साहित्य चक्र

21 June 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 21 जून 2026





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पिता ने सिखाया

सिखाया पिता ने यही सिखाया
हार जाना पर कभी भी हार नहीं मानना
हार जो मानोगे तो लड़ना भूल जाओगे
शत्रुओं से फिर कभी भी लड़ नहीं पाओगे
ग़ुलामी करोगे, ग़ुलाम ही कहलाओगे
सड़ा दिए जाओगे दलदली-यातनाघरों में
ज़रा भी पूछना नहीं पड़ेगा पता नरक का
नरक होगा पल-पल पूरा आमने-सामने
नहीं चाहोगे अंतत: फिर भी भुगतोगे
ऑंखें होते हुए भी मगर जान नहीं पाओगे
करोगे क्या ऐसा जातक जीवन पाकर
चाहोगे पर चाहकर भी मर नहीं पाओगे
सिखाया पिता ने यही सिखाया।


- राजकुमार कुम्भज


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दिल में दबाते हो दर्द को तुम, लवों पर क्यूँ लाते नहीं हो,
समंदर समेटे हो अश्कों का भीतर, आँखों से क्यूँ इन्हें बहाते नहीं हो।
हँसते रहते हो फीकी सी हंसी, नकाब क्यूँ हसी का हटाते नहीं हो,
चाहते हो बताना हर बात तुम, चाहकर भी क्यूँ मगर बताते नहीं हो।
दिल में दबाते हो दर्द को तुम, लवों पर क्यूँ लाते नहीं हो।

कशमकश बहुत है भीतर-भीतर, बाहर क्यूँ इसे लाते नहीं हो,
आँखे बंद करके करते हो इबादतें, मंदिर मस्जिद क्यूँ जाते नहीं हो।
लाख पूछने पर भी हमें तुम, बात दिल में दबी क्यूँ बताते नहीं हो,
झुकी नज़रों से देखते हो तुम, नज़र से नज़र क्यूँ मिलाते नहीं हो।
दिल में दबाते हो दर्द को तुम, लवों पर क्यूँ लाते नहीं हो।

गहरी किसी ठोकर से घायल हो तुम, जख्मों को क्यूँ दिखाते नहीं हो,
महफ़िल में भी रहते हो गुमशुम, वजह क्यूँ इस चुप्पी की बताते नहीं हो।
गुनगुनाते हो तन्हाई में बहुत, राग-ए-दिल क्यूँ महफ़िल में गाते नहीं हो,
आ जाने दो आँधियों को एक बार तुम, उठते तूफानों को यूँ दबाते नहीं है।
दिल में दबाते हो दर्द को तुम, लवों पर क्यूँ लाते नहीं हो।


- धरम चंद धीमान



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इतनी सी जिंदगी

दो जून की रोटी,
दो कपड़े,
दो ईंटों का घर,
दो मीठे बोल,
दो कदम हमसफ़र
दो पल का चैन-
बस इतनी सी तो होती है ,
दो दिन की असल जिंदगी।


- रोशन कुमार झा



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बड़ा बड्डीखणा बी खरा नी हुन्दा
एड़ा गल्लांन्दे आए स्याणे,
कर ले सब्र, जे आई ख़बर
फेरी बादा बिच पऊंणा पच्छ्ताणे

ओच्छे बणी कन्ने, कुछ नी मिलदा
चार दिना री हुन्दी बड्डीयाई,
फेरी नी पूछदा कोई भाईयों
याद आऊँदी फेरी अपणी कमाई,

ओच्छे अपणा, ओच्छपण नी छड्डदे
चाहे बादा बिच पओ पच्छ्ताणे,
चौहट्टे-चबारे फेरी गल्लां लगदिया
लोक हंसदे,तान्ने कसदे, याद आऊँदे फेरी स्याणे,

अक्कड़ बुरी, अकड़ना तिस दे बी बुरा
न मिलदा कुछ कुसी जो, ना ई आऊँदा पूरा,
कर सुरत, रह नीठा,छड्ड दे बड्डीखणा ओ बन्देया
निवां बणी कन्ने चल, आई नी पऊणा पच्छ्ताणे,

गल्लां हुंदियाँ सच्चीयाँ, लोक बणादें ख्वाणे
जीभा ज़बानी ये गल्लां चड़दियाँ स्वाद कोई क्या जाणे ?
कर ले अम्ल, बान गठ्ठी, याद आऊँदे फेरी स्याणे
रसभरूरिया ये गल्लां लोकों, कीमत कोई क्या जाणे ?


- बाबू राम धीमान



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-पिता कब अच्छे दोस्त बन गए... पता ही नहीं चला!

बचपन में जिनसे सबसे ज़्यादा डर लगता था,
आज उन्हीं से हर बात कहने का मन करता है।

जो कभी कहते थे- "इतना मत हँसो..."
"समय पर घर आना..." "पढ़ाई पर ध्यान दो..."
तब लगता था, ये सिर्फ़ रोकते-टोकते हैं।
लेकिन समय ने धीरे-धीरे बताया...
वे रोक नहीं रहे थे,
वे जीवन की ठोकरों से बचा रहे थे।

एक उम्र के बाद एहसास हुआ कि
पिता के पास हर सवाल का उत्तर नहीं होता,
लेकिन हर मुश्किल में कंधा ज़रूर होता है।

अब उनसे बातें होती हैं... कभी व्यापार की,
कभी परिवार की, कभी जीवन की,
और कभी बिना किसी वजह के भी।

अब समझ आता है, वे केवल पिता नहीं,
मेरे सबसे सच्चे, सबसे मौन और
सबसे भरोसेमंद दोस्त हैं।
दोस्त वह नहीं जो हर बात पर "हाँ" कह दे,
दोस्त वह है जो आपकी भलाई के लिए
ज़रूरत पड़ने पर "ना" भी कह सके।

शायद इसी लिए... पिता पहले अनुशासन बने,
फिर सहारा बने, और एक दिन...
पता ही नहीं चला कि वे सबसे अच्छे दोस्त बन गए।

जो लोग आज भी अपने पिता के साथ
बैठकर दो पल हँस सकते हैं,
उनसे अधिक अमीर शायद ही कोई होगा।


- नरेंद्र मंघनानी


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बीत गए वह दिन पर उनकी यादें पास हैं,
दूर हो तुम पर तुम्हारी यादें पास हैं।

हर वक्त मुझे याद आती है तुम्हारी,
तुम्हारे वापस आने की खास है,

मैने हमेशा तुम्हें याद किया है,
इसलिए शायद बस यादें पास है,

तुम्हारा जिस्म नहीं है मेरे पास,
पर तुम्हारे होने का एक एहसास है,

कई समय से मैं रह रहा हूं अकेला,
अकेलेपन से लड़ने का मुझे अभ्यास है,

जब हम पहली बार मिले थे,
तब से तुम्हारी धड़कन मेरे पास है,

तुम दिया थी मेरी जिंदगी की,
पर अब दिया- बत्ती नहीं बस प्रकाश है,

शाम को घर की ओर जाने लगता हूं,
घर पर तुम देखोगी ये आस है,

मैं तो कब का दफन हो जाता,
वह तो तुम्हारी यादें मेरे पास हैं,

साथ हमारा कभी छूट नहीं सकता,
तुम हो वहां पर दिल मेरे पास है,

हमारी कुछ बातें अधूरी रह गई,
उनके पूरे होने की आस है,

तुम्हें देखूं तो ग़ज़ल बन जाए,
पर अब यह कागज एक लाश है,

तुम गई तो स्याही भी ले गई,
पर फिर से लिखूंगा ग़ज़ल ये आस है,

कुछ यादें हमेशा साथ में रह जाती हैं,
जैसे तुम्हारी मेरे पास है,

रात को कमरे में बैठे गुनगुनाता हूं,
तुम्हारे लिए लिखे गीत आज भी पास हैं,

तुम्हे आज भी रोज देखता हु,
तुम्हारी तस्वीर आज भी पास है,

तुम जब आई थी मेरी जिंदगी में,
वह पल आज भी खास है,

इसीलिए तो जिंदा है "राज",
तुम्हारी यादें अभी भी पास है।


- प्रणव राज


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व्यक्तित्व

व्यक्तित्व केवल रूप नहीं,
न ही वाणी का श्रृंगार।
यह तो अंतर्मन की सुगंध है,
जो देती जीवन को आकार॥

विपदा में जो धैर्य रखे,
सफलता में रहे विनीत।
वही व्यक्तित्व उज्ज्वल होता,
जिसके भाव रहें संगीत॥

सत्य, करुणा, प्रेम और सेवा,
जिसके जीवन का आधार।
उसके पदचिह्नों से महके,
धरती, अम्बर और संसार॥

चमक नहीं पहचान बनाती,
न ही ऊँचे पद का मान।
व्यक्तित्व वही श्रेष्ठ कहलाए,
जो जीते सबके हृदय-प्राण॥


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


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शिकायत

वह कभी प्रेम का इज़हार नहीं करता था,
पर शिकायतों का कोई अवसर नहीं छोड़ता था।

तब समझ में आया,
कभी-कभी प्रेम शब्दों में नहीं,
इसी तरह की शिकायतों में रहता है।

एक दिन न दिखूँ,
तो वह दो दिन गायब हो जाता।
उससे शिकायत करती,
तो बड़ी सहजता से कहता
"पहले तुम तो उस दिन नहीं दिखीं थीं।"

उसकी हर नाराज़गी में
मेरा हिसाब छिपा होता था,
और हर शिकायत में
एक अनकहा अधिकार।

शायद प्रेम हमेशा
"मैं तुमसे प्यार करता हूँ" नहीं कहता,
कभी-कभी वह शिकायतों का लिबास पहनकर भी
हमारे पास आ बैठता है।


- सविता सिंह मीरा


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मेरा पहला प्यार है तू...
हां! तुझसे ज्यादा मैं
पिता से प्यार करता हूं।
मगर तेरी हिफाजत
और सम्मान से
कोई नहीं खेल सकता,
जब तक मैं जिंदा हूं।
तेरे लिए मैं सारे
जगत से लड़ सकता हूं।
हां! गुस्सा होता हूं तेरे से...
कभी लड़ लेता हूं तेरे से...
मगर तेरा अंश हूं तेरे से
बड़ा थोड़ी हो सकता हूं।
तेरे दूध का कर्ज थोड़ी ना
मैं अदा कर सकता हूं।


- दीपक कोहली



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दिव्या अनुराग

जन्म जमांतर की मेरी
अतृप्त इच्छाएं
मुझे छूने लगी है।

देख कर तुमको
मुझ में प्रेम जिज्ञासा
फिर उत्पन्न होने लगी है।

तुम्हारे अस्पर्श अहसास
मेरे सहस्रार को
जागृत करने लगे है।

न चाहते हुए भी
मेरे अनाहत में
तुम्हारे स्वर को गूंजने लगे हैं


- डॉ. राजीव डोगरा



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ज़िन्दगी कटी है

जितनी भी ज़िन्दगी कटी है सब तेरे नाम
बुरा किया अच्छा किया है सब तेरा काम
जैसी बुद्धि दी तूने है उसी का परिणाम
अपने कर्मों का फल भुगतेगा क्यों बन रहा अनजान

जिंदगी में किससे मिलना है तुझे नहीं मालूम
किससे मिलाना है यह वही तय है करता
मालूम है तुझे कि जाना पड़ेगा एक दिन खाली हाथ
मोहमाया में फंस गया जाने से बहुत है डरता

बने बनाये खेल को बिगाड़ना
या बिगड़े हुए खेल को बनाना
किसी के हाथ में तो कुछ भी नहीं
अपनी मर्जी से आता है उसको नचाना

कभी करता है वह दिल्लगी
कभी उपहास है उड़ाता
भटकाता है अकेली राहों में
तो फिर राह भी है दिखाता

जिंदगी को जो यूं ही तमाम कर दिया
जिसने दिया सब कुछ उसी को बदनाम कर दिया
अवसर जो मिले आगे बढ़ने के उन्हें गंवा बैठा
दूसरों का जीना भी हराम कर दिया


- रवींद्र कुमार शर्मा


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मौत सच है रहेंगे सदा हम नहीं।
जीने का भी यहाॅं पे मज़ा कम नहीं।।

ज़िंदगी चार दिन की जियो शान से।
बाटो खुशियाॉं जहाॉं में मगर ग़म नहीं।।

ज़ुल्म सहते रहे उनके हॅंसते हुए।
रोए ऐसे की ऑंखें हुई नम नहीं।।

ज़ेहनी कमजोर जो लड़ते फिरते हैं वो।
गुस्से में कांपते जिनके कुछ दम नहीं।।

जंग बल से नहीं तुम लड़ो अक़्ल से।
नज़रें दुश्मन पे हों ये मगर ख़म नहीं।।

चढ़ने के बाद जल्दी न उतरे मिरी।
फूल महवे की पीता कभी रम नहीं।।

लोग क्यूॅं डर रहे देख मुझको निज़ाम।
ठर्रा बोतल में है ये कोई बम नहीं।।


- निज़ाम फतेहपुरी



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