साहित्य चक्र

19 October 2024

कविता- नियत



नियत को साफ रख कर्म भी अच्छे कर ले

खुला मन है अगर तो खुशियां मिलती जहां की
ईर्ष्या अगर मन में है तो रहती हमेशा उदासी है
कर्म तेरे अच्छे हैं तो किस्मत तेरी दासी है
नियत अच्छी है तेरी तो घर में मथुरा काशी है

तन की मैल को तो पानी निकाल ले गया
कपड़ों की गंदगी भी साबुन ले जाएगा
उजला तन हो गया कपड़े भी उजले हो गए
मन में जो गन्दगी भरी है उसको कैसे धो पाएगा

नियत को साफ रख कर्म भी अच्छे कर ले
गुनाहों को छोड़ कर नेकी को गोद में भर ले
आखिर में यही काम आनी है तेरे
बुरे कामों को त्याग कर कुछ अच्छे काम कर ले

छोड़ेगा जब बुरे कर्म मन अपने आप अच्छा हो जाएगा
मज़बूती मन को मिलेगी कोई गम नहीं सताएगा
अच्छा करेगा तो आगे भी अच्छा ही मिलेगा
बुरा चाहेगा भी कोई तेरा कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा।


                                                    - रवींद्र कुमार शर्मा


कविता- यादे





ये तुमने क्या कह दिया,
तुम मुझे याद नहीं करते हो।

दिल के टुकड़े कर दिए,
कितने सपने देखे थे हमने, 
एक पल में चकनाचूर हो गये।
 
कहा था तुमने हर बार मुझसे, 
साथ कभी छोड़ूंगा नहीं तुम्हारा, 
आज लगता है रब भी मुझ से रूठ गया।

जिसे मैने अपना माना, 
वो ही दिल को तोड़ गया।

क्या कहु ए दिल तुमसे, 
अपने होठों पर मुस्कान ला, 
और फिर से याद कर उस रब को, 
वहीं सही रास्ता दिखाएगा तुझको।

                                - गरिमा

कविताः आवाज




नींद में भी उठती हैं
आवाजें वाणी भी तो बंधी है
किनारों में शब्द कब पहुँच पाते है
प्रत्येक पूर्वाग्रहों में...

कितनी पुकारें अनसुनी रहकर
परत दर परत की निस्तब्धता में समा रही हैं।

समयावधि में कृष्ण विवर से टकराकर
कोई रश्मि किरण प्रत्यागत नहीं होती।
वे सारे शब्द, निर्देश, वर्ण और आवाजें
जो अब तक कह नहीं और ना ही सुने गए
उनके आविर्भाव का कोई निशान तलाशती है।

यह मौन का प्रहर यह अकेलापन बड़ा ही
अदभुत है इसमें कल्पनाओं की क्षणिका विद्यमान है।

- डॉ. पल्लवी सिंह 'अनुमेहा'

कविताः करवा चौथ का दिन



करवाचौथ के दिन व्रत का संकल्प करती है,
सूर्योदय से चंद्रमा के आने तक,
अपने मन को पति की याद में बहलाती है,
लंबी उम्र हो पति की यही दुआ करती है।

सजती है सवंरती है सोलह श्रृंगार करती है,
मनमोहनी बनकर अपने चांद का दीदार करती है,
 उपहार की कोई परवाह नहीं ,
बस अपनी जीवनसाथी के प्यार की इच्छा रखती है।

पूरा दिन भूखे प्यासे रह कर रीत निभाती है,
एक टक टकी लगाकर चांद के दीदार का इंतजार करती है,
क्या पता उम्र बढ़ी न बढ़े,
प्यार जरूर बढ़ेगा ऐसा विश्वास जताती है।

लंबी उम्र की दुआ करके,अपने प्रण को निभाती है,
हर वर्ष इस पावन दिन को, करवाचौथ के रूप में मनाती है।


                                       - डॉक्टर जय अनजान



14 October 2024

पितृसत्ता पर सीधा प्रहार करती फिल्म- 'स्त्री-2'


शैतान का सबसे बड़ा छल यह था कि उसने दुनिया को यह यकीन दिला दिया कि वह मौजूद नहीं है।” – 'द यूज़ुअल सस्पेक्ट्स' की यह प्रसिद्ध पंक्ति ‘स्त्री 2’ का एक उपयुक्त परिचय है, एक ऐसी हॉरर-कॉमेडी जिसने न केवल बॉक्स ऑफिस पर धूम मचाई है, बल्कि दर्शकों को सोचने पर भी मजबूर कर दिया है। रोमांचक दृश्यों के पीछे, ‘स्त्री 2’ एक गहरे सामाजिक संदेश को उजागर करती है, जो पितृसत्ता की उन जड़बंदी हुई संरचनाओं पर प्रकाश डालती है जो महिलाओं की स्वायत्तता को कमजोर करती हैं।



फिल्म की शुरुआत एक शांत, सुदूर कस्बे से होती है, जो पहली नज़र में शांतिपूर्ण दिखता है, लेकिन जल्द ही एक भयावह सच्चाई सामने आती है। एक रहस्यमय राक्षस इस कस्बे में निवास करता है, जो विशेष रूप से उन युवतियों को शिकार बनाता है जो पारंपरिक लिंग भूमिकाओं को चुनौती देना चाहती हैं। यह राक्षस समाज की उन दमनकारी ताकतों का प्रतीक बन जाता है जो उन महिलाओं को निशाना बनाती हैं जो सपने देखने, स्वतंत्र रूप से सोचने और परंपरा की बेड़ियों को तोड़ने का साहस रखती हैं। यह भयावह रूपक दर्शाता है कि कैसे पितृसत्तात्मक समाज महिलाओं की व्यक्तित्व और आकांक्षाओं को "निगल" जाता है और उनके अस्तित्व को डर से नियंत्रित करने का प्रयास करता है।

फिल्म के केंद्र में राजकुमार राव का किरदार है, जो एक महिला दर्जी की भूमिका निभाता है—पारंपरिक पितृसत्तात्मक समाज में एक असामान्य पेशा। उनका किरदार उन रूढ़ियों को चुनौती देता है जो लिंग भूमिकाओं के बारे में बनी हुई हैं और आधुनिक रिश्तों में बदलते हुए समीकरणों पर जोर देता है। श्रध्दा कपूर का किरदार भी महिलाओं की दोहरीता का प्रतीक है—एक ओर कोमलता और दूसरी ओर शक्ति को संतुलित करती हुई, वह पितृसत्तात्मक समाज में अपना रास्ता बनाती है। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, यह स्पष्ट हो जाता है कि युवा महिलाओं के गायब होने का कारण उनके द्वारा पारंपरिक अपेक्षाओं को नकारना है। जो महिलाएं स्वतंत्रता चाहती हैं और परंपरागत मानदंडों को चुनौती देती हैं, वे एक प्रतिशोधी शक्ति का शिकार बन जाती हैं। यह राक्षस समाज की उस क्रूर प्रतिक्रिया का प्रतीक है जो महिला स्वायत्तता को नियंत्रित करने के लिए हिंसक उपाय अपनाता है। पुरुष किरदार, जो सामान्य से लेकर निर्दयी आक्रांताओं तक के रूप में दिखाए गए हैं, इस बात का प्रतिनिधित्व करते हैं कि कैसे गहरे स्तर तक जड़ें जमाई हुई पुरुषवादी मानसिकता विकृत आचरणों जैसे हिंसा और उत्पीड़न को सामान्यीकृत कर देती है।

‘स्त्री 2’ समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से पितृसत्ता के उस रूप को उजागर करती है जो महिलाओं की स्वतंत्रता को दबाने के लिए हिंसा को औचित्य प्रदान करता है। फिल्म यह भी दर्शाती है कि जब राजकुमार राव का किरदार समाज में बदलाव लाने और महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने की कोशिश करता है, तो उसे प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है। यह उस गहरी जड़ जमाई पितृसत्तात्मक सोच का प्रतीक है जो यथास्थिति को चुनौती देने वालों को अस्वीकार कर देती है। 


राक्षस, जो कई सिरों के साथ दिखाया गया है, एक शक्तिशाली रूपक बनता है—नकारात्मकता नकारात्मकता को आकर्षित करती है और विकृत व्यवहार समूह में फैलता है। यह विशेष रूप से उन दृश्यों में स्पष्ट होता है, जहां राजकुमार के राक्षस को हराने के प्रयासों के बावजूद, और भी राक्षस प्रकट होते हैं, जो यह दर्शाता है कि कैसे विषाक्त मानसिकता और व्यवहार सामूहिक रूप से फैलते हैं, जैसे एक गिरोह मानसिकता। हालांकि, फिल्म केवल समस्या को दर्शाने तक सीमित नहीं है। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, यह उम्मीद की एक झलक पेश करती है। 


फिल्म का चरमोत्कर्ष 'अर्धनारीश्वर' की अवधारणा को प्रस्तुत करता है, जो प्राचीन हिंदू विचार है कि पुरुष और महिला ऊर्जा का समन्वय होना चाहिए। यह रूपक दर्शाता है कि सच्ची सामंजस्य और समानता पुरुष और महिला के बीच परस्पर सम्मान में निहित है। यह दृष्टि पितृसत्तात्मक परंपराओं को चुनौती देती है, एक ऐसे समाज का आह्वान करती है जहां दोनों लिंगों का समान रूप से सम्मान किया जाता है और उन्हें समान अवसर प्राप्त होते हैं। 

जबकि ‘स्त्री 2’ पितृसत्तात्मक हिंसा की आलोचना करती है, यह सामाजिक पाखंड का भी मजाक उड़ाती है। कस्बा, बाहरी रूप से शांत और स्वागतशील दिखता है, लेकिन इसके अंदर गहरे बैठे पूर्वाग्रह और हानिकारक रूढ़ियाँ छिपी हैं। फिल्म में हास्य और व्यंग्य का प्रयोग इन पाखंडों को उजागर करता है, जो हमें हंसाते हुए भी सोचने पर मजबूर करता है।

अंत में, ‘स्त्री 2’ केवल एक हॉरर-कॉमेडी नहीं है; यह सामाजिक परिवर्तन के लिए एक शक्तिशाली उत्प्रेरक है। फिल्म ने मनोरंजन और एक गहरे संदेश को बखूबी मिश्रित किया है, हमें लैंगिक असमानता की कठोर वास्तविकताओं का सामना करने के लिए चुनौती देती है। यह हमें एक ऐसे भविष्य की ओर प्रेरित करती है, जहां पुरुष और महिला समानता के साथ खड़े हों, परस्पर सम्मान और साझी मानवता के साथ। यह याद दिलाती है कि लैंगिक समानता के लिए लड़ाई अभी भी जारी है, लेकिन यह लड़ाई लड़ने योग्य है।

आइए, हम अपने मतभेदों को स्वीकार करें, निर्णय और पूर्वाग्रह की बेड़ियों को तोड़ें, और उन मानदंडों को चुनौती दें जो हमें विभाजित करते हैं। सच्ची लैंगिक समानता का अर्थ केवल व्यक्तिगत अधिकारों के लिए संघर्ष नहीं है; यह एक दूसरे की स्वतंत्रता और गरिमा के लिए सामूहिक जिम्मेदारी का आह्वान है। साथ मिलकर, हम एक ऐसी दुनिया बना सकते हैं जहां हर आवाज सुनी जाए, और हर कहानी का महत्व हो।

स्त्री 2’ एक मनोरंजक फिल्म के रूप में शुरू होती है, लेकिन इसका अंत एक गहरे सामाजिक संदेश के साथ होता है, जो दर्शकों को जागरूकता की दिशा में प्रेरित करता है।


                                      - डॉ. पूजा दीक्षित जोशी, शिक्षिका व समाजशास्त्री