पिता से जान मेरी
पिता से पहचान मेरी
पिता से मान मेरा
पिता से अभिमान मेरा
पिता की परी हूं
पिता की राजकुमारी हूं
पिता का गुरूर हूं
पिता का सम्मान हूं
पिता का खून हूं
पिता का नशा हूं
पिता का स्वप्न हूं
पिता का जहाँ हूं
पिता की अस्मत हूं
पिता का अस्मत हूं
पिता का सितारा हूं
पिता का चाँद हूं
पिता का सूरज हूं
पिता है तो जहां है
पिता है तो जीवन है
पिता से ही रिश्ते हैं
पिता से ही कुल है
पिता से ही सुख है
पिता दुखों का नाश है
पिता सुखों की आस है
- सुमन डोभाल काला
*****
चिट्ठी
बहुत दिनों बाद
मन हुआ कि चिट्ठी लिखी जाए-किसी अपने को
किसको सम्बोधित कर लिखूँ लेकिन ?
रिश्तेदारों को तो चिट्ठी -पत्री पढ़ने में कोई खुशी नहीं मिलती है,
ना ही वे लिखते हैं।
फिर किसे लिखूँ ?
सोचता हूँ, सबसे पहले लगातार अपनी धुरी पर घूमती हुई
पृथ्वी को लिखता हूँ।
फिर लिखूँगा, चमकते हुये उगते सूर्यदेव को
जिससे हम मनुष्यों और तमाम जीव-जंतुओं को
ऊर्जा मिलती है।
फिर लिखूँगा, चन्द्रमा को
उनसे मामा-भांजे का सम्बंध जो स्थापित है-आज भी।
फिर लिखूँगा हवा को
उसकी पीठ पर ही उसको चिट्ठी लिखूँगा।
फिर लिखूँगा, अपनी जगह अडिग हिमालय पर्वत को
जो अपने भीतर न जाने कितनी औषधीय पौधे समेटे खड़ा है
आभार सहित लिखूँगा।
नदी के सीने में लिखूँगा तमाम जल-कोषों के नाम।
वृक्षों-पौधों को लिखूँगा सारे पंछियों को भी।
लिखूँगा चिट्ठी आज
और कुछ नहीं तो आकाश के सीने में सभी को
सम्बोधित करते हुए लिखूँगा
ताकि सिर उठाकर सब पढ़ सके
एक ही चिट्ठी सबके नाम
- सुधीर कुमार सोनी
*****
पिता
पापा आपसे कुछ कहना था,
संघर्षशील राहों की थकान
जो आपने मेरे लिए सही थी।
आज मैं उसी राह पर हूं,
बस यही आपसे कहना था।
- कांता शर्मा
*****
स्त्री का रोना
स्त्री जब रोती है,
तो उसके आँसुओं के पीछे छिपे
दर्द का कारण समझ पाना
अक्सर कठिन हो जाता है।
उसकी आँखों से बहती हर बूँद
अपने भीतर अनगिनत अनकही कथाएँ
और मौन पीड़ाएँ समेटे होती है।
उसके आँसू सदैव से पुरुष मन को
एक ऐसे असमंजस के
द्वार पर लाकर खड़ा कर देते हैं,
जहाँ वह चाहकर भी
उसके अंतर्मन की गहराइयों को
पूर्णतः समझ नहीं पाता।
- सुभाष 'अथर्व'
*****
हर बार अफसोस जताते है,
सुधरने का नाम नहीं लेते है।
कभी शासन, कभी प्रशासन
के सिर जिम्मेदारी मड़ देते हैं।
हर बार, एक जैसा व्यवहार...
मृतकों को जातियों में बांट देते हैं।
जब अपना कोई मरता है, तो
फिर हम नंगा रोना रोते हैं।
आखिर कितने बेशर्म हैं हम!
सुधरने का नाम नहीं लेते हैं।
एक नागरिक के रूप में, हम
जिम्मेदारी क्यों नहीं लेते हैं ?
- दीपक कोहली
*****
तू ही तू
यूं तो जिंदगी में किस किसका
ना मलाल किया ?
उफ्फ!
कम्बख्त याद भी आई तो तेरी आई।
महफिल में बैठकर जिक्र हुआ
तमाम मुद्दों पर मगर
हर मुद्दे पर बात भी आई तो तेरी आई।
मुआमला दिल का था,
फिर दिन क्या और रात क्या ?
दिन तो मेरे रहे लेकिन
ये रात भी आई तो तेरी आई।
मेरे हिस्से में आए
ये मंदिर, ये पीर और दरगाह
मीरा जैसा ये दिवानापन,
लेकिन जब भी सिर झुका
लब पर,
मुराद भी आई तो तेरी आई
मना लिया था खुद को
कि मेरा दिल छोटा है
तेरी हैसियत के हिसाब से,
अरे पागल ! आंखों में बनकर
मेरे आंसू,
सौगात भी आई तो तेरी आई।
मैंने कब किसी और को सोचा
तेरे बगैर,
तेरी वफ़ा, तेरा गुमां
हर तरफ तू ही तू
मेरे ख्यालों में भी कभी,
बारात भी आई तो तेरी आई।
- मंजू सागर
*****
तुम आना तो
मेरे शहर की हवा सुनना,
यहाँ हर झोंके में
अपनों की दुआ बसती है।
मैं तुम्हें लिखना चाहती हूँ
हमारी मिट्टी को मिलाकर,
ताकि मेरी लिखावट
हमेशा घर की खुशबू बन जाए!
तुम आना तो
मेरे शहर में ठहर जाना,
यहाँ एहसासों की धूप में
अपनों की यादें महकती हैं।
मैं तुम्हें पढ़ना चाहती हूँ
बंद लिफ़ाफ़ों के अल्फ़ाज़ से,
ताकि मेरी लिखावट
तुम्हारा जीवन गीत बन जाए!
- अंशिता त्रिपाठी
*****
उफ्फ्फ! यह चाय
आज फिर वही रस, वही तृप्ति,
युगों बाद जागी वह सुवास,
या कोई गुप्त रहस्य छिपा है,
जिसकी लगी रहती है आस।
कतिपय अनकहे शब्द मौन के,
घुल जाते चाय में हर बार,
मात्र तुम्हारी सुधि आते ही,
जीवंत हो उठता वही स्वाद।
- सविता सिंह मीरा
*****
हम हैं गुनहगार
तुँ जननी तुँ भगिनी है तुँ नारी
खुद दर्द पीकर जीवन है संवारी
तेरी करूण कथा पे हम शर्मसार
हम पुरूष वर्ग तेरी है गुनहगार
दहेज की लोभ में जिन्दा जलाया
क्रूर जलालत की तमगा पहनाया
भोग्य वस्तु तुम्हें माना एक उपहार
परिजन की खिदमत में तुम गई हार
वंश बेल तुमने हमारी आगे बढ़ाया
खुद बेदना झेल खानदान की साया
तेरी कुर्बानी पे हम हैं तेरी कर्जदार
फिर भी ना समझा नादान संसार
मायके की मोह त्याग पिया घर आई
पति की सेवा में खुद को तुम लुटाई
तेरी आँचल में हम पाया गुलजार
फिर भी ना हुए हम तेरी वफादार
शराबी बन कर जब जब घर आया
प्रेम से तुमने हमें मेरे लिये समझाया
फिर भी तुम्हें हमने दिया डंडे की मार
अपशब्दों की पहनाया गले में हार
तेरी इज्जत पे आँच कभी जब आया
महाभारत का दृश्य तब पूर्वज ने सजाया
फिर भी हमने दी तुमको घृणित बाजार
कितना गिर गया पुरूष आज मेरे यार
तुँ जननी तुँ भगिनी है तुँ नारी
खुद दर्द पीकर जीवन है संवारी
तेरी करूण कथा पे हम शर्मसार
हम पुरूष वर्ग तेरी है गुनहगार
दहेज की लोभ में जिन्दा जलाया
क्रूर जलालत की तमगा पहनाया
भोग्य वस्तु तुम्हें माना एक उपहार
परिजन की खिदमत में तुम गई हार
वंश बेल तुमने हमारी आगे बढ़ाया
खुद बेदना झेल खानदान की साया
तेरी कुर्बानी पे हम हैं तेरी कर्जदार
फिर भी ना समझा नादान संसार
मायके की मोह त्याग पिया घर आई
पति की सेवा में खुद को तुम लुटाई
तेरी आँचल में हम पाया गुलजार
फिर भी ना हुए हम तेरी वफादार
शराबी बन कर जब जब घर आया
प्रेम से तुमने हमें मेरे लिये समझाया
फिर भी तुम्हें हमने दिया डंडे की मार
अपशब्दों की पहनाया गले में हार
तेरी इज्जत पे आँच कभी जब आया
महाभारत का दृश्य तब पूर्वज ने सजाया
फिर भी हमने दी तुमको घृणित बाजार
कितना गिर गया पुरूष आज मेरे यार
- उदय किशोर साह
*****
ढलती शाम का सफ़र
सांझ ढली है, सूरज लाल,
पेड़ों के पीछे छुपा गुलाल।
कच्ची सड़क पर उड़ती धूल,
घर लौट रहे हैं सब जल्दी जल्दी,
अपनी धुन में हैं मशगूल।
मोटरसाइकिल की जलती लाइट,
धीमे-धीमे होती अंधेरी नाइट।
आगे-आगे दौड़ती ज़िंदगी की गाड़ी,
पीछे छूटती खेतों की क्यारी।
बैलगाड़ी पर लदा सूखा घास,
दिलाता है गुज़रे ज़माने का अहसास।
दूर कहीं एक धुंधली सी राह,
थके हुए कदमों को घर की चाह।
यह ढलता सूरज, यह शांत समां,
कहता है, थम गया है जहां।
दिनभर की मेहनत का सुंदर ये अंत,
गांव की शाम है बड़ी जीवंत।
सांझ ढली है, सूरज लाल,
पेड़ों के पीछे छुपा गुलाल।
कच्ची सड़क पर उड़ती धूल,
घर लौट रहे हैं सब जल्दी जल्दी,
अपनी धुन में हैं मशगूल।
मोटरसाइकिल की जलती लाइट,
धीमे-धीमे होती अंधेरी नाइट।
आगे-आगे दौड़ती ज़िंदगी की गाड़ी,
पीछे छूटती खेतों की क्यारी।
बैलगाड़ी पर लदा सूखा घास,
दिलाता है गुज़रे ज़माने का अहसास।
दूर कहीं एक धुंधली सी राह,
थके हुए कदमों को घर की चाह।
यह ढलता सूरज, यह शांत समां,
कहता है, थम गया है जहां।
दिनभर की मेहनत का सुंदर ये अंत,
गांव की शाम है बड़ी जीवंत।
- डॉ. मुश्ताक अहमद शाह
*****
बीते लम्हों की खुशबू
बीते लम्हो की खुशबू, आज भी दिल में है समायी,
भले, बीते दिन अनेक, मगर आज भी याद नहीं है गयी।
शहर की आबोहवा मे,हाँ कुछ वक्त को है भूले,
लेकिन जैसे ही फुर्सत में होते है,याद आते है गाँव के झूले।
गाँव के वो सब खेत खलिहान, बगीचे बाग याद है सब,
दोस्तो के संग लुकाछिपी, गाय चराने भी याद आते है अब।
माँ की डांट, चाची की गोद,बुआ की पुचकार,
दादा दादी के साथ मस्ती की याद है बरकरार।
सबकुछ याद आज भी खूब मन में है आते,
उन लम्हो को याद कर, मन है तडप जाते।
ये गाँव मे बिताये गये लम्हे, बहुत ही यादगार है,
उन लम्हो की खुशबू आज भी मन मे बरकरार है।
शहर की भीड़ वाली जिदंगी से मन उबकने है लगी,
गाँव मे बिताये गये हर पल अब,याद आने है लगी।
रिश्ते मे संबंध के नाम हे सबो को थे जानते,
जहाँ हरेक किसी का प्यार खूब थे मिलते।
यहाँ शहर मे तो बस,अप ने और अपपे के मतलबी बने,
रिश्ते का प्यार छोड़ो, रिश्ते मे संबंध मे लगे कटने।
सुख दुख की सहभागिता में पूरे गाँव इकट्ठा थे होते,
यहाँ तो शहर मे,बस अपने से ही सब है संभालते।
बस अब तो मन उचटने से लगा है, शहर से मेरा,
गाँव की हरेक लम्हे को खुशबू याद आने लग है सारा।
बीते लम्हो की खुशबू, आज भी दिल में है समायी,
भले, बीते दिन अनेक, मगर आज भी याद नहीं है गयी।
शहर की आबोहवा मे,हाँ कुछ वक्त को है भूले,
लेकिन जैसे ही फुर्सत में होते है,याद आते है गाँव के झूले।
गाँव के वो सब खेत खलिहान, बगीचे बाग याद है सब,
दोस्तो के संग लुकाछिपी, गाय चराने भी याद आते है अब।
माँ की डांट, चाची की गोद,बुआ की पुचकार,
दादा दादी के साथ मस्ती की याद है बरकरार।
सबकुछ याद आज भी खूब मन में है आते,
उन लम्हो को याद कर, मन है तडप जाते।
ये गाँव मे बिताये गये लम्हे, बहुत ही यादगार है,
उन लम्हो की खुशबू आज भी मन मे बरकरार है।
शहर की भीड़ वाली जिदंगी से मन उबकने है लगी,
गाँव मे बिताये गये हर पल अब,याद आने है लगी।
रिश्ते मे संबंध के नाम हे सबो को थे जानते,
जहाँ हरेक किसी का प्यार खूब थे मिलते।
यहाँ शहर मे तो बस,अप ने और अपपे के मतलबी बने,
रिश्ते का प्यार छोड़ो, रिश्ते मे संबंध मे लगे कटने।
सुख दुख की सहभागिता में पूरे गाँव इकट्ठा थे होते,
यहाँ तो शहर मे,बस अपने से ही सब है संभालते।
बस अब तो मन उचटने से लगा है, शहर से मेरा,
गाँव की हरेक लम्हे को खुशबू याद आने लग है सारा।
- चुन्नू साहा
*****
सुलझा लो...
सुलझा लो वक्त रहते,
उन रिश्तों को ज़रा,
जो खामोशियों की गाँठों में
कहीं उलझ गए हैं।
बस एक बात न कह पाने से,
जो अंदर ही अंदर
धीरे-धीरे बिखरने लगे हैं।
ज़रा सोचो तो...
आख़िर ऐसा क्या है,
जो प्रेम से भी बड़ा हो गया?
कौन-सी वह बात है,
जो एक छोटी-सी नाराज़गी को
इतना विशाल बना रही है?
जिस लड़ाई में जीतकर भी
चेहरे पर मुस्कान न लौटे,
वह जीत भला किस काम की?
जब चोट उसे लगे,
और दर्द तुम्हें हो,
तो यह अहंकार...
यह ज़िद...
आख़िर किस काम की?
थोड़ा तुम झुक जाओ,
थोड़ा वह भी संभल जाएगा।
यक़ीन मानो,
धीरे-धीरे सारे गिले-शिकवे
अपने आप मिट जाएँगे।
कोई रिश्ता ऐसा नहीं
जहाँ कभी नाराज़गी न हो।
मगर रिश्ते
नाराज़गी से नहीं,
एक-दूसरे को मनाने की चाह से
ज़िंदा रहते हैं।
बस एक बार पहल करके तो देखो...
क्या पता,
कौन-सी मुलाक़ात आख़िरी हो,
कौन-सी बात आख़िरी हो,
और कब किसी अपने को
मनाने का अवसर ही न मिले।
रिश्तों को जीतने की नहीं,
निभाने की कोशिश कीजिए।
क्योंकि अपने,
बहस से नहीं...
प्रेम से अपने बने रहते हैं।
सुलझा लो वक्त रहते,
उन रिश्तों को ज़रा,
जो खामोशियों की गाँठों में
कहीं उलझ गए हैं।
बस एक बात न कह पाने से,
जो अंदर ही अंदर
धीरे-धीरे बिखरने लगे हैं।
ज़रा सोचो तो...
आख़िर ऐसा क्या है,
जो प्रेम से भी बड़ा हो गया?
कौन-सी वह बात है,
जो एक छोटी-सी नाराज़गी को
इतना विशाल बना रही है?
जिस लड़ाई में जीतकर भी
चेहरे पर मुस्कान न लौटे,
वह जीत भला किस काम की?
जब चोट उसे लगे,
और दर्द तुम्हें हो,
तो यह अहंकार...
यह ज़िद...
आख़िर किस काम की?
थोड़ा तुम झुक जाओ,
थोड़ा वह भी संभल जाएगा।
यक़ीन मानो,
धीरे-धीरे सारे गिले-शिकवे
अपने आप मिट जाएँगे।
कोई रिश्ता ऐसा नहीं
जहाँ कभी नाराज़गी न हो।
मगर रिश्ते
नाराज़गी से नहीं,
एक-दूसरे को मनाने की चाह से
ज़िंदा रहते हैं।
बस एक बार पहल करके तो देखो...
क्या पता,
कौन-सी मुलाक़ात आख़िरी हो,
कौन-सी बात आख़िरी हो,
और कब किसी अपने को
मनाने का अवसर ही न मिले।
रिश्तों को जीतने की नहीं,
निभाने की कोशिश कीजिए।
क्योंकि अपने,
बहस से नहीं...
प्रेम से अपने बने रहते हैं।
- नरेंद्र मंघनानी
*****
दिलों में अनगिनत जज़्बात हैं
अधूरे सपनों की रात है,
धीरे - धीरे ढल जाएगी,
चंद दिनों की ही तो बात है।
होगी उनसे भी मुलाकात,
दिलों में अनगिनत जज़्बात हैं।
अधूरे सपनों की रात है,
धीरे - धीरे ढल जाएगी,
चंद दिनों की ही तो बात है।
होगी उनसे भी मुलाकात,
दिलों में अनगिनत जज़्बात हैं।
- चेतना सिंह 'चितेरी
*****
नशे में डूब रही है जवानी
न वह चूल्हे की रोटी न वह घड़े का पानी
बदल सी गई कुछ ऐसी ज़िंदगानी
बुढापा भी कुछ और सा बीत रहा अब
अलग ही चाल चल रही कुछ आज की जवानी
नशे की स्याही से लिख रहा युवा
आज की अपनी यह कहानी
उस देश का भविष्य क्या होगा
जहां नशे में डूब रही है जवानी
सुनते किसी की नहीं करे अपनी मनमानी
जान कर भी अनजान हैं कर रहे नादानी
किस दिशा में जा रही आज की युवा पीढ़ी
कैसे हो गई यह नशे की दीवानी
नशे के कारोबार में जो लिप्त है
खून नहीं उनकी रगों में है पानी
अपनी औलाद भी जब करेगी नशा
तब बनेगी फिर एक नई कहानी
आज की पीढ़ी को बहुत मुश्किल है समझाना
अच्छा नहीं लगता उनको बार बार बताना
टोका टोकी तो बिल्कुल भी पसंद नहीं
मन की करेंगे चाहे इधर से उधर हो जाये जमाना
बुजुर्गों की बातों की हंसी हैं उड़ाते
आजाद रहना चाहते हैं बन्धन उनको नहीं भाते
कैसा मुश्किल का दौर है यह आया
मां बाप को बृद्धाश्रम पहुंचाने में नहीं है शर्माते
न वह चूल्हे की रोटी न वह घड़े का पानी
बदल सी गई कुछ ऐसी ज़िंदगानी
बुढापा भी कुछ और सा बीत रहा अब
अलग ही चाल चल रही कुछ आज की जवानी
नशे की स्याही से लिख रहा युवा
आज की अपनी यह कहानी
उस देश का भविष्य क्या होगा
जहां नशे में डूब रही है जवानी
सुनते किसी की नहीं करे अपनी मनमानी
जान कर भी अनजान हैं कर रहे नादानी
किस दिशा में जा रही आज की युवा पीढ़ी
कैसे हो गई यह नशे की दीवानी
नशे के कारोबार में जो लिप्त है
खून नहीं उनकी रगों में है पानी
अपनी औलाद भी जब करेगी नशा
तब बनेगी फिर एक नई कहानी
आज की पीढ़ी को बहुत मुश्किल है समझाना
अच्छा नहीं लगता उनको बार बार बताना
टोका टोकी तो बिल्कुल भी पसंद नहीं
मन की करेंगे चाहे इधर से उधर हो जाये जमाना
बुजुर्गों की बातों की हंसी हैं उड़ाते
आजाद रहना चाहते हैं बन्धन उनको नहीं भाते
कैसा मुश्किल का दौर है यह आया
मां बाप को बृद्धाश्रम पहुंचाने में नहीं है शर्माते
- रवींद्र कुमार शर्मा
*****
अनकहा इज़हार
हां मैं लिखता हूं
सिर्फ लिखने के लिए नहीं
अपने जज्बातों के
इज़हार के लिए भी
हां मैं लिखता हूं
हर अल्फ़ाज़ में तुमको
मगर कहता नहीं कभी
अपने लफ्जों में तुमको
हां मैं लिखता हूं
अपने हृदय की
गहरी अनुभूति के साथ
मगर जाता नहीं कभी
अपने जज्बातों के आर पार।
हां मैं लिखता हूं
सिर्फ लिखने के लिए नहीं
अपने जज्बातों के
इज़हार के लिए भी
हां मैं लिखता हूं
हर अल्फ़ाज़ में तुमको
मगर कहता नहीं कभी
अपने लफ्जों में तुमको
हां मैं लिखता हूं
अपने हृदय की
गहरी अनुभूति के साथ
मगर जाता नहीं कभी
अपने जज्बातों के आर पार।
- डॉ. राजीव डोगरा
*****
मानवीय संवेदनाएँ
मानवीय संवेदनाएँ शून्य हो गई हैं,
कुछ लोग सबकी ज़िंदगी से खेल रहे हैं।
क्या पैसा इतना ज़रूरी हो गया है,
कि इंसानियत का मूल्य ही खो गया है?
ज़िंदगी तो बहुत छोटी होती है,
क्या कोई धन साथ लेकर जाता है?
क्यों नहीं सोचते लोग यह बात,
केवल कर्म ही अंत तक साथ निभाता है।
उन मासूमों का क्या दोष था,
जो असमय काल के गाल में समा गए।
उन माताओं का क्या हाल होगा,
जिनकी गोद हमेशा के लिए उजड़ गई।
आँखों के आँसू अभी सूखे भी नहीं,
पर कुछ समय बाद लोग सब भूल जाएंगे।
फिर होगा कोई और हादसा,
और हम केवल शोक मनाते रह जाएंगे।
क्या प्रशासन फिर भी नहीं जागेगा?
क्या वह केवल अपनी जेबें भरता रहेगा?
जिस दिन किसी बड़े व्यक्ति का अपना दुख होगा,
शायद तभी वह इस पीड़ा को समझ पाएगा।
मानवीय संवेदनाएँ शून्य हो गई हैं,
कुछ लोग सबकी ज़िंदगी से खेल रहे हैं।
क्या पैसा इतना ज़रूरी हो गया है,
कि इंसानियत का मूल्य ही खो गया है?
ज़िंदगी तो बहुत छोटी होती है,
क्या कोई धन साथ लेकर जाता है?
क्यों नहीं सोचते लोग यह बात,
केवल कर्म ही अंत तक साथ निभाता है।
उन मासूमों का क्या दोष था,
जो असमय काल के गाल में समा गए।
उन माताओं का क्या हाल होगा,
जिनकी गोद हमेशा के लिए उजड़ गई।
आँखों के आँसू अभी सूखे भी नहीं,
पर कुछ समय बाद लोग सब भूल जाएंगे।
फिर होगा कोई और हादसा,
और हम केवल शोक मनाते रह जाएंगे।
क्या प्रशासन फिर भी नहीं जागेगा?
क्या वह केवल अपनी जेबें भरता रहेगा?
जिस दिन किसी बड़े व्यक्ति का अपना दुख होगा,
शायद तभी वह इस पीड़ा को समझ पाएगा।
- गरिमा लखनवी
*****

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