"मम्मी, अभी नहीं... शाम को ले आएँगे।"
मेरे इतना कहते ही माँ की आँखें कहीं दूर टिक गईं। धीमे स्वर में बोलीं, "तुम्हारे पापा होते, तो मेरी बात टालते नहीं। धनिया पत्ता भी कहना पड़ता, तो उसी वक्त ले आते।"
घर में एक पल को सन्नाटा छा गया। हम भाई-बहन एक-दूसरे का चेहरा देखते रह गए। शब्द किसी के पास नहीं थे, केवल एक अनकहा अपराधबोध था।
तभी मन ने समझाया- माँ को शिकायत धनिया पत्ते की नहीं थी; वह तो बस यादों का एक बहाना था। दरअसल, उन्हें आज भी उस व्यक्ति की कमी खलती है, जिसने जीवन भर उनकी हर छोटी-बड़ी इच्छा को अपने प्रेम का सम्मान समझा।
सविता सिंह मीरा
जमशेदपुर

No comments:
Post a Comment