ देते हैं ज़मीन
हवा तुम बहुत प्यारी हो
तुम मेरे जीवन में समाई हो
तुम रूठीं तो यह जीवन रूठा
साँसों का काफ़िला यहीं छूटा
लिपटी हो मेरे आसपास
चिपकी हो मेरे सीने से
बैठी हो मेरे काँधे पर
नन्ही बिटिया की तरह
पर तुम्हारे वज़न का अहसास ही नहीं होता
हवा तुम कितनी भारी हो
कि तुम्हारे वज़न से दबकर
बड़े बड़े पेड़ उखड़ जाते हैं
छोड़ देते हैं ज़मीन
हवा तुम बहुत प्यारी हो
तुम मेरे जीवन में समाई हो
तुम रूठीं तो यह जीवन रूठा
साँसों का काफ़िला यहीं छूटा
- अजय नेमा
*****
मैं कौन हूँ
मैं संजीदगी से
मुस्कान भरे
कुछ गीत
सुनाया करता हूँ
जो आँसू मुझको
देते हैं
मैं उनको भी
हंँसाया करता हूँ
मैं जनता का ही
सेवक हूँ
राष्ट्र निर्माण का मैं
अधिनायक हूँ
मैं सेवा में ही
निरत रहूँ
मैं सीधा सादा
अध्यापक हूँ
अभिभावक भी
कहते हैं
मैं विद्या को
महकाता हूँ और
बच्चों को
चहकाता हूँ।
मैं संजीदगी से
मुस्कान भरे
कुछ गीत
सुनाया करता हूँ
जो आँसू मुझको
देते हैं
मैं उनको भी
हंँसाया करता हूँ
मैं जनता का ही
सेवक हूँ
राष्ट्र निर्माण का मैं
अधिनायक हूँ
मैं सेवा में ही
निरत रहूँ
मैं सीधा सादा
अध्यापक हूँ
अभिभावक भी
कहते हैं
मैं विद्या को
महकाता हूँ और
बच्चों को
चहकाता हूँ।
- भुवनेश मालव
*****


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