साहित्य चक्र

29 November 2016

#कलयुग की पहचान#

                                #कलयुग की पहचान#


प्राणी में  प्राण नहीं,
मानव में मानवता नहीं।
यहीं कलयुग की पहचान है।।


धर्म में धर्मता नहीं, 
पवित्र में पवित्रता नहीं।
यहीं कलयुग की पहचान है।।

वाणी में सत्य नहीं, 
पहनावे में शर्म नहीं।
यहींं कलयुग की पहचान है।।

पानी में मीठास नहीं, 
भोजन में स्वाद नहीं।
यहीं कलयुग की पहचान है।।

                                    कवि- दीपक कोहली


 
 

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