साहित्य चक्र

07 May 2023

हिंदी और अंग्रेजी पत्रकारिता में फर्क

अपने 30 साल के पत्रकारिता करियर में हर पड़ाव पर हिंदी और अंग्रेजी जर्नलिज़्म में बहुत बड़ा फर्क देखा है मैंने। हिंदी वालों को हमेशा ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है लेकिन उसके बावजूद हमेशा इंगलिश वालों से छोटा ही महसूस होता है।





दरअसल जब मैंने एक ट्रेनी के रूप में अपनी पहली नौकरी जॉइन की थी तब मैंने हिंदी और अंग्रेजी जर्नलिज़्म में कोई फर्क नहीं किया। मैं यहां बता दूं कि मेरा जर्नलिज़्म कोर्स हिंदी में नहीं बल्कि इंगलिश मीडियम में था जहां मैंने टॉप किया था। लेकिन जब हिंदी जर्नलिज़्म में नौकरी का अवसर मिला तो सोचा कि मेरी तो हिंदी भी अच्छी है, क्या फर्क पड़ता है। लेकिन फर्क पड़ता है... याद रखें।

अब मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मैं तो अब खालिस हिंदी वाली कैटेगरी में ही आती हूं। लेकिन इस दौरान बहुत सी बातों को मार्क किया है मैंने जिनको आज यहां साझा करना चाहती हूं।

सबसे पहली बात है सैलरी में बड़ा अंतर। हिंदी पत्रकार और अंग्रेजी पत्रकार की सैलरी में बहुत बड़ा अंतर देखने को मिलता है। ये अंतर सबसे ज्यादा प्रिंट मीडिया में दिखेगा। इसके बाद यह अंतर कम होता जाता है डिजिटल मीडिया और फिर टीवी जर्नलिज़्म में।

टीवी जर्नलिज़्म में चूंकि हिंदी अंग्रेजी से ऊपर है इसलिए वहां यह फर्क ज्यादा नहीं है। टीवी इंडस्ट्री में पहले के जमाने के मुकाबले ओवरऑल सैलरीज़ अब काफी कम हो गई हैं लेकिन फिर भी अब हिंदी और इंगलिश में सैलरीज़ का फर्क शायद (हो सकता है कि मेरी जानकारी सही न हो, अगर ऐसा नहीं है तो मुझे करेक्ट करें प्लीज़) ज्यादा न हो।

दूसरा अंतर है काम का। मुझे लगता है कि अंग्रेजी मीडिया में काम करना हिंदी मीडिया से काफी आसान है। डिजिटल मीडिया के लिए ही नहीं, हर तरह के मीडिया के लिए। चूंकि मैंने प्रिंट में मैगजीन, न्यूज़पेपर से लेकर रेडियो और डिजिटल मीडिया सभी जगह (टीवी को छोड़कर) काम किया है इसलिए यह कह सकती हूं।

यह बात इसलिए सच है क्योंकि हिंदी वालों को अंग्रेजी से अच्छा अनुवाद करना आना जरूरी है। बिना अंग्रेजी जाने हिंदी में किसी पत्रकार को नौकरी मिलना बहुत मुश्किल है, चाहे वो कितना भी बेहतरीन लेखक हो। अंग्रेजी में ऐसा नहीं है, वहां सिर्फ इंगलिश का अच्छा ज्ञान होना और बेहतरीन राइटिंग स्किल होना ही काफी है।

हिंदी में कुछ भी लिखना हो, रिसर्च करने के लिए आपको गूगल या आजकल चैट जीपीटी की सहायता लेनी होगी जहां इंगलिश में ही बेहतरीन कॉन्टेंट मिलता है। उसे पढ़कर, समझकर या अनुवाद करके ही इस्तेमाल किया जा सकता है। हुआ ना हिंदी जर्नलिज़्म ज्यादा कठिन और मेहनत वाला काम, जिसे पूरी ईमानदारी और मेहनत से करने के बावजूद आपके हिस्से जो भी आता है वो आपकी मेहनत की पूरी भरपाई नहीं कर सकता।

हिंदी और अंग्रेजी के बीच का ये अंतर हमेशा बहुत खटकता है। क्या आपको भी ऐसा लगता है ?


                                                   - रिचा कुलश्रेष्ठ


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