साहित्य चक्र

28 September 2019

जननी हो तुम



जननी हो तुम , प्रियदर्शी
हो तुम ही आस की लकीर ,
कुछ झुक जाना कुछ झुकना,
सीखा देना , है तुम्हें पूर्वजो की,
लाज..!!


की सीखाना कुछ यूँ,
सम्मान में सिर झुकाकर ,
करे दंडवत प्रणाम सुबहो शाम 
दोनों मान ,
रहे उसे परवरिश की लाज।


की सीखाना कुछ यूँ,
की हो जुबां पर मर्यादा की ,
लकीर , ना निकले आकार वाणी,
की रहे उसे परवरिश की लाज ।


की सीखाना कुछ यूँ,
की अर्द्धनग्न का प्रमाण 
ना दें ,
की घर की मर्यादा ना लांघे
कभी ,
की ना दें गानों से अश्लीलता 
का प्रमाण ,


की है उसके कंधों पर ,
बहन शहनाई ,
की है उस बहन को ,
भाई की नाक प्यारी ,
की सदा रहे यूँ ही आस न्यारी ।


अपने संस्कार कुछ यूँ भर जाना
की कभी तेरे परवरिश पर ऊँगली ना उठे ,
की है उसे माँ का भी है स्वरूप पाना 
की  है उसे पिता का भी फर्ज निभाना


रखें सदा लक्ष्मी , आजाद सा साहस 
हो वाणी , लता जैसी  ,
हो धावक , दास जैसी ,
हो समाजसेवी , टरेसा जैसी
हो वीर , भगत सा ,
हो संकल्पी , चाणक्य सा ,
हो सन्यासी , नंद सा ,

                                          स्वरचित - मनकेश्वर महाराज "भट्ट"



No comments:

Post a Comment