साहित्य चक्र

12 April 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 12 अप्रैल 2026




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मलौण किला

ऊँचे पहाड़ पर दुर्ग मलौण, गौरव गाथा गा रहा
वीर गोरखाओं ने बसाया, गुणगान उनका गा रहा
रणनीति से दुर्ग बना, अठारह सौ चार से चौदह काल
बेकार यहाँ से करते रहे वो, दुश्मन की हर ओच्छी चाल

हुआ अंग्रेजों से युद्ध भयंकर, अठारह सौ पंद्रह था बर्ष
तोपों की गड़गड़ाहट से, जग में फैला गोरखा उत्कर्ष
भक्ति थापा वीरता के पर्याय, अंततः रण में हुए बलिदान
देश-धर्म और कौम रक्षा में, कुर्बान कर दिए अपने प्राण

अमर सिंह थापा के नेतृत्व में, गोरखाओं ने तन-मन लगाया
संसाधनों की कमी ने लेकिन, मजबूर उन्हें था बनाया
माता काली मंदिर इसमें, कहानी आज भी है बता रहा
गोरखा संघर्ष और अंग्रेजी चाल के, किस्से बहुत सुना रहा

अब भी खंडहर बना खड़ा है, सहता हुआ समय की मार
टूटी दीवारें बता रही हैं , था वैभव इसका कितना अपार
पर्यटक आज भी देखते हैं, रह-रह इसकी पुरानी शान
अपने कैमरों में संजो लेते हैं, इस धरोहर की पहचान

संरक्षण की राह संजोता किला, कर रहा है अब यही पुकार
इससे पहले की कण- कण हो जाऊं, कर दो मेरा जीर्णोद्वार
अमर रहे मलौण किला, दुनिया में गूंजता रहे इसका नाम
शत-शत नमन जिन्होंने बनाया, दिल से दें उनको सम्मान


- धरम चंद धीमान


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स्पंदन

प्रेम में दिल की स्पन्दन से, बैचेन हुए मन
मिलने को आतुर हुए तो, बढ़ी दिल की धड़कन

खतरे में था मिलना उससे, हाथ पांव में बढ़ी कंपन
हौसला न गिरने दिया, पहुंचा उसकी भवन

पहरे लगे थे खूब उनके, प्रेम में थे हम मतवाले
रूके न हमारे कदम, जुगाड़ में दिल मचले

नयनों ही नयनों से हुई कुछ इशारे, उसे भी बढ़ी स्पन्दन
चोर निगाहें से बचती हुई, वो छोड़ आयी निज भवन

सबके निगाहें से बचते-छिपते, चले गये बहुत दूर
जहाँ जाकर हमने एक नयी दुनिया बसाई, हुए मगरूर


- चुन्नू साहा


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जय होती है मानुस की
जब लड़ता है दुश्वारी से।
होती है पराजय मानुस की
जब लड़ता न दुश्वारी से।

रुकता न जो तूफानों में,
वह साहस की पहचान बना।
कांटों भरे हर पथ पर चलकर,
वह खुद अपनी मिसाल बना
सींचा है जिसने जीवन वट को,
मेहनत की श्रमवारि से
जय होती है मानुस की,
जब लड़ता है दुश्वारी से।।

जलती है हृदय में जिसके,
पावन ज्योति,कठिन परिश्रम की।
जीवन पथ में,चलता है वही,
काँटों की पथवारी पर।
सुंदर सुमन तोड़ता है वही,
जीवन की फुलवारी से।
जय होती है मानुस की
जब लड़ता है दुश्वारी से


- मनोज कुमार भूपेश


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भविष्य से खिलवाड़

मोबाइल में व्यस्त
युवा पीढ़ियां
कर रहे भविष्य से खिलवाड़
लगातार जूझ रहे
फ्री फायर पब जी जैसे खेलों में
वे बेफिक्र हैं
अपनी ही धुन में
कर रहे मौज
मां बाप के बनाएं
धन दौलत परिश्रम
के बदौलत
हर फिक्र को फोन में
उड़ा रहे
उन्हें पता है
ये मौज ये मस्ती
नहीं काम आयेगी
एक दिन नाकाम होना है
छोड़ो फ्री फायर पब जी खेल
उठाओ कलम और किताब
बदल डालो इतिहास
अरे उठो धरातल
के अमर सपूतों
पुनः नवल निर्माण करो
करो मां बाप गुरुओं
का सम्मान
धरती मां को प्रणाम करो।


- मनोज कौशल


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एक टीचर की डायरी

डायरी के पीले पन्नों पर
चॉक-धूल की हल्की रेखाएँ हैं,
कुछ अधूरी जाँची कॉपियाँ,
कुछ बच्चों की मुस्कानें हैं।

हर पन्ना कहता है मुझसे
“तुम केवल पाठ नहीं पढ़ाती हो,”
तुम तो सपनों को आकार देती,
जीवन की राह दिखाती हो।

कक्षा में जब शोर मचता है,
मन में फिर भी स्नेह उमड़ता है,
हर नन्ही शंका के पीछे
एक विश्वास खड़ा दिखता है।

कोई कहता, “मैम, यह समझाइए,”
कोई चुपचाप नज़रें झुकाता,
मैं अक्षर-अक्षर में ढूँढ़ती,
उसका मौन भी कुछ कह जाता।

जब थककर कोई बैठ जाता,
मैं हौसलों की बात लिखूँ,
“तुममें उजियारा बहुत है,”
ऐसी हर सौगात लिखूँ।

परीक्षा के अंकों से बढ़कर
उनकी कोशिश प्यारी लगती,
हार में भी जो सीख मिले,
वही विजय हमारी लगती।

डायरी में दर्ज हैं आँसू भी,
कभी विदा की नमी के साथ,
पर गर्व भरे वे क्षण भी हैं
जब वे बढ़ते अपनी राह।

मैं एक शिक्षिका हूँ,
पर उनसे रोज़ सीखती हूँ,
उनके विश्वास की छाया में
खुद को फिर से सींचती हूँ।

मेरी डायरी गवाह है इस बात की ...
यह रिश्ता केवल पाठशाला का नहीं,
यह मन से मन की वह डोरी है
जो जीवन भर टूटती नहीं।


- डॉ. सारिका ठाकुर ‘जागृति’


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हम मुसाफ़िर

ख़्वाब पलकों पे सजाएँ तो सँवर जाते हैं
हम तो ख़ुशबू की तरह हद से गुज़र जाते हैं।

यह जो मुँठी में लिये बैठे हैं यादों के दीए
रोशनी बन के अंधेरों में बिख़र जाते हैं।

ढूँढ़ने निकले जो तुझको तो यह "जानां",
पाँव थकते हैं मगर हौसलों से भर जाते हैं।

मंज़िलें उन को ही आग़ोश में लेती हैं नादां,
जो कड़ी धूप में हँस कर ही यहाँ जाते हैं।

सिर्फ़ दीवार व दर व बाम ही घर तो नहीं,
दिल सलामत हो तो वीराने भी घर जाते हैं।

वक़्त बाँटेगा भला कैसे हमें ऐ मुश्ताक़,
हम मुसाफ़िर हैं जहाँ चाहें ठहर जाते हैं।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़


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कुर्सीनामा

कुर्सीनामा किस-किस का ढूंढोगे ?
जिन्दगी की वसीहत किसी के नाम तो नहीं,
बहियों को खोलता हूँ, पन्नों को पलटता हूँ,
देखता हूँ बारम्बार,
चेहरे के धुंधले अक्स
फ़िर भी खाली दिखते हैं

न दिखती बड़ी-बड़ी कोठियां कहीं
न दिखती हवेलियां,
न दिखते आलिशान बंगलें कहीं,
खंडहरों में बदल गई मीनारें
बजती थीं जहां कभी मेंगल
आज कबूतरों का डेरा वहां,
देखता हूँ रोजनामचे की रपट
जब खंगालता हूँ इतिहास,
चेहरे के धुंधले अक्स
फिर भी खाली दिखते हैं,
न कोई पद मिला, न कोई प्रतिष्ठा मिली
न कोई धन मिला, ना कोई तमगा मिला,
बही खोली तो, कर्मों की लम्बी फेहरिस्त मिली
पढ़ा जब फेहरिस्त को,तो हाथ लगी मेरे उदासी,
आंसुओं की बूंदों की झड़ी
गालों से टपकने लगी,
चेहरे के धुंधले से अक्स
फिर भी खाली दिखाई देने लगे,
खोखला सा वही प्रश्न,मुझसे पूछने लगा-
कुर्सीनामा किस-किस का ढूंढोगे
और करोगे क्या उसका ?

- बाबू राम धीमान


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टैंक पर लोकतंत्र

टैंक जब रौंद रहे हों हर-कहीं
बच्चों,बूढ़ों,स्त्रियों और अस्पतालों को
बम जब बरसाये जा रहे हों दुनियाभर में
खेतों,कारख़ानों में, हल चलाते, कल चलाते
किसानों,मज़दूरों,कामगारों की रीढ़ पर
जब संधि-समझौतों से छुपाकर लगातार
लिखी जा रही हों नृशंसताएं, बर्बरताएं
फूलों की जगह बिछाई जा रही हों लाशें
जहाँ-जहाँ दिखाई देती थीं पाठशालाएं
अगर वहाँ-वहाँ उड़ाई जा रही हो बारूद
तो मैं कैसे लिख सकता हूँ कविता
तो मैं कैसे लिख सकता हूँ है ईश्वर कहीं
तो मैं कैसे लिख सकता हूँ पानी का संगीत
तो मैं कैसे लिख सकता हूँ युद्ध विरूद्ध बुद्ध
और मैं कैसे लिख सकता हूँ अनुनय-विनय
सचमुच मैं लिख ही कैसे सकता हूँ प्रार्थनाएं
कैसे लिख सकता हूँ टैंक पर लोकतंत्र ?


- राजकुमार कुम्भज


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व्यर्थ की चिंता छोड़िए न करें
कोई अफसोस,
कल की चिंता चिता समान
खो देती है होश,
जो होना होकर रहेगा नियति
है प्रभु की देन,
अच्छी सोच और समझ ही
देती ऊर्जा और जोश।


- कांता शर्मा


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क्या सच में बंजारा बनना है?

मन फिर आज बंजारा बनने को चला
सबसे दूर भागने की
आदत को छोड़ न सका...

मन फिर आज बंजारा बनने को चला
ठहरने का इसे आज कोई
वक्त ही नहीं रहा...

मन आज फिर बंजारा बनने को चला
एक कहानी, दो कहानी
हजारों कहानियों में बहाना ढूंढ रहा...

मन आज फिर बंजारा बनने को चला
ढूंढना क्या है जो
बन कर मिला वो उसका न हो सका...

मन आज फिर बंजारा बनने को चला
खुद को इससे से पृथक कर
अपने को ही न समझ सका...

मन अब कब तक बनवासी बन
यूँ अपने को ठुकराता रहेगा
एक ठहराव पर रुक और सोच
क्या सच में बंजारा बनना था
अगर हाँ, तो बन के भी क्या फायदा
जब सुकून और शांति
ही नहीं रहा...


- आध्या गुप्ता


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व्यतीत जीवन की तन्हाई में,
यह साथ तो है चौथेपन की परछाई में।
तब तुम और हम स्वतन्त्र होंगे,
हर कार्य से रिहा होंगे।

तब बैठेंगे साथ हम कुछ पल,
इस वक़्त को दोहराएंगे।
सपनों में अपने बीते हर पल की,
छवि फिर बनाएंगे।

तब तुम मुझ से रूठ न जाना,
मेरा साथ तब भी निभाना।
हम- तुम मिलकर एक नई कश्ती फिर सजाएंगे,
एक-दूजे में खो जाएंगे।

कभी तुम मेरा सहारा बनना,
कभी हम तुम्हारे काम आएंगे।
बच्चो का क्या है,
वह तो अपने जीवन में आगे बढ़ जाएंगे,
तब साथ बस हमारा होगा,
जीवन का सहारा होगा।

तेरे चहरे की हंसी में,
हम अपने गम छूपाएंगे।
हम-तुम एक-दूजे में खो जाएंगे,
नई दुनियाँ फिर बनाएंगे।


- रितु जाजू


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हाइकू

1) नीला आकाश
सफेद बादल हैं
रूई पहाड़

2) अकेला पेड़
छाँव फल देता है
खेत के बीच

3) फूल वह है
जो खुशबू बाँटता
पतझर में

4) चल रहे हैं
मंज़िल ना निशाना
फिर भी राही

5) रात अशांत
चैन हुआ बेचैन
देख चाँदनी

6) चुप किताब
अक्षर बोल पड़े
मैं आवाज हूँ

7) काटों ऊपर
जो भी चल पड़ा है
वही राही है

8) गहरे पेड़
इनको आग लगी
दुख बढ़े हैं

9) हवा के रंग
बदलते मौसम
भरे उमंग

10) देख सूरज
मेरे पास आया है
किरणों राहीं


- कश्मीरी लाल चावला


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मैं सिमटती गई

कभी घूंघट,कभी बुर्के के पीछे
मैं छिपती गई,
तुमने जिस मर्यादा में रखा
उसमें मैं सिमटती गई।

अपने प्रेम और त्याग से
जिन्दगी की माला पिरोती गई,
तुमने जिस मर्यादा में रखा
उसमें मैं सिमटती गई।

मेरी जिन्दगी पर मुझे छोड़
सबकी हुकूमत चलती गई,
तुमने जिस मर्यादा में रखा,
उसमें मैं सिमटती गई।

समाज के बनाए नियम,
कायदों में मेरी जिन्दगी पिसती रही,
तुमने जिस मर्यादा में रखा
उसमें मैं सिमटती गई।

अपनी इस घुटन भरी जिन्दगी से
खुली हवा में जाने को
मैं तड़पती रही, तरसती रही।
तुमने जिस मर्यादा में रखा
उसमें मैं सिमटती गई।


- अंकिता जैन अवनी


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सूखती ममता

तुम मानो या ना मानो,
तुम्हारे लिए जहां हूं,
हां तुम्हारी ही मां हूं।

धरा पर आई स्वर्ग छोड़ कर,
तुम सब को नीर सा अमृत
पीला कर।

जीवन दिया है,खुद का अस्तित्व
मिटाकर,
सींचे खेत तुम्हारे,कमी नहीं की,
रखा कुछ भी नहीं पास बचाकर।

तुम कैसे भूल गए मुझे,
बांध दिए किनारों को,
मैला किए पवित्र मेरे
जलधाराओं को।

रेत निकले,महल बनाए।
अपनी सारी मैल मुझसे धुलवाए।

तुम स्वार्थी इतने कैसे हो गए,
खुद की प्यास बुझाते बुझाते
मुझको सूखे रेत में दफना गए।

तुमने मेरे बारे में न सोचा तो ना सही,
तेरे बच्चे रह ना जाए प्यासे कहीं।

मैं अब किस्सा बन जाऊंगी,
तुम्हारे अतीत का हिस्सा बन जाऊंगी।

मैं तुम्हारी मां हूं, जो चली गई
तो फिर नहीं आऊंगी,
मुझको बचा सको तो बचा लो,
नहीं तो अश्रु संग तुझे भी बहा
ले जाऊंगी।


- रोशन कुमार झा


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यादों का झरोखा

​उसे भूलना इतना आसान नहीं था,
मगर मैं गलतफहमी का शिकार हो गया।
मुझे लगा कि मैं भूल गया हूँ उसे,
पर गाहे-बगाहे दोस्तों ने चुटकी ले ली।

​नाम उसका मेरे नाम के साथ जोड़कर,
एक पल में दुनिया भर की खुशी दे दी।
मैं खोने लगा फिर से उसकी यादों में,
बीते वक्त का एहसास फिर जिंदा होने लगा।

​मैं खुद से, उससे भी ज्यादा प्यार करने लगा,
इस बात पर गौरवान्वित होते हुए-
कि उस खूबसूरत नाज़नीन का मैं दीवाना था,
और वह भी हद से ज्यादा मेरी दीवानी थी।

​बस एक-दूसरे से मिलकर,
हाल-चाल ही जानना होता था,
कभी उसकी झील सी आँखों में,
यूँ ही डूब जाना होता था।

​उसके कोमल हाथ, जो कभी-कभी
मेरे बालों को सहला जाते,
एक मीठी मुस्कान के साथ,
चेहरे का हर भाव बता जाते।

​"कोई इतना प्यार भरा ख्याल कैसे रख सकता है?"
मगर वह जताती नहीं थी कि-"मैं तुमसे प्यार करती हूँ",
मैंने भी कभी कहा नहीं कि-"मैं तुमसे प्रेम करता हूँ।"

​बीता हुआ समय वक्त के साथ बदलता गया,
मैं उस जूस वाली दुकान पर,
फिर से अकेला ही जाता रहा।
वक्त के साथ वह किसी और की हो गई,
और मैं गुमनामी में कुछ साल जीता रहा।

​मगर आज देखो ना, पुराने दोस्तों ने—
हँसी-हँसी में मेरे नाम के साथ उसका नाम जोड़ दिया,
हँसते हुए फिर वही पुरानी चुटकी ले ली।
मैं भी फिर कहीं यादों में खो गया।

​एक चुटकी सिंदूर ही तो बाकी था,
ताउम्र उसके हाथों से सर सहलाने के लिए;
हँसी-ठिठोली के साथ थोड़ा रूठना और मनाना,
मज़ा देता... इस "याद वाली सज़ा" की जगह।

​मगर वक्त और हालात ने सब कुछ बदल दिया,
फिर यादों का सहारा ही चेहरे की हँसी बन गया।
देखो ना! मज़ाक-मज़ाक में यादों से उसकी मुलाकात फिर हो गई।

कुछ यादें चाहकर भी भुलाई नहीं जातीं,
इंसान बस उन्हीं मीठी यादों को संजोए ज़िंदा रहता है,
एक-दूसरे के दिल के किसी कोने में।
और हाँ "उसे भूलना इतना आसान नहीं हैं।"

​तभी फिर किसी दोस्त ने टोका-
"चल, बाहर निकल यादों के झरोखे से,
कहीं तू फिर से खो गया है!"
"हाँ-हाँ चल, समोसे का स्वाद-
इमली की चटनी के साथ लेते हैं।"

​और फिर क्या... ऑर्डर कर दिया,
इस बार उसके लिए नहीं, अपने दोस्तों के लिए।


- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'


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हां ! धीरे-धीरे ओझल हो रहा हूं मैं....

मानो इरादों की इमारतें ढह गई हैं,
वक्त की तेज़ धार में शरारतें बह गई हैं,
महफ़िलों से सन्नाटे की ओर चल पड़ा अब,
गुमनाम अंधेरों में शामिल हो रहा हूं मैं....

धीरे-धीरे ओझल हो रहा हूं मैं....

बेफ़िक्री दबाने की मुझे आदत नहीं थी,
फिर वक्त को भी तो रुक जाने की फितरत नहीं थी,
सर झुका हालातों से हार ही जाऊं सोचा है,
हर अरमां के अपने, क़ातिल हो रहा हूं मैं....

धीरे-धीरे ओझल हो रहा हूं मैं....

रंगमंच पे आकर झिंझोड़ा है किसी ने,
करतबों का सिलसिला तोड़ा है किसी ने,
खेल ख़त्म अब गिर रहा है परदा,
निगाहों में सबकी बोझिल हो रहा हूं मैं....

हां ! धीरे-धीरे ओझल हो रहा हूं मैं....


-कुणाल


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स्कूल चलो!

छोड़ो घर का सारा काम
सुबह सूर्य को करो प्रणाम
बहुत हुआ घर में आराम
स्कूल चलो!

अभिव्यक्ति की आजादी मिलेगी
जीवन में आराम मिलेगा
ढेर सारा पैगाम मिलेगा
स्कूल चलो!

साक्षर देश बनाना है
लड़का हो या लड़की हो
नहीं करना है इनमें भेद
स्कूल चलो!

मुफ्त में कलम किताब मिलेगा
भोजन पानी साथ मिलेगा
गुरुओं से अच्छी बात मिलेगा
स्कूल चलो!

अच्छी शिक्षा संस्कार मिलेगा
नित नवीन व्यवहार मिलेगा
जीवन का आधार मिलेगा
स्कूल चलो!

अभिभावक को जगना होगा
बच्चों का भविष्य बनाना होगा
लापरवाही से होगा हानि
प्रतिदिन बच्चों को भेजो स्कूल
स्कूल चलो, स्कूल चलो!


- मनोज कौशल


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मासूम नन्हें प्यासे परिंदे

​तेज़ धूप का आलम देखो, न साया है न राहत है,
हवाएं गरम हैं कितनी, उफ़ कैसे उड़ते फिरते हैं।

उनके नन्हे पाँव, वो भी कोमल बैचेनी में लगते हैं,
निगाहें पानी को ढूंढती इसी उम्मीदों मे पलते हैं।

​असीमित और लाचारी से इनका भरा है जीवन,
प्यारे प्यारे सुंदर सुंदर,इंद्र धनुष से ये लगते हैं।

शिक़व, शिक़ायत और फ़रियाद कहां ये करते हैं,
चहचहाहट से आंगन को ख़ुशियों से ये भर देते हैं।

​हमारा फर्ज़ कुछ तो होगा जो इनकी मदद करें हम,
मिट्टी के प्याले में हम भी इक दरिया भर के रखते हैं।

एक क़तरा पिएंगे पानी लाख दुआएं तुमको देजाएंगे,
दीवारें, ओर घर तुम्हारे सुकून-ओ-चैन से भर देते हैं।

​पक्षियों की प्यास बुझाना इबादत से है बड़ी इबादत,
प्यार मुश्ताक़ सच्चा है तो ये लोट के फिर से आते हैं।


- डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़


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ये क्या बात हुई

तुम मिलने ही ना आओ
और हम शिकायत भी ना करें,
ये क्या बात हुई ?

तुम बेपरवाह ख़ामोश बैठे रहो
हम नादां बग़ावत भी ना करें,
बोलो ये क्या बात हुई ?

घिरे हो कितने अजनबियों से तुम,
क्या तुम्हारी हिफ़ाज़त भी ना करें,
बताओ ये क्या बात हुई ?

सच में पत्थर दिल सनम है मेरा
तो हम उसकी इबादत भी ना करें,
कहो ना ये क्या बात हुई ?

तुम्हारी बदमाशी तुम्हे मुबारक,
अब हम शराफ़त भी ना करें,
वाकई ये क्या बात हुई!

बेशक दिल तोड़ना दस्तूर है तुम्हारा,
सुनो उनकी इज़्ज़त भी ना करें
भई ये क्या बात हुई?

भले ही नफ़रत पाले हो मन में,
पर हम मोहब्बत भी ना करें,
अजी ये क्या बात हुई?


- आनन्द कुमार


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नफ़रत का बाजार

नफरत का बाजार बेशर्मी से सजाने लगा है,
जो कभी तलबगार थे पाक मुहब्बत के,
उन्हें अब नफरत का साजोसामान देने लगा है।

नफरत का गुबार दिलों में कैसे भरना लगा है,
जो हाथ उठता था कभी औरों की मदद में,
वो अब कत्ल के इरादे से उठने लगा है।

आंखों का प्यारा ही ,आंखों में खटकने लगा है,
जिसको छुपाया था कभी पलकों के साए में,
वहीं अब आंखे दिखा कर बात करने लगा है।

रिश्तों में भी दिखावे का अहसास छाने लगा है,
इक दूजे के बिन जहां जी नहीं पाते थे लोग,
रिश्तों को भी अब गहरे गर्त में दफनाने लगा है।

खुदगर्जी का आलम इस कदर छाने लगा है,
बेशर्मी से लाशों के ढेर पर बैठ कर आदमी,
तिजोरियां खुद की बेगैरत होकर भरने लगा है।

कर्मों का हिसाब तो हर किसी को देना पड़ा है,
गलतफहमी में रहते हैं,जिसकी लाठी उसकी भैंस
याद रखना कभी बबूल के पेड़ पर आम लगा है।


- राज कुमार कौंडल


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चलते जाना है
चलते जाना है,रुकना नहीं है
कोई तुम्हें समझे या ना समझे
कोई तुम्हें जाने या ना जाने
कोई तुम्हें पहचाने या ना पहचाने
कोई तुम्हें कहे अच्छा या कहे बुरा
कोई निंदा करे या करे स्तुति
कोई प्रीति करे या करे घृणा
रुकना नहीं है,चलते ही जाना है
जग में कोई नहीं है अपना
कौन कब स्वार्थ हेतु साथ छोड़ जाए
कोई नहीं जानता
अक्सर हमने लोगों को कलिकाल में
विश्वास को तोड़ते-मरोड़ते देखा है
हृदय को विदीर्ण करते देखा है
प्रेम में हमने देखे हैं धोखे
सादगी का हमने मजाक बनते देखा है
ऐसा लगता है कि
सब ओर गिरगिटों का अम्बार है
अरे! फिर भी,फरेब से भरी दुनिया में
चलना तो है,
हर कदम फूंक -फूंक कर चलिये
रुकना नहीं है,बस चलते ही जाना है
हे मानव ! जग में स्वकर्तव्य का कर निर्बहन
ईश्वर का सुमिरन करते जाओ तुम
प्रेमपूर्ण, भक्तिपूर्ण प्रार्थनाएं होती हैं
दया भाव से,करुणा से नित्य कबूल
तभी उस करुणामय, प्रेम के सागर
ईश्वर को हृदय से नमन है
वाणी से वंदन है
जो है इस सृष्टि का पालक
इस सृष्टि का मूल
रुकना नहीं है हमें जीवन में
प्रेम से,सच्चाई से परोपकार हेतु
निरंतर आगे बढ़ते जाना है
आगे बढ़ते जाना है।


- प्रवीण कुमार


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औरतें
औरत का दुःख धुएँ सा होता है,
जो आँखों में चुभता है,
पर आसमान तक दिखता नहीं।

हँसते हुए होंठों के पीछे,
वो चुपचाप राख बनती रहती है,
कोई ताप नहीं माप पाता।

मर्द का दुःख बादल जैसा-
गरजे तो दुनिया सुन ले,
बरसे तो हर कोई भीग जाए।

पर औरत…
वो समंदर की गहराई है,
जिसमें आँसू डूबते रहते हैं,
और सतह पर
सिर्फ़ शांति दिखाई देती है।


- 'रूद्राणी' पूनम शर्मा


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खामोश यादें

मैं गूंजता रहूंगा तेरे शहर में
तेरी यादों के संग।
मैं अकेला ही सही
पर फ़िरता रहूंगा हर जगह
तेरी खामोशी को ले अपने संग।
लोग पूछेगे मुझें जब
क्या दर्द है तुम्हें?
मगर मैं फिर भी
चुपचाप फिरता रहूंगा
सीने में दफन की
तेरी खामोश यादों को ले संग।
मैं लिखता रहूंगा
हर जगह इश्क़
लोग पूछेंगे मुझे
कौन है हमराही तेरा?
तो मैं चुपचाप हंसता रहूंगा,
तेरी मुस्कुराहट को याद कर।


- डॉ. राजीव डोगरा


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