साहित्य चक्र

06 October 2019

#अजीब_सी_बात


दोस्तों शायद आपने बहुत सारे अनुभव सुनें और पढ़े होंगे, मगर आज जो मैं आपको बताने जा रहा हूं, वह अनुभव वाकई में सबसे अलग है।




बात मेरे स्कूल के दिनों की है। आपको बता दूं, मैंने सरकारी स्कूल में पढ़ाई की है, जो गांव-ेदेहात में होते है। जहां एक या दो अध्यापक पढ़ाने के लिए आते हैं। लकड़ी के काले पट्टे में मैंने अ आ इ ई उ ऊ सीखें। जिसे हमें बांस की कलम और सफेद मिट्टी से भरा करते थे। शुरू में मुझे मेरीे बड़ी बहनें ले जाया करते थे। मैं 4-5 साल में स्कूल जाना शुरू किया। मगर मेरा नाम 6 साल की आयु में लिखा गया, क्योंकि मैं अपने मां-बाप का पहला बेटा था, जिसके कारण में खूब लाड-प्यार मिला। इसलिए मेरा नाम मेरे दादाजी ने 6 साल की आयु में 1 कक्षा में लिखाया। मेरी 1 से लेकर 5 तक की पढ़ाई गांव के स्कूल में ही हुई। जहां सिर्फ दो अध्यापक थे। जिसमें से एक बहुत ही मारते थे। जिनसे पूरा स्कूल डरता था। 

मैं बचपन में बहुत की तेज और लड़ाकू था। मैं अपने सहपाठियों के साथ खूब मार पीट करता था। वैसे आपको बता दूं, मैं पढ़ाई में साधारण छात्रा रहा हूं, क्योंकि मेरे घर में कोई भी व्यक्ति पढ़ा-लिखा नहीं था। हां मेरी बहनें मेरे से बड़ी जरूरी थी। मगर दो-तीन कक्षाएं जिन्हें भी खुद मेहनत करनी पढ़ती थी। घर में मम्मी और हम अकेले हुआ करते थे। पापा पहले नौकरी करते थे बाद में खेती-बाड़ी। पापा के नौकरी के चलते घर में मम्मी अकेली हुआ करती थी। जो हमें भी संभालती थी और घर का कारोबार भी, जिसमें गाय और भैंस भी शामिल थे। 

एक बात हैं- मैंने और मेरे भाई-बहनों ने खूब देसी दही-दूध खाया है। मेरी मम्मी की एक आदात थी, उसने कभी भी दूध और दही बेचा नहीं। जब पापा नौकरी से घर आते थे, तो हम सब डर के मारे चुप-चाप रहते थे। सिर्फ बड़ी बहन बोलती थी। पापा पूरे गांव के बच्चों को डांटते थे, जो आज भी जारी है।

मैंने अपने पापा से बहुत कुछ सीखा- जैसे बोलना, खाना, पहनना आदि। पापा समझाते थे और मैं उसे अपने दिमाग में भर लेता था। मैंने बहुत प्रयास किये अपने पापा को समझने की, मगर बोलते है ना बाप बाप ही होता है और बेटा बेटा ही होता है। चाहे बेटा कितना ही क्यों ना पढ़ ले मां-बाप की बराबरी और उनकी कर्ज नहीं उतार सकता है।

हां पापा पढ़ना लिखना जानते थे, मगर वो नौकरी पर रहते, जिसके कारण हमें घर में कोई पढ़ाने वाला नहीं था। मम्मी सिर्फ किताब खोलने के लिए बोलती थी, जब हम भाई-बहन किताब खोलते तो खूब लड़ाई झगड़ा हुआ करता था। अगर साफ शब्दों में बोलो तो रोज कोई ना कोई रोता था। जिसमें कभी-कभी मैं भी शामिल रहता था। वहीं स्कूल जाते समय भी यही हाल हुआ करता था। किसी दिन सीसा टूटता था तो किसी दिन रोते हुए स्कूल जाते थे। आज भी उन दिनों को याद कर बहुत हंसता हूं। मगर एक बात हैं- मम्मी से डर बहुत लगता था। जब वो मारती थी।

 एक बार मैं अपने ताऊ जी के बेटे यानि अपने बड़े भाई के साथ स्कूल की छूट्टी कर मेला जाने के लिए तैयार हुआ। मम्मी से पूछा तो मम्मी ने साफ-साफ माना कर दिया मेले में जाने के लिए, मगर मैं अपनी जिद में था, तो जाने लगा, फिर क्या मम्मी ने इतना मारा की मैं बेहोश हो गया और 1 घंटे बाद होश आया। उस दिन एक और शपथ ली कि आज से वो काम नहीं करने हैं, जो घर वालों को परेशानी में डालें और उन्हें अपमानित करें।

यानि मम्मी की मार मेरे लिए एक सीख बनी। मेरी मम्मी मेरे छोटे भाई को बहुत प्यार करती हैं। मैं अपने दादाजी से बहुत ज्यादा प्यार करता था- करता हूं और करता रहूंगा। मगर मेरे दादा जी मुझे अकेला छोड़ चले गए है। दादाजी आप मेरे आदर्श हो और रहोंगे।

एक दिन की बात है- स्कूल में फ्रीस जमा करनी थी, मगर मम्मी के पास पैसे नहीं थे। बड़ी बहन चिल्ला रही थी फ्रीस के लिए और हम भी। चाचा ताऊ से बोला पैसे है तो दे दो। मगर उनके पास भी उस दिन नहीं थे। वो भी मजदूरी करते थे। इसलिए उनके पास भी हमेशा पैसे नहीं रहते थे। उन दिन मुझे एहसास हुआ- हमारी क्या औकात है और हम कितने पानी में है। धन-दौलत से कुछ नहीं होता, आपके पास सही दिमाग और शिक्षा होनी चाहिए। तभी तुम अपने आप को कामयाब और एक सही मार्ग पर ले जा सकते हो।

वैसे मेरा घर गांव-जंगल क्षेत्र में है। जहां कभी-कभी बारिश आंधी तूफान से तबाही आ सकती है। मगर इसके अलावा कोई डर नहीं है। अगर सीधा कहें तो स्वर्ग है। मेरी मम्मी पढ़ना लिखना नहीं जानती थी, मगर उसकी परवरिश साफ और ईमानदार थी। उसने हमें गलत संगती और माहौल में जाने रोक और डरा-डरा कर पढ़ाया। जिसके चलते आज मैं सोशल मीडिया में अपनी बात आप लोगों तक साझा कर पा रहा हूं। मैं अपनी मम्मी का कर्ज कभी भी नहीं उतार सकता, क्योंकि उसने जिस संघर्षों से हमें पाला-पौछा हैं, शायद ही किसी और की मम्मी ने साहा होगा।

अपने स्कूल के एक अध्यापक जी की बात साझा कर रहा हूं, जो मुझे नहीं करनी चाहिए, मगर क्या करूं मजबूर हूं- हमारे स्कूल के अध्यापक जी जो बहुत ही कमाल के थे- जब कोई बच्चा उनके पास शिकायत लेकर जाता था , तो वो गजब का जवाब देते थे। जैसे हम बोलते थे- अध्यापक जी वो सुरेश मुझे मार रहा है, तो वो बोलते थे- तुम उसे पीट दो। मतलब हर समय इस तरह के जवाब उनके पास तैयार रहते थे।

एक बात तो साफ है- बचपन में बांस की कलम से लकड़ी के पट्टे में अ आ इ ई लिखने का अपना ही मजा है। जो आज बहुत ही कम बच्चे शायद ही लिखते होंगे।

आगे और भी अपने जीवन के कुछ अनुभवों के कुछ अजीब सी बातें आपके साथ साझा करता रहूंगा।

                                                          ।।दीपक कोहली।।


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