26 October 2025
छायाचित्र आधारित पंक्तियाँ पढ़िए
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छठ पूजा में घर
यह कहानी तीन भोजपुरी दोस्तों की है जो अलग-अलग शहरों से एक शहर में रहते हैं और काम करते हैं। कल्लू गोरखपुर से, भुअर छपरा से और रघु बक्सर से हैं जो दिल्ली एनसीआर की अलग-अलग कंपनियों में काम करते हैं। वे लगभग तीन साल से एक ही रूम में साथ रहते हैं और भोजपुरी बोलने वाले हैं, इसलिए उनकी दोस्ती और रूम पार्टनरशिप भी है। दिन भर ड्यूटी करने के बाद वे शाम को रूम पर आ जाते हैं। तीनों खुशमिजाज और मिलनसार हैं।
कंपनी से निकलने के बाद वे टेम्पो से अलग-अलग जगहों से एक चौराहे पर पहुंचते हैं और फिर तीनों लोग साथ होकर बस से अपने रहने वाले एरिया तक पहुंचते थे। यह उनकी रोज की दिनचर्या है। एक दिन चौराहे पर दो लोग पहुंच गए, लेकिन रघु को आने में देर हो गई।
कुछ देर बाद वह भी उदास दिखते हुए आता दिखाई दिया। कल्लू ने भुअर से कहा, "हरदम मुस्कराने वाले रघु को क्या हो गया है? वह उदास और धीरे-धीरे नीचे सर किए आ रहा है।"
भुअर ने पूछा, "क्या हुआ है, कुछ बात है तो बताओ हमें भी... कंपनी में कुछ हुआ है या घर में कुछ हो गया है, बोल... बोल ना भाई।"
रघु ने कहा, "कुछ नहीं हुआ है भाई... चलो रूम पर बताता हूं..."
बस में बैठने के बाद पूरे रास्ते किसी ने कुछ नहीं बोला। रूम पर पहुंचकर मुंह हाथ धोने के बाद तीनों बैठ गए। कल्लू ने कहा, "क्या हुआ है, कुछ बताओगे...हमें भी। क्यों उदास हो बताओगे भी कि हमें भी टेंशन में रखोगे... बताओ क्या हुआ है...।"
रघु ने बताया, "भाई, कंपनी से निकलने के बाद टेम्पो में बैठा था, तभी घर से फोन आ गया... सरदार जी जो टेम्पो चलाते थे, उन्होंने भी सुना... बात खत्म होते ही छठ के शारदा सिन्हा जी का गीत बजा दिया... छठ गीत सुनकर रोना आ गया, आंखें डबडबा गईं... सरदार जी ने कहा, 'छठ नजदीक है, घर जाने की छुट्टी कब लोगे हो बिहारी बाबू... मैं भी पटना साहिब का ही हूं...'
टेम्पो के सीसे में चेहरा का भाव देखकर उन्होंने हमसे पूछ लिया, 'बहुत जल्द जाएंगे सरदार जी...'
यह कहकर टेम्पो छोड़ दिया और घर जाने की बात छठ जैसे पर्व में सुनकर मन और दुःखी हो गया लगा अब जितना जल्द छठ पर घर पहुँचे, बिहारी है न भाई। आज छुट्टी का आवेदन ऑफिस में दिया भी है, देखो क्या होता है। छुट्टी मिलेगा तो छठ में जाऊंगा भाई... लगभग 10 महीने हो गए हैं घर से आए हुए ...।"
यह सुनकर भुअर ने भी उदासी भरे आवाज में कहा, "मुझे भी लगभग साल भर हो गया है घर गए हुए। कभी-कभी सोचता हूं कि अगर बिहार में ही रोजगार होता तो मुझे दिल्ली एनसीआर में नहीं आना पड़ता... भले कम पैसे मिलते, लेकिन पर्व में घर पहुंच जाता आसानी से...।"
कल्लू ने भी अपने आँशुओं को चेहरे से हटाते हुए कहा, "मैं भी अगली छठ में नहीं गया था घर... क्या करें भाई, उत्तर प्रदेश और बिहार के एमपी, एमएलए सोते रहते हैं... अपने से मतलब है उन लोगों को... और जनता भी जातिवाद से ऊपर उठकर रोजगार के लिए वोट करे तो सरकार को भी समझ आए... लेकिन क्या करें, सोचने से क्या होता है, जब तक जनता जागेगी नहीं, तब तक पलायन जारी रहेगा भाई।"
रघु ने लम्बा सांस लेते हुए कहा, "अबकी छुट्टी मिले या न मिले, मैं छठ में घर जाऊंगा...तो जाऊंगा... बताओ, पूरा बिहार जो घर दिवाली में विभिन्न लाइट एवं फूलों से सजाता है, छठ के बाद ही उतारता है... उसकी खुशी... माँ के हाथ का छठ में बना ठेकुआ प्रसाद...जिसका कोई जवाब ही नहीँ, सब साथी, परिवार के सदस्यगण की उपस्थिति... और सबसे मिलने की खुशी... और साथ में मिलकर लिट्टी चोखा बनाना... छठ गीत से गुलजार पूरा बिहार... यह सब सोचकर इतना याद आया है कि अब पक्का घर छठ में पहुंचूंगा चाहे कुछ भी हो... तब जाकर दिल को शुकुन मिलेगा भाई...।"
तीनों दोस्त एक ही स्वर में बोले, "छठ जैसे महापर्व में घर किसी भी हाल में पहुंचेंगे... बोलो जय छठी मईया..."
यह कहकर हंसते हुए घर पहुंचने की तैयारी में तीनों दोस्त लग गए...
- राघवेंद्र प्रकाश 'रघु' / बक्सर, बिहार
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24 October 2025
आज की प्रमुख रचनाएँ- 24 अक्टूबर 2025
उलझन
मंजिल की राहों में, मेरे पड़ाव बहुत हैं,
हासिल कम, और घटाव ज्यादा है।
इस दरिया के, बांध पर,
बहाव कम, और रिसाव बहुत है।
रहते हम, अकेले अक्सर,
अपनों का साथ कम, और सुझाव
बहुत है।
कहने को रिश्ते नाते, दुनिया अपनी,
फिर भी इसमें जुड़ाव कम,
मनमुटाव बहुत है।
पहले पढ़ा करते थे, लोगों को चेहरे से
अब चेहरा किताब, कम, नकाब बहुत है।
मेरे कविता बिल्कुल, मेरे जैसी,
अल्फ़ाज़ कम, दोहराव बहुत है।
- रोशन कुमार झा
*****
थम गए वहीं कदम
जब रिश्तों को टूटते देखा
हंसते-खेलते लोगों को
जब पास से बिछड़ते देखा।
थम गए वहीं कदम
जब झूठ को सच बनते देखा
हाथों में हाथ डालकर चलते हुए
जब क़रीबी लोगों को पराया बनते देखा।
थम गए वहीं कदम
जब इंसानों को पत्थर बनते देखा
तिनके तिनके जुड़े हुए मोतियों को
जब बुरी तरह बिखरते हुए देखा।
- इशिका चौधरी
*****
कवि और उसकी कविता
होते हैं क्या शब्द तीर कवि के ,
सिर्फ समाज पर ही लक्षित,
या फिर उसकी आत्मा को भी,
करते हैं क्या ये जागृत।
गढ़ता जिन आदर्शों,चरित्रों की ईमारत,
शब्दों की इंटों से चिनकर,
बसता भी है खुद उसमें क्या,
या रहता कहीं और ही छिपकर।
चलता क्या उस मशाल की लौ में,
लिए जिसको हाथ में है रहता,
या फिर औरों को राह दिखाकर,
खुद अंधेरे में चलता रहता।
करता प्रहार भेदभाव की दीवारों पर,
क्या खुद सहता या न करता,
देता नहीं हकीकत में उंच- नीच के जख्म,
या फिर दिखावे को ही मरहम करता।
जलता नहीं क्या किसी की सफलता से,
हौसला देने को सच्ची ताली बजाता,
जलता-भुनता रहता या भीतर से,
या नकली मुखौटा चेहरे पर लगाता।
मानव की इज्ज़त मन से है करता,
या फिर ढोंग का राग है गाता,
सुनता, समझता है दूजे के मन को भी,
या अपनी ही है हांकता जाता।
जज्बाती खेलों का नहीं क्या खिलाड़ी,
है पाक साफ़ मन का स्वामी,
मौका प्रस्ती की पढ़ाई में सच है अनाड़ी,
या जानता है मिलीभगत की इन्तजामी।
है अगर कवि और कविता का संगम,
फिर कवि प्रकृति की सर्वोत्तम है कृति,
कवि और कविता का भेद तो,
लगता बस शब्द उजाड़ और स्व-स्तुति।
- धरम चंद धीमान
*****
हम बन जाएंगे
हम बखुश्बू बन जाएंगे
तुम दरिया बनो
हम किनारा बन जाएंगे
तुम प्रेम मे डुबो
हम सहारा बन जाएंगे
तुम जंगल में खो जाओ
हम इशारा बन जाएंगे
तुम अंतरिक्ष में विचरण करो
हम ऑक्सीजन बन जाएंगे
तुम अश्क बहाओ
हम ख़ुशी भर जाएंगे
तुम अंधेरों में चलो
हम दिया बन जाएंगे
तुम महफ़िल सजाओ
हम गीत गुनगुना जायेंगे
तुम उड़ान भरो
हम फलक झुका देंगे।
- सदानंद गाजीपुरी
*****
स्नेह-डोर
दूजे मानव पर गुस्सा आया
दोनों ने कोहराम मचाया
तू तू मैं मैं,मैं मैं तू तू
पथ पर जाते हुए पथिक नें
स्नेह,प्रेम का पाठ पढ़ाया
समझ ना आया
क्लेश बढ़ा
हाथापाई पर बात बन आयी
प्रेम से रोटी बाँट कर,खाकर
एक श्वान आया,उन्हें बताया
"तुम दोनों ही गुस्से में हो
रुक जाओ थोड़ा
पानी पी लो
सोचो आखिर
इस झगड़े का मूल था क्या
लड़ना क्या आवश्यक है
या है इसका
कोई विकल्प
सोचो तो,थोड़ा रुक कर।"
दोनों मानव ने बात सुनी
उस वीर श्वान की
ठहरे पल भर,
पानी पीकर
सोचा और विचारा कुछ-कुछ
बनी सहमति उन दोनो में
नहीं लड़े फिर,
एक हुए
मन ही मन निर्मल-हृदय
श्वान को वंदन कर
साथ चले
उस पार क्षितिज के
स्नेह-डोर में बंधे-बंधे।
- अनिल कुमार मिश्र
*****
बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी
कौड़ियों की न रहेगी कीमत,
हैरान, परेशान न हो,
औकात जरूर दिखलाएगी
बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी...
मुर्गों की तरह न फड़ फड़ा
नहीं तो शामत जरुर आएगी,
चलेगा जब खंजर कसाई का
गर्दन साबुत न रह पाएगी
बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी...
देखा है रंजोगम में डूबते हुए,
जो बनते थे शहंशाह,
देखा है कुटिल चाल चलते
हिटलर को भी,
हाथ कुछ न आ सका
सिवाय गम के,
शेखी न ज़्यादा बघारा कर,
शामत तेरी भी आएगी
बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी...
सितम मुफ़्त में हर कहीं
न ढाए जा
अंजाम देख कर एक दिन
रूह जरूर कांप जाएगी
मृत्यु भी उस दिन
कहां बख्स पाएगी,
बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी...
- बाबू राम धीमान
*****
ज़माना है खराब
खुद को सुधारते नहीं कहते हैं ज़माना है खराब
संस्कारों की कमी ने कर दिया सब कुछ बर्बाद
आवोहवा ऐसी बदली की धुआं धुआं हो गया
पंछी उड़ गया जाल से देखता रह गया सैयाद
जुल्फें काली थी अब सफेद हो गई
जिंदगी यूँ ही झमेलों में गुज़र गई
दिल अभी भी समझता रहता है जवान
बहार आई भी और झट से निकल गई
मौके की तलाश में रहते हैं बनते है बहुत स्याने
बढ़ते जा रहे हैं आगे रिश्तों को लगा कर ठिकाने
अपनी अकड़ में रहते है लोग आजकल
रूठने पर कौन जाता है किसी को मनाने
विद्यार्थी अध्यापक को आंख है दिखाता
चोरी करता है जो वह पकड़ में नहीं आता
अपना कसूर हो तो चुप हो जाते हैं सारे
हो दूसरे का तो ज़माना बहुत शोर है मचाता
जुल्म को देख कर भी सामने से निकल हैं जाते
सच्चाई का साथ नहीं देते हैं डर जाते
ज़ुबान पर जैसे हो ताला लगा हुआ सबके
पूछे भी कोई तो कुछ नहीं हैं बताते
देना पड़ेगा सबको अपने कर्मों का हिसाब
लाना पड़ेगा थोड़ा अपने आप में भी बदलाव
बातें बनाने से ही यह दुनिया नहीं सुधरेगी
एक से एक जब मिलेंगे तभी तो आएगी इंकलाब
- रवींद्र कुमार शर्मा
खुद को सुधारते नहीं कहते हैं ज़माना है खराब
संस्कारों की कमी ने कर दिया सब कुछ बर्बाद
आवोहवा ऐसी बदली की धुआं धुआं हो गया
पंछी उड़ गया जाल से देखता रह गया सैयाद
जुल्फें काली थी अब सफेद हो गई
जिंदगी यूँ ही झमेलों में गुज़र गई
दिल अभी भी समझता रहता है जवान
बहार आई भी और झट से निकल गई
मौके की तलाश में रहते हैं बनते है बहुत स्याने
बढ़ते जा रहे हैं आगे रिश्तों को लगा कर ठिकाने
अपनी अकड़ में रहते है लोग आजकल
रूठने पर कौन जाता है किसी को मनाने
विद्यार्थी अध्यापक को आंख है दिखाता
चोरी करता है जो वह पकड़ में नहीं आता
अपना कसूर हो तो चुप हो जाते हैं सारे
हो दूसरे का तो ज़माना बहुत शोर है मचाता
जुल्म को देख कर भी सामने से निकल हैं जाते
सच्चाई का साथ नहीं देते हैं डर जाते
ज़ुबान पर जैसे हो ताला लगा हुआ सबके
पूछे भी कोई तो कुछ नहीं हैं बताते
देना पड़ेगा सबको अपने कर्मों का हिसाब
लाना पड़ेगा थोड़ा अपने आप में भी बदलाव
बातें बनाने से ही यह दुनिया नहीं सुधरेगी
एक से एक जब मिलेंगे तभी तो आएगी इंकलाब
- रवींद्र कुमार शर्मा
*****
मृत्यु
अभी मेरे सपने पूरे नही हुए,
नही जो पाया हूं अपनी जिंदगी।
अरे , अभी अभी तो ख्याल आया है,
कर लेने दो किसी चरणों की बंदगी ?
मेरा बेटा विदेश में पढ़ता है,
जरा मेरे सगे संबंधियों को आ जाने दो।
खून पसीना से कमाया हूं ये धन,
अरे इसका कुछ हिस्सा तो ले जाने दो ?
प्यार करता हु मैं जिससे,
एक बार उसकी बाहों में सो लेने दो।
बहुत रोएंगे मेरे सब अपने,
एक बार गले मिलकर रो लेने दो।
उसके बाद मृत्यु ने उस आत्मा को क्या कहा सुनिए-
क्यू नही हुए तेरे सपने पूरे ?
हमने समय तो तुम्हे भरपूर दिया।
पर तूने आलस्य, प्रमाद,घमंड में
उस समय को चकनाचूर किया।
दो पल कोई तेरे साथ न बैठा,
तु कहता जग साथी मेरा।
क्या? जायेगा कोई साथ तुम्हारे।
कौन है यहां अपना तेरा ?
पल पल उसके साथ रहा,
पर क्यू नही उससे प्यार किया ?
मैने तुम्हे जीने किन चाह दी थी,
फिर क्यों नही तूने अपनी जीवन जिया ?
वहां पर सिर्फ नौटंकी होगा,
जहां अर्थी पर तुम रहोगे पड़ा हुआ।
इतना सुनते ही उस आत्मा ने,
शरीर छोड़कर खड़ा हुआ।
- गगन कुमार
*****
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22 October 2025
दीवाली विशेष- 2025
दीपों का त्योहार
दीपों का त्योहार दीपावली है आई
सबके मन में खुशियां है छाई।
घर को रंग रोगन कर होती है तैयारी
इससे घर की शोभा लगती है न्यारी।
दो दिन पहले धनतेरस है आती
कोई नई वस्तु भी खरीदी है जाती।
मिट्टी के दीपक सबको है भाते
जगमग जगमग जलकर घर की शोभा है बढ़ाते।
पटाखे फूलझड़ियां व आतिशबाजी खूब है चलते
आसमान को रंग बिरंगी रोशनी से है भरते।
रिश्तेदार व मित्रों को मेहमान है बुलाते
मिलजुलकर खुशियां खूब है मनाते।
घर पर पारम्परिक पकवान है बनाते
मिठाईयां भी एक दूसरे को खूब है बांटते।
दिनभर बधाई संदेशों का आना जाना लगा रहता
कोई हैपी दिवाली तो कोई शुभ दीपावली है कहता।
रात को मां लक्ष्मी की पूजा भी है होती
जलती रहती है मां की अखंड ज्योति।
भगवान् राम चौदह वर्ष बाद अयोध्या लौटे थे आज
उनकी पितृ भक्ति और भातृ प्रेम पर हमें है नाज़।
रात का दृश्य बड़ा मनमोहक है लगता
घर, गांव, शहर दुल्हन सा है सजता।
खुशियों का त्योहार है खूब खुशियां मनाओ
आपसी प्रेम भाव भी खूब बढ़ाओ।
- विनोद वर्मा
*****
एक दिया
इंसान को अब बदलना चाहिए,
कभी नेक राह पर भी चलना चाहिए।
देखकर दुःख दूसरों का भी,
मन उसका ज़रा मचलना चाहिए।
जिम्मेदारियों से भरी जिसकी ज़िंदगी,
उसे घर से बाहर निकलना चाहिए।
लड़खड़ा ना जाएं दोनों क़दम कहीं,
तभी ज़्यादा नहीं उछलना चाहिए।
जुगनुओं ने रात कर दी है रोशन,
थके सूरज को अब ढलना चाहिए।
जिन घरों में अँधेरा हो रहा घना,
एक दिया वहाँ भी तो जलना चाहिए।
जगमगाता रहे सदा भारत देश मेरा,
यही ख़्वाब आँखों में पलना चाहिए।
- आनन्द कुमार
*****
दिलों में रौशनी के दिए जलाना है,
अँधेरों को मन के अब मिटाना है।
ज़माने की गुजरती धूल में यारों,
उम्मीदों के रंगों को सजाना है।
रात भले ही हो ये काली काली,
रूह में रौशनी का राग जमाना है।
घरों की चौखटों पर मुस्कान सजी है,
हर सीढ़ी रंगों से महक उठी है।
आतिश बाजी का शोर बहुत है,
फिज़ाओं में कुंदन सी सूरतें चमक रही हैं।
दीपावली, अब सिर्फ़ एक रस्म नहीं है,
हमारी तहज़ीब की ये पहचान बनी है।
हर दिया जो जलता है सच्चे दिल से,
अमन और ख़ुलूस की खुशबू आए,
मुखड़ों पर अपने पन की छटा लहराए।
- डॉ. मुश्ताक अहमद शाह सहज
*****
चलो दिवाली मनाएं
चलो घी के दीपक जलाएं,
जलाएं नए ऊर्जा उत्साह से,
चलो दिवाली मनाएं ऐसे,
मनाएं एक नए अंदाज़ में।
जगमग जगमग रौशन हो,
ऐसे दीपक जलाएं हम,
चलो दिवाली मनाएं ऐसे,
मनाएं एक नए अंदाज़ में।
क्यूं न अज्ञानता को मिटाएं,
ज्ञान के नए दीप जलाएं,
चलो दिवाली मनाएं ऐसे,
मनाएं एक नए अंदाज़ में।
पटाखे फुलझड़ियों का प्रदूषण रोकें,
तेल घी के दीपक जलाएं,
घरों को रंगो की रोशनी से सजाएं,
दीवाली मनाएं नए अंदाज में।
- कैप्टन जय महलवाल 'अनजान'
*****
अक्टूबर की यादें...
पता नहीं, अक्टूबर माह किसकी याद दिलाता है!!
आते हुए दीपावली की, झरते हुए शिवली की,
और नज़दीक आती छठ पूजा की।
छठ तो मानो हमारे हृदय, रक्त, और हर धड़कन में व्याप्त है।
दशहरा के साथ ही मन में छठ की प्रतीक्षा शुरू हो जाती थी।
कानों में कहीं दूर से “बहंगी लचकत जाए... की धुन गूंजने लगती है।
गेहूं चुनना, धोना, सुखाना, पिसवाना,
लौकी की सब्जी, चने की दाल, बचका क्या-क्या गिनवाऊं!
खरना की शुद्धता, डूबते सूरज का अर्घ्य,
उगते सूरज की लालिमा और फिर पारण का संतोष...
फिर पूरे वर्ष छठ के इंतज़ार की शुरुआत।
छठ के बाद जैसे वातावरण में एक शांत सूनापन उतर आता है,
और फिर धीरे-धीरे वर्ष भी विदाई की ओर।
2025 अब अपने अंतिम पायदान पर खड़ा है...
देखें 2026 क्या लेकर आता है।
ईश्वर करे आने वाला वर्ष सबके लिए मंगलमय हो,
हर व्यक्ति हर पर्व पूरे हर्ष से मना सके।
दीपों-सी उजली हों आपकी भावनाएँ,
और सवेरे सूरज-सी नई उम्मीदें लाएँ।
इसी शुभकामनाओ के साथ।
जोड़े जोड़े फलवा सूरज देव घटवा पे तिवई...
जय हो छठी माई
- सविता सिंह मीरा
*****
दीपावली का अर्थ यही कि, हर छाया से संवाद करें,
मिट्टी के ये दीप बताते हम सबको सृष्टि भी क्षणभंगुर है,
जब प्रेम की लौ जलती हो, हर क्षण आयु का अंकुर है।
अंधकार शत्रु नहीं, अवसर है, प्रकाश को पहचानने का,
मौन में जो संगीत बसे, वही सत्य है जीवन जानने का।
दीपावली का अर्थ यही कि, हर छाया से संवाद करें,
अपने भीतर के रावण को, राम के दीप से याद करें।
संसार के द्वार सजते रहेंगे, पर आत्मा का कक्ष जगाना है,
लक्ष्मी जी भी आएंगी द्वारे , दीप प्रेम का हमें जलाना है।
जग मगाए दीप मनोमंदिर में, स्नेह, क्षमा और साधना के,
सच्ची रोशनी वही है,जो आती है आत्मपथ विवेचना से।
- डॉ मुश्ताक अहमद शाह
*****
दिवाली ऐसे मनायें
आओ इस बर्ष हम दिवाली ऐसे मनायें,
डी.जे . की धुनों से शोरगुल न मचाएं।
जुए और शराब के भी न चलायें दौर,
बचपन किसी का न छिने करें हम गौर।
पटाखा रहित दिवाली की परम्परा चलायें,
ध्यान रहे पड़ोस में कोई भूखा न सो जाए।
खुद के कपड़ों पर हम खर्च न करें यूँ अथाह,
फुटपाथ पर न रहे कोई चिथड़ों में लिपटा।
राम के चरित्र के आदर्श हम जीवन में उतारें,
सत्यपालन ,सयमीं बन अपना जीवन सँवारे।
अपने कर्तव्यों का बखूबी हम पालन करें सदा,
लोभ-लालच त्यागें न भूलें हम कुल मर्यादा।
दीप जला मिटाएं अमावस निशा का अँधियारा,
सकारात्मक उर्जा से भरा हो तन -मन हमारा।
करें लक्ष्मी विनायक पूजन रख मन में श्रदा भाव,
आदर और सम्मान से भरा हो हमारा स्वभाव।
आस पास के साथ ही मन को भी स्वच्छ बनाएं,
दुर्भावना और द्वेष का कूड़ा मन में न हम जमाएं।
ईर्ष्या ,घृणा जैसी बुराइयां हम मन में न पालें,
नीति, न्याय और मेहनत से देश ,समाज संभालें।
पटाखे कम फोड़े हम ,मानव से मानव को जोड़े,
पर्यावरण को भावी पीड़ियों को स्वच्छ हम छोड़े।
भरत, लक्ष्मण से लें शिक्षा , भाईचारा हम बढ़ाएं,
राघव, जानकी के नैतिक मूल्यों को हम अपनाएं।
- लता कुमारी धीमान
*****
प्रकाश पर्व दीपावली
अज्ञान पर ज्ञान की,
अधर्म पर धर्म की,
बुराई पर अच्छाई की,
झूठ पर सच्चाई की,
तिमिर पर प्रकाश की
अमानवता पर मानवता की
विजय का प्रतीक है दीपावली
प्रभु राम जैसा स्वामी,
बजरंगबली जैसा सेवक,
भरत, लक्ष्मण जैसे भाई,
माता जानकी जैसी भार्या
वानर राज सुग्रीव जैसा मित्र
बनने की सीख देता है
पावन पर्व दीपावली
दीपों से आलोकित हर निकेतन है
पटाखों के शोर से, आनन्दित हर मनुज है
आतिशबाजी के रंग-बिरंगे प्रकाश से,
नहाया ये गगन,ये अंबर है
पकवानों, मिष्ठानों की मिठास से
हर उर हर्षित है,आनन्दित है
अन्त में दिव्यता और धार्मिकता के साथ
माता लक्ष्मी और विघ्नहर्ता गणपति का
भजन,अर्चन एवं पूजन है
आओ आनंद से, उल्लास से
प्रभु श्रीराम के चरित्र को
जीवन में अपनाते हुए
प्रकाश पर्व, आनंद पर्व दीपावली मनाएं।
- प्रवीण कुमार
*****
आओ मिलकर दीप जलाएं
दीपों के संग दीपोत्सव पर,
गणेश संग माँ लक्ष्मी आए,
संग में माँ सरस्वती को लाए,
ईश-कृपा की आशीष पाएं,
हम समस्त परिवार पर।
चेहरों पर मुस्कान सजाएं,
थोड़ा-सा हम प्यार लुटाएं,
किसी बेबस और लाचार पर।
आओ मिलकर दीवाली मनाएं,
माँ लक्ष्मी का आशीष पाएं।
मुरझाए चेहरों को खिलाएं,
अपने अगर रूठे हों- मनाएं।
मन से अंधियारे को मिटाएं,
आओ मिलकर दीप जलाएं,
दीपोत्सव का आनन्द उठाएं,
मिल-कर सब दीवाली मनाएं।
- कंचन चौहान
*****
सही मायने में तो दीपावली वो नहीं,
जो बिजली की रौशनी से जगमग हो जाए,
जो अँधेरों में भी उम्मीद बन जाए।
जब कोई भूखा मुस्कराए रोटी पाकर,
जब कोई बूढ़ा हाथ थामे सहारा पाकर,
जब किसी रोते बच्चे की आँखों में हँसी लौटे,
तभी असली दीप जलता है- इंसानियत का होकर।
ना दिखावे की रोशनी, ना शोर की पिटारी,
असली दीवाली तो है मन की उजियारी।
जो हर दुखी के जीवन में मुस्कान जला दे,
जो हर दिल में प्रेम का दिया सजा दे।
भगवान वहीं खुश होते हैं सच्चे दिल से,
जहाँ करुणा बहती है हर एक सिलसिले से।
तो आओ, इस बार दीप जलाएँ इंसानियत के नाम,
मन में दया, प्रेम और सेवा का करें हम प्रण हर शाम।
- बीना सेमवाल
*****
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