साहित्य चक्र

09 January 2026

अरावली पर्वतमाला पर लिखी कविताएँ



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अरावली

अरावली के आँचल में, है इतिहास समाया,
कण-कण इसका पूछे, क्या वक्त ये आया ?
बांध मरू को बाँहों में, बनकर जीवन डोर,
धड़कती हूँ भारत के लिए, फिर कैसा ये शोर ?

वन-उपवन की छाया, नदियों का हूँ आधार,
हरियाली धरा को देती, लुटाती अपना प्यार,
रेतीली आँधियों को, देती न आगे की राह,
हूँ मौन प्रहरी युगों से, हो गया अब क्या गुनाह ?

घाव बहुत हैं तन पर, फिर भी हूँ मौन खड़ी,
पीड़ा मेरे मन की, नहीं किसी ने कभी पढ़ी,
सुन नहीं रहा क्यूँ, कोई मेरी करुण पुकार,
मेरे आधार में है छिपा, मानव तेरा भी आधार।

है अरावली से ही, जीवन अस्तित्व, विस्तार,
रक्षक के भक्षण में लालायित, ये कैसा व्यवहार ?
पाल रही पुत्र सा, पर कर बैठे तुम अधिकार,
बहुत शौक है चढ़ा, तो पाँव अपने को कुल्हाड़ी मार।


- धरम चंद धीमान


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अरावली

सोच रहे हो..
या फिर साजिशन निर्णय दे रहे हो!

घटते जंगलों, पेड़, पहाड़ों पर,
क्यों नहीं तुम कुछ बोल रहे हो।
भारतवर्ष की वसुधा का श्रृंगार,
आरावली पर्वतमाला तोड़ रहे हो।।

छोटे-छोटे पर्वतों की पुष्पों से,
पर्वतमाला अरावली है बनी।
उन पुष्प रूपी पर्वतों से,
तुम क्यों भला मुँह मोड़ रहे हो।।

अरे तनिक तो ख्याल करो,
प्राकृतिक ढाल तो ना खत्म करों।
जानवर बेजुबा कितने मारोगे,
आधार आजीविका ना ख़त्म करों।।

धूल भरी आंधी से तुम,
दिल्ली को कैसे बचाओगे।
खत्म हो गई नदिया अगर तो,
प्यास किस किसकी बुझाओगे।।

फिर ना कोई कभी किसी,
इंसानों को भी बचा पाएगा।
हवा भी होगी जहरीली,
यूं भूख प्यास भी सताएगा।।

काम ना आएगी तेरी तरक्की,
बेसुध होकर सब मारे जाएंगे।
काम ना आएगा तेरा विस्तार,
पाप के भागी हम ही कहलाएंगे।।

ऐसी तरक्की की क्या जरूरत,
जो अरावली से करें छेड़छाड़।
अगर छू भी दिया तूने अगर,
होगा तुझ पर भी कड़ा प्रहार।।

सोच रहे हो..
या फिर साजिशन निर्णय दे रहे हो!


- राघवेन्द्र प्रकाश 'रघु'



*****

हाँ मैं पर्वत अरावली हूँ।

प्रथम गिरि का मैं चारण हूँ,
मैं प्राकृतिक उच्चारण हूँ।
सदियों को चलते देखा है,
भारत को बनते देखा है।

ऊँचाई मेरी किंचित है,
आज पहाड़ी भी चिंतित है।
सबको लगता यही वहम
लगता हूँ ऊँचा कुछ कम।

खोल कर्ण को सुनो जरा
मुझमें है इतिहास भरा।
मैं प्रताप गाथा गायक हूँ,
राणा का सेनानायक हूँ।

अरि के रक्तओं को चाटी हूँ,
याद करो हल्दीघाटी हूँ।
दुश्मन को भी तौल लिया था,
हरहर बमबम बोल दिया था।

मेरी काया पर मत जाओ,
बस मेरे कर्मो को गाओ।
राजस्थल बनते देखा हूँ,
भौगोलिक लक्ष्मण-रेखा हूँ।

मैं सदियों तक तुम्हें दिया है,
क्या बदले में तनिक लिया है।
मुझको तुमने शाप कह दिया,
किस मन से है पाप कह दिया।

मर्यादा को ताख रख दिया,
सीने पर अब लात रख दिया।
राह भटक कर रह जायेगी,
श्वास अटक कर रह जायेगी।

मत कर अपने मन से भूल,
उड़ेगी दिल्ली तक यह धूल।
सोच समझकर कदम बढ़ाना,
पाछे जाकर मत पछताना।

सदियों से मैं यही खड़ी हूँ।
बस जड़वत चुपचाप पड़ी हूँ।
मत छेड़ो मैं ठीक-सही हूँ।
हाँ मैं पर्वत अरावली हूँ।

- प्रीतम कुमार पाठक


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अरावली की पीड़ा

परिपत्र को तुम छांट रहे संकेत
नही यह अच्छा है।
विकसित भारत की आड़ में
ये प्रकृति को सीधा गच्चा है।
जब- जब नर ने प्रकृति को छेड़ा
तब- तब मची तबाही है।
निज संकट को आमंत्रित
करने वालों तुम्हें बधाई है।

ये अरावली पर्वत जिसने
विस्तार थार का रोका है।
नर मानव और जीव-जन्तु की
रक्षा को सबकुछ झोंका है।
करना था रक्षण जिसका
न भक्षण उसका अच्छा है
विकसित भारत की आड़ में ये
प्रकृति को सीधा गच्चा है।

पेड़ लगाकर प्रकृति के
रक्षक का फर्ज निभाते हो।
व्यक्ति विशेष के हित में फिर क्यों ?
अरावली कटवाते हो।
अरे अवशेषी तुंग के कारण
परिवेश यहां का अच्छा है
विकसित भारत की आड़ में ये
प्रकृति को सीधा गच्चा है। .

यदि क्षति पहुंचेगी अद्रि को
तब रौद्र रूप प्रकृति लेगी।
प्रेम बांटने वाली प्रकृति
चोट हमें भीषण देगी।
प्रकृति का वैरी बनना
ये किंचित भी न अच्छा है।
विकसित भारत की आड़ में ये
प्रकृति को सीधा गच्चा है।

हस्तक्षेप यदि रुका नही
तो थार बहुत हर्षित होगा।
पूरब से लेकर उत्तर तक वह
निज भ्रमण की दस्तक देगा।
मरू मिल जाये सरिता से
तब अंजाम न इसका अच्छा है।
विकसित भारत की आड़ में ये
प्रकृति को सीधा गच्चा है।

मिले थार यदि सरिता से
निज प्रेम से रंजित कर देगा।
नीर सुखाकर सरिता का
सैकत से सुसज्जित कर देगा।
सीख " करुण" की तुम मानों
कुदरत से तर्क न अच्छा है
विकसित भारत की आड़ में ये
प्रकृति को सीधा गच्चा है।


                                          - करन सिंह "करुण"


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मम्मी की एक दिन की मार से मुझे कभी गलत करने की हिम्मत नहीं आई...



मुझे ठीक से याद नहीं है, मगर इतना जरूरी याद है कि रक्षाबंधन के त्यौहार वाला समय था। रक्षाबंधन के एक-दो दिन आगे या एक-दो दिन बाद की बात है। उस दिन मैंने पहली बार स्कूल नहीं जाने का फैसला किया था। यह फैसला मैंने बिना किसी से पूछे किया था। ना मम्मी से पूछा था, ना पापा से और ना ही दादा जी से... मुझे रक्षाबंधन के मेले में जाना था। कुछ स्कूल के दोस्त और कुछ अगल-बगल के साथी थे। मम्मी को पता नहीं था कि मैंने स्कूल की छुट्टी की है। जब सब स्कूल चले गए और मैं मेले के लिए तैयार हो रहा था, तब मम्मी को पता चला कि मैं स्कूल नहीं गया हूं।





मम्मी ने पूछा- आज स्कूल क्यों नहीं गया ?
मैंने कहा- मुझे मेले में जाना है। 
मम्मी ने कहा- स्कूल तेरा बाप जाएगा ?
मैंने कहा- वो मुझे नहीं पता।
मम्मी ने कहा- तूने स्कूल की छुट्टी की ठीक है, मगर तू मेला नहीं जाएगा।
मैंने कहा- क्यों नहीं जाऊंगा ?
मम्मी ने कहा- अगर हिम्मत है तो जाकर देख ले। 
मैंने कहा- ठीक है।

मैं कपड़े पहन तैयार होकर दोस्तों का इंतजार करने लगा। तब एक दोस्त आया ही था कि मम्मी ने चप्पल घूमा के मेरे सिर पर खींच दिया। मैं भागने वाला ही था कि दूसरा भी पड़ गया। इतने में मैं जोर से चिल्लाया और रोने लगा। करीब दो-ढाई सौ मीटर मैं भागा ही होगा रोते-रोते कि मम्मी ने मुझे पकड़ लिया। उसके बाद जो हुआ मत पूछो!





करीब 20 से 25 मिनट मुझे मम्मी ने इतना मारा और पीटा कि मैं बेहोश हो गया। उसके बाद मम्मी ने मेरे मुंह में पानी के छीटे मारे और मुझे पानी पिलाया। मैं होश में आ गया मतलब आज तक होश में ही हूं। पहले बचपन में भाई के कारण मैं मां का दूध सही से नहीं पी पाया और उसके बाद इस मार ने मुझे मम्मी से काफी दूर कर दिया। 

मगर कभी-कभी मैं सोचता हूं कि अगर मम्मी की वह मार नहीं पड़ी होती तो क्या मैं इतनी बुराइयों से बच पाता! शायद वह मार नहीं पड़ी होती तो मैं एक बिगड़ैल बच्चा बन जाता जो नशा, चोरी, बदमाशी और मारपीट से ग्रस्त हो चुका होता और किताबों से मेरा दूर-दूर तक का वास्ता खत्म हो चुका होता। और शायद आज मैं आपको यह किस्सा नहीं सुन रहा होता। 

मेरा व्यक्तिगत मानना है- बच्चों को बचपन में ही गलत और सही का ज्ञान सीखाना जरूरी है। चाहे उसके लिए अभिभावकों को उन्हें डांट-फटकार और मारपीट करने ही क्यों ना पड़े, सभी अभिभावकों को करनी चाहिए।


                                                            - दीपक कोहली

कविता- पितृसत्तात्मक समाज की कहानी



 

तुम पढ़ सकती हो,
पर आज़ाद नहीं हो,
अवैतनिक घरेलू कामों की बेड़ियों से,
जो कभी टूटें नहीं।
 
कोचिंग कर सकती हो,
सिलाई-कटाई सीख सकती हो,
पर घर के कामों से मुक्ति नहीं,
नौकरानी नहीं, बस सेवा की मशीन।
 
ट्यूशन पढ़ा सकती हो,
पैसे कमा सकती हो,
पर घर की चौखट पर,
मुक्ति की कोई डगर नहीं।
 
खेलों में भाग ले सकती हो,
डिग्री भी जीत सकती हो,
पर परिवार की सेवा से,
फुरसत कभी नहीं।
 
आत्मनिर्भर बन सकती हो,
पर एक बंदी बनी रहती हो,
जिसकी मंज़िल नहीं,
बस ‘विदा’ की दहलीज़।
 
विदा हो जाओ,
फिर भी पढ़ सकती हो,
कमाई कर सकती हो,
पर घर की सेवा से,
कभी छुटकारा नहीं।
 
बच्चे पालो,
दूध पिलाओ या बॉटल भरो,
तेल मालिश कोई और करे,
पर घरेलू कामों का बोझ,
दिल से ना उतरे कभी।
 
पुरुष?
वह कमाता है,
घर का काम नहीं करता,
सेवा नहीं करता,
फुरसत नहीं मांगता।

उसका काम है कमाना,
तुम्हारा काम है सेवा करना,
उसकी थकान समझो,
अपनी इच्छा भूल जाओ।
 
पर याद रखना-
कमाई के नाम पर वो आराम करे,
और तुम बंदी बनो,
घर की दीवारों के बीच,
जहाँ तुम्हारी कोई आवाज़ नहीं।
 
यह है पितृसत्ता की दास्ताँ,
जहाँ महिला पढ़ती है, काम करती है,
पर आज़ाद नहीं होती,
बस सेवा में बंधी रहती है।

 
                           - प्रीती जायसवाल



08 January 2026

प्रकृति से भरा गांधी का स्विट्जरलैंड

वर्ष 2025 के अंत में, मैं अपने जन्मदिन के मौके पर 25 दिसंबर 2025 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में स्थित कौसानी घूमने के लिए गया। कौसानी इतना खूबसूरत है कि मैं इसे शब्दों में बयां नहीं कर सकता हूं। चाय के बागान से लेकर हरे-भरे पहाड़ और हिमालय के दर्शन यहां होते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कौसानी की सुंदरता और प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर इसे भारत का मिनी स्विट्जरलैंड कहा था।





पहाड़ों के बीच में बसा कौसानी एक छोटा सा शहर है। कौसानी में गांधी जी का अनासक्ति आश्रम भी स्थित है। इस आश्रम से जो दृश्य दिखाई देता हैं उनके लिए मेरे पास भाव और शब्द नहीं है। अनासक्ति आश्रम में मुझे ध्यान करते हुए ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मैं हिमालय में बैठकर साक्षात विश्व का भ्रमण कर रहा हूं।

जहां प्रकाश की किरण मेरे माथे को चूमते हुए मुझे गर्मी का एहसास कर रही थी, वही हिमालय मेरी आंखों के सामने खड़ा होकर मेरे से कह रहा था- क्या तुम भी मेरी तरह अपने फसलों पर अडिग और अटल रहते हो ?




और मैं मौन होकर शांत मन से हिमालय और प्रकाश के मिलन को बंद आंखों से महसूस कर रहा था। हरे-भरे चाय के बागान मुझे अपनी ओर बुला रहे थे। चिड़ियों की मधुर आवाज़ मुझे शांति और प्रकृति की खूबसूरती का एहसास करवा रहे थे।

कौसानी की यह यात्रा मेरे जीवन में नये अनुभवों का एक पिटारा लेकर आया है। पहाड़ी लोगों के जीवन और संघर्ष ने मेरा पूरा नज़रिया बदल दिया है। मैं चाहता हूं आप भी एक बार कौसानी जाइए और अपने जीवन के अनुभवों को और बढ़ाइए।


- दीपक कोहली



आज की प्रमुख रचनाएँ- 08 जनवरी 2026





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बुझी हुई कंदील लिए हाथों में
अंधे,अंधों को,अंधेरे में दिखा रहे हैं रास्ता
और बम-बम बमबारी करते हुए
चिल्ल-पों मचाते हुए इधर-उधर की
बता रहे हैं कि इधर, इधर ही है मुक्ति-मार्ग
सर्दियाॅं पास हैं, तो वसंत भी दूर नहीं
अच्छे दिनों का स्वादिष्ट है अचार
और बेहद चटपटा भी कुछ कम नहीं
कारागृह जाने से बचाता है बख़ूबी
कपड़े बदलना भी सिखाता है
जो सीख गये कुशल कारीगर कहलाये
और जो सीख नहीं पाये ये महान कला
पीछे-पीछे आये,आते गये पैदल
आहिस्ता-आहिस्ता...


- राजकुमार कुम्भज


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दर्द-ए-बयां

ठोकर जब देती है दर्द हमें
मरहम देता दर्द को बुझाय
दिल पे जब चोट लगती है
मरहम ना पाये उसे समुझाय
क्रोध जब धधके आग में
ङाल दो इसपर ठंडा पानी
ना जलायेगी क्रोध की आग
बुझ जायेगी गुस्से की कहानी
शांत सागर है तुफां का द्योतक
ना समझो मौन को कमजोर
जब आनी होती है यहाँ सुनामी
सब कुछ पल में हो जाता है दूर
आलस्य मानव का बना है बैरी
ना दो इन्हें तन मन में वास
टाल देती है कामों को अक्सर
जब हो जाती है जालिम निवास
अनपढ़ पूत है जग का यमदूत
कहती थी मेरी नानी अपनी जुबानी
अनपढ़ से ना करना कभी प्रीत
खत्म कर देगी जीवन की तेरी कहानी
सलाह सदैव लिजीये साधु जन से
भले ही दुश्मन हो बना घर के आगे
सज्जन देते है भलाई की सलाह
भले ही तुमको मन में ना जागे
धन दौलत है रिपु के समान
चोर डकैत को देता है आमत्रंण
कभी ना बनना धन्नामल
छीन लेता है नींद जड़ चेतन


- उदय किशोर साह


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से जमाना हुण नी औणा

जिहां जे हयूंद नेड़े लगा था औणा
ता समझो लकड़िया रा प्रबंध भी  करणा पौणा।
चूल्ही ले भीड़ लगी जाहीं थी पौणा
जे थोड़े झे लेट हुई गए तां समझो बैठणे रा नंबर नी पौणा।
लगी करां से जमाना हुण नी औणा...
चूल्ही रा गीट्ठा चल्दा रैहणा
फेरी क्या पोहलणिया कने कथा रा दौर चली पौणा।
दादू दादी  कथा कने पोहलणिया लगी जाएं थे सुनाणा
पोत्रु कने पोत्रिया री ज़िद हुईं थीं आसा इन्हा ले ही सौणा।
लगी करां से जमाना हुण नी औणा...
छलिया रे भोगड़े तौए पर  बनाणा
गुड़ मलाई कने पौएं थे खाणा
जे लगी जाओ बरखा री झड़ी ता संटवार पौणी बनाणा
कदी ऐंकलू  कदी चिल्हडू ता कदी खिचड़ा खाणा।
लगी करां से जमाना हुण नी औणा...
हयूंदा परौहणे भी जरूर जाणा
परौहणे जो हुक्का सबणी ते पैहले औणा
फेरी सुखसांद रा दौर चली पौणा
खाणा भी दूधा घीऊआ ने ही मिलणा
लगी करां से जमाना हुण नी औणा...


- विनोद वर्मा

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फौजी बनना नहीं आसान

फौजी बोलना जितना होता है आसान
उतना ही कठिन होता है फौजी बनना
शांति में भी उग्रवादियों से लेना पड़ता है लोहा
युद्ध में तो फिर मोर्चे पर पड़ता है लड़ना

कठिन प्रशिक्षण पूरी सेवा में रहता है जारी
तभी तो एक कमांडो पड़ता है सौ पर भारी
अकेला भी पड़ जाए अगर युद्ध में कभी
पीठ नहीं दिखाता सफर रखता है जारी

देश की सुरक्षा के लिए तैयार हरदम है रहता
घर परिवार से दूर किसी से कुछ नहीं कहता
कभी सायचिन की ठंड कभी राजस्थान की गर्मी
कभी असम नागालैंड कश्मीर में उग्रवादियों से लड़ता

आपदा कहीं आ जाती देश में
एकदम से तब फौज को बुलाते
जब हम किनारे खड़े होकर हैं चिल्लाते
जिंदगी बचाने तब वह उफनती नदी में है कूद जाते

दंगा फसाद कहीं हो जाये देश में
तब भी फिर याद आते हैं सेना के जवान
जहाँ बाकी लोग कुछ कर नहीं सकते
वही आकर संभालते है फिर कमान

सर्दी गर्मी में रहते बार्डर पर तैनात
करते हैं मुकाबला कैसे भी हों हालात
उनमें भी होता है एक मासूम सा दिल
उनके भी होते हैं दिल के जज़्बात


- रवींद्र कुमार शर्मा


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नूतन वर्ष- 2026

साल नया और हाल पुराना
कुछ सुनना कुछ उन्हें सुनाना
कुछ पाया कुछ खोया सबने
जैसा था अपनाया हमने
शिकवे और गिले थे सारे
उनमें भी सब रहे हमारे
जद्दोजहद रही रोटी की
बात वही किस्मत खोटी की
रीति प्रीति है बदली-बदली
रिश्तों में अब अदलाबदली
हानि लाभ हावी रिश्तों पर
खुद का स्वार्थ आज है ऊपर
प्रेम समर्पण त्याग पुराना
बदल गया सब ताना-बाना
किस कंधे पर सिर रख रोऊं
वो मेरा मैं उसका होऊं
कहाँ गए खुशियों के आंसू
जिनके संग सुख-दुःख मैं बांटू
कहाँ गई यादों की हिचकी
आती है अब अक्सर सिसकी
नए साल में अरमानों के
बीज नया हम फिर बोयेंगे
आस और विश्वास लिए हम
मधुर स्वप्न में फिर खोंयेंगे
दोहराएंगे वही कहावत
गिरती चढ़ती चींटी का
नया हौंसला फिर लेकर हम
नूतन वर्ष मनाएंगे...


- विजय कनौजिया


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नशे ने नींव ही हिला दी

नशे ने नींव ही हिला दी,
जाने किसने युवाओं को
नशे की सलाह दी।

कहाँ बिकता है यह ज़हर,
किसने नशे को पनाह दी,
इस नशे ने भविष्य की
नींव तक हिला दी।

लाखों सपने आँखों में लिए
निकले थे घर से,
माँ की दुआएँ, पापा की सीख,
सब नशे में उड़ा दी।
जाने किसने युवाओं को
नशे की राह बता दी।

नशा-नाश है ज़िंदगी का,
यही इसकी अंतिम सच्चाई।
अंजाम से सब हैं वाक़िफ़,
फिर भी नशे की लत लगाई।

अपने साथ अपनों की
नैया भी डुबो दी,
परिवार ही नहीं,
समाज की नींद उड़ा दी।

नशे ने सचमुच
भविष्य की नींव ही हिला दी।


- कंचन चौहान


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नारी की पीड़ा

आखिर मैं ही क्यों
दबी कुचली रहुँ इस समाज में
क्या मेरा कोई अस्तित्व नहीं ?

आखिर मैं ही क्यों
अपनी पीड़ा को अंतर मन में रखूँ
क्या मेरी संवेदनाओ का कोई वजूद नहीं ?

आखिर मैं ही क्यों
कुंठित व्यक्तित्व झेलू लोगों का
क्या मेरी भावनाओं का कोई मूल्य नहीं ?

आखिर मैं ही क्यों
जियों ओर लोगों के लिए
क्या मेरे जीवन की कोई 'हस्ती' नहीं ?

आखिर मैं ही क्यों
दिन-रात उत्पीड़ना सहन करुँ
क्या मुझे स्वयं खुश रहने का अधिकार नहीं ?


- डॉ. राजीव डोगरा


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दिव्य अनुपम अलौकिक

ज़ब शशधर की ये प्रथम किरण
ज्योंँ पड़ती तेरे आनन पर,
फैली फिर धरा के चहुँ ओर
मोहक धवल उजली सी किरण।

देख कर विस्मित होने लगे
सकल चर-अचर,अरु मानव-गण,
मेनका-सी सुंदरता लिए
किसका मोती सम श्वेत वसन?

ज्यों ओस कि बूँदों पर उतरी
सूरज की पहली रक्तिम किरण,
अलौकिक सा अनुपम मनोरम
न शब्दों में इसका वर्णन।

ईर्ष्या में चाँदनी छिप गई
नटखट से बादलों के ओट,
अंधकार को बेध कर व्याप्त
होने लगी हुई श्वेत ज्योत।

सच तो है नारी ही जग की
कोमल विमल अनुपम-सी कृति,
कोई और क्या लिखें उस पर,
नहीं शेष बची कोई पंक्ति।

चाहे दिनकर की प्रथम किरण
या मयंक की हो धवल किरण,
उसकी सौम्यता अरु शुभ्रता का
शब्दों में न हो सके वर्णन।


- सविता सिंह मीरा


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ओस की बूंद

अरि ओ, ओस की बूंद
सुना है तुम अच्छे से तस्वीर बनाती हो
खूबसूरत चीजों को प्रतिबिंब में
छिटका कर और भी खूबसूरत बना जाती हो
आज मैं भी आ गई तुम्हारे पास
तुम बारिश से बनीं हो या कोहरे से
मुझे कुछ भी कोई भी मतलब नहीं इससे
बस तुम आज मेरा भी प्रतिबिंब साकार कर दो ना
थोड़ा सा छिटका कर इसे भी आकार कर दो ना
दृश्य जो उभर उभर आयें
उनमें एक अपनी चमक का रंग भी भर देना
अन्दर से बिखरी भी हूँ, निखरी भी हूँ,
कुछ कुछ टूटी भी हूँ, संवरी भी हूँ ;
जो भी अच्छा लगे, उसे निखार दे जाना
अरी ओ नन्ही सी, प्यारी-सी ओस की बूंद
सुना है तुम अच्छे से तस्वीर बनाती हो
इक मेरी भी तस्वीर बना देना
बस छिटके हुए रंगों में मेरा
अक्स बेशक ना हो बस उथल- पुथल सहित
मेरा स्वार्थहीन अंतर्मन दिखा जाना
निहित हो उसमें मेरी अभिव्यक्ति
वो रंग उसमें भर जाना
अरी ओ, ओस की बूंद
सुना है, तुम अच्छे से तस्वीर बनाती हो
इक मेरी भी तस्वीर बना देना।


- मीना कुमारी शर्मा


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अजीब-सा रिश्ता होता है गुस्से और प्यार का,
जहाँ शिकायतें भी दुआ बन जाया करती हैं।
उन्हें हम दिल की हर धड़कन सौंप देते हैं,
वही हमसे अक्सर नाराज़ हो जाया करते हैं।

उनका रूठना भी हमें तोड़ता नहीं,
बल्कि और ज़्यादा अपना बना जाता है।
परवाह वहीं होती है गहरी,
जहाँ गुस्से का रंग भी सच्चा नज़र आता है।

छोटी-छोटी बातों पर उनका यूँ खामोश हो जाना,
दिल के किसी कोने को चुपचाप छू जाता है।
हम जानते हैं, यह नाराज़गी नहीं,
बस प्यार जताने का एक तरीका बन जाता है।

जो अजनबी होते हैं, उन्हें फर्क नहीं पड़ता,
पर अपने ही सवाल उठा लिया करते हैं।
शायद जो दिल के सबसे क़रीब होते हैं,
वही हमसे सबसे ज़्यादा गुस्सा किया करते हैं।

नाराज़गी के इस प्यारे रंग को समझो,
यह रिश्तों का असली ढंग है।
गुस्सा भी प्यार का एक हिस्सा है,
जो दिल को और भी मजबूत बनाता है।

तो रूठो, गुस्सा करो, पर दूर मत जाओ,
क्योंकि प्यार में शिकायतें भी प्यार ही लगती हैं।
हर नाराज़गी में एक दुआ छुपी है,
जो दिल को और भी करीब लाती है।


- रेखा चंदेल


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बेकाबू जनसंख्या

आज हर इंसान को देखो लाइन का ही मारा है,
जहां भी देखो लाइन का ही ताना बाना सारा है।

बस रेल दुकानों में देखो भीड़ का ही पसारा है,
अस्पतालों में देखो लाइनों का अजब नज़ारा है।

एक अनार सौ बीमार सा लगता आलम सारा है,
अस्पताल में देखो रोगी सा हो गया जग सारा है।

खड़े रहने के अलावा दिखता नहीं कुछ चारा है,
बेदर्द लाइन में लगा हर शख्स यहां बेचारा है।

अस्पताल बड़े डाक्टर बड़े बड़ी बहुत सुविधाऐं हैं,
पर इस बेशर्म बीमारी से फिर नहीं छुटकारा है।

गरीब मरता क्या न करता मजबूरी में बेसहारा है,
बस लाइन में खड़ा हो करता इंतजार बेचारा है।

हर शख्स यहां बीमार और कर्ज का मारा है,
देख सभी को ये लगे,सुखों ने किया किनारा है।

सोचो जरा किसे दोष दें किसका दोष सारा है,
देखो बेकाबू जनसंख्या ने खेल बिगाड़ा सारा है।


- राज कुमार कौंडल


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जमाना छोड़ दिया

जिन हाथों में खंजर थे उन्हें गले लगाना छोड़ दिया,
तुम रहने दो उन बातों को मैने मिलना मिलाना छोड़ दिया।

बरसाती रातों में पहले डर लगता था हर एक आहट से ,
अब रखती हूं दरवाजा खुला खिड़की लगाना छोड़ दिया।

मैं अपना अपना कहती थी , वो मतलब मतलब चलते थे,
अब दुनियादारी समझी तो वो खेल पुराना छोड़ दिया।

जुगनू की तरह जलती ही रही कुछ ऐसा है किरदार मेरा,
अब औरों की खातिर मैंने खुद को जलाना छोड़ दिया।

मुस्कान फरेबी जिंदा है तुम ढूंढ रहे हो मेरा दुःख,
नादान हो तुम ये क्या जानो मैंने आंसू बहाना छोड़ दिया।

वो पल ना लौटकर आएंगे , मत ढूंढो खोई उम्मीदें,
ना पंछी लौटकर आएंगे उन्होंने आशियाना छोड़ दिया।

यूं थिरक रही थीं आशाएं , कोई तो समझेगा मन को,
सब अपनी गरज के दीवाने मैंने सारा जमाना छोड़ दिया।

तुम चाहते हो मैं फिर आऊं आकर दुनिया में मिल जाऊं,
तुम रहने दो उन बातों को मैंने मिलना मिलाना छोड़ दिया ।


- मंजू सागर


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गज़ल

(212 212 212 212)
क़ाफ़िया- आरा | रदीफ़- नये साल में

खुशनुमा है नज़ारा नये साल में।
प्यार से है पुकारा नये साल में।।

याद आते रहे हो हमें तुम सजन।
हो मिलन अब दुबारा नये साल में।।

पा लिया है तुम्हें हर जनम के लिए।
मिल गया ये इशारा नये साल में।

फूल बनकर महकती रही रात भर।
ख्वाब टूटा हमारा नये साल में।।

चाॅंद को देखकर आह भरते रहे।
मिल गया इक सितारा नये साल में।।

हम निभाते रहे प्रीत की रीत को।
कर दिया बेसहारा नये साल में।।


- रिंकी सिंह


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सहसा

शब्दों में कैद जिंदगी,
अपने पंखों को तिज़ोरी में
संभाल के रखतें हैं।
फिर एक दिन ऐसा आता है,
के जाने अनजाने खुद ही
पिंजरा बनाने लगते हैं;
अपने लिए और अपने के लिए।
अंत तक आकाश इंतजार में रहता है :
खुले दो पंख, कब फैलेंगे ?
ऊंचाइयों को चीर कर
उसकी सीमाओं को छूने।
आजादी की उम्मीद हर
एक कोणों में बसती है,
घर आकाश तिज़ोरी पिंजरा,
पंख और शब्दों में भी।
पर राह किसे पता है ?
केवल मन मस्तिष्क के मेल से,
जहां बौद्धिक विचारों का जन्म हो;
ठीक वहीं से शुरू होता हैं
आजादी की राह।
फिर सहसा एक तिज़ोरी खुलती है,
और वो एक पिंजरा खोलना चाहता है...
पर न खुलने की ज़िद ने ही
तोड़ दिया पिंजरे को।
आज आकाश को अपनी
पहली मंजिल मिली;
और इंतजार खत्म हुआ।


- सुतपा घोष


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भारत जातियों का
अजायबघर हैं।
यहां जाति है कि
जो कभी जाती नहीं...
मानुष कों मानुष नहीं दिखता
वो जाति पूछने
और जानने को आमादा है
यहां जाति के जलवे
बड़े निराले है।
ओछी राजनीति ने
समता भाईचारा को खा लिया।
करूणा, सहिष्णुता, समाजवाद
और धर्मनिरपेक्षता
कब फलीभूत हुआ है ?
सब अपनी जाति की
श्रेष्ठता में लगे हैं। भला!
मानवता की किसे परवाह है ?
कुछ विशेष नेता- राष्ट्रीय नेता
बाकी नेता समुदाय विशेष के नेता
कोई किसानों का नेता
कोई दलितों का नेता
कोई पिछड़ों के नेता
कोई महिला नेत्री
कोई शोषितों का नेता
कोई आदिवासियों का नेता
आदि और इत्यादि
समाज समुदाय के
नेता आखिर
कौन गढ़ रहा है ?
आज यह समझना होगा।
देश सबका है
सब देश के हैं
हम पहले और अंत में
भारतीय हैं।
यह भाव जगाना होगा,
हम सब की एक पहचान
मानव-मानव एक समान
राष्ट्र को सशक्त बनाना है।
जाति, धर्म, लिंग, वर्ण,
सम्प्रदाय आदि
संकीर्णता को त्यागना होगा।
सारे वाद-विवाद भुलाकर
केवल मानववाद को
गले लगाना होगा।


- जितेंद्र बोयल



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कई बार कलम उठाई सोचा कोई नया कलाम लिखूँ,
क्या जो बीत गया है उसका बयाँ-ए-इख़्तिताम लिखूँ,
या नए साल की फ़ेहरिस्त में खुशियों का नाम लिखूँ।

बार-बार कलम रूक जाती है, सोचकर मैं क्या लिखूँ,
रोज़मर्रा की भाग-दौड़ से हुई क्या वह थकान लिखूँ,
भूला दिया है जो मैंने, क्या ख़्वाबों का वो मकान लिखूँ।

महसूस नहीं हुए जज़्बात तो कैसे लफ़्ज जमाल लिखूँ,
बीत गया जो, उसके लिए आज कैसे मैं मलाल लिखूँ,
मिल जाए अगर जवाब तो शायद मैं कोई सवाल लिखूँ।

शेर या गज़ल लिखूँ, कोई नज़्म या कोई कहानी लिखूँ,
अपनो ने ही चलाए नश्तर, कैसे मैं अपनी ज़ुबानी लिखूँ,
सहरा आँखों में अब क्यूँ फिर मैं नमक का पानी लिखूँ।

गुज़र गया है जो साल शायद उसे ही मैं यादगार लिखूँ,
या नए साल की इब्तिदा कैसे हुई थी ख़ुशगवार लिखूँ,
लिखकर यह नज़्म शायद मैं ख़ुद को सुख़न-वर लिखूँ।


- डॉ. नाज़िया शेख़


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