साहित्य चक्र

25 October 2024

कविता- अजनबी कौन हो तुम ?

!! अनमोल रिश्तें !!

आपस में रिश्ते एक स्नेह की जंजीर है।  
यह मानो एक डोर है यह एक अंजीर है।

ना तुम साथ रहकर निभा पाए। 
ना तुम अलग रहकर जोड़ पाए। 

गुजर रही है जिंदगी कब करोगे कोशिश? 
क्या? कभी नहीं नमाओगे अपना शीश?

संभलने को तो अभी-भी शेष है।
जान लो तुम अभी-भी विशेष है।

सर झुका कर हाथ ही तो आगे बढ़ाना है। 
बस सामने रिश्तों का अनमोल खज़ाना है।

*****




अजनबी कौन हो तुम ? 
मैं बात कर रही हूँ और मौन हो तुम।

क्या, आंखों-आंखों में ही सब कहोगे ? 
अपने दिल की बात मुझसे नहीं कहोगे। 
मुझे समझ नहीं आया तो क्या करोगे?  
तब तो मौन व्रत तोड़ोगे।

अजनबी कौन हो तुम ? 
मैं बात कर रही हूँ और मौन हो तुम। 

क्या, हाथों में हाथ ले दोगे मेरा साथ ? 
क्या, ऐसी भी होती है कभी मुलाकात ? 
ये कैसा रिश्ता है मौन में भी पिसता है ?
क्या तू कोई फरिश्ता है ?

अजनबी कौन हो तुम ? 
मैं बात कर रही हूँ और मौन हो तुम।

                                                     - संजय एम. तराणेकर 


22 October 2024

कविता- मेरा अस्तित्व




               क्या मेरे अस्तित्व के 
               कोई मायने
               रहेंगे ?
               अगर मैं उतार भी दूँ
               चेहरे ओर से चेहरा
               मेरे स्वयं का
               अस्तित्व ही पिघल
               जायेगा
               और
               मैं अनाम हो जाऊंगी।

                  तेज झंझावतों में उठे
                  धूलकणों की तरह
                  हो चुका होगा
                  जर्जर मेरा अंग-प्रत्यंग
                  मेरा वर्ण धीमा हो जाएगा
                  चेहरा, चेहरा नही रहेगा।

               काश !
               मेरी थोड़ी-सी सांस
               मेरी इच्छा के
               अधीन हो,
                    यह कौन-सी आज्ञा लेकर
                    तुम आये हो।

               मैं अकेली-सी पड़ गईं हूँ,
               मन करता है
               कि मैं
                अपने जख्म दिखा दूँ
                अपना आवरण उतार दूँ
                तब क्या
                मेरे अस्तित्व के
                कोई मायने रहेंगे ?
                  अगर मैं स्वयं ही 
                 आवरण उतार दूँ तो
                 मेरा नाम ही खो जायेगा।


                        - डॉ. पल्लवी सिंह 'अनुमेहा'


21 October 2024

कविता- बेटी




जब-जब बेटी आती,
धरा पर संग लाती,
खुशियां अपार,
ईश्वर का उपहार हैं बेटियॉं, 
सूर्य की प्रथम किरणें हैं बेटियॉं,
माता-पिता की भौंर हैं बेटियॉं,
तारों से शीतल छाव हैं बेटियॉं,
घर-प्लऑंगन में चिड़ियों-सी,
चहचहाट हैं बेटियॉं,
गुलाब,जूही,चंपा,चमेली,
मोगरा-सी खूशबू हैं बेटियॉं, 
दो कुल को रोशन करती हैं बेटियॉं,
कोयल-सी मधुर गीत हैं बेटियॉं,
माता-पिता का सौभाग्य होती हैं बेटियॉं,
पंचामृत में तुलसी-सी हैं बेटियॉं,
मॉं की सखि हैं बेटियॉं,
खिलती कली है बेटियॉं, 
पुलकित सुमन-सी हैं बेटियॉं,
मॉं बाप का दुख-दर्द दूर करती हैं बेटियॉं,
घर की रोशनी हैं बेटियॉं, 
परसों होती हैं बेटियॉं,
अंश और गर्व होती हैं बेटियॉं,
संस्कार और संस्कृति हैं बेटियॉं, 
बाग और दुआ हैं बेटियॉं,
देवी का रूप हैं बेटियॉं, 
मॉं की इच्छा हैं बेटियॉं, 
पिता का अभिमान हैं,बेटियॉं,
चंदन की महक हैं बेटियॉं,
पापा की लाड़ली दुलारी परी हैं बेटियॉं।

                                         - संगीता सूर्यप्रकाश मुरसेनिया 


कविता- जीवन हमारा होगा




चाँदनी रातों  में जो साथ तुम्हारा होगा,
कितना खुशहाल ये जीवन हमारा होगा।

अँधेरी रातों में जो हाथ तुम्हारा होगा,
जिंदगी जीने का एक सहारा होगा।

कि अगर कर दिया तुमने इशारा तो,
फिर तो मुझे मरना भी गवारा होगा।

यु लहरों को मिलता किनारा होगा,
डूबते को तिनके का सहारा होगा।

हँसते हुए पी लेते हैं ग़मों का साग़र,
हमको कभी तो तुमने पुकारा होगा।

तुम्हारे अलावा भी कोई हमारा होगा,
यह हमको कभी नहीं गवारा होगा।

कुछ यूँ तड़पाता है दिल तन्हाईयों मे,
क्या ऐसा प्यार भी तुम्हें दुबारा होगा।

                                             - अनिल चौबीसा


20 October 2024

कविता- आंगन में बेटी




खेलती है बेटी जब आंगन में
किसका मन नहीं खिलता है
बेटी का संग जीवन में
किस्मत वालों को ही मिलता है

आँगन में बेटी जब हंसती है खिलखिलाती है
हंसी उसकी देख खुशी दुगनी हो जाती है
लिपट जाती है जब दौड़ कर वह गले से
सारी थकान दिन भर की पल में उतर जाती है 

आंख से नहीं दिखता था बाप को
बेटी रोज़ वीडियो कॉल लगाती थी
उसका चेहरा तो बाप देख नहीं पाता था
बाप को खुश देखकर बेटी खुश हो जाती थी

दूर हो सकता है बेटा 
बाप की दौलत की चाह में
लेकिन बेटी छोड़ नहीं सकती कभी
माँ बाप को अकेली सुनसान राह में

बेटी से है घर की रौनक 
खुशियां मिलती है अपार
चली जाती है जब बेटी
लगता जैसे रूठ गई हो बहार

                               - रवींद्र कुमार शर्मा