साहित्य चक्र

18 December 2025

रेप के कारण क्या हैं ?


शायद आपने इस सवाल को कभी गौर से समझने की कोशिश नहीं की होगी। चलिए आज मैं आपको समझाने की कोशिश करता हूं। पुरुष का पेनिस व महिला के दो स्तन और एक वेजाइना शायद इन्हीं तीन अंगों से शायद रेप होता है। मगर मेरा मानना है कि महिला के स्तन रेप का कारण नहीं हो सकती क्योंकि रेप 6 माह की बच्ची से लेकर 80 वर्ष की वृद्धा औरत के साथ भी होता है।




इसका मतलब औरत की वेजाइना रेप का मुख्य कारण हो सकती है। मगर रेप तो छोटे लड़कों का भी होता है, जबकि उनके पास कोई वेजाइना नहीं होती है। इतना ही नहीं दुनिया भर में कई ऐसी खबरें भी आई हैं, जिसमें कुत्ता, गाय, बकरी, सुअर और भैंस तक के साथ रेप या कुकर्म जैसे घटनाएं हुई हैं। ऐसे में सवाल अभी भी वही है- रेप क्यों और किसके कारण होते हैं ?

मासूम बच्चियों से लेकर लड़कों, जानवरों और 80 वर्ष की महिलाओं के साथ तक रेप और गैंगरेप जैसी घटनाएं सामने आती है या आज के दौर में आम हो गई है। इसके बावजूद भी हम इन घटनाओं पर चर्चा नहीं करते और अपने घर के अंदर खुलकर बात करने में डरते हैं आखिर क्यों ? क्या इन घटनाओं पर हमारी चुप्पी इसका समर्थन करती है ? अगर नहीं तो फिर हमें इन घटनाओं पर आवाज उठानी ही होगी और खुलकर चर्चा करनी ही होगी।




रेप पेनिस, स्तन और वेजाइना के कारण नहीं होता है, बल्कि यह एक प्रकार की मानसिकता है। इस मानसिकता से हर पुरुष गुजरता है। जब पुरुष किशोरावस्था में होता है तो वह स्त्री की ओर आकर्षित होता है। इस दौरान वह स्त्री के स्तनों को देखना, स्त्री की शारीरिक बनावट की कल्पना करना, स्त्रियों के अंडरगारमेंट्स को देखना और स्त्रियों के पैरों या टांगों को देखना आदि तरह की कोशिशें करता है। यह कोशिशें वह छुप-छुप स्वयं या दोस्तों की बातों को सुनकर करता है। इस तरह वह एक अलग ही कल्पनाओं की दुनिया में खोने लगता है। इसके बाद वह हस्तमैथुन करना शुरू करता है और धीरे-धीरे हस्तमैथुन का आदी हो जाता है।

एक तरफ पढ़ाई का दबाव और दूसरी तरफ परिवार की आती जिम्मेदार... और साथ ही कामुकता की एक अलग ही निजी काल्पनिक दुनिया। जहां वह कामुकता का राजा होता है। कामुकता के निजी काल्पनिक दुनिया में वह अपने मां-बहनों को छोड़कर हर स्त्री या भोग करने वाली वस्तु को अपना शिकार बनना चाहता है। यही मानसिकता उसे रेप और यौन अपराध की तरफ धकेल देती है। रेप और यौन अपराध पुरुषों की गंदी मानसिकता के कारण होते हैं।




एक पुरुष के लिए उसकी किशोरावस्था उसके चरित्र की नींव की तरह है। क्योंकि! किशोरावस्था में पुरुष की कामुकता सबसे अधिक होती है। इसलिए किशोरावस्था में एक पुरुष के लिए उसके परिवार और दोस्तों की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। इसलिए पुरुषों की इस गंदी मानसिकता को खत्म करने के लिए हम सभी को मिलकर काम करना होगा। हमें अपने बच्चों को इस तरह की मानसिकता के प्रति जागरूक बनाना होगा।


- दीपक कोहली





17 December 2025

आज की प्रमुख कविताएँ- 17 दिसंबर 2025





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खामोशियाँ

कर देती है खामोशियाँ जब रिश्तों में घर,
लगती है फिर जिन्दगी ज्यूँ नरक का दर।
शांत,स्थिर मन में आता सुनामी सा कहर,
बन जाती खामोशियाँ, फिर धीमा सा जहर।

रहता है खामोशियों में छिपा असहनीय दर्द,
समझ जो इस दर्द को पाए, वो सच्चा हमदर्द।
बढ़ जाती तन्हाइयाँ, जो न पास हो हमसफ़र,
बन जाती है खामोशियाँ, फिर धीमा सा जहर।

गलतफहमियों का भी, बन जाती ये कारण कभी,
बाहर रखती शांत, शोर खूब मचाती भीतर दबी |
भावनाओं का हो जाता दमन, रखते-रखते सब्र,
बन जाती खामोशियाँ, फिर धीमा सा जहर।

कम हो जाती नजदीकियां, बढ़ जाती है दूरी,
संवादहीनता, औपचारिकता बन जाती मजबूरी।
बैचैनी का आलम रहता, मन पर छाया आठों पहर,
बन जाती खामोशियाँ, जब धीमा सा जहर।


- लता कुमारी धीमान


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गांव की सुबह

चौथे पहर मुर्गा बांग लगाए
सुबह होने को आई क्यों नींद में सोए जाए।
गांव की सुबह कुछ यूं ही आए।
कोयल भोर का राग सुनाए
नींद अब तो भागने को आए।
गांव की सुबह कुछ यूं ही आए।
कबूतर भी छत पर घूटर घूं करने आए
सब जग उठे तुम अब भी नींद में सोए जाए।
गांव की सुबह कुछ यूं ही आए।
गौरेया भी चीं चीं कर अपना संगीत सुनाए
उठ मुसाफिर अब तो भोर होने को आए।
गांव की सुबह कुछ यूं ही आए।
पशु भी अब  ज़ोर ज़ोर से रांभने को आए
अब तो सुबह हो गई ये अहसास जरूर करवाए।
गांव की सुबह कुछ यूं ही आए।
मोबाइल फोन का अलार्म तो बंद हो जाए
पर प्राकृतिक अलार्म कोई बंद न कर पाए ।
गांव की सुबह कुछ यूं ही आए।
हर कोई अब अपने कामों में व्यस्त हो जाए
मैं सुबह हूं जनाब अब तू क्यों घबराए।
गांव की सुबह कुछ यूं ही आए।


 - विनोद वर्मा


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थक्के हारे ये चेहरे

थक्के हारे ये चेहरे,
सुबह होते ही
खिल उठते हैं ये चेहरे,
नए ख्वाबों को बुनते है हर रोज़,
नए सपनों के साथ हर रोज़,
नए शब्दों को बुनते हैं हर रोज़,
और लिखते हैं कोरे कागज पर,
एक नई कविता को।


- सुनीता बिश्नोई


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जिंदगी के फासले

वक्त मेरी मुठ्ठी में कभी भी रहा ही नहीं,
और मैं कभी इसकी कैद से रिहा हुआ नहीं।

कितना सोचते थे कि हम छू लेंगे आसमान,
पर जो सोचा जिंदगी में वो कभी हुआ ही नहीं।

टिमटिमाते सितारों को जितना प्यार कर लें,
पर असल में कोई सितारा किसी का हुआ नहीं।

जब कभी कभार मिला पसंदीदा तोहफा,
उसमें भी रज़ा खुदा की थी मेरी औकात नहीं।

हाले पल का आनंद लेना ही है मौज़े जिंदगी,
वरना इस सच्चाई से मुंह मोड़ लेना जीना नहीं।

तय खुद ही करने होंगे सफरे जिंदगी के फासले,
वक्त के फेर से तो औलिया फकीर भी बचे नहीं।


- राज कुमार कौंडल


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डरो नहीं

फूल सा खिलो मगर,
धूप में झरो नहीं,
मृत्यु एक सत्य हैं,
डरो नहीं डरो नहीं,

सुगंध बिखेर दो यहॉँ
सुन्दर करो यह जहाँ
हँसी के आगोश में,
दुःख छुपा लो यहाँ,
काँटे है हर जगह,
विनिमय इसका करो नहीं
डरो नहीं डरो नहीं।

हो हार जीवन की
पर तुम डरो नहीं,
याद तुम्हें सब करें,
यह आश करो नहीं।
तन भले ही मरे
पर तुम मरो नहीं
डरो नहीं डरो नहीं।

जग यह नगण्य है,
न ही कुछ गण्य है
हार व जीत से ही
जीवन अक्षुण्य है
आत्मा की मोती को
ताज में जड़ो नहीं
डरो नहीं डरो नहीं।

जो भी यहाँ हो रहा,
होने दो होने दो,
एक खिवैया उसी को,
खेने दो खेने दो,
औरो की बात सुन,
व्यर्थ काम करो नही
डरो नहीं डरो नहीं

डूबने के भय से क्यों,
न हाथ मे पतवार लो,
जीवन एक नॉव है,
जिसे तुम सवाँर लो।
आँधिया हजार हो,
मन निराश करो नहीं।
डरो नही डरो नहीं।


- रत्ना बापुली


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इससे
ज्यादा पागल
न हो पाउँगा।
इतना
आवारा बादल
न हो पाउँगा।
मैं नहीं देख पाउँगा
दो आदमियों के
काम के समय से
दो घंटे अधिक
काम करना
मगर परिणाम
शून्य गुणे शून्य
बराबर शून्य?
कारण
अठारह घंटे
काम मतलब
स्वयं के साथ ज्यादती
और शोषण,
नियमानुसार
एक आदमी
का केवल आठ घंटे काम
विधि सम्मत है,
इस प्रकार
आठ घंटे के
अतिरिक्त दस घंटे
काम करना
एक आदमी की दिहाड़ी
और दूसरे आदमी कीआँखों
में दिहाड़ी की
चमक के दो घंटे
छीनना किसी अपराध से
कम नहीं है।
रोजगार छीनना
संज्ञेय अपराध है,
राष्ट्र की नींव को दरकाना है,
विकास पर ब्रेक लगाना है,
कायर और नपुंसक
इतिहास पर रोते हैं।
पराक्रमी, पुरुषार्थी
अतीत का रोना छोड़कर
वर्तमान को दृढता से मज़बूत
करते हैं
और
नापते हैं वो डग
जो बन जाती है
अनुकरणीय लीक...
जिस पर चलते हैं सब
जाति, मजहब से मुक्त होकर
त्यागकर समस्त संकीर्णतायें
निरपेक्ष भाव से...
मगर तुम
मज़बूत नहीं,
मजबूर
में अपना
अस्तित्व सुरक्षित देखते हो,
पर याद रखना मजबूर
जब मर्यादाएं लाँघता है...
तब उठती
ऊँची-ऊँची ज्वार भाटाएँ
दरकने लगती हैं
केवल अपने अस्तित्व की
रक्षा करती चहर दिवारियां...
ईमारतें करने लगती
खून की उल्टियां
याद रखना
सड़कों का नंगानाच
बहुत खतरनाक
होता है...


- राधेश विकास


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कुछ कहता हूं,
तो बात बढ़ती है।
कुछ ना कहूं !
ऐसा हो सकता नहीं।
कशमकश दिल की,
हिम्मत मेरे मन की,
उलझनें जीवन की,
कुछ परेशानियां हैं,
कुछ नादानियां हैं।
कुछ एहसास अजब हैं,
एक समंदर है भावनाओं का।
कुछ समझदारियां हैं।
कुछ फासले से हैं,
कुछ नजदीकियां हैं।
कुछ द्वंद्व हैं मन में,
कुछ अधूरे फैसले हैं!
आगे बढ़ता हूं,
तो कुछ छूट जाता है।
जो स्थिर हो जाए!
ऐसा मानव हो सकता नहीं।
कुछ जानता हूं,
कुछ सीख रहा हूं।
कुछ कल्पनाएं हैं!
कुछ संवेदनाएं हैं।
कुछ भ्रम भी हैं!
कुछ मनगढ़ंत रचनाएं भी हैं।
कुछ किस्से हैं,
कुछ कहानियां हैं।
कुछ सच्चाई भरी नादानियां भी हैं।
कुछ लिखता हूं ,
तो सच बाहर आता है
ओर न लिखूं
ऐसा ’अशोक’ हो सकता नहीं।


- अशोक कुमार शर्मा


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तुम-सा नहीं देखा
देखे हैं यहाँ लोग बहुत से
लेकिन तुम-सा नहीं देखा
पद, प्रतिष्ठा, धन मिलते ही
रूख जो तू ने यूँ बदला..
जैसे कि! वर्षों से पीछा
तुझे छुड़ाना था
बस तलाश एक मौके का था
और वो मिल भी गया
खैर! अफसोस की हमें कोई बात नहीं
ऐसा होना भी तो लाजिमी था
आखिर कितने दिन तक साथ चलता
लेकिन ये भी मत भूलो कि तुम
हम से ही निकल कर गए हो
और हम सब ने ही तुम्हें
एक पहचान दिलाई
संघर्ष के वक्त हम ही साथ थे
लक्ष्य भी तो एक ही था
लेकिन अफसोस कि
उस लक्ष्य में स्थान सीमित था
और तुम्हें वो स्थान मिल गया
इसका मतलब ये नहीं कि तुम
हम सब को अब छोड़ दोगे!
लेकिन तुम तो सचमुच में
हम सब को छोड़ दिया
इसीलिए तो चुन्नू कवि को
आज लिखना पड़ा रहा
कि तुम-सा नहीं देखा।


- चुन्नू साहा


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नहीं हूँ

थका हूँ लेकिन हारा नहीं हूँ,
हालातों का अभी मारा नहीं हूँ।

कर लेना कद्र जीते जी हमारी,
मरने के बाद तुम्हारा नहीं हूँ!

हाँ इश्क़ है तो सच में है तुमसे,
मैं आशिक़ हूँ आवारा नहीं हूँ।

कसक सी दिल में छुपी हैं कहीं,
जब से मिली हो कुंवारा नहीं हूँ।

देख लेना कोई मुझसे भी बेहतर,
शायद अब तुमको गवारा नहीं हूँ।

प्यार-व्यार की बातें व्यर्थ हैं सब,
लगता है अब तुम्हें प्यारा नहीं हूँ।

करके फासला कैसे पाओगे मुझे,
मैं इंसां हूँ कोई सितारा नहीं हूँ।


- आनन्द कुमार


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मंज़िल की तलाश में, मैं यूं ही भटकता रहा
मिली तो नहीं मंज़िल, फ़िर भी प्रश्न खटकता रहा
बीसियों बहाने बनते बिगड़ते रहे, अपने ही मन में,
दोष बिना जांचे परखें कैसे दे किसी को ?
बस यही सोचता रहा,
मंज़िल की तलाश में, मैं यूं ही भटकता रहा
मिली तो नहीं मंज़िल, फ़िर भी प्रश्न खटकता रहा...
आंख मिचौली होती रही, सोच आगे न बढ़ सकी
टीस उसकी भी,मेरे मन में बार-बार उभरती रही,
कभी मैं अपने मन को देखूं,कभी उसकी ओर देखूं
चक फेरी फिर भी वह मेरी आंखों को देती रही,
सोचता रहा मैं भी बड़ी गहराई से, उसकी ओर
तलाश उसकी फिर भी जारी रही,
कोई उत्तर पा नहीं सका, प्रश्न फ़िर भी खटकता रहा
मंज़िल की तलाश में, मैं यूं ही भटकता रहा
मिली तो नहीं मंज़िल, फ़िर भी प्रश्न खटकता रहा...
कौन पहुंचा है आज तक,अपनी आख़िरी मंज़िल पर ?
गणित में उसके मन विचलित होता रहा,
न कुछ सोच पाया और न ही अनुमान लगा पाया
अपनी ही उधेड़बुन में फंस कर,चिन्तन भी न कर पाया,
खैर छोड़ो इन बातों को, मिलेगा क्या इनसे?
यही सोच कर फ़िर भी कुछ सोच न पाया
उत्तर मिल न पाया, प्रश्न खटकता ही रहा
मंज़िल की तलाश में, मैं यूं ही भटकता रहा
मिली तो नहीं मंज़िल, फ़िर भी प्रश्न खटकता रहा...


- बाबू राम धीमान


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कितने चेहरे

न जाने कितने चेहरे लगाए,
लोग रहते है यहाँ,
एक पल जो दिखाते है,
दूसरे पल छिपा देते हैं कहाँ ?

हँसते-हँसते ठहाकों संग,
मगरमच्छी आंसू बहाते हैं कैसे ?
मन की ईर्ष्या और कुंठा पर,
मुस्कान का पर्दा गिराते हैं कैसे ?

मीठे-मीठे शब्द जाल से,
जंजाल षड्यंत्र का बुन जाते है क्यूँ ?
जहर की भर-भर कर शीशियाँ ,
शहद की चिप्पी लगाते हैं क्यूँ ?

जगजाहिर है चित्र और चरित्र ,
असलियत फिर छुपाते हैं कैसे ?
कर्म खलनायक के करके,
नायक खुद को बताते हैं कैसे ?

नहीं लायक जो देखने के भी,
वो आदर कैसे पा जाते हैं यहाँ ?
हैं जो पूजने के काबिल,
कर अपमानित ठुकराए जाते हैं यहाँ

सच्चा चेहरा रखने वाले,
नकाबपोशों का शिकार हो जाते यहाँ,
अति कठिन है पहचान कर पाना,
न जाने कितने चेहरे लोग रखते यहाँ ?


- धरम चंद धीमान


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16 December 2025

विजय दिवसः भारतीय सेना के शौर्य का प्रतीक


हर वर्ष 16 दिसंबर को हमारा देश विजय दिवस के रूप में भारतीय सेना के शौर्य को याद करता है। 16 दिसंबर 1971 का इतिहास हमारे देश के लिए एक महत्वपूर्ण दिवस के रूप में याद किया जाता है। इस दिन हमारी सेना ने पाकिस्तान को युद्ध में धूल चटाई थी। यह ना केवल एक सैन्य शक्ति का प्रदर्शन था, बल्कि मानवीय मूल्यों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता की भी पुष्टि करती है।





यह दिन हमारे हमें हमारे उन वीर सैनिकों के बलिदान और वीरता का स्मरण करता है, जिन्होंने हमारी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। इस युद्ध में हमारे 3900 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए और करीब 10 हजार सैनिक घायल हुए। मगर दुश्मन देश के हजारों सैनिक को घुटनों पर ला दिया। पूर्वी पाकिस्तान के सैन्य कमांडर लेफ्टिनेंट जरनल एएके नियाजी ने भारत के पूर्वी सैन्य कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण किया था।

इस युद्ध को भारत-पाक का तीसरा युद्ध भी कहा जाता है। यह युद्ध 3 दिसंबर से 16 दिसंबर 1971 तक चला और ढाका में पाकिस्तानी आत्मसमर्पण के साथ विराम हुआ था। माना जाता है कि इस युद्ध में 30 लाख से अधिक लोगों की जान गई और करीब 1 करोड़ से अधिक इस युद्धा के कारण बांग्लादेश से निर्वासित हुए। इस युद्ध की शुरुआत पाकिस्तान द्वारा भारत के हवाई अड्डों पर पूर्व-नियोजित हवाई हमलों से की गई। भारत द्वारा पाकिस्तानी आर्मी के आत्मसमर्पण एवं पाकिस्तान के दो टुकड़े कर बांग्लादेश के रूप में नया देश बनाकर युद्ध को समाप्त किया गया।






इस युद्ध में भारत में पाकिस्तान के दो टुकड़े किए और पश्चिम में लगभग 15000 किलोमीटर (5795 वर्ग मील) भूमि पर कब्जा किया था। मगर सद्भावना के प्रतीक के रूप में शिमला समझौते में पाकिस्तान को वापस कर दी गई। जबकि भारत ने जम्मू-कश्मीर में 883 किलोमीटर (341 वर्ग मील) और पाकिस्तान ने 150 किलोमीटर (59 वर्ग मील) क्षेत्र को अपने पास बरकरार रखा।

इस युद्ध को जीतने में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, रक्षामंत्री सरदार स्वर्ण सिंह, फील्ड मार्शल सैम होर्मुसजी फ्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ (सैम बहादुर), पूर्वी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा, नौसेना के पश्चिमी कमान के ध्वज अधिकारी कमान-इन-चीफ एडमिरल सौरेंद्र नाथ कोहली, पूर्वी नौसेना के कमान के ध्वज अधिकारी कमान-इन-चीफ वाइस एडमिरल नीलाकांत कृष्णन और हजारों सैनिकों की अहम भूमिका रही थीं।


- मन्नत रंधावा



14 December 2025

आज की प्रमुख रचनाएँ- 15 दिसंबर 2025





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है कोशिश यही




मैं करता रहा कोशिशें
अपनी कोशिशों में होती रहीं हैं ग़लतियाॅं
कई-कई और कई-कई बार मुझसे
और मैं हारता रहा हूॅं युद्ध-मैदानों में
जय-पराजय की होती हैं नीतियाॅं और-और
कि वे जो होती नहीं हैं कभी भी, कहीं भी
किसी भी कोशिश की क़शीश में पक्षधर
हज़ारों हार बाद, हज़ारों कोशिशें क्यों नहीं,
बार-बार और हज़ारों-हज़ार बार क्यों नहीं,
गिरना, उठना, संभलना, समझना इत्यादि
समझता हूॅं ख़ूब-ख़ूब समझता हूॅं मैं
और समझता हूॅं फिर-फिर लड़ना बार-बार
हज़ारों-हज़ार बार लड़ना और लड़ते रहना
है कोशिश यही।


- राजकुमार कुम्भज



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कहां गया वो घर अब
जहां पीढ़ियों ने
बचपन बिताया था
नापना था मुझे भी
उस घर की चौखट को
जहां छोटे से आंगन में
वक्त गुजर जाया करते थे
संयुक्त परिवार का संगठन
भाई-बहन, दादी बाबा
ताई ताऊ, चाचा चाची
रिश्तों की मंडी खड़ी रहती
अपनेपन की चाशनी में डुबोती
खाटें जब बिछती थीं
जगह न बचा करती थी
फिर भी किस्से कहानियों में
दादी बाबा की बातों में
खुशियों की महक हुआ करती थी
चूल्हें की रोटियों के साथ
मां ममता परोसती थीं
चिड़ियां दाना पाकर जहां
उम्मीद का घर न छोड़ा करती थीं
गऊ मां को भी
प्यार से रोटी मिलती थी
घर में अन्नपूर्णा की बरक्कत हुआ करती थी
अगल-बगल की छतें
अपनी ही हुआ करती थी
पंतगें घर घर अरमानों की उड़ा करती थीं
तब न दीवारें थी, न बंटवारा था
फिर भी पानी रिसते छप्पर ही
असल घर हुआ करते थे
जहां हम रिश्तों को
खुलकर जिया करते थे।


- अंशिता त्रिपाठी


*****




उठ और अपनी उड़ान देख,
कदमों तले आसमान देख।

मुसाफिर नजर मंजिल पर रख,
मत कभी अपनी थकान देख।

उथल पुथल करते आँसू के बीच,
हँसते हुये अपनी मुस्कान देख।

यूँ ही मत बन नीर क्षीर विवेकी,
हमेशा ईमान देख, बेईमान देख।

निशाना हरहाल में अचूक होगा,
अपनी तीर अपना कमान देख।

दीदार ए दुनिया सबको नहीं होती,
विकास आम खास छोड़ इंसान देख।


- राधेश विकास


*****



गुड़िया

नन्हीं सी गुड़िया,
मिट्टी का घर बनाती हैं,
उसमें अपने
नए सपनों को सजाती हैं,
नए परिवार को सजाती हैं,
नई गुड़िया का,
ब्याह रचाती है,
बड़ी आशाएं रखती हैं,
जब वह बड़ी होती हैं,
तब उन्हीं अमूर्त
कल्पनाओं को
मूर्त रूप देने की
कोशिश करती है
उम्र भर में...


- सुनीता बिश्नोई


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ओ रे चंद्रमा

निर्मित जब से है, अद्भुत ब्रह्माण्ड
सुन्दर -सा प्यारा है तब से चांद।
कोई कहे इन्दु, बच्चों के तुम मामा,
सबके दुलारे न्यारे, ओ रे चंद्रमा।

धीरे -धीरे, हौले-हौले परिक्रमा करते,
रूकते नहीं,बेथक कलाएं दिखाते चलते।
कभी अदृश्य हो अमावस तो कभी करते पूर्णिमा,
कहलाते हो कलाधर तभी, ओ रे चंद्रमा।

शीतल प्रवृत्ति से अपनी जग को शांति सिखाए,
धीरज धरकर पूर्णता फिर कैसे पाई जाए।
हालात बदलते सभी के, करते जाओ कर्मा,
सुन्दरता पर करना न नाज़, बतलाते ओ रे चंद्रमा।

जीवन रहता एक सा न,आते उतार -चढ़ाव,
बदलना न मंजिल, रहना सदा समभाव।
तारों संग जब होआते, बदल जाता समां,
दिन से रात कर निशाकर कहाते ओ रे चंद्रमा।

सारे जहां को देते रोशनी तुम एकसमान,
करते न घृणा, द्वेष, सबसे प्रेम रख करते मान।
उत्थान से पतन, पतन से उत्थान को पहनाते अमलीजामा,
अविचल हो पथ पर रहते अग्रसर सदा ओ रे चंद्रमा।


- लता कुमारी धीमान


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हो तंग जनों की बातों से
रो रो कितनी काटी निशीथ
आगे सत्कार बुराई पीठपीछ
शायद यही है इनकी नीति
सदैव भले के संग बुरा
क्या यही इस जग की रीत
के प्राणी यहां सब ही हैं नीच
और हम ही बस लाचार क्लिष्ट

उस समय को याद करो( 2)
जब सब मार ठहाके
रहे थे उसको नीचे खींच
तब उस कृत्य में शामिल
क्या तुम नहीं थे उनके बीच?
लाचार तो तुम कभी थे ही नहीं
अगर ना ही कभी बन पाओगे
और सबको यूं निष्ठुर बता
कब तक सत्य ठुकराओगे
जब औरों की निंदा छोड़कर
खुद में सुधार लय लाओगे
जब त्याग काम की वासना
खुद में प्रेम का दीप जलाओगे
लेने में तो सब खुश हैं
तुम देने में हर्षाओगे
जब शुद्ध विचारों के जल से
अपने मन को तुम नहलाओगे
तब जाके शायद कहीं
सती के त्याग को समझ पाओगे
तब जाके पूरे मन से
तुम राधे राधे गाओगे
तब अपने मन में ही कहीं
तुम अपना मन बढ़ाओगे

मुझे क्रोध भयंकर आता था
पर क्रोध को मैने बांध लिया
बस रचनी धर्म की गाथा अब
यह मन में मैने ठान लिया
उन द्वेष,घृणा,और श्रापों को
कुछ इस भांति मैने साध लिया

है संभव न मैं वीर बनूं
पर कोशिश न किसीकी पीर बनूं
न बन पाया जो कुछ भी अगर
प्रेम से बहता नीर बनूं


- शुभी मिश्रा


*****





उपहास

यह कैसा उपहास बिधाता
यह कैसा उपहास।
भर भावों को उर में,
बॉध दिया उल्लास।
यह कैसा उपहास बिधाता,
यह कैसा उपहास।

स्वतंत्र लेखनी पर जैसे,
बधें हुए हो हाथ।
दो पल भी रह न पाती,
इन भावों के साथ।
यह कैसा-

कर्म खड़ा फुंफकारता
विवश है मेरी आश,
करना चाहूं कुछ पर
हो जाता व्यर्थ प्रयास।
यह कैसा उपहास बिधाता,
यह कैसा उपहास

साध्य साधन और मनन,
प्रयत्न भी है साथ,
पर समय की बेड़ी ने,
बॉधा मुझको नाथ
कुछ कर पाने की चाह,
अब न रही खास,
यह कैसा उपहास विधाता,
यह कैसा उपहास।


- रत्ना बापुली


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दूर रहकर भी निभा जाता है कोई,
साथ रहकर भी कोई दगा दे जाता है।

जुर्म करके भी बच जाता है कोई,
बिन किये ही जुर्म सजा कोई पा जाता है।

क्या खाऊँ सोच तड़पता है कोई,
क्या –क्या खाऊँ कोई समझ नहीं पाता है।

जताता नहीं बहुत कुछ करके भी कोई,
छोटे से उपकार को कोई बार-बार बतलाता है।

क्षमा कर देता है बड़े गुनाह भी कोई,
आग जलाकर बदले की कोई खुद भी जल मर जाता है।

रक्त का रिश्ता भी अपना नहीं लगता कोई,
पल भर में ही अजनबी कोई दिल को भा जाता है।

समझ सका न ये दुनियादारी, गुजार उम्र कोई,
चंद दिन यहाँ रह कर कोई खुद को सर्वज्ञ बता जाता है।

“धर्म “समझ ये आया नहीं अपना-पराया कोई,
मिल जाए जो खुद सा कोई, वही दिलों का नाता है।


- धरम चंद धीमान


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कोई शख्स दिल में उतर गया है
अब सारा ज़ख्म भर गया है

चराग बेखौफ जल रहा हैं अब
तूफानों का मंज़र गुजर गया है

गर्मी का मौसम है आने वाला
अब अश्क आंखों में ठहर गया है

भंवरा बसंत ऋतु में खूब झूम रहा है
यादों के पुराने पत्ते सब झर गया है

मेरे दयार पे खुर्शीद आए है मिलने
सदमे के रश्क से सब जुगनू मर गया है

दिलो को शेर से सवा शेर कर दिया
हर दश्त का शिकारी अब डर गया है

चमन वाले अब पैगाम भेज रहे हैं
स्वागत में सारे फूल बिखर गया है

हबीब का मुसलसन पयाम आया है
सदानंद इंद्रधनुष के जैसे संवर गया है


- सदानंद गाजीपुरी


*****




नारी के कदम, विजय की ओर

रन हो या राहें जीवन की सारी,
हर कदम में आगे बढ़ती नारी।

घर की डोर हो या कर्म की उड़ान,
संतुलन में रखती हर पहचान।

बिन नारी के अधूरा हर प्रयास,
उसके संग ही मिलता लक्ष्य का विश्वास।

देवों संग नारी बनी विजय की ढाल,
तभी हर युग में जीती हर चाल।

थकती नहीं, रुकती नहीं,
नारी है- जो हार मानती नहीं।


- बीना सेमवाल


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अब ख़ामोश हर मंज़र है...

ख्वाहिशें दम तोड़ती हुईं,
उमंगें भी मानो दफ़न हैं,
बेजुबां दिल का समंदर है,
अब ख़ामोश हर मंज़र है...

प्रतिस्पर्धा न है किसी से,
न हार-जीत का डर है,
थम चुका जोश का बवंडर है,
अब ख़ामोश हर मंज़र है...

बिछे हैं कांटे हर क़दम राहों पर,
चलना क्या रेंगना भी है दूभर,
लहुलुहान कर रहा मुझे यादों का खंजर है,
अब ख़ामोश हर मंज़र है...

जाले पड़े दिल की टूटी दीवारों पे,
कुछ दरारों में दीमकों के बसेरे,
मन का महल अब तो खंडहर है,
अब ख़ामोश हर मंज़र है...

सूखी हर डालियां कहती हैं अब,
कहां से फूटे नई कोपलें ?
उम्मीदों की जमीं भी तो हो चुकी बंजर है,
अब ख़ामोश हर मंज़र है...
अब ख़ामोश हर मंज़र है...


- कुणाल


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