अनुराग चंद्रिका
विरह-विपिन में भी सदा, रखती मधुर प्रकाश।
टूटे मन के द्वार पर, लिखती नव विश्वास॥
नयनों की निस्तब्धता, पढ़ ले पल में आह।
बिन बोले ही बाँट दे, स्नेहिल मन की चाह॥
ज्यों चंदन की गंध हो, ज्यों सरिता का नीर।
वैसी ही अनुरागिनी, हर ले मन की पीर॥
ममता के आकाश में, प्रेम-पंख ले खोल।
अनुरागों की चंद्रिका, भर दे मधुमय बोल॥
द्वेष-धुआँ जब घेर ले, जग का कोना-कोन।
प्रेम-दीप बन जल उठे, इसका उज्ज्वल मौन॥
रिश्तों की इस भीड़ में, जहाँ स्वार्थ का शोर।
अनुरागी चंद्रा कहे, प्रेम रहे सिरमौर॥
जीवन की संध्या तले, जब थक जाए प्राण।
चंद्रिका बन साथ दे, बनकर मधुर विधान॥
प्रेम न केवल प्राप्ति है, प्रेम स्वयं उपहार।
जिसने इसको जान लिया, उसका बेड़ा पार॥
- शशि धर कुमार
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आँखें हो रही शर्मसार
आधुनिकता की कैसी बह रही बयार।
उड़ गई मर्यादा की यहाँ पे संसार॥
आधुनिकता की दौड़ में हारा संस्कार।
शर्म से झुक गई आँखें, हो रहीशर्मसार॥
फैशन ने खोल दी है नई नई बाजार।
अर्धनग्न परिधान की छाई है बहार॥
गर्व में चूर है बिकनी की वो दरबार।
शर्म से झुक गई आँखें, हो रही शर्मसार॥
दौलत की नशे में चूर है जिनका परिवार।
पश्चिमी सभ्यता की कर रहे वो प्रचार॥
भारतीय सभ्यता हुई समाज में तार तार।
शर्म से झुक गई आँखें , हो रही शर्मसार॥
भूल गया अपना वजूद अपना व्यवहार।
नकल में पागल है जग के युवा बेरोजगार॥
भारतीय चलचित्र भी है आज गुनहगार।
शर्म से झुक गई आँखें, हो रही शर्मसार॥
गलत परिवेश की खुल गई आज द्वार।
ओछी संस्करण की चल गई व्यापार॥
किस को दोष दूँ मैं ओ परवरदिगार ।
शर्म से झुक गई आँखें, हो रही शर्मसार॥
- उदय किशोर साह
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कुछ पूछिए मत…
कहा आपने,
"पूछिए नहीं,
बस मेसेंजर में अपनी कविता भेज दीजिए…"
तो लीजिए,
प्रश्नों का बोझ नहीं लाया हूँ,
बस मन की कुछ धड़कनें
शब्दों में सजा लाया हूँ।
अगर पसंद आए,
तो मुस्कुराकर पढ़ लीजिए,
न आए पसंद,
तो हवा के संग उड़ जाने दीजिए।
कविताएँ ज़बरदस्ती
दिलों में नहीं उतरतीं,
वे तो चुपके से
आत्मा के द्वार खटखटाती हैं।
मैं तो केवल
भावों का एक यात्री हूँ,
शब्द मेरी पोटली हैं,
और प्रेम मेरी पूँजी।
यदि मेरी पंक्तियों में
आपको अपना ही कोई एहसास मिल जाए,
तो समझूँगा,
मेरी कविता ने
अपना घर पा लिया।
क्योंकि…
कविता पढ़ी नहीं जाती,
महसूस की जाती है;
और जिसे महसूस कर लिया जाए,
वह शब्द नहीं,
एक मौन संवाद बन जाती है।
- नरेंद्र मंघनानी
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पापा को आराम चाहिए
सुबह तड़के से उठ जाते हैं,
नाश्ता भी नहीं खाते हैं,
दिन भर लैपटॉप पर खट खट करते-करते,
रात को थकान से टूट जाते हैं।
रविवार के दिन भी काम निपटाने में बच्चों के साथ नहीं खेलते हैं,
रात दिन सुबह शाम बॉस के नखरे झेलते हैं,
नींद न पूरी होती तो,
कुर्सी पर बैठे-बैठे झपकियां लेते हैं।
रोजमर्रा की कशमकश से दूर जाने का,
परिवार के संग बैठकर खाने का,
मन तो बहुत करता होगा उनका,
शारीरिक और मानसिक सुख पाने का।
माना, कि काम करने से पैसे आते हैं,
अगर पैसे कमाने में पापा अंदर से टूट जाते हैं,
तो लात मारो ऐसे पैसे को,
जिसके लिए पापा हमसे दूर जाते हैं।
पापा को थोड़ा आराम चाहिए,
दिन भर की भाग दौड़ से विश्राम चाहिए,
जीवन भर दौड़ते हैं वो,
उन्हें थोड़ा सा विराम चाहिए।
- प्रणव राज
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हत्था किस्मत
नवें नवें बने प्रधाना मेम्बरां जो बधाई,
तिने जे लोकां रे अणमूल्ले वोटा री दात पाई।
हूण सारे जितने वाले इसा गल्ला रा रख़्यो ध्यान,
बेकार ना जाए किसी रा मतदान भाई।
हूण मलेखा नी करना,सब्बी रा करना मान,
किन्ने वोट दित्त्या मिजों किन्ने नी वोट पाई।
हूण सारे इलाके री डोर इ तुसांरे हत्थ,
से जे किते रे वादे तीनां जो रखयों चेते भाई।
एडा नी बोलना की पंचायता च पैसा ई निया,
ऐ पुराने सड़ी रे बहाने नी लाणे मेरे भाई।
जियां जे कित्या था प्रचार जोरा शोरा कने,
तेड़े जोरा शोरा कन्ने कम्मा रा रखना चेता भाई।
ऐ इलेक्शन पंजा पंजा सालां री बारी नी,
लोकें तुसा रे हत्था अपनी किस्मत दिती थमाई।
- राज कुमार कौंडल
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अब आम ख़ुद ही गिरते हैं...
होता था कभी ऐसा भी सवेरा,
हर सुबह उसके साये में बच्चों का डेरा,
पत्थर-डंडियों की सड़सड़ाहट पे,
हर डाल झूमते देख ये नज़ारा।
अब वो कलरव को हर डाल तरसते हैं...
अब आम ख़ुद ही गिरते हैं...
गिलहरी-चिड़ियों का साथ तो आज़ भी है,
पर मोटी डाल में लगा झूला कहां गया ?
तरक्की की होड़ ने उजाड़ा आंगन,
उसकी छांव का वो मेला कहां गया ?
गर्मियों के दोपहर अब अकेलेपन पे हंसते हैं...
अब आम ख़ुद ही गिरते हैं...
नीड़ों पर झूलते नौनिहाल अब,
फुर्सत नहीं कब धमा-चौकड़ी करें।
मोबाइलों से फुर्सत मिले तब तो,
आम की थोड़ी-सी फिकर करें।
बोझिल फलों की टहनियां,
अब नाउम्मीद रहते हैं...
अब आम ख़ुद ही गिरते हैं...
- कुणाल
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विसंगति
कोई
लूट कर
भी नहीं अघाता,
किसी
की सारी
पूँजी जा रही।
बड़े
शौक से सजाया
था आलीशान आशियाना,
पर
जिंदगी बनकर
रिफ्यूजी जा रही।
माना
विरोधाभाषों में
तालमेल से जिंदगी
आगे बढ़ने का रास्ता देती है,
पर
किसी की ठोकरों में
समंदर खुद पनाह माँगता है,
मगर
कहीं कहीं प्यास की खातिर
एक एक बूँद पूजी जा रही।
- राधेश विकास
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संशय से भरी, प्रेम निवेदन
कोई थी.. लेकिन अभी नहीं है,
पास है, लेकिन दूर कहीं है,
कभी गलत थी, लेकिन अब सही है
महसूस होता है, यहीं कहीं है ।
मन है मिलने का, लेकिन भय है
कुछ तो अभी भी संशय है
पता नहीं कैसा महसूस होगा
दिल मे यही बात का मची प्रलय है।
लेकिन मिलना तो अब होगा ही
जो भी सोचने का है, वो सोचेगा ही
अब भय रखकर मन मे, दूरी कैसा ?
जीवन उसके बिना भी चलेगा ही।
बस यही सोचकर आ जाना है,
सारे गिले शिकवे भूला देना है,
ये नश्वर तन का भरोसा नहीं है,
कभी भी त्यागना, आ सकता है।
कह देंगे सुनो मेरी अर्जी,
पहले जैसा बनो या बना लो दूरी,
मेरे तरफ से मिट गये सारे शिकायत
अब रखो चाहे ना रखो, जो मर्जी।
- चुन्नू साहा
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आधा अधूरा
अनपढ़ मन से,
जब कभी पहचानने लगूंगी
अक्षरों की आकृति,
समझने लगूंगी शब्दों की मूक भाषा,
जब होने लगेगा मात्राओं का ज्ञान,
पढ़ना सीख जाऊंगी शब्दों के भाव
जब मुझमें आ जाएंगीं
संवेदना और भावनाएं,
हृदय करेगा प्रकृति से संवाद,
तब मैं एक पुस्तक लिखूंगी...
पुस्तक में लिखूंगी जीवन का सार,
जन्म से मरण तक का क्रम,
मोह से त्याग का अनुबंध,
प्रेम और वियोग
वियोग और मृग मरीचिका
धड़कन और हृदय का द्वंद्व
वह बहुत सी बातें जिन्हें कोई
समझ ही नहीं पाया।
कोई समझ भी गया तो
शायद लिख नहीं पाया
लिखूंगी वह बहुत कुछ
जो हमेशा आधा अधूरा रहा।
जो अधूरा रहकर,
कलम के लिए
अनगिनत सवाल छोड़ गया।
- मंजू सागर
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आस
एक आस में जी ली जिंदगी,
सोचा जीवन मिला है अच्छी काटेगी,
पर बचपन गुजरा बेहतर से बेहतर,
उसके बाद पिसी और घिसी है जिंदगी,
किसी तरह जी है जिंदगी बस एक आस में,
बस अधूरी आस में गुजार दी एक लंबी उम्र,
सोचा कुछ ठहराव आएगा एक आस में,
बिखरी कई बार आस मेरी रुकी है ये साँस मेरी,
पर अपनी एक आस में गुज़ार दी लम्बी जिंदगी,
बहुत कुछ खोया एक आस में बहुत कुछ पाया एक आस में,
पर रही आधी-अधूरी ज़िंदगी अनगिनत आस लिए,
शायद किस्मत में आस की आशाएँ लिखी थी,
बहुत इंतज़ार की आस में सारी आशाएं लिखीं थी किस्मत में,
कई खुशियां एक साथ मिल गई
लगा सारे जन्मों को जी लिया
हर आस में...!
- सुमन डोभाल काला
*****
बदलते समय की आस
एक ही घर की छाँव तले,
बैठे हैं अपने पास-पास,
दो ने थामी ज्ञान की पुस्तक,
दो को भाया स्क्रीन का प्रकाश।
पुस्तक के पन्नों में डूबे,
कुछ मन खोजें नया विचार,
मोबाइल की जगमग दुनिया में,
कुछ खो बैठे अपना संसार।
एक ओर शब्दों का सागर है,
एक ओर क्षणिक आकर्षण जाल,
एक देता चिंतन की गहराई,
एक रखता मन को बेहाल।
ज्ञान वहीं है जहाँ मन ठहरे,
जहाँ विचारों का हो विस्तार,
माध्यम चाहे कोई भी हो,
उद्देश्य बने जीवन का सार।
भूले रिश्तों की यह व्यथा
कहीं पुस्तक, कहीं मोबाइल का संसार,
पर सबसे बढ़कर प्रेम और संवाद,
यही है जीवन का सच्चा आधार।
- डॉ सारिका ठाकुर 'जागृति'
*****
फूल
फूल ने मुस्कुराते हुए कहा,
मैं काँटों के साथ रहता हूँ,
मेरा जीवन बहुत कठिन है,
फिर भी खुशबू बिखेरता हूँ।
तब मैंने हँसकर कहा,
तुम्हारी तरह मेरा भी जीवन है,
अभी मैं एक छोटा-सा बच्चा हूँ,
धीरे-धीरे बड़ा हो जाऊँगा।
अपनी खुशबू से सारा जहाँ महकाऊँगा,
सबके जीवन में प्रेम जगाऊँगा,
फिर जीवन के आखिरी दिनों में,
भगवान के चरणों में रहूँगा।
और अंत में एक दिन,
तुम्हारी ही तरह मिट्टी में मिल जाऊँगा,
पर अपनी खुशबू से लोगों के दिलों में,
सदा के लिए बस जाऊँगा।
फूल ने मुस्कुराते हुए कहा,
मैं काँटों के साथ रहता हूँ,
मेरा जीवन बहुत कठिन है,
फिर भी खुशबू बिखेरता हूँ।
तब मैंने हँसकर कहा,
तुम्हारी तरह मेरा भी जीवन है,
अभी मैं एक छोटा-सा बच्चा हूँ,
धीरे-धीरे बड़ा हो जाऊँगा।
अपनी खुशबू से सारा जहाँ महकाऊँगा,
सबके जीवन में प्रेम जगाऊँगा,
फिर जीवन के आखिरी दिनों में,
भगवान के चरणों में रहूँगा।
और अंत में एक दिन,
तुम्हारी ही तरह मिट्टी में मिल जाऊँगा,
पर अपनी खुशबू से लोगों के दिलों में,
सदा के लिए बस जाऊँगा।
- गरिमा लखनवी
*****
ओलम
जी रहा हूँ जीवन
बड़ी ही शिद्दत से
क्या मेरी पीड़ा का
कारण बन तुम
मुझे शून्य करोगे ?
हारा तो कभी
था ही नहीं मैं
पर क्या छेड़
मेरे जज्बातों की तरंगों को
मुझे तुम अधूरा करोगे?
मानता हूं तुम्हें
भेजा है उस खुदा ने
स्वयं मेरे पास
क्या छेड़ प्रेम का राग
मुझे हीरा करोगे ?
जी रहा हूँ जीवन
बड़ी ही शिद्दत से
क्या मेरी पीड़ा का
कारण बन तुम
मुझे शून्य करोगे ?
हारा तो कभी
था ही नहीं मैं
पर क्या छेड़
मेरे जज्बातों की तरंगों को
मुझे तुम अधूरा करोगे?
मानता हूं तुम्हें
भेजा है उस खुदा ने
स्वयं मेरे पास
क्या छेड़ प्रेम का राग
मुझे हीरा करोगे ?
- डॉ. राजीव डोगरा
*****
दूर हो बहुत घर की याद तो आती होगी
बाहर ही मिलता है सब कुछ
यह नासमझी की हैं बातें
अमेरिका और कनाडा की रातों से
हैं सुंदर मेरे भारत की रातें
क्या वहां मिलेगा जो यहां नहीं मिलता
देखा है बहुत ऊंचा उड़ने का सपना
वह रिश्ते मां बाप का प्यार नहीं मिलेगा
जिसके लिए छोड़ दिया घर अपना
दूर हो बहुत घर की याद तो आती होगी
सपनों की दीवार बीच मे आ जाती तो होगी
मिलता होगा जब कोई हमवतन तो
याद वतन की बहुत आती तो होगी
गांव खेत खलिहान दोस्त सब पीछे छूटे
दूर हुए भाई बंधु रिश्ते नाते सब टूटे
देखते रहते हैं राह बूढ़े माता पिता तुम्हारी
निकले खून के सब रिश्ते भी झूठे
आती होगी याद वह गांव की हवा ठंडी ठंडी
कहां भूलती होगी वह पहाड़ी से जाती पगडंडी
न कोई दोस्त न कोई अपना है विदेश में
याद तो आती होगी शाम को लगती दोस्तों की वह मंडी
आ जा विदेश छोड़कर तुझको धरती तेरी पुकारती
पत्थरा गई हैं बूढ़ी आंखें तेरी राह निहारती
पराए हैं लोग वहां कोई नहीं है अपना
कैसे भूला उस मां को जो आने पर तेरी आरती थी उतारती
बाहर ही मिलता है सब कुछ
यह नासमझी की हैं बातें
अमेरिका और कनाडा की रातों से
हैं सुंदर मेरे भारत की रातें
क्या वहां मिलेगा जो यहां नहीं मिलता
देखा है बहुत ऊंचा उड़ने का सपना
वह रिश्ते मां बाप का प्यार नहीं मिलेगा
जिसके लिए छोड़ दिया घर अपना
दूर हो बहुत घर की याद तो आती होगी
सपनों की दीवार बीच मे आ जाती तो होगी
मिलता होगा जब कोई हमवतन तो
याद वतन की बहुत आती तो होगी
गांव खेत खलिहान दोस्त सब पीछे छूटे
दूर हुए भाई बंधु रिश्ते नाते सब टूटे
देखते रहते हैं राह बूढ़े माता पिता तुम्हारी
निकले खून के सब रिश्ते भी झूठे
आती होगी याद वह गांव की हवा ठंडी ठंडी
कहां भूलती होगी वह पहाड़ी से जाती पगडंडी
न कोई दोस्त न कोई अपना है विदेश में
याद तो आती होगी शाम को लगती दोस्तों की वह मंडी
आ जा विदेश छोड़कर तुझको धरती तेरी पुकारती
पत्थरा गई हैं बूढ़ी आंखें तेरी राह निहारती
पराए हैं लोग वहां कोई नहीं है अपना
कैसे भूला उस मां को जो आने पर तेरी आरती थी उतारती
- रवींद्र कुमार शर्मा
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सिंदूरी स्वप्न
पलकों में जो छुपा हुआ था,
वह पैगाम सुनहरा है।
आज खुला है राज हृदय का,
रंग यह बेहद गहरा है।
अधरों का वह मौन समर्पण,
आज विवश होकर बोला
चुपके से सदियों का सावन,
इस सूने आँगन डोला।
माँग सजी जब लाल रेख से,
मन का दर्पण मुसकाया।
जिसको केवल चाहा दिल ने,
उसको अपने सम्मुख पाया।
पलकों में जो छुपा हुआ था,
वह पैगाम सुनहरा है।
आज खुला है राज हृदय का,
रंग यह बेहद गहरा है।
अधरों का वह मौन समर्पण,
आज विवश होकर बोला
चुपके से सदियों का सावन,
इस सूने आँगन डोला।
माँग सजी जब लाल रेख से,
मन का दर्पण मुसकाया।
जिसको केवल चाहा दिल ने,
उसको अपने सम्मुख पाया।
- सविता सिंह मीरा
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