साहित्य चक्र

04 July 2021

" जीवन चलने का नाम है।"


एक वक्त जीवन में ऐसा आता है जब लगने लगता है जैसे सब कुछ रुक गया है। सब ख़त्म हो गया है। चलते रहने की कोई वजह नज़र नहीं आती है। चलने की हिम्मत भी टूट चुकी होती है। तभी अचानक मन के किसी कोने से एक आवाज़ आती है।

रुकना मौत का दूसरा नाम है। 
जीवन चलने का नाम है।।





जब तक जीवन है, चलते ही रहना है। मन की परवाह किए बिना। वजह की तलाश किए बिना। हम सब वर्तमान में इसी स्थिति में जी रहे हैं। महामारी दहशत व्याप्त करने में कामयाब हो गई है। बहुत कुछ हमसे छिन गया है, बहुत कुछ छिन रहा है। और आगे भी जाने क्या होने वाला है ? सब काम धंधे बंद हैं। हम सब भी पूरी तरह चारदीवारी में बंद हैं। जो भी अपने पास है उसी में काम चला रहे हैं। 


सुबह बिस्तर से उठते हैं और एक निश्चित चारदीवारी  में घूम फिरकर फिर से उसी बिस्तर पर लौट आते हैं। सब कुछ रुका हुआ है यहां तक कि सोच की गति भी और युधिष्ठिर के अनुसार दुनिया में सबसे तीव्र गति से चलने वाला मन भी दुख के अथाह सागर में डूबकर चुप चाप बैठ गया है। हर इंसान के पास दुख की कोई कहानी है। सबकी अपनी व्यथा है। दुख सबकी जबान पर चढ़ा हुआ है, उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है। हमारी बेबसी की दास्तान बन गया है। 

वर्तमान स्थिति के बारे में सोचें तो हर दिन ढलते ढलते यही पैग़ाम देकर जाता है कि जीवन तो बस पानी का एक बुलबुला है। हवा चले या तेज़ धूप निकले उसे तो फूट ही जाना है। फिर क्या जरूरत है इतनी जद्दोजहद की ? इतनी मेहनत और भागदौड़ की ? जो भी मिला है, जैसा भी मिला है उसे वैसा ही स्वीकार कर लेना चाहिए। और बस ऐसे ही बैठे बैठे जीवन गुज़ार देना चाहिए जैसे अभी गुजार रहे हैं। परंतु क्या यह धारणा बना लेना उचित है ? भले ही अनचाहे ही सब रुक गया है लेकिन समय बदलेगा ज़रूर। जीवन फिर से चलेगा ज़रूर। 

पहले से भी अधिक तीव्र गति से। दिन रात बिना रुके बस चलता ही रहेगा। आगे और आगे बढ़ता ही रहेगा कभी न रुकने के लिए। बस इसी उम्मीद को जगाए रखना है। इसी आशा और विश्वास को बचाए रखना है। तभी इस दुख के वातावरण से मुक्ति मिल पाएगी। हमारी कोशिशें अवश्य रंग लायेंगी। जो टूट गया है, छूट गया है, उसे वापिस नहीं लाया जा सकता है। लेकिन जब तक जीवन है तब तक चलते रहना ही नियम है। जीवन रुकने का नहीं बल्कि चलने का नाम है।


                                      अर्चना त्यागी जी कलम से...


वृक्ष हमारे पूजनीय है।



वृक्ष हमारे पूजनीय हैं क्योंकि वृक्षों से हमें प्राणवायु के रूप में ऑक्सीजन की प्राप्ति होती है।ऑक्सीजन हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण तत्व जिसके बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं है और वृक्ष ऑक्सीजन का सबसे बड़ा उत्पादक है। यानी वृक्ष हमारे प्राण रक्षक हैं। इसके अतिरिक्त वृक्ष का हर एक अंग पत्ती से लेकर जड़ तक अत्यंत गुणकारी है। विभिन्न प्रकार की वनस्पति-औषधि हमें इसी से प्राप्त होता है।


                 पर्यावरण संतुलन के लिए इस धरा पर एक निश्चित मात्रा में पेड़ो का होना अतिआवश्यक है।इसके अभाव में पर्यावरण असंतुलित हो जाएगा और हमारे जीवन पर घोर संकट का बादल मंडराने लगेगा।इसलिए आवश्यक है कि हम पेड़ों को कटने से रोके उसका संरक्षण करें और अधिक से अधिक पौधारोपण करें।

            पेड़ों पर ही परिंदों का बसेरा होता है।परिंदा जो स्वस्थ पर्यावरण का एक आवश्यक घटक है।पेडों की अंधाधुंध कटाई एवं द्रुतगति से हो रहा शहरीकरण के कारण आज परिंदों की बहुत सारी प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार पर है, जो हमारे लिए शुभ संकेत नहीं है।

                  पेड़ों के कटने व जंगलों के कम होने से जंगली जानवरों के जीवन पर संकट छा गया है।इस धरती पर जितने भी जीव-जंतु हैं सभी की अपनी-अपनी उपयोगिता है और हर जीव पर्यावरण संतुलन के लिए आवश्यक है, इनके नहीं रहने से पर्यावरण को खतरा है।ईश्वर ने जब सृष्टि का निर्माण किया तब सभी जीवों में हम मानवों को सबसे अधिक विवेकशील बनाया ताकि हम अपने विवेक का सदुपयोग कर धरा पर रहने वाले सभी जीव-जंतुओं का संरक्षण करेंगे। परन्तु हम मानव स्वार्थ साधना में इस कदर लीन हो गए कि हमें इस बात का ध्यान ही नहीं रहा कि यह पृथ्वी सिर्फ हमारी नहीं है बल्कि और भी जीवों का इसपर अधिकार है।अंधाधुंध पेड़ो की कटाई एवं प्राकृतिक संसाधनों का दोहन आज हमारे स्वयं के अस्तित्व के लिए खतरा बनता जा रहा है। यदि आज भी हम नहीं संभले तो वो दिन दूर नहीं जब इस सुंदर सृष्टि के नष्ट होने के जिम्मेवार हम होंगे।

                   इसलिए हे इंसान अब तो जागो ।अभी भी हमारे पास समय है अपने भूल को सुधारने की।हम अपने होने का कर्तव्य निभाए और माँ समान अपनी प्यारी धरती के प्राकृतिक सौंदर्य को बनाए रखने में अपना योगदान दे।
                       हम सब मिलकर अधिक से अधिक पेड़ लगाएँ और उन पेड़ों का संरक्षण करें। क्योंकि पेड़ के फायदे ही फायदे हैं। पेड़ों से हमें ऑक्सीजन की प्राप्ति तो होती ही है इसके अतिरिक्त पेड़ हमारे वातावरण को शुद्ध करता है, मिट्टी के क्षरण को रोकता है, भू जलस्तर को बढ़ाने में सहायक है। वायुमंडल के तापक्रम को कम करता है। इसलिए अपने आसपास ज्यादा से ज्यादा पेड़ो को लगाएँ और मानव होने का फर्ज निभाएँ।


                         कुमकुम कुमारी 'काव्याकृति'


मैं भी जीना चाहता था




मैं मरना नहीं
मैं जीना चाहता था
मुझे भी जीना था
मां का लाडला बेटा
दोस्तों की जान
पापा की पहचान
बहन का हीरो
बन के रहना था 
मैं मरना नहीं 
मैं जीना चाहता था
मेरी भी कुछ सपने थे
कुछ अपने थे
रूठ गए अपने
टूट गए सपने
मैं मरना नहीं
जीना चाहता था
पर ऐसे घुट-घुट के नहीं
 खुल कर जीना था
कितने गम थे अंदर
फिर भी इन गमों को भूल
 आगे बढ़ता गया
चेहरे पर एक झूठी मुस्कान दिखा
 सारे गम सेहता गया
मैं मरना नहीं
 जीना चाहता था 
कुछ भी अच्छा नहीं लगता 
जब दिल अंदर से रोता है
आंखों में थे जो सपने
 वो हो रहे थे
 टूट कर चकनाचूर
मैं मरना नहीं 
जीना चाहता था
लोगों की बातों से डर कर 
गम का घुट 
अकेले पीता गया
और इनका जजमेंट 
जहर का काम कर गया
मन की बात बांटने से ज्यादा
 मर जाना अच्छा लगा
मैं मरना नहीं 
मैं जीना चाहता था ।।


                                                राधा पटेल
    

।। माँ ।।




माता खाये या न खाए,
अपने बच्चों को खिलाये
सन्तान नहीं वो पापी है,
जो माता को भूल जाए।।

माता से बढ़कर न,
इस संसार में कोई दूजा है
हुआ भला उसका जो
माता के चरणों को पूजा है।

माता की ममता, मर्यादा
जिसको समझ न आए
सन्तान नहीं वो पापी है,
जो माता को भूल जाये।।

आँखों से ओझल कभी न,
जिसने तुमको की है
दूध पिलायी तुमको,
खुद तो पानी पी है

धरती, अम्बर नीलगगन,
देवलोक भी शीश झुकाये
सन्तान नहीं वो पापी है,
जो माता को भूल जाये।।

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                                  प्रो.डॉ. देशराज विक्रांत 


एक मजदूर की व्यथा





तुम क्या जानोगे हाल मेरा,
साहेब तुम पैसे वाले हो।

तुम रहते हो बड़े महलों में,
मैं सादी झोपड़ी वाला हूं ।।
और तुम लगाते हो छप्पन भोग,
पर मैं रूखी रोटी वाला हूं।।

तुम क्या जानोगे हाल मेरा, 
मैं एक गरीब कहलाता हूं।।

मैं पैदल चलने वाला हूं,
तुम गाड़ी आडी वाले हो ।
मेरे बच्चे जाए सरकारी में,
तुम प्राइवेट स्कूल वाले हो।।

तुम क्या जानोगे हाल मेरा,
साहेब तुम पैसे वाले हो ।।

घर भले मेरा छोटा है,
पर खुशियां तुमसे ज्यादा है।
और हम भले है गरीब की औलादें,
पर हमें प्यार से रहना आता है।।

और तुम क्या जानोगे हाल मेरा,
मैं एक गरीब कहलाता हूं।


                                            -निकिता रघुवंशी