साहित्य चक्र

06 January 2024

सच्चा प्रेम बस साथ देता है





मजबूरियां ओढ़ दूर हो जाने पर,
जिम्मेदारियां पहन मुस्कुराने पर,
अकेली रातों में छोड़ जाने पर,
चुप रह कर,
सब सहकर,
प्रेम विश्वास देता है।

छोड़ दो या लौट आओ..
रूठ जाओ या मनाओ..
हार कर उस प्रेम को चाहो तो सब जीत जाओ..
हार में भी खुशियां तुम्हारी स्वीकार लेता है..।

दूर जाओ, 
पास आओ,,
हर तरफ से बढ़ा स्नेह वह हाथ देता है,,
सच, जो प्रेम है सच्चा..
हमेशा तुम्हारा साथ देता है..
आंसू चुनो, या खुशियां चुन लो..
सच्चा प्रेम बस साथ देता है..।

 - सौजन्या

"माँ" एक अनमोल रिश्ता

"माँ” ये शब्द बड़ा अनमोल है। माँ शब्द ही नहीं बल्कि हमारे जीने का आधार है। बिना माँ के जीवन जीना बहुत मुश्किल है। जब तक सुबह सुबह आपकी आवाज न सुन लेता था, तब तक ऐसा लगता था कि सुबह हुई ही नहीं है। "माँ" और भगवान में कौन बड़ा है, ये सोच कर बड़ी असंजस में पड़ जाता हूँ। किसी के भी जीवन में एक माँ, सर्वश्रेष्ठ और सबसे महत्त्वपूर्ण होती है, क्योंकि कोई भी उनके जैसा सच्चा और वास्तविक नहीं हो सकता। माँ हमेशा हमारे अच्छे और बुरे समय में साथ रहती थी।






"माँ" के लिए उनके बच्चे बहुत कीमती होते हैं। अपने जीवन में दूसरों से ज्यादा वो हमेशा अपने बच्चों का ध्यान रखती है और प्यार करती है। अपने जीवन में वो अपने बच्चों को पहली प्राथमिकता देती है और उनके बुरे समय में उम्मीद की रौशनी जला देती है।

जिस दिन हम पैदा होते है वो "माँ" ही होती है जो सच में बहुत खुश हो जाती है, वो हमारे हर सुख-दुख में हमारा साथ देती हैं और कोशिश करती है कि हमारी सारी परेशानियाँ हल कर दें। मुझे आज तक पता नहीं चल पाया है कि जो मेरे मन में चल रहा होता था,वो मेरी माँ को कैसे पता चल जाता था। "माँ" और बच्चों का रिश्ता बहुत ही अनमोल होता है, जो कभी खत्म नहीं हो सकता है, कोई भी माँ कभी भी अपने प्यार और परवरिश में कमी नहीं लाती है।

लोग कहते है कि भगवान दिखाई नहीं देता,लेकिन मैं कहता हूँ कि "माँ"आप ही मेरे भगवान हैं। मैं कहता था "माँ" मैं आपके लिए दुनिया की हर ख़ुशी को आपके चरणों में ला दूँगा,बस आप हमेशा मेरे साथ रहना, मुझे छोड़कर कहीं मत जाना। “माँ” शब्द सिर्फ कहने में एक अक्षर का हो सकता है, लेकिन कैसे बताऊँ मैं इस एक अक्षर के शब्द में कुटुंब समाया हुआ है। लोगों के जीवन में सबसे अहम किरदार सिर्फ "माँ" का ही होता है। किसी भी व्यक्ति के इस संसार में आने पर सबसे पहले एक ही शब्द निकलता है “माँ”।

दुनिया की सबसे बड़ी गुरु "माँ" होती है, सही गलत का अर्थ माँ बचपन से ही बताती है, माँ ही होती है जो सबसे ज्यादा प्यार करती है। माँ भगवान का दूसरा रूप होती है। माँ का कहना जो मान लेता है वो सच में कामयाब हो जाता है। जीवन में चाहे कितनी भी तरक्की पा लो, पैसा कमा लो, लेकिन सच मायने में केवल यही कहूँगा कि यदि “माँ” खुश नहीं,तो कितना भी पैसा कमा लो सब रद्दी है।

"माँ" का होना जीवन का सबसे अहम भाग होता है। हर किसी के माँ  नहीं होती। लेकिन जिसके होती है वो सच में किस्मत वाला होता है। एक दोस्त, एक बहन, एक भाई, एक गुरु, और कभी कभी एक पिता का अभिनय निभाती है, जो उसे “माँ” कहते है। जब जेब खाली होती है तब पिता से लड़ कर हमें पैसे देती है I हमारे मन की चीजें पहले ही जान लेती है, वो होती है “माँ”। कहने को इतने शब्द हैं मगर मैं सिर्फ इतना ही कहता था कि “माँ” चाहे कुछ भी हो जाए, मुझे मत छोड़ना, मैं तुम्हारे बिना अकेला नहीं जी सकता इस दुनिया में।

“माँ” का रिश्ता केवल माँ ही निभा सकती है। माँ वो है, जो खुद साधारण साड़ी पहनती है लेकिन अपने बच्चों को नए कपड़े दिलाती है। माँ वो होती है,जो हमें जीवन जीने का तरीका सिखाती है। माँ के बिना जीवन अधूरा है। "माँ" के चले जाने के बाद भी उनके लिए कुछ अगर कर सकूँगा तो किस्मत वाला मानूँगा अपने आप को।

माँ हमारे जीवन का वो हिस्सा होती है जिसके बिना जीवन जीना बहुत मुश्किल हो जाता है। बेटे का प्यार माँ के लिए कम हो सकता है,लेकिन माँ का प्यार अपने बच्चों के लिए कभी कम नहीं होता। चाहे रात को माँ भूखी सो जाएँ,मगर अपने बच्चों को कभी भूखा नहीं सुलाती,ऐसी होती है माँ।

माँ अपने बच्चों से बहुत प्यार करती है I चाहे खुद फटे पुराने कपड़े पहन ले,मगर अपने बच्चों के लिए नए कपड़े खरीद कर देती है I खुद गीली जगह सो कर बच्चों को सूखे में सुलाती है माँ I माँ के बारे में कहना बहुत ही गर्व की बात है,बड़े ही किस्मत वाले होते है जिनकी माँ होती है।

माँ हमेशा अपने बच्चों के साथ रहना चाहती है। जब बच्चा स्कूल से आ जाता है,तो माँ उसको खाना देती है। उससे पूछती है कि आज स्कूल में क्या-क्या हुआ और खाना पूरा खाया कि नहीं I और यदि आपको न पता हो तो मैं बता दूँ कि एक माँ अपने बच्चों के लिए कुछ भी कर सकती है,जैसे की मेमने (बकरी का बच्चा) के लिए उसकी माँ शेर से भी लड़ने की हिम्मत रखती है और अपने बच्चे की रक्षा करती है।

माँ अगर बच्चे से नाराज हो जाये,तो भी ज्यादा देर तक बिना बोले नहीं रह पाती है। माँ अपने बच्चों की खुशी के लिए निर्जल उपवास रखती है और बिना खाए पानी पिए पूरा दिन रह लेती है। पता नहीं चलता कि "भगवान ही माँ हैं" या फिर "माँ के रूप में भगवान आते हैं" इस दुनिया में, हमारी रक्षा के लिए।



                                                                            - गोपाल मोहन मिश्र


05 January 2024

परिवर्तन



उतरे चेहरे को लेकर मंत्रीजी ने अपने घर में प्रवेश किया। वो चाहते थे कि सबसे लड़ें,पूछें कि उन्हें सत्ता में वापिस क्यों नहीं आने दिया गया ? क्यों जनता को उनसे इतनी नफरत हो गई कि पार्टी को जिताना तो दूर वो स्वयं भी अपनी जमानत नहीं बचा पाए। 





एक ऐसा इंसान जिसे लोग पहचानते ही नहीं हैं, कैसे जीत सकता है ? सारे समीकरण उलट गए थे। सबसे अधिक कष्ट इस बात का था कि उनकी पत्नी का वोट भी दूसरी पार्टी को चला गया था। अखबारों की सुर्खियों में यही चर्चा हो रही थी। घर में उन्होंने अंदर प्रवेश नहीं किया। ड्राइंग रूम में सोफे पर निढाल होकर लेट गए और नौकर को आवाज़ लगाई," रामलाल थोड़ा पानी लाओ।" आज़ आवाज़ में आदेश नहीं था। रामलाल खुशी खुशी दौड़कर पानी ले आया। मंत्रीजी का अवसाद और भी बढ़ गया। ,"सभी खुश हैं मेरी हार से।" उन्होंने मन ही मन बुदबुदाया। पत्नी चकित थी कि आज़ पतिदेव के तेवर बदल कैसे गए थे ?" 

पास में सोफे पर बैठ कर उन्होंने नेताजी से पूछा," सर दबा दूं क्या ? तबीयत ठीक नहीं लग रही है।" नेताजी ने पत्नी की बात सुनकर घूरकर उसे देखा।," इतनी चिंता क्यों करती हो? वोट डालते समय चिंता नहीं थी मेरी। तुम तो चाहती ही हो कि मैं दुख में डूब जाऊं।" पत्नी ने बात संभालनी चाही," ऐसा क्यों कहते हो नेताजी ? आपके दुखी होने से क्या मैं सुखी रह सकती हूं?" नेताजी ने आंखें खोल कर पत्नी का चेहरा देखा," बता सकती हो तुमने दूसरी पार्टी को वोट क्यों दिया?" उन्होंने सीधा प्रश्न पूछा। पत्नी के चेहरे पर अनायास ही मुस्कुराहट आ गई। ," नेताजी मुझे अहसास नहीं था कि मेरे वोट के बिना आप जीत ही नहीं पाओगे। मुझे यही लगा कि मेरी तरह मेरा वोट भी आपके किसी काम का नहीं है।" नेताजी पत्नी की बात सुन रहे थे। 

शायद सालों बाद। बात के पीछे के मर्म को समझ रहे थे शायद पहली बार। उन्होंने व्यंग्य से पूछा," तो अपना महत्व बताने के लिए तुमने ऐसा किया ?" पत्नी उठ कर खड़ी हो गई। ," नहीं नेताजी बस आपको घर वापिस लाने के लिए ऐसा किया। कई सालों से आप भूल गए थे कि आपका घर कहां है? पत्नी कैसी है?" आज़ नेताजी अपने घर में अपनापन महसूस कर रहे थे। दिल का बोझ उतर रहा था। जाने क्यों हार अच्छी लग रही थी। सोफे से उठे और बाथरूम में जाकर देर तक नहाते रहे। उन्हे मालूम था अब कोई पूछने नहीं आएगा। लोगों का जमावड़ा अब जीतने वाली पार्टी के दफ्तर के बाहर लगा था। नेताजी ने पत्नी के हाथ की बनाई चाय पी और चुस्कियां लेते हुए सोचा," हारता नहीं तो यह सुकून नहीं नसीब होता।" पूरे घर में जैसे रौनक छा गई थी। 

"रंजना चलो सुगनचंद को जीत की बधाई दे आते हैं। तुमने उसे विजयी बनाया है। मेरा इतना फर्ज तो बनता है।" उन्होंने हंसकर कहा तो पत्नी तुरंत तैयार होने चली गई। बेटा,बेटी और उनकी मां भी साथ जाने को तैयार थी। रामलाल भी खुद को नहीं रोक पाया और नया सूट पहन कर गाड़ी में जा बैठा। आज़ गाड़ी मंत्रीजी चला रहे थे।


                                                           - अर्चना त्यागी

राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा को बीजेपी अपना राजनीति कार्यक्रम क्यों बना रही ?


भारत विभिन्न संस्कृति और सभ्यता का मिला-जुला देश है। यहाँ कई धर्म-जाति के लोग एक साथ मिलकर रहते हैं। अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भारत को समस्त विश्व में लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर के रूप में देखा जाता है। मगर इन दिनों भारतीय लोकतंत्र पर कई प्रश्न खड़े हो रहे है। चाहे वह वर्तमान सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों के खिलाफ बदले की भावना हो या फिर एक ही समाज व एक ही विचारधारा को आगे बढ़ाने का कार्य हो या फिर विपक्ष को खत्म करने की दिशा में उठाए जा रहे फैसले हो। वर्तमान की भाजपा सरकार अपने फायदे के लिए छोटी-छोटी चीजों को भी बड़े इवेंट के रूप में प्रस्तुत करती रही है। राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम राम मंदिर ट्रस्ट का निजी कार्यक्रम है, मगर वर्तमान की बीजेपी सरकार उसे अपने राजनीतिक मंच के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारी कर रही है।






ऐसे में सवाल उठते हैं- जब भारत एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, तो फिर सरकार को किसी एक धर्म के कार्यक्रम को अपना राजनीतिक मंच क्यों बनाना चाहिए ? क्या सरकार के इस फैसले से देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं बिगड़ेगी ? और अगर बिगड़ेगी तो इसके लिए जिम्मेदार कौन होगा ? क्या सरकार के इस फैसले से देश के अल्पसंख्यक समुदाय व दूसरे धर्म को मानने वाले लोगों के मन में सरकार के प्रति अविश्वास तो उत्पन्न नहीं होगा ? क्या हिंदू धर्म सिर्फ भाजपा की राजनीति का हथियार है ? हिंदू धर्म को बार-बार अपनी राजनीतिक के लिए इस्तेमाल करना कितना सही है ? कही राजनीतिक मिलावट से हिंदू धर्म को नुकसान तो नहीं होगा ? राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम को भाजपा द्वारा राजनीति मंच बनाना कितना सही है ?

भाजपा राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम को अपना राजनीतिक मंच बनाकर 2024 की तैयारी में लगी है। इस कार्यक्रम के जरिए भाजपा अपने वोटरों और समर्थकों को एक संदेश देना चाहती है। जिससे 2024 आम चुनाव की लड़ाई भाजपा के लिए आसान हो जाए। मगर जनता भाजपा के इस जाल में कितना फंसती है, यह तो आने वाला वक्त ही बता पाएगा। भाजपा द्वारा राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम को अपना राजनीतिक मंच बनाना यह बताता है कि भाजपा अपनी राजनीति के लिए किसी भी स्तर पर जा सकती है। राम मंदिर का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने दिया है और भाजपा इसका क्रेडिट ले रही है। राम मंदिर निर्माण का कार्य राम मंदिर ट्रस्ट कर रही है। ट्रस्ट को आम जनता ने पैसे आदि सामाग्री दान किए है।

भारतीय राजनीति में जिस तरह से धर्म-जात हावी हो रही है, यह भारतीय लोकतंत्र के लिए सही नहीं है। अगर ऐसे ही धर्म-जात की राजनीति हावी होती रही, तो आने वाले समय में भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था डगमगा सकती है। इसलिए हमारे देश के सभी राजनीति पार्टियों को धर्म-जाति की राजनीतिक से ऊपर उठने की जरूरत है। आज भारत विश्व का सबसे ज्यादा युवाओं वाला देश है और हमारे देश में बेरोजगारी अपने चरम पर है। सरकार बेरोजगारी, महंगाई और विकास जैसे मुद्दों पर बात नहीं करना चाहती है। सत्ता में बैठी राजनीतिक पार्टी भाजपा के पास धर्म और राष्ट्रवाद का ऐसा हथियार है, जिसका विपक्ष के पास कोई तोड़ नहीं है। विपक्ष अपनी राजनीतिक तौर-तरीकों में कोई बदलाव नहीं करना चाहता है, जिसके कारण विपक्ष लगातार कमजोर होता जा रहा है, जबकि सत्ता पक्ष हमेशा चुनावी मूड में रहता है।
राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम एक धार्मिक कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम के जरिए सत्ता पक्ष 2024 के लिए अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंक रहा है। इस प्रकार किसी धार्मिक कार्यक्रम को अपना राजनीतिक मंच बनाना सरासर लोकतंत्र का अपमान है। विपक्ष को सत्ता पक्ष के इस हथियार का जवाब खोजना चाहिए और देश की आम जनता का ध्यान सरकार की नाकामियों की ओर ले जाना चाहिए। जिससे 2024 के आम चुनाव में विपक्ष लड़ाई में जिंदा रह सकें और सत्ता पक्ष को कांटे की टक्कर दे सकें।

- दीपक कोहली


03 January 2024

कविताः इंतजार



दस्तक देना बेकार है ,
वो खाली सा दिखता है ।

यादें पड़ी हर कोने मे ,
दिल भरा सा लगता है ।

जिस्म उस मकान सा ,
साँसें है किराया ।

कागज़ मेरे नाम के ,
फिर भी मै पराया ।

जा खोल दरवाजा
क्यूँ चौखट पे तू खड़ा ।

मिल लेना खुद को ,
जहां से तू हुआ था बड़ा ।

दस्तक नही ,
वो मन की पुकार है ।

तुझको शायद ,
खुद का ही इंतजार है ।


                                      - मैथिली रमेश