साहित्य चक्र

28 May 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 29 मई 2026





आज की चाय

पहले चाय बहाना होती थी,
दोस्तों को पास बुलाना होती थी।
घंटों बैठकर बातें होतीं,
हँसी में आधी परेशानियाँ खोतीं।
मित्र, रिश्तेदार साथ बैठते,
दिल के सारे राज़ कहते।
एक कप चाय में अपनापन था,
हर रिश्ते में मीठा बंधन था।
अब मोबाइल पर हाल पूछ लेते हैं,
इमोजी भेजकर रिश्ते जी लेते हैं।
न वो बैठकी, न वैसी यारी,
हर चेहरे पर दिखती लाचारी।
तनाव, अकेलापन, मन की दूरी,
भीड़ में भी सबकी मजबूरी।
क्योंकि अब दिल खुलकर कहता कहाँ है,
कोई चाय पर बैठता कहाँ है।
आओ फिर से वो दौर बुलाएँ,
एक कप चाय संग रिश्ते निभाएँ।
थोड़ा समय अपनों को दें,
दो मीठे शब्द प्यार के कहें।
क्योंकि चाय सिर्फ पेय नहीं होती,
यह दिलों की गर्माहट होती।


- बीना सेमवाल


*****





मां ईश्वर का साया है
मां ईश्वर का साया है,
जिसने संसार बसाया है।
मां का होना वरदान है,
मां का होना एहसान है।
बिना बोले जो सब समझे,
ममता की असल पहचान वो।
मां सा प्यार नहीं मिलता,
ना वो एहसास कहीं जग में।
बेशक जग में सब रिश्ते हैं,
रिश्तों में प्यार भी बेशक है,
लेकिन मां की ममता जैसा
वह एहसास नहीं मिलता।
जो केवल मां में संभव है,
वह निर्मल भाव नहीं मिलता।
मां के आंचल की छांव तले
जो मिले सुकून, नहीं मिलता।
बेशक दुनिया में सब कुछ है,
बस मां का स्वरूप नहीं मिलता।
खो जाती है जब मां जग में,
आंखें ढूंढें उसको नभ में।
फिर रहे तलाश अधूरी ही,
बेशक दुनिया को छान लो फिर,
नहीं मां सा अक्श कोई जग में,
बेशक ढूंढो उसको नभ में।
मां की ममता का मान करो,
मां है जग में, अभिमान करो।
मां सा कोई शख्स नहीं मिलता,
नहीं मां का अक्श कहीं जग में।
मां है तो दुनिया सुंदर है,
मां खुद ईश्वर का साया है।
मां का होना ही वर है,
मां के रूप में खुद ईश्वर
धरती पर बना हमसाया है।
मां ईश्वर का साया है,
जिसने संसार बसाया है।
मां में खुद की रचना करके,
ईश्वर धरती पर आया है।


- कंचन चौहान


*****




हम ऐसे रत्न

हम ऐसे रत्न हैं सखी, जो मुफ़्त में बिक जाते हैं,
पत्थर-सी किस्मत ले कर, हर राह में ठोकर खाते हैं।

कीमत अनमोल हीरे-सी, पर पत्थर लोग समझते हैं,
किस्मत के हाथों छले गए, हर राह में ठोकर खाते हैं।

दुनिया मेरी ऐसी बनाई, किससे करूँ शिकायत मैं,
रोड़े बिछे हैं राहों में, कैसे उनको हटाऊँ मैं।

मेहनत मेरी काम न आई, पानी फिर गया करनी में,
दोष किसी को देती नहीं, वक्त कटा उदर भरनी में।

ऐसी मांझी बन न पाई, जो खे ले नाव तूफानों में,
डूब चुकी है मेरी नैया, पुकार न पहुँची कानों में।

अब तो संतोष का दामन, पकड़ के जी लूँ कुछ पल,
हर किसी के दामन में, मिलता नहीं सफल फल।


- रत्ना बापुली


*****




माँ एक शब्द नहीं माँ ईश्वरीय वरदान है,
माँ धरती है माँ आकाश है,
माँ भगवान का दूसरा रूप है,
जो सौ दर्द सहते हुए भी एक जीव को रचती है,
वह भव्य देवीय शक्ति है,
माँ अपना संपूर्ण जीवन
अपने उस परिवार को देती है
जिसे वह एक एक बूँद रक़्त से सींचती है,
माँ ईश्वर की वह कृति है जिसमे सारा भ्रह्माण्ड समाया है,
माँ का एक दिन नहीं बल्कि हर दिन माँ दिवस होता है,
माँ है तो जीवन है माँ है तो ख़ुशियाँ है,
माँ दुखों का नाश है माँ सुखों की आस है,
धन्य धन्य है उस ईश्वर को जिसने बहुत ही फ़ुरसत से माँ रची,
षष्टांग प्रणाम उस माँ को जिसकी वजह से मैं हूँ,
पुनः एक बार संसार की सारी माँओं को नमन वंदन करती हूँ,
आज माँ नहीं नम है आँखें मेरी,
हर जन्म में तेरी ही कोख मिले तेरा ही साया मिले,


- सुमन डोभाल काला


*****




श्रमिक वंदना

भोर होते ही श्रमिक जागे,
मेहनत कर भाग्य जगाते।
ईंट उठाकर घर बनाते,
सबके सपने सच करवाते।

धूप तले दिनभर तपते,
कदम-कदम आगे बढ़ते।
पसीना मोती सा झरता,
धरती हरियाली से भरता।

खेतों में अन्न उगाते,
सबके घर खुशियाँ लाते।
कारखाने भी रोज़ चलाते,
देश को उन्नति पथ पर बढ़ाते।

श्रम से जग उजियारा होता,
हर आँगन उत्सव सा होता।
मजदूरों का मान बढ़ाओ,
जीवन उनका धन्य बनाओ।


- डॉ. सारिका ठाकुर 'जागृति'


*****




कितनी बड़ी बात है ना!
योनि से आया आदमी
योनि के पीछे पागल रहता है।
गजब तो तब हो जाता है, जब
उसी योनि पर वो गालियां देता है।
और दुनिया के सामने
उसी योनि पर खुल कर
बात करने में शर्माता है।
विडंबना देखिए!
जब कोई उसे उसकी
मां, बहन और पत्नी की
योनि की गाली देता है
तो वो गुस्सा हो जाता है।
आदमी के इस व्यवहार को
उसकी मूर्खता कहें या
फिर उसका दोगलापन ?


- दीपक कोहली


*****




मां

नि:स्वार्थ प्रेम की
परिभाषा है मां
उसकी हर
त्याग तपस्या
अतुलनीय है
मां वो पूंजी है
जिसे चाहकर भी
खोया नहीं जा सकता
मां अंतर्मन की आवाज है
प्रेम की सच्ची
परिभाषा है मां
मैं चाहे जितनी बार खो जाऊं
पर मां को कभी भी
खोया नहीं जा सकता
मां है तो मुक्कमल हूं मैं
मां ही सृष्टि की रचना है
मां है तो ये सृष्टि है।


- मनोज कौशल


*****




बादशाह की हार

शतरंज के बड़े खिलाड़ी निकले,
वजीर से ही बादशाह को मात दी।
वाह खूब खेला है , तुमने मासूम दिल से,
मेरी सारी ख़ुशगहमियां पल में उतार दी।

अच्छा हुआ जो तूफानों ने
बादलों को चीर दिया,
तेरी ये फितरत पहले मालूम न थी,
अब तेरी खामोशी ने सब बता दिया।

मैंने वक्त मांगा था, हिसाब नहीं,
तुम मेरी जिंदगी का एक पन्ना नहीं
पूरी किताब थी।

लट्टू सा घुमाया मुझे,
अपने इशारों पर नचाया भी।
पतंग जैसे मंजे को कभी
ढील देकर अचानक खींच ली।

वह क्या अदा पाई है,
ये तेरी अदा थी,पुरानी
या सिर्फ मुझ पर आजमाई है।

मैंने भी ये खेल अब तुझसे सिखा है,
जीतने का इरादा नहीं, अब
बस देखना है,और कितने वार करते हो

मैं तुमसे प्यार करता हूं अब भी,
लेकिन देखना है अब,
क्या तुम यही सितम बार-बार करते हो।


- रोशन कुमार झा


*****





शुक्रिया

मुझको भुलाने के लिए शुक्रिया,
ग़म देकर रुलाने के लिए शुक्रिया।

चेहरे की चमक खो गयी थी कहीं,
इसे आंसुओ से धुलाने के लिए शुक्रिया।

हम तो मांग रहे थे ज़िन्दगी तुमसे,
यूँ मौत के बीच झुलाने के लिए शुक्रिया।

तुम्हारी नाराज़गी तोड़ देती थी कभी,
ज़िन्दगी भर मुँह फुलाने के लिये शुक्रिया।

सरे बाजार निलाम हुई है इज़्ज़त मेरी,
अपनी महफ़िल में बुलाने के लिए शुक्रिया।

क्या बीती मुझपर ये तुम क्या जानो,
इस दिल को जलाने के लिए शुक्रिया।

कोई अपना नहीं होता इस जहां में,
ये बात याद दिलाने के लिए शुक्रिया।


- आनन्द कुमार


*****




वो घर अब वैसा नहीं

बड़ी रौनक थी आँगन में, हँसी दीवार सुनती थी,
हर इक कोने में अपनों की कोई आवाज़ रहती थी।

कभी नाराज़गी भी थी, कभी चुप्पी भी गहरी थी,
मगर रिश्तों के धागों में वो पहली गर्मजोशी थी।

वही चौखट, वही कमरा, वही तस्वीर है लेकिन,
न जाने वक्त क्या बदला ,ये घर वैसा नहीं लेकिन।

जहाँ मिल बैठकर अक्सर शामें ठहरा करती थीं,
अब उन कमरों में बस यादों की आहट गुज़रा करती है।

कभी हम भी इसी छत पर सितारों से मिला करते,
अब अपने ही मकाँ में अजनबी होकर मिला करते।

मगर उम्मीद बाकी है, दुआ अब भी धड़कती है,
किसी दिन फिर इसी आँगन में रौनक लौट आएगी।


- नरेंद्र मंघनानी


*****




मां रौ आंचळ

बात बाळपन री है
म्हं बाळक हो
अचपळों अर बदमाश हो
खेलतो -कूदतों मस्त हो
काम कीं नीं करतो
ओळमों सिर-माथे राखतों
अळबाद पर अळबाद करतों
म्हं घणां उजाड़ करतो
बापू जैळी चकतों
जाड़ पिसतो
म्हं "मां" री ओट लेवतों
मां पल्लू रो परकोटो बणांवती
म्हं शरणागत हुंवतों
बापू कैंवतों टिंगर
धरती माथै बौझ हैं
म्हं सुबकतों मां पुचकारती,
गळती म्हं करतों
मां मनावती
बात बात म्हं खिजतों
मनावणां मां करती
टेम लदगों
कद बड़ा होगा??
ठा नीं पड़्यों
आज पीड़ घणीं
सांझ री बगत
भींत माथै टंग्योड़ी
बापू री फोटू देख
म्हारों हिवड़ों फाट्यों
म्हं बोल्यों
बापू म्हं धरती माथै
आजै भी बोझ हूं
पण बापड़ी लाद्या फिरै हैं
म्हारें कान मांय पैचाणीं
सी आवाज़ आई
बेटा धरती बापड़ी कै करें?
धरती "मां" हुवै!
म्हं आंसू पूंछतों
बी सूं पैली
"मां " री आवाज आई
बेटा दूध ल्याऊ!
आज ठा पड़्यों
मां "मां" ही हुवै
कै जळम दैवणी
अर कै जळमभौम!


- जितेन्द्र कुमार बोयल


*****




माँ का दर्द

आज से दस साल पहले,
मैंने आंखों में चश्मा पहने,
तो, माँ की आंखों में आंसू आ गये,
कि मेरे बेटे मे कमी क्या दे दिये ?

क्योंकि माँ पचहत्तर साल के उम्र में भी,
साफ साफ दुनिया को देख लेती थी,
और मैं चौंतीस साल के उम्र मे ही,
आंखो में चश्मा पहने ली।

माँ उस दिन बहुत ही उदास थी,
वो बार बार खुद को दोषी मान रही थी,
कि कुछ तो कमी रह गया है, मुझमें
जिससे मेरे बेटे ने पहना है चश्मे।

माँ की उदासी देख मैंने समझाया, कि
ऐसा कोई बात नहीं है, माँ
लिखते-पढ़ते वक्त आंखों में,
पानी आ जाता है थोड़ी सी ।

जिस वजह से, चिकित्सक ने,
चश्मे लगाने की सलाह है दी,
तेरे से कोई कमी नहीं हैं, माँ
तू तो बच्चों वास्ते,
एक की हो जमीन-आसमाँ।


- चुन्नू साहा


*****




ठगे जा रहे हैं

आजकल दर दर पर फरियादी बन आ रहे हैं,
सब हाथ जोड़ विनम्र मुद्रा में वोट मांग रहे हैं।

ईमानदारी सत्यनिष्ठा की मिशाल बने बैठे हैं।
हरेक की खातिरदारी करने को तैयार बैठे हैं।

आजकल सब हाथ जोड़कर सेवक बने बैठे हैं,
सबको बड़ी दीन हीन कातर नजरों से देख रहे हैं।

गर्मी में दौड़ धूप कर खूब पसीना बहा रहे है,
गिले शिकवे मिटाकर सबको गले लगा रहे हैं।

सबके सुख दुख को अपना बता रहे हैं,
जीतने के लिए कितने मिट्टी से जुड़ते जा रहे हैं।

साम दाम दंड भेद के सूत्र सब अपना रहे हैं,
कुर्सी पाने की चाह में हर दांव आजमा रहे हैं।

सब रामराज्य लाने को तैयार बने बैठे हैं,
जुबान को मिसरी सी मीठी बनाए बैठे हैं।

कुछ तो नए नए अपनी किस्मत आजमा रहे हैं,
कुछ तो पांच वर्षों बाद अपने चेहरे दिखा रहे हैं।

वादे विकास के नए नए सपने दिखाए जा रहे हैं,
सब को मुंगेरी लाल के सपने दिखाए जा रहे हैं।

सोच समझ कर करना अपने मत का प्रयोग,
नहीं तो आमजन वर्षों से यूँ ही ठगे जा रहे हैं।


- राज कुमार कौंडल


*****




आज ख़ुद से मैं खुद रूबरू होके आया हूं
अपने हर रंज ग़म में सुरूर होके आया हूं

नहीं दिल को चाहत, दौलत शौहरत की
ये मोहब्बत का नया दस्तूर लेके आया हूं
अपने हर रंज ग़म से सुरूर होके...

सिफारिशों से नहीं बनते हैं अब काम अजब दौर है
सिफारिश संग तोहफा हुजूर लेके आया हूं
अपने हर रंज ग़म से सुरूर होके...

मिसालों में दलीलों में गुज़रे वक्त ही रहे जिंदा है काफ़ी
नया वक़्त है धोखा बदस्तूर देके आया हूं
अपने हर रंज ग़म से सुरूर होके...

मैनें लाख दुहाई 'नरेंद्र' दर्द ग़म ज़ख्म की उसको दी
वो न पिघला लौट मैं मजबूर होके आया हूं
अपने हर रंज ग़म से सुरूर होके...
मोहब्बत का नया दस्तूर लेके...


- नरेन्द्र सोनकर बरेली


*****




तपती धूप

गुस्से में क्यूँ है आज   दिनमान
आग बरसाता है तेरा  आसमान
तपती गरमी से जग है   परेशान
बहती  से पसीना  सुबह से शाम

सूख गये धरा पे सब    ताल तलैया
व्याकुल निहार रहे      किसान भैया
तड़प रही बेचारी       प्यासी गौरेय्या
रे बदरा ओढ़ा दे छतरी छईयां  छईयां

पछुवा हवा गरम लू संग लेकर आई
बरगद पीपल शीतलता दे।    सुहाई
रे मेघा कुछ शरम कर मेरे।      भाई
गरमी से जन जीवन को आफत आई

प्यासी है धरती प्यासा खेत खलिहान
पानी बरसा कर कर दो।   तुँ एहसान
ठंडी हवा की दे दो हमें कर मेहरबान
जीव जन्तु की बात आज तुम    मान

प्यासी सरिता भूल गई खुद की रवानी
त्रस्त हैं जलचर मांग रहे हैं पानी पानी
लुट गई सब नदियों की भरी   जवानी
बदलो अपनी नीति लिख नई कहानी


- उदय किशोर साह


*****




दरियादिल इतने नहीं हो तुम !
जितना नाटक करते हो ,
अकड़ कर बैठते हो सभा में
और सरे आम झूठ बोलते हो,

सभाएं हमने भी देखी हैं बहुत सी
मगर ऐसी नहीं देखी, साकी
कत्ल करवाते हो जज्बातों का
और मुजरिम को खुले घूमाते हो

पैरवी भी खुद ही करते हो, मसले की
और राह भी खुद ही दिखाते हो,
अक्लमंद सभी समझते हैं अपने को,
इस जहां में ऐ दोस्त!
पर कोई किसी से कम नहीं

एतबार नहीं है, तो आजमा कर देख लो
कर ले तसल्ली अगर सीने में हिम्मत हो
चांद टूटता नहीं यहां किसी के इश्क में ए दोस्त!
दर्द से दर्द ही सिला होता हैं, परख कर देख लो


- बाबू राम धीमान


*****


बचपन

धूल में खेलती, सपनों से अनजान थी,
नन्हीं सी मैं, बस एक उड़ती जान थीं।

पेड़ से गिरी, किस्मत ने थाम लिया,
फिर भी जीवन ने आगे बढ़ा दिया।

रोटी की खातिर दूर तक चलती रहीं,
धूप में भी मैं चुपचाप जलती रही।

गरीबी ने मेरे सपनों को आजमाया,
पर मैंने हर दर्द को शब्द बनाया।

किताबों में रातें, खामोश सी बातें,
कविताओं में ढली, मेरी सारी रातें।

मैं टूटी नहीं, मैं निखरती रहीं,
हर मुश्किल में भी मैं चलतीं रहीं।


- सुनीता बिश्नोई



*****




टी का महत्व

चाय  पीओ उत्साह पाओ
थकान दूर करो शक्ति पाओ
तनाव हटाओ शांति पाओ
सिरदर्द घटाओ स्वस्थ पाओ
जीवन में चाय पीना जरूरी है।

चाय से मिली शक्ति अनोखा है
चाय से मिली रुचि अति मधुर है
चाय से मिली शांति निर्मल है
चाय से मिला उत्साह बेमिसाल है
चाय पीने से शक्ति बढ़ती है नित्यं।

हम को कार्यरत की शक्ति देती है
जीवन में नीरस को मिटाता है
और मस्तिष्क तेज बनता है
इससे शरीर चुस्त बन जाता है
चाय से मिली शक्ति अद्वितीय है।

आजकल चाय कई किस्में में मिलते है
ग्रीन टी पीने से कोलेस्ट्रॉल कम होते है
अदरक टी पीने से पाचक शक्ति बढ़ती है
नींब टी पीने से निरोधक शक्ति बढ़ती है
ज़िंदा में टी पीना एक हिस्सा बनता है।


- श्रीनिवास एन, आंध्रप्रदेश


*****