साहित्य चक्र

19 April 2022

कविताः पाप-पुण्य



क्या है पाप पुण्य !
उचित अनुचित, भला बुरा- 
यह कार्य धर्मानुकूल है, 
और यह कार्य अधर्म है !

कर्म तो कोई भी बुरा नहीं,
सिर्फ व्यवस्था से रूप बदल जाता है, 
वही कर्म किसी के लिए पाप, 
तो किसी के लिए पुण्य बन जाता है !

रोग मुक्त होने के लिए औषधि का सेवन उचित है,
और उन्मत्त  होने के लिए उसका सेवन अनुचित है-
किसी दुष्ट  घातक प्राणी को मारा जाए तो वह हिंसा उचित है,
और किसी निर्दोष को मारा जाए तो वही हिंसा अनुचित है !

एक व्यक्ति का आत्मसम्मान दूसरे के लिए घमंड हो सकता है,
एक कलम प्रेम को व्यक्त भी करती है, 
उसी से किसी की मृत्यु भी लिखी जा सकती है -
उत्तम कार्य में नीयत का होना अनिवार्य है,
स्वयं का किया कर्म सही, 
वही दूसरे के द्वारा हो तो गलत,
क्या है सही गलत-पाप पुण्य धर्म अधर्म, 
कौन परिभाषित करता है ?


कविताः माता-पिता




जब 1 साल के थे हम बच्चे,
नहला के पहनाते थे कपड़े वह अच्छे!

उस वक्त रो-रो कर उन्हें परेशान किया,
फिर कपड़े गंदे करके, उन्हें हैरान किया !

हुए 2 साल के, चलना उन्होंने सिखाया,
चलना आते ही हमें, उनके हाथ ना आकर, उन्हें बहुत भगाया!

4 साल के होने पर पेंसिल से उन्होंने लिखवाया,
हमने सारी दीवारों पर उन्हें पेंसिल से बनाए चित्रों को दिखाया!

5,6 से साल के होने पर विद्यालय छोड़ने जाते वह,
हम रो-रोकर मना करते, नहीं जाएंगे, हमको फिर समझाते वह!

7 साल के होने पर, लाए वह हमारे लिए बैट बॉल,
हमने थोड़ी पड़ोसी की खिड़कियां और बनाए निशान गोल!

8 साल के होने पर भी कोई कसर न छोड़ी हमने,
आइसक्रीम खरीदी उन्होंने, और कपड़े खराब किए अपने!

9, 10 साल के होने पर' कहीं बाहर दिखाने ले गए वह कार्यकर्म,
माता पिता के पास में बैठे के, उनसे कहते दोस्तों के पास बैठ जाए हम?

11 12 साल के होने पर हमें वह बताने लगे ऐसे कपड़े पहनो, ऐसे बाल बनाओ,
हमने कहा फैशन बदला, जमाना बदला, प्लीज आप हमें ना समझाओ!

13 14 साल में जब आते हम विद्यालय से,
वह चाहते हमारे बच्चे आकर हमें गले मिले!

जाते हम दूसरे कमरे में, कर लेते दरवाजा बंद,
दो पल भी नहीं बैठ के करते उनसे बातें चंद!

16, 17 साल के होते ही दीलाई उन्होंने बाइक और स्कूटी,
ले गए पास मैं जा रहे बोलकर, तेज चला कर हड्डी पसली टूटी!

18, 19 साल के होने पर बाहर कॉलेज में डाला,
हमने कहा हमें चाहिए कॉलेज विदेश वाला!

कुछ वक्त की दूरी नहीं सहन होती उनसे,
पर हमें जाना है लंदन, पेरिस, यू एसए!

हुए कुछ बड़े 25, 26 साल,
पूछा उन्होंने शादी का सवाल!

जवाब दिया उनको यह आपका काम नहीं,
आपको नहीं पता कौन होगा हमारे लिए सही!

30 साल के होने पर कहने लगे, तुम्हारे बच्चे नहीं कर रहे सही,
बच्चों ने जवाब दिया, मां अब पुराने जमाने वाली बात नहीं रही! 

40 50 साल के हो गए, पूरी जिंदगी वह माता- पिता ने कराए मौज,
आज जब बूढ़े हो गए, तो लग रहे हैं हमें बोझ!

सारे बच्चों यह याद रखो,
जिस दिन वह चले जाएंगे,
हम खुद को, कैसे संभाल पाएंगे!

बिना निस्वार्थ के जितना प्यार दिया उन्होंने तुमको,
तुम भी कम से कम निस्वार्थ प्यार देना उनको!

क्योंकि एक ही माता पिता मिलेंगे हमें,
मिल जाएंगे सो रिश्ते,
फिर वक्त निकलने पर, चाहे हम लगाएं लाखों किस्ते!

और फिर कहेंगे जिंदगी भर,
एक माता-पिता ही है जो देते साथ,
कभी ना छोड़ो उनका हाथ,
दिन हो या हो रात, करना चाहे हमसे बात,
पर उनकी कदर ना समझी हमने कभी,
यह बात हम को समझ में आई अभी!
यह बात हम को समझ में आई अभी!


                                                                 डॉ. माध्वी बोरसे


दोहेः वीर



वीर देश की शान  है, रखे देश का मान।
मातृभूमि की आन में,करें निछावर जान।।


लहू बहा कर देश में, बढ़ा लिया जो मान।
नमन करें उस वीर को,करें सदा बलिदान।।


त्याग और बलिदान में , करें नहीं ये देर।
डरे  नहीं  है  वीर ये, करें  वहीं  पर ढेर।।


वीर देश की जान है, सभी करें गुणगान।
मिले जगत में वीर को,सदा वीर सम्मान।।


बढ़े देश का मान है, नमन करो सब आज।
लाल लहू  से  सींचते, रखे  देश की लाज।।


लाल लहू को देख के, शत्रु  गए अब भाग।
मातृभूमि की आन में, दिए प्राण को त्याग।।


तीन रंग की  शान  में,खड़े  वीर है आज।
सफल हुए हैं देश में ,सभी वीर सरताज।।


वीर धरा के लाल ये, मातृभूमि के अंग।
शत्रु मिले है  धूल में, करें  रोज है जंग।।


शत्रु  डरे  है  वीर  से, रखे  देश की लाज।
मातृभूमि की लाज में, करें वतन के काज।।


शीश चरण में डाल के, रखे देश का मान।
वीर  धरा के  लाल है, रखे  नयी पहचान।।


धीर वीर  से देश से, बढ़े देश का मान।
मात धरा है बोलती, यही सदा है जान।।


लोग कहे सब बात ये,उच्च सदा ये लाल।
शत्रु घटे हर  बार हैं, डरे  इन्हीं से  काल।।


बहा  लहू है  देश में, रखा सदा जो ध्यान।
नमन करें जो वीर को, बढ़े उसी का मान।।


युद्ध छिड़ा है देश में, वीर करें बलिदान।
शत्रु मिटे हैं आज ये, रखे देश की आन।।


कहे देश के वीर ये,यही जगत की रीत।
सर्व धर्म का देश ये,देश  प्रेम ही  मीत।।


लोग कहे सब बात ये,उच्च सदा ये लाल।
शत्रु घटे  हर बार हैं, डरे  इन्हीं  से काल।।

वीर देश के जानिए,  यही देश की जान।
बने देश की छाँव ये, करें सभी यशगान।।


अमर रहे सब वीर ये, लोग कहे अब गाँव।
देव मूर्ति हैं  रूप  ये,यही  धरा  की  छाँव।।


करें दुआ हैं लोग सब, खिले धरा में फूल।
वीर  देश की  नींव  हैं,  शत्रु चटा दे धूल।।


वीर  रखे  हैं  भाव  ये , देश  प्रेम  आधार।
प्रेम भाव सब कहीं हो,यही जगत का सार।।


                                                  कल्पना भदौरिया "स्वप्निल"


कविताः मेरी कलम





ऐ कलम, मेरी कलम,
करूँ मैं तुझको नमन।
ऐ कलम...

तुझसे विनती है खास,
 करूँ लिखने का प्रयास।
तब  देना  तुम  साथ,
सदा  रहना  मेरे  हाथ।
ऐ कलम...

मेरी लेखनी में हो दम,
रहे  न   कोई   भ्रम,
पढ़कर मेरे विचार,
सुखमय हो संसार।
ऐ कलम...

भरकर उमंगो का रंग,
लेकर अपनों का संग।
रहे  कोई  न  उदास,
पूरी हो सबकी आस।
ऐ कलम...

मिले ज्ञान का प्रकाश,
रच  दूँ  मैं   इतिहास।
मिटे  बैर  का  भाव,
बढ़े मैत्री का प्रभाव।
ऐ कलम...

सकारात्मक हो विचार,
करूँ  इसका  प्रसार।
रच दूँ सुंदर कोई गान,
बने जो मेरी पहचान।
ऐ कलम...

एक-एक शब्द में हो दम,
रुके न कभी मेरी कलम।
देना   सदा  मेरा  साथ,
थामे रखना मेरा हाथ।
ऐ कलम...


                                       कुमकुम कुमारी "काव्याकृति"



कविताः नारी महिमा





चाँद की तरह शीतल है नारी।
सूर्य की तरह तेजस्वी है नारी।।
धरती की तरह धैर्यवान है नारी।
सागर की तरह है गंभीर है नारी।
हिमालय सी विशाल है नारी।
वायु सी गतिमान है नारी।

नारी यदि दादी है तो दया का अवतार  है।
नारी यदि काकी  है तो करुणा का भंडार है।
नारी यदि भाभी है तो भावना का समर्पण है।
नारी यदि पत्नी है तो प्यार का दर्पण है।

नारी बहन बेटी है तो सब बन्धनों का अहसास है।
नारी यदि माँ है तो साक्षात परमात्मा है।
नारी कभी हारती नहीं उसे हराया जाता है।
लोग क्या कहेंगे यह कह कर डराया जाता है।

नारी यदि ठान ले तो मौत से भी लड़ जाती है।
नाजुक है अबला नहीं बलशाली हर नारी है।

सबको जीवन देने वाली नारी है।
संस्कारों की सौगात सिखाती नारी है।
आसमान में उड़ान भरती नारी है।
समुद्र में गोता लगाते नारी है।

नारी वो एहसास है जिसके लिए शब्दों की कोई अभिव्यक्ति नही।
कर सके जो उसे पूरी तरह से व्यक्त किसी भाषा में ऐसी शक्ति नहीं।।

                                        अर्चना लखोटिया