साहित्य चक्र

06 November 2025

जातिवाद- एक अभिशाप




देश की एकता और अखंडता में जो,
सबसे बड़ा रोड़ा है वो है जातिवाद,
हर व्यक्ति अपनी जाति की श्रेष्ठता,
सिद्ध करने में व्यर्थ की बहस झगड़े,
और खून - खराबा करने पर तुला है,
कोई उनसे पूछे कि ईश्वर ने तो सिर्फ़,
दो ही जातियाँ बनाई हैं स्त्री व पुरुष,
फ़िर तुम कौन हुए प्रकृति के विरुद्ध,
असंख्य जाति की उत्पत्ति करने वाले,
हे मानव जिन्हें हम जातियाँ बोलते हैं,
दरअसल ये तो सैंकडों वर्ष पहले के,
वो पुश्तैनी कार्य हुआ करते थे,
जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते गये,
मसलन बाल काटने वाला नाई हुआ,
मिट्टी के बर्तन बनाने वाला कुम्हार,
जिसने जूते चप्पल बनाये वो चमार,
कपड़े सिलने वाला दर्ज़ी,
आभूषण बनाने वाला सुनार,
लोहे का काम करने वाला लौहार,
इसी सिद्धांत पर जातियाँ स्वतः बनी!
परन्तु आज कोई भी काम,
किसी विशेष जाति का नहीं रह गया,
जीवन यापन हेतु सभी स्वतंत्र हैं,
जिससे घर चले वही काम अच्छा,
जूतों के शोरूम वाला चमार नहीं,
बर्तन बेचने वाला कुम्हार नहीं,
ब्यूटी पार्लर चलाने वाली नाई नहीं,
शिक्षक अब शास्त्री या आचार्य नहीं,
ये दोगलापन भी भारत मे ही है,
क्योंकि यह देश जितना उच्च शिक्षा,
की तरफ़ अग्रसर हो रहा है,
उतना ही अंधविश्वास व दकियानूसी,
बातों की तरफ़ भी गतिमान है,
पहले के लोग ग्रामीण परिवेश के,
अशिक्षित व अंधविश्वासी होते थे,
लेकिन आज का शिक्षित समाज भी,
इन्हीं बेफ़िज़ूल की बातों में पड़कर,
आपस में बैर, नफ़रत और ईर्ष्या,
के बीज बोता जा रहा है,
क्या अपनी जाति में झगड़े नहीं होते,
अगर जाति ही सब कुछ होती तो,
क्यों भाई - भाई में, चाचा-भतीजे में,
लड़ाई होतीं हैं, वो तो एक कुल के हैं,
सिर्फ़ मैं ही श्रेष्ठ यह मात्र भ्रांति है,
लोग क्यों भूल जाते हैं कि,
महापुरुष तो हर जाति - धर्म में,
पैदा हुए हैं जिन्होंने देश के लिए,
अनेकों भलाई के कार्य किये हैं,
अपना सर्वत्र न्यौछावर किया है,
उनका वर्चस्व आज भी क़ायम है!
हमें ऐसे लोगों पर शर्म आती है जो,
जातिवाद की आड़ में देश में,
नफरत की आग फैलाते हैं,
और इसके विकास में बाधा बनते हैं,
उनकी तुच्छ मानसिकता आज भी,
समाज को खोखला कर रहीं है,
उन्हीं की वजह से ये राष्ट्र कभी भी,
उन्नति - प्रगति नहीं कर पाएगा,
पश्चिमी देश हमसे कई साल आगे हैं,
क्योंकि वे देश जाति धर्म में नहीं बंटे,
जिस तरह से अब भारत में भी,
शिक्षा का प्रसार हो रहा है तो,
आशा है आने वाले कुछ सालों बाद,
हमारे यहाँ से भी यह कुरीति समाप्त,
हो जाएगी, वैसे भी मानव की श्रेष्ठता,
उसकी जाति से नहीं बल्कि उसके,
विवेक, ज्ञान, कर्म, संस्कार, व्यवहार,
पर निर्भर है, उच्च कुल का मानव,
वही है जिसमें ये गुण विद्यमान है,
एकबार अहं की पट्टी खोलकर देखिए,
समस्त मानव जाति कितनी सुंदर है,
अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दीजिये,
देखना एक ना एक दिन यह बुराई,
अपने आप ही समाप्त हो जाएगी,
तब हम साँस लेंगे एक वास्तविक,
स्वतंत्र भारत की आबो हवा में,
अन्यथा हम सच्चे मनुष्य ही नहीं बने।


- आनन्द कुमार


*****

बिहार में होगा तेजस्वी उदय!


हमारे देश में हर साल किसी न किसी राज्य में चुनाव होते हैं। मगर जब भी यूपी और बिहार में विधानसभा चुनाव होते हैं तो पूरे देश में चर्चा होती है। क्योंकि ये दोनों राज्य जनसंख्या की दृष्टि से बहुत बड़े हैं। और राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि इन राज्यों के विधानसभा चुनाव देश की राजनीति तय करती है। 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में आरजेडी यानी राष्ट्रीय जनता दल सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर आई थी। 






इस चुनाव में तेजस्वी यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर नीतीश कुमार और अमित शाह को पानी पिला दिया था। एक तरफ युवा तेजस्वी तो दूसरी तरफ अपार अनुभव से भरे दिग्गज राजनेता थे। कहा जाता है कि बिहार विधानसभा चुनाव-2020 में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन के कारण तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए।

इस बार महागठबंधन और एनडीए में सीट बंटवारे से लेकर मुख्यमंत्री पद‌ को लेकर काफी खींचतान देखने को मिल रही है। महागठबंधन ने तेजस्वी यादव को अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित कर दिया है जबकि एनडीए ने अभी साफ नहीं किया है कि उनके मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही होंगे। हां एनडीए का कहना है कि नीतीश कुमार के चेहरे पर ही वह चुनावी मैदान में है। बाकी तो चुनाव परिणाम बताया कौन मुख्यमंत्री बनता है और राजनीति क्या मोड़ लेती है।

मुख्यमंत्री के सबसे लोकप्रिय चेहरे के तौर पर तेजस्वी यादव पिछले एक साल से लगभग हर सर्वे में शीर्ष स्थान पर दिखाई देते हैं। मगर सवाल है क्या तेजस्वी की लोकप्रियता राष्ट्रीय जनता दल को वोट दिला पाएगी ? या नीतीश का अनुभव तेजस्वी उदय को होने से पहले ही एक बार फिर रोक देगा‌ ? नीतीश पिछले 20 सालों से बिहार की राजनीति में अपना किला बनकर बैठे हैं। चाहे कोई पार्टी कितनी ही सीट जीत जाए, मगर बिना नीतीश चच्चा के सत्ता पाना पिछले 20 सालों से असंभव हुआ है। 

अभिमन्यु की तरह तेजस्वी रोजगार, पलायन और विकास के मुद्दों के साथ अपने रथ को विजयी की ओर लेकर तो जा रहे है। मगर राजनीतिक युद्ध के महारथी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और गृहमंत्री अमित शाह के साथ पूरी एनडीए तेजस्वी का राजनीतिक वध करने में लगे हुए हैं। ऐसे में देखना होगा क्या तेजस्वी अभिमन्यु की तरह मारे जाएंगे या फिर एनडीए के चक्रव्यूह को भेद कर अपनी राजनीतिक कौशल का परिचय देंगे।


                                                 - दीपक कोहली

आज की प्रमुख रचनाएँ- 06 नवंबर 2025




तेरे आने की खुशी में
मैं अपने सारे गम भूला बैठा,
व्यथित था मन मेरा, दुःख के भार से,
बोझ उसका सारा, मन से उतार बैठा
हल्का हुआ मन मेरा
खुशी से झूम उठा,
तेरे आने की खुशी में
मैं अपने सारे गम भूला बैठा...
मिले थे जो गहरे ज़ख्म
मुझे तेरी महफ़िल में,
घाव भरे नहीं
कमबख्त, नासूर बनते गए
मवाद उनका धीरे धीरे रिसता रहा,
हल्क सूख गया मेरा ,सोचते सोचते,
कतरा कतरा उनका मैं, बहा बैठा
तेरे आने की खुशी में
मैं अपने सारे गम भूला बैठा...
साथ देने का जो वादा
किया करते थे हमसे,
लच्छेदार बातें, जो हाँकते थे हमसे,
लाचार बन कर वो, दूर से देखते हैं तमाशा,
दिल पे मेरे क्या गुजरी होगी
वह समझ न पाए,
मगर अफसोस!
मैं गम में भी उजाला ढूंढ बैठा,
शहर नमक का था
और मैं ज़ख्म खोल बैठा
तेरे आने की खुशी में
मैं अपने सारे गम भूला बैठा...

- बाबू राम धीमान


*****


सोए शेर को जगाना होगा
रूठी जनता को मनाना होगा

भले समाज आपस में बंटा है
एकता का गीत सुनाना होगा

सभी को चरण बंदन नमन कर
स्नेह का अलख जगाना होगा

नफरत के जंजीर तोड़ कर
देश प्रेम का पाठ पढ़ाना होगा

कुछ अंगुलीमाल भटक गए है
बुद्ध के मार्ग पर लाना होगा

रोजगार,शिक्षा,स्वास्थ्य से
उन्नत भारत बनाना होगा

जाति धर्म से ऊपर उठ के
सबको गले लगाना होगा

धरती माँ के रक्षा के लिए
अपना शीश चढ़ाना होगा

चाइना हो या अमेरिका हो डर
ऑपरेशन सिंदूर का दिखाना होगा

भारत बुद्ध और युद्ध की धरती है
जो जैसे मानेगा वैसे मनाना होगा

जब आन बान शान पर आंच आएगा
“सदानंद” ताकत अपना दिखाना होगा


- सदानंद गाजीपुरी


*****


तुझको कौन गिरा पाएगा ?

तूफानों से लड़कर आया है,
आग में खुद को तपाया है,
डर को जिसने खाक किया,
वह तू ही तो कहलाया है।

हर चोट को जिसने समझा,
एक नया सबक जीवन का,
अंधेरे को चीरकर जो,
लाया उजाला मन का।
तुझको कौन गिरा पाएगा?
तेरी रगों में साहस है,
तेरी साँसों में विश्वास है,
हर चुनौती को स्वीकारने का,
तुझमें सच्चा एहसास है।

पर्वत को भी झुका दे जो,
वह ज़िद तेरे इरादों में,
रुकना तूने सीखा नहीं,
चाहे राहों में हों बाधाएँ।
तुझको कौन गिरा पाएगा?

गिरेगा भी तो क्या होगा,
उठना तुझे आता है,
मिट्टी छूकर भी सोना हो,
यह हुनर तूने पाया है।
दुनिया लाख बिछाए कांटे,
तू फूलों सा मुस्कुराएगा,
सूर्य बनकर तू चमकेगा,
ये ज़माना देख पाएगा।
तुझको कौन गिरा पाएगा?

जब तक ध्येय न मिल जाए,
तब तक विश्राम कैसा?
जब खुद पर हो इतना यकीं,
फिर परिणाम कैसा?
तू खुद अपनी मशाल है,
तू खुद अपनी कहानी,
तुझसे ही शुरू है तेरा सफर,
ओ! कर्मठ प्राणी।
तुझको कौन गिरा पाएगा?
जिसके मन में हो लगन,
और दिल में हो हिम्मत,
ईश्वर भी साथ देता है,
जो रखता है नेक नीयत।
लड़, बढ़, चल, फिर जीत तेरी,
यह अटल सत्य है जान,
तू ही तेरा भाग्य-विधाता,
तू ही तेरा भगवान।
तुझको कौन गिरा पाएगा ?


- कैप्टन जय अनजान


*****


दो दो हाथ करेंगे

बहुत सहा है,
अब नहीं सहेंगे।
अपनी नियति से
दो-दो हाथ करेंगे।

भरोसा किया था बहुत,
इत्मीनान था,

मालूम नहीं था,
ठंडी हवाओं
के बाद,
कातिल तूफान था।

किया इंतजार, कि गुजर जाए,
ये काली रात,
अब थामी है मशाल, खुद
सुखद नया प्रभात
हम करेंगे।

तोड़ेंगे या टूट बिखरेंगे,
लेकिन, नियति अब,
दो दो हाथ करेंगे।

भोला था,अब तक नादान,
किया परेशान,
लिया हर पल इम्तेहान।

मौके दिए हमने बहुत,
संभालने को,
अब लहरों की,
लगाम हम थामेंगे।

ना करेंगे,समझौता
ना बात करेंगे।
अबकी बार दो दो हाथ करेंगे।

परवाह नहीं जिन्दगी अब,
डर नहीं कुछ,
हारेंगे खुद,या तुझको,
शीशे में उतारेंगे।

अब हर्जाना नहीं भरेंगे ,
ऐ नियति,
तुझसे अब,
दो दो हाथ करेंगे।


- रोशन कुमार झा


*****



काफी है बस उससे बात हो जाए कभी लघु।
ताल्लुक मोहब्बत का देह से नहीं होता रघु।।

जो सांवला है रंग उसका मुझको खूब भाता है।
बाते ओ यादे आके याद मुझको खूब सताता है।।

डूब जाऊं उसकी झील सी आंखों में कहीं मैं।
किससे कहूं कि आज कल याद मे ही हुँ मै।।

सोशल मीडिया पर दिख जाता है तस्वीर कही।
जूम कर चूम लेता हूं माथे को मै फिर कही।।

रह सलामत खैर खुदा से मनाता ही रहता हूं।
याद की होती है तड़प तब मै कॉल करता हूं।।

बन जाता है दिन उससे जब बात होती है।
मशवरा तबीयत का बस अल्फाज होती है।।

रखे ख़ुश परवरदिगार तुझे तू जहां रहे कहीं।
बस याद कर ले कभी की तेरा यार भी है कहीं।।

जब तक रहेगी जान तुझसे दोस्ती भी रहेगी।
राह-ए-जिंदगी में मिल गई तो दिन याद रहेगी।।

दे हाथों में हाथ मुस्कान के साथ दो रूह मिलेगी।
ये मुलाकात ही तो जिंदगी भर सदा याद रहेगी।।


- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु'


*****


जाड़ा

हो गया जाड़े का अब तो आगाज़,
सहारा बने उनी वस्त्र, अंगीठी और अलाव,
पेड़ों से पत्ते झड़-झड़ उतर रहा सबाब,
अपनी धरा पर गाते विदेशी परिंदे आकर राग।

हर प्राणी भंडार अपना भर रहा,
आने वाले कोहरे, धुंध और बर्फ से डर रहा,
प्रबंध बिल घोंसले या छत्त का कर रहा,
जीवित रहे इसलिए हर प्रयत्न कर रहा।

गेंहूँ और तिलहन खेतों में है बोये जाते,
जीवन यूँ ही चलेगा उम्मीद है बंधाते,
वृद, कमजोर खुद को है असहाय पाते,
ठंडे झोंकों से ठिठुर-ठिठुर है कंपकंपाते।

सिरहन से शुष्क हो जाती है धरा,
सिखाती है हमें दुःख-सुख से जीवन है भरा,
देती है सन्देश हमें कुछ इस तरह,
रहता नहीं एक सा, परिवर्तनों से जीवन है भरा।


- धरम चंद धीमान


*****


कोई तो हमारा होगा

आँखों - आँखों में जब इशारा होगा,
तब बड़ा ही हसीन नज़ारा होगा।

उफ़्फ़ ये चंचल शोख़ अदाएँ तुम्हारी,
इन पर कोई तो दिल हारा होगा।

चाँदनी भी हर तरफ़ फ़ैल गई होगी,
जब उसने ख़ुद को सँवारा होगा।

हैरान हूँ आज तक यही सोचकर मैं,
चाँद किसने ज़मीं पर उतारा होगा।

ख्वाहिशमंद है ज़िंदगी इसी आस में,
कि वो हसीं शख़्स कब हमारा होगा।

बनकर हमसफ़र हाथ थाम लो मेरा,
मेरे जीने का यही तो सहारा होगा।


- आनन्द कुमार


*****


कभी तो

फैल रहा है चहुं ओर ये जो भ्रष्टाचार,
अपना रहे अनैतिकता भूल शिष्टाचार,
सीमित हुई सोच, मतलबी व्यवहार,
लुप्त हो रहे सब आदर्श और संस्कार।

हर जगह बेईमानी, हर रोज नया घोटाला,
धनी उड़ाता मौज, निर्धन न पाए निवाला,
गोलियों की बौछार, है बम का बोलबाला,
अपराधी खुला, बेकसूर पर लगता ताला।

आएगा कोई तूफ़ान, चलेगी फिर कोई आंधी,
रक्षक आमजन का बन आएगा फिर से गाँधी,
हारेगा अन्याय, न्याय की होगी फिर से चांदी,
मर्यादा की लक्ष्मण रेखा जायेगी न फिर लांघी।

मची है ये जो मारकाट, हर ओर चीख-पुकार,
मिलेगा रास्ता जरूर, हो जाएगा जंगल ये पार,
कभी तो खुलेंगे ये सत्य, अहिंसा के चेतना द्वार,
कभी तो पाएगा देश भ्रष्टाचारी भवसागर से पार।


- लता कुमारी धीमान


*****


अपराजित

मुझे दीवाना न समझना
मुझे इश्क का
परवाना न समझना ,
मैं रहता हूं
अक्सर ह्रदय में तुम्हारे
मुझे आवारगी का
किनारा न समझना।

मुझे बेगाना मत समझना
मुझे अपना भी
मत समझना
मैं रहता हूं
अक्सर ख़ुदा की आवारगी में
मुझे यूँ ही
बेचारा मत समझना।

मुझे हारा हुआ मत समझना
मुझे पराजय का
सितारा मत समझना
मैं रहता हूं
अक्सर बड़ी जीत की तलाश में
मुझे यूँ दुनिया से हारा
मानव न समझना।


- डॉ. राजीव डोगरा


*****


फिर से वही शाम
जब सूर्य छिप रहा था
हल्की-हल्की हवाओं से
जब आसमान रात का पैगाम दे रहा था

सुबह के निकले हुए पंछी
जब शाम को घर लौट रहे थे
दिन भर का दाना जोड़कर
जब मधुर आवाज में गीत गा रहे थे

वहीं शाम के मंजर में
जब सड़कें शांत हो रही थी
दोपहर तक हुए कोलाहल में
जब गाडियां धींमी पड़ रही थी


- इशिका चौधरी


*****


तराशे कोई उन पत्थरों को जो पत्थर बने बैठे हैं,
कोई लाए रगों में लहू कि सब खंजर बने बैठे हैं ।

जहाँ ज़िंदगी की खाल में रहने लगे लाशें सभी,
कोई लाए रूह का नया कफन कि सब पिंजर बने बैठे हैं।

शौकिन हैं, संगीन भी,लाखों हैं सहमी कहानियाँ,
कोई लाए ज़मी सा रूखापन कि सब भादर बने बैठे हैं।

करते हैं सजदे बेवजह, भटके हुए राही सभी,
कोई लाए ख़ुदा का अता पता कि सब हैदर बने बैठे हैं।

चढ़ने लगे जेहन में जब ख़ुमार खुद को खोने का,
कोई लाए इशक का ज़हर कि सब दिलबर बने बैठे हैं।


- स्वाति जोशी


*****


काल चक्र अभी खूंटे से बंधी बकरी, कल तक खूंटी से लटक जाएगी। यही है काल चक्र, आज इसकी है तो कल उसकी बारी आएगी। ये माने कसाई और वो बताए खुद को मुक्तिदाता, बदल जाएगा दृष्टिकोण जो थोड़ी सी भी स्थिति बदल जाएगी। ये मौत तक बेफिक्र,नासमझ घास के पीछे भाग रही वो रोता रहेगा उम्र भर, जो थोड़ी सी भी समझ आएगी। इसका कोई नहीं, इस बदलती दुनियां में हमराज । उसे थोड़ा सा कुछ हुआ तो एक पूरी दुनिया उजड़ जाएगी। इसने सिखा है बस मिमियाना,सुख दुःख कहां है जाना। उसे आज खुशी मिल रही है, कल कौन जाने कितनी उदासी आएगी। ऐसे ही आते रहेंगे प्रश्न, होते रहेंगे विचार। ये दुनिया है अशोक, ये यूं ही चलती आई है और यूं ही चलती जाएगी।
- अशोक कुमार शर्मा


*****


बेटियां आखिर बेटियां होती 

बेटियां आखिर बेटियां होती
उन्हें भी तो मां बाप से मिलने की आस होती। 
जिस घर में पली बढ़ी और  जवान होती
शादी के बाद  उस घर की राहें तकती रहती ।
घर के काम काज से फुर्सत नहीं मिलती 
जब भी देखो व्यस्त ही नजर आती। 
कभी संतान की सेवा करती
तो कभी सास ससुर की सेवा में हाजरी भरती।
चूल्हा चौका भी संभालती 
कौन क्या खाएगा भली भांति है जानती।
पशुओं को चारा भी काटती
खेती बाड़ी को भी संभालती।
नौकरी पेशा में सफल होती
कभी डाक्टर तो कभी पायलट
बन आसमान में उड़ती।
मां बाप का कलेजा बड़ा करती
उनके संस्कारों को संतान में भरती।
मां बाप से मिलने की चाह तो करती
पर जिम्मेवारियां अब पीछा कहां छोड़ती।
मन ही मन यह जरुर सोचती
बेटियां और कुछ नहीं
सिर्फ कर्तव्यों का बोझा है ढोती।


- विनोद वर्मा


*****


03 November 2025

महिलाओं के लिए स्वर्णिम युग है 'लोकतंत्र'



इतिहास के पन्ने पलटने से पता चलता है कि लोकतंत्र आने से पहले लगभग हर देश में महिलाओं की स्थिति बेहद चिंताजनक और गंभीर रही है। यही स्थिति भारतीय समाज में भी रही है। भले ही हम महिलाओं को देवी कहते हैं,‌ मगर आज भी हमारे समाज में महिलाओं के साथ शोषण, अत्याचार और घरेलू हिंसा ये देखने को मिलती है।





भारतीय समाज में तो आजादी से पहले महिलाओं के पास ना शिक्षा के अधिकार थे, ना अपने पसंद की शादी करने का अधिकार था और ना ही अपने अनुसार जीवन जीने का अधिकार था। हमारे समाज में महिला को पति की दासी, पतिव्रता, घर की लक्ष्मी आदि नाम से गुलामी की बेड़िया पहनाई जाती है। और आज भी गांवों में कम उम्र की लड़कियों का अपने से दुगुने उम्र के मर्द के साथ विवाह कर दिया जाता है।

इतना ही नहीं बल्कि पढ़-लिखकर नौकरी करने के बाद भी शादी के लिए लड़की के पिता को दहेज देना पड़ता है। और तो और दहेज और घरेलू हिंसा के कारण कई लड़कियों को आत्महत्या तक करने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। समाज की इस सच्चाई को लोग अपने बुरे कर्मों की तरह चुपके से छुपा लेते हैं।





बीती रात यानी 2 नवंबर 2025 को भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने महिला वनडे क्रिकेट वर्ल्ड कप- 2025 का खिताब जीता है। हमारी इन बेटियों ने बता दिया है कि मौका मिलने पर वो सब कुछ कर सकती है, जो मर्द समाज कर सकता है। सोचिए! अगर हमारे देश में लोकतंत्र नहीं होता तो क्या हमारी लड़कियां क्रिकेट खेल पाती ? मेरा मानना है- बिल्कुल भी नहीं। लोकतंत्र महिलाओं के लिए स्वर्णिम युग है।

कोई माने या ना माने इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, मगर यह सत्य है कि लोकतंत्र ने महिलाओं, गरीबों, पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों को बराबरी के अधिकार दिए हैं। भले ही हम भारतीय अपनी संस्कृति, सभ्यता और परंपरा को कितना ही महान क्यों ना बताएं, मगर हमारे समाज में समानता और बराबरी की कमी सदियों से रही है और आज भी दिखाई देती है।





हमारी लड़कियों का क्रिकेट में विश्व कप जीतना उन सभी सामंतवादियों और पितृसत्तात्मक विचारधाराओं से ग्रस्त लोगों के मुंह पर कढ़ा तमाचा है। समाज के जो लोग हमेशा यह कहते फिरते हैं कि लड़कियां यह नहीं कर सकती, लड़कियों को ऐसे कपड़े नहीं पहनने चाहिए और लड़कियों को नौकरी नहीं करनी चाहिए उन सभी मूर्ख लोगों को हमारी बेटियों द्वारा जीते इस क्रिकेट विश्व कप की वीडियो देखनी चाहिए।

हमारी बेटियों द्वारा जीते गए इस क्रिकेट विश्व कप ने हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए उम्मीदों और सपनों का सागर खोल दिया है। अगर आप एक सच्चे स्वतंत्र भारतीय हैं तो आपको अवश्य ही आज लोकतंत्र के प्रति संवेदना‌ और शुक्राना अदा करना चाहिए।


- दीपक कोहली


02 November 2025

रचनाकार राजकुमार कुम्भज जी की चार कविताएँ





पहली- कविता

फिर जीत है निश्चित
उड़ानें हों,हौसले हों
तो बदल ही जाती है आकाश की रॅंगत भी
वे तीर जो तेज़ रफ़्तार, तेज़ धार लिए
आते हैं,आते हैं इधर विरुद्ध ही अभी
हो भी सकते हैं समर्थन में चारण
हो सकते हैं कारण कई-कई
हों अगर उड़ानें, हों अगर हौसले
तो माॅंजता है रास्ता भी सब
फिर जीत है निश्चित।


*****


दूसरी- कविता

कुछ-कुछ परिचित भी.
वे जो मारते हैं चोंच
नवजात शिशुओं तक को
नोंच लेते हैं अपनी हवस में
ज़रा भी छोड़ते नहीं हैं शिक़ायतें
मुस्कुराने नहीं देते हैं ज़रा भी नहीं
जाते हैं,जाते हैं अट्टहास में
बिछाते हैं बिस्तर और सो जाते हैं
हो सकता है कि हो सकते हों वे
कुछ-कुछ परिचित भी।


*****


तीसरी- कविता

बारूद की लिपि को.
हथियार हैं हाथ ही
चाहे फिर छोटे हों या लंबे ही क्यों नहीं
शर्त है यही कि वज़ह सहित
आना चाहिए काम कार्रवाई में
क़ामयाब वे जो सिखाते हैं
सबक़-ए- क़ामयाबी सभी-सभी को
किन्तु लड़ते नहीं हैं,
लड़ाते हैं युद्ध दूसरों-तीसरों को
बिछाकर ताश के पत्ते-पत्ते पर बारूद
उसी गुप्त और रहस्यमयी बारूद की लिपि
लुप्त करते हैं बच्चे।


*****


चौथी- कविता

उम्मीद के लिए
थोड़ा-सा नमक,थोड़ा-सा उजास
ज़रूरी है जीवनभर की उम्मीद के लिए
एक गाॅंठ है कि जिसे मैं खोलता रहता हूॅं
संपूर्णता से संपूर्ण जीवनभर के सूने में
एक गुलदस्ता, एक व्यवस्था है आततायी
और वह उसकी मनमोहक मुस्कान
जिसमें बिच्छू ही बिच्छू।

- राजकुमार कुम्भज


*****