साहित्य चक्र

09 July 2026

डॉ. शैलेश शुक्ला की तीन गज़लें पढ़िए





गज़लें


उन्हें भुलाने की कोशिश में उन्हीं की याद आयी
हर बात से निकलकर बस उन्हीं की बात आयी।

सोने की कोशिश की, मगर हम न सो पाए रात भर
इन कोशिशों में हर दफ़ा इक और नई रात आयी।

मुस्कुराने की कोशिश की, हमने मगर हर बार
पर आँखों में फिर आँसुओं की ही सौगात आयी।

भरोसा उन पर खुद से ज़्यादा है हमें, मगर
मौसम बदलने की खबर हवा अपने साथ लायी।

वो कहते हैं कि बेवफ़ाई वफ़ा से जीत जाती है
भला कोई क्या जाने कि किसने किससे है मात खायी।

सोचा था ‘शैलेश’ उन्हें हम भुला देंगे आसानी से
मगर अब जा के याद हमें अपनी ही औक़ात आयी।


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वो तो हमें खुद से जुदा बताए बैठे हैं
हम उन्हें दिल का खुदा बनाए बैठे हैं।

वो मिलें या न मिलें, है उनकी अपनी मर्ज़ी
हम तो खुद को ही उन्हीं में समाए बैठे हैं।

वो कहते हैं कि हमसे नहीं कोई नाता
फिर भी मेरी राहों में नज़रें बिछाए बैठे हैं।

वो हमें दूर से हर रोज़ निहारा करते हैं
हम जो देखें उन्हें, तो नज़रें चुराए बैठे हैं।

अपनी चाहत से चाहे वो जिसे भी चाहें
हम तो दिल में उन्हें अपना बनाए बैठे हैं।

दूर जाएँ वो अगर हमसे, तो कोई फ़र्क नहीं
हम तो हर ज़र्रे में उनको ही बसाए बैठे हैं।

‘शैलेश’ को वो मिलें, न मिलें—पता नहीं
पर दिल से तो उन्हें हम अपनाए बैठे हैं।

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चले आते हैं इन गलियों में अक्सर दीवानों की तरह,
इस मिट्टी में अपना घर होने का एहसास होता है।

बरसों शहर में रहकर भी हम शहर के हो न सके,
गाँव और कस्बे में बिताया हर लम्हा ख़ास होता है।

तमाम साज़ो-सामान जोड़े हमने, खुश रहने की ख़ातिर,
एसी की हवा में भी बेनवा की याद से मन उदास होता है।

रिश्ते तो बहुत बने शहर में, पर स्वार्थ की दूरियाँ रहीं,
अपनों से अपनेपन का रिश्ता ही दिल के पास होता है।

भीड़ में रहकर भी अक्सर हम तन्हा ही रह जाते हैं,
हर शख़्स के चेहरे पर मुखौटों का आभास होता है।

जब लौटते हैं यादों में अपने गाँव की पगडंडियों पर,
हर कोना, हर आँगन जीता-जागता इतिहास होता है।


- डॉ. शैलेश शुक्ला


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