भारतीय संस्कृति में ज्ञान और कौशल कभी भी एक साथ समांतर चलते हुए नहीं दिखाई देते हैं। भारतीय इतिहास बताता है कि एक ओर जहां कौशल को जातियों में बांटा गया तो दूसरी ओर ज्ञान को सीमित कर दिया गया था। किसी भी राष्ट्र और समाज की तरक्की तब तक संभव नहीं है जब तक कि ज्ञान और कौशल का मिश्रण नहीं हो जाता है। भारतीय समाज में ज्ञान और कौशल को अलग-अलग जातियों व वर्गों में बांटने के कारण समाज के विकास व समृद्धि का पहिया जातिवाद और भेदभाव जैसी कुप्रथाओं में धस गया। इन कुप्रथाओं के कारण समस्त भारत को सदियों तक गुलाम रहना पड़ा था। अब वक्त आ गया है कि इस विषय पर हम सभी भारतीयों को सोचना चाहिए।
भारत के पास ज्ञान का भंडार है, मगर हमने उस ज्ञान का सही से इस्तेमाल किया ही नहीं है। बस ज्ञान के माध्यम से हमने अपने समाज में पाखंडता फैलाई और मनुष्यता को बांटने का काम किया है। इसके लिए हमारा समस्त समाज जिम्मेदार है, जिसने पाखंड फैलाया वो भी और जिसने उस पाखंड को ज्ञान और परंपरा मान लिया वो भी। भारत के पास ऐसी कौशल कला थी कि उसके उदाहरण- पुराने मंदिर, महल और किलों के रूप में आज भी जिंदा हैं। हमने कभी भी अपने देश और संस्कृति की कौशल कला का वो मान-सम्मान नहीं किया, जो होना चाहिए। बल्कि हम आधुनिकता की दौड़ में अपने देश की कौशल कला को लगातार भूलते या खोते जा रहे हैं।
आज हम पश्चिमी कला, कौशल और ज्ञान को सब कुछ मान बैठे हैं। जिस कौशल को हमने जातियों में बांटा दिया था, आज उसी कौशल का नाम पश्चिमी देशों के कारण परिवर्तित होने पर हम सभी उसे बतौर पेशे के रूप में अपना रहे हैं। जैसे- हेयर डिजाइनर यानी नाई, सिविल इंजीनियर्स यानी बढ़ई, फैशन डिजाइनर यानी दर्जी, नर्स यानी दाई, आदि। मतलब जिस कौशल के कारण हमारा समाज जातियों में बांटा रहा और कुछ लोगों के साथ हमारे समाज ने उनके पेशे के कारण जानवरों जैसा व्यवहार किया। मगर आज देखिए उन्हीं लोगों का पेशा हम सभी हंसी-खुशी अपना रहे हैं। यह सब देकर मेरे मन में एक ही प्रश्न उठता है- आखिर हमारा समाज इतना दोगला क्यों है ?
पश्चिमी देशों में रंगभेद से लेकर विभिन्न प्रकार की बुराइयां थी, मगर उन्होंने उन बुराइयों को पीछे छोड़ कर अपने देश व समाज की प्रगति एवं विकास को आगे रखते हुए आधुनिकता के साथ आगे बढ़ने का फैसला किया। आज पश्चिमी देश हमसे हर क्षेत्र में कई गुना आगे हैं। मगर हम आज भी जातीय श्रेष्ठता और धर्म के लड़ाई में उलझे हुए। हजारों साल गुलाम रहने के बाद भी अगर हमारा समाज रक्त शुद्धि जैसे खोखले दांवों के साथ अपने ही समाज के लोगों के साथ जातिवाद और भेदभाव करता है, जो यह अवश्य ही मूर्खों जैसा व्यवहार है। आज के इस आधुनिक युग में लगभग हर समाज के लोग रक्तदान भी करते हैं और बीमार पड़ने पर उस रक्त का इस्तेमाल भी करते हैं। बाकी किसका कितना रक्त शुद्ध है यह दावा कर पाना अपने आप में ही हमारे लिए अपने पूर्वजों का अपमान है।
विश्व के पटल पर बतौर राष्ट्र हमें जाति, धर्म को पीछे छोड़ कर अब अपने देश के विकास, प्रगति और उन्नति को ध्यान में रखते हुए कौशल और ज्ञान को साथ-साथ आगे बढ़ना होगा। आप और हम सिर्फ यह सोचे कि मैं ही आगे बढूं या मेरा ही समाज आगे बढ़े तो इससे राष्ट्र की प्रगति नहीं होती है, बल्कि इससे राष्ट्र में अमीरी और गरीबी की खाई बढ़ती है जो राष्ट्र को गृह युद्ध की ओर लेकर जाता है। इसलिए हमें जाति और धर्म के बंधन से ऊपर उठकर सोचना होगा। क्यों ना हर देश का नागरिक हमारे भारतीय समाज व संस्कृति का ज्ञान, कला एवं कौशल को अपनाएं। हमारी संस्कृति और सभ्यता 'वसुधैव कुटुम्बकम्' यानी एक विश्व-एक परिवार पर आधारित है।
- दीपक कोहली
.png)
No comments:
Post a Comment