साहित्य चक्र

01 November 2024

कविता- दिल चाहे आसमान में उड़ना



मिल जाती है जब किसी को बहुत खुशी
उम्र बीत गई थी जिसको रहता था दुखी
दिल चाहे उड़ना आसमान में उसका
भावनाएं आ जाती हैं बाहर जो दिल में थी छुपी

अचानक से कोई मिल जाये अपना
लगता है जैसे देख रहे कोई सपना
जिसकी कृपा से वह आ गया सामने
नाम उसका चाहता है मन श्रद्धा से जपना

वर्षों बाद किसी की हो जाये पूरी मुराद
हो गया था जिसका जीवन में सब बर्बाद
जी रहा था करके अच्छे दिनों की याद
मुक्ति मिली चिंता से अब हुआ आज़ाद

गले लगाता घूम घूम कर सबको
कहता है सब को ही अपना
पूरी हुई जो आस अब मेरी
हकीकत है या कोई सपना

                                  - रवींद्र कुमार शर्मा


कविता- दीप




        न सही विश्वास मेरा,
        पूछ लें उस दीप से।

        जो रात सारी रहा जलता,
        साथ मेरे बन प्रतिबिंब।।

             हाल सारा जायेगा कह,
             दीप वह जो बुझ गया।

             जगने का सबब मेरा,
             और जलने के मजा।।

        मांगती विश्वास का बल,
        देख ले इक नजर भर।

        बस वही लेकर मैं संबल,
        जलती रहूँगी चिर -युगों तक।।

             हाथ गहकर बस तू कह दे,
            सफल होगी यह प्रतीक्षा।

            उम्र के विश्वास की,
            बहुत है वह एक ही पल।।

                     
                                        -  डॉ. पल्लवी सिंह 'अनुमेहा'


कविता- रह गया




जिंदगी जीते जीते जीना ही रह गया। 
दूसरे की पंचायत करने में खुद को पहचानना रह गया।

सभी के बारे में जानकारी रखने में,
अपने बारे में जानना रह गया।

दूसरे के बारे में बुरा सोचते सोचते,
अपना अच्छा करना ही रह गया।

भले ज्ञान प्राप्त कर लिया तमाम,
पर समझदारी पाना रह गया।

दूर के संबंधों को संजोते संजोते,
निकट के संबंधों को संजोना रह गया।

चारों दिशाओं के पत्थरों को तो पूज लिया,
पर ईश्वर को पहचानना रह गया।

नदी के बहाव की तरह बह गई यह जिदगी,
और फिर एक बार जीना रह गया।

दूसरों के घर उजाला करते करते,
अपने घर में दिवाली का दीप जलाना रह गया।


                                                    - वीरेंद्र बहादुर सिंह 


26 October 2024

लेख- छोटे बच्चों की मोबाइल की लत के लिए मां-बाप जिम्मेदार


आप छोटी थीं तो समय बिताने के लिए क्या करती थीं? यह बात 30 साल की उम्र वाली किसी भी महिला से पूछा जाए तो वह अपने बचपन के खट्टेमीठे अनुभव के साथ याद करते हुए कहेगी कि सहेलियों के साथ घरघर खेलती थी, छोटेछोटे बर्तनों को ठीक से रखती थी, शाम को दोस्तों के साथ गार्डन में खेलती थी, बरसात में कागज की नाव बना कर उसे तैराती थी, मिट्टी गीली कर के उससे छोटीछोटी चीजें बनाती थी, मेला घूमने जाती थी और इसी तरह की तमाम चीजें कर के समय बिताती थी। अनेक प्रवृत्तियों से भरा हमारा बचपन सचमुच समृद्ध था। क्योंकि उस समय मोबाइल इस दुनिया में नहीं था।




25 से 40 साल की उम्र वाले हर व्यक्ति को चाहे लड़का रहा हो या लड़की, सभी को समृद्ध बचपन मिला है। क्योंकि तब मोबाइल का प्रकोप आज की तरह नहीं था। यह भी कहा जा सकता है कि वह समय बच्चों के लिए स्वर्णकाल था। हम समय बिताने के लिए मोबाइल के सहारे नहीं रहते थे। हमारे पास करने के लिए अनेक प्रवृत्तियां थीं। अब के बच्चों के पास यह स्कोप कम हो गया है। आज ज्यादातर पैरेंट्स और बच्चे मोबाइल का उपयोग खूब कर रहे हैं। लोग शिकायत करते हैं कि बच्चे गैजेट्स के आदी हो गए हैं। हम लोगों को जिस उम्र में मात्र खिलौनों से खेलना आता था, उस उम्र में हमारे बच्चे मोबाइल खोल कर यूट्यूब खोज लेते हैं और उसे चालू कर के मनपसंद के कार्टून देखते हैं। मोबाइल में पासवर्ड लगा रखा है तो एक बार बच्चे के सामने पासवर्ड खोल दिया जाए तो उसे झट पता चल जाता है। गैजेट्स के कारण बच्चों में स्मार्टनेस जल्दी आ जाती है। जबकि स्मार्ट होना तो अच्छी बात है, पर गैजेट्स की ललक बच्चे को न्युरोलाॅजिकल समस्या तक ले जा सकती है।





अधिक टाइम स्क्रीन का असर-
स्क्रीन टाइम को ले कर भी शिष्टता होनी जरूरी है। पहले 2 साल तक तो बच्चे को मोबाइल से बिलकुल दूर रखना चाहिए। इसके बाद 3 से 5 साल के बीच में उसे मोबाइल दिया जा सकता है, पर उसका मैक्सिमम समय एक घंटा रखें। 5 साल बाद यह समय घटा दें। मोबाइल में बच्चा कैसा कंटेंट देखता है, इसका भी ध्यान रखें। अगर उसे बारबार कंटेंट बदलने की आदत है तो उसे टोंके। यह अच्छी आदत नहीं है। अधिक देर तक मोबाइल का उपयोग करने से बच्चे को न्युरोलाॅजिकल समस्या हो सकती है। स्वभाव में अधीरता, गुस्सा, एक ही बात को रिपीट करने की आदत, एकाग्रता का अभाव, एडीएचडी आदि अनेक समस्याएं हो सकती हैं।

हमारा भूतकाल और बच्चों का वर्तमान- 
हम अपने बचपन को खंगालें तो ख्याल आएगा कि हमें पढ़ने का शौक अपने दादा-दादी या माता-पिता से डेवलप हुआ है। पहले के समय में ज्यादातर घरों में लोग किताबें रखते थे। जिन्हें पढ़ना नहीं आता था, वे अपने बच्चों को दूसरी प्रवृत्ति सिखाते थे और तमाम लोग यह कहते थे कि उन्हें पड़ना नहीं आता, पर तुम सीखो। वह हम सभी का भव्य भूतकाल था। हम ने मांटेसरी पद्धति से पढ़ना सीखा और जीवन की उपयोगी अन्य चीजें भी सीखीं। पर आज के बच्चों का क्या? नो डाउट हम अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने का श्रेष्ठ प्रयत्न करते हैं, फिर भी हम जिस ऑथेंसिटी में बड़े हुए हैं, उसकी कमी कहीं न कहीं हमारे बच्चों के बचपन में अवश्य दिखाई देती है। इसका एक कारण हमारे स्वभाव का अधिक सेंसटिव स्वभाव भी कहा जा सकता है। दूसरा यह कि अब के बच्चे समय बिताने के लिए खिलौनों के बजाय मोबाइल नाम के खिलौने से खेलना पसंद करते हैं। इसके पीछे का कारण कहीं न कहीं हम खुद हैं।

बच्चा जो देखेगा, वही सीखेगा-
माता-पिता की सब से बड़ी शिकायत यह होती है कि बच्चा मोबाइल का आदी हो गया है। पहले इसी के विषय में बात करते हैं। आज का बच्चा बहुत कम उम्र से ही गैजेट्स और खास कर मोबाइल का क्रेज रखने वाला बन जाता है। इसका सब से बड़ा कारण हम खुद हैं। ञब हम खुद ही मोबाइल का उपयोग खूब करेंगे तो बच्चे भी वहीं सीखेंगे। छोटे से जब थोड़ी समझ डेवलप होती है तो बच्चा अपने आसपास के लोगों के हाथों में मोबाइल देखता है। उस समय गोद में सोए बच्चे को यह पता नहीं होता कि उसके माता-पिता या किसी के भी हाथ में यह क्या है? जो अधिकतर इनके हाथों में होता है। एकदम कमउम्र से ही उनके दिमाग में यह जिज्ञासा डेवलप होने लगती है कि मेरी ही तरह इम्पार्टेड यह क्या चीज है, जो सभी के हाथों में होती है। वह उसे अपनी बड़ीबड़ी आंखों से देखता रहता है। इसके बाद जब वह खाने-पीने में आनाकानी करता है तो मम्मी मोबाइल दिखा कर उसे खाने के लिए ललचवाती है। 





लगभग सभी बच्चों की मोबाइल देखने की आदत इसी तरह डेवलप होती है। 5 साल का होतेहोते यह आदत अतिशय बन जाती है। इसमें गलती उसकी अकेले की नहीं है, इसमें पैरेंट्स की भी उतनी ही गलती है। हम सभी बच्चों के सामने मोबाइल ले कर बैठ जाते हैं। वह बुलाता है या साथ खेलने के लिए कहता है तो हम सभी को मोबाइल देखने में खलल पड़ती है, तब हम सभी खीझ उठते हैं। हम सभी का यह ऐक्शन उन्हें सिखाता है कि जीवन में मोबाइल का कितना महत्व है। थोड़े समझदार बच्चे को अनुभव होता है कि मेरे पैरेंट्स को मेरी अपेक्षा मोबाइल ज्यादा महत्वपूर्ण है। आपकी यही बात वह फाॅलो करता है। इसके बाद हम सभी शिकायत करते हैं कि बच्चा मोबाइल का आदी हो गया है। जबकि उसकी यह आदत हम खुद लगाने वाले होते हैं। जब हम खुद मोबाइल नहीं छोड़ सकते तो बच्चों से कैसे उम्मीद रखें।

बेसिक आदत बदलने की जरूरत-
अब महिलाएं पौराणिक रीतिरिवाज फाॅलो करने लगी हैं। गर्भ के दौरान गर्भसंस्कार कराना और अच्छा साहित्य पढ़ना यह सब बेसिक है। महिलाएं अब यह सब करती हैं। पर यह पत्थर की लकीर नहीं है। यह सब होने के बावजूद बच्चे की आदत अच्छी ही होगी, यह जरूरी नहीं है। बच्चे के जन्म के बाद आप का ऐक्शन कैसा है, यह भी जरूरी है, क्योंकि बालक का पहला शिक्षक उसका घर ही होता है। वह घर में जैसा वातावरण देखेगा, वैसी ही उसके अंदर भी आदत डेवलप होगी। अगर बच्चा घर वालों को पढ़ता देखेगा तो वह भी पुस्तक प्रेमी बनेगा और वह मोबाइल का अधिक उपयोग करते देखेगा तो मोबाइल प्रेमी बनेगा।




बच्चे को कुएं का मेढ़क न बनाएं-
अपने यहां 2 तरह के पैरेंट्स हैं। एक वे जो एक अमुक उम्र तक बच्चों को घर से बाहर भेजने में डरते हैं और दूसरे जो बच्चों से बहुत कुछ करा लेना चाहते हैं। बाहर न जाने देने वाले पैरेंट्स बच्चों की मोबाइल या टीवी की लत के लिए सब से अधिक जिम्मेदार होते हैं। क्योंकि घर के अंदर रहने वाला बच्चा आखिर करे क्या? कितना इनडोर गेम खेले। आखिर में ऊब कर वह मोबाइल या टीवी देखने की जिद करेगा। ऐसा न हो, इसलिए बच्चे को बाहर ले जाएं, अन्य बच्चों से हिले-मिले। उसे कुएं का मेढ़क न बनाएं। अब दूहरी तरह के अपने बच्चे को सब कुछ सिखाने की अपेक्षा रखने वाले पैरेंट्स। इस तरह के पैरेंट्स भी अपने बच्चों के लिए खतरा हैं। अति की कोई गति नहीं। एक साथ सब कुछ सिखा देने की अपेक्षा रखना भी कम खतरनाक नहीं है। धीरज रखना चाहिए, समय के साथ सब हो जाएगा। बस, अपने बच्चों को अथेंटिक और गैजेट्स फ्री जीवन देने की कोशिश करेंगे तो बाकी सब अपने आप हो जाएगा।

                                                          - स्नेहा सिंह

25 October 2024

लेख- लेखन मात्र कमाई का जरिया नहीं


अब जब नोटफ्री आंदोलन के ज़रिये इस विषय पर ज़ोरदार चर्चा छिड़ चुकी है और आंदोलन के समर्थकों द्वारा बहुत आक्रामक और उपहासपूर्ण स्वर में इस विषय में तर्क दिए जा रहे हैं तो इसके कुछ और केंद्रीय आयामों पर बात कर लेना चाहिए। यहाँ पर सबसे बुनियादी प्रश्न यह है कि लेखक क्यों लिखता है? क्या वह आजीविका के लिए लिखता है? मान लीजिये कोई व्यक्ति आजीविका के लिए कोई कार्य करता है। वह एक दुकान लगाता है। उससे अगर कोई भलामानुष पूछे कि यह कार्य क्यों करते हो, तिस पर वह जवाब देगा- रोज़ी-रोटी के लिए। अगर उससे कहा जाए कि तुम्हें जितनी आमदनी होती है, वह मुझसे ले लो, लेकिन यह दुकान मत लगाओ- तब वह क्या करेगा ? सम्भव है वह पैसा ले ले और दुकान ना लगाए। 





किंतु अगर लेखक से कहा जाए कि फलां पुस्तक के प्रकाशन से तुम्हें जितनी आमदनी होगी, वह पैसा मुझसे ले लो किंतु पुस्तक मत लिखो- तब क्या लेखक पुस्तक नहीं लिखेगा? अगर वह पुस्तक पैसों के लिए ही लिखी जा रही है, तो सम्भव है वो पैसा ले ले और एक अरुचिकर कार्य करने से अपनी जान छुड़ाए। पर उसके बाद यह भी सम्भव है कि वह अपने समय और परिश्रम का उपयोग वह लिखने में करे, जो वह वास्तव में लिखना चाहता है। इस दृष्टान्त से हमें यह भेद दिखलाई देता है कि लेखन और आजीविका में कार्य-कारण का सीधा सम्बंध नहीं है, भले लेखन से आजीविका मिल सकती हो। किंतु लेखन की तुलना आजीविका के दूसरे साधनों से इसलिए नहीं की जा सकती, क्योंकि जहाँ वो दूसरे साधन विशुद्ध रूप से आजीविका के लिए होते हैं, वहीं लेखन किसी और वस्तु के लिए भी होता है।

मूलतः मक़सद यह स्पष्ट करना है कि लेखक का प्राथमिक दायित्व क्या है। लेखक का प्राथमिक दायित्व है लिखना और अपने लिखे को पाठकों तक पहुँचाना। एक बार यह दायित्व पूरा हो जाए, उसके बाद उसे अपने लेखन से जो धन, मान-सम्मान, सुख-सुविधा, उपहार आदि मिलते हैं, वो अतिरिक्त है, बोनस है। किंतु लेखक जब कोरे काग़ज़ का सामना करता है तब उसके सामने यह प्रश्न नहीं होता कि लिखने से कितना धन-मान मिलेगा, बशर्ते वो बाज़ारू लेखक ना हो। उसके सामने एक ही संघर्ष होता है और वो यह कि जो मेरे भीतर है- विचार, कल्पना या कहानी- उसे कैसे काग़ज़ पर उतारूं कि उसमें मेरा सत्य भी रूपायित हो जाए और पाठक तक भी वह बात किसी ना किसी स्तर पर सम्प्रेषित हो जाए।

यह कल्पना करना ही कठिन है कि आज से बीस साल पहले तक लेखक के लिए प्रकाशन कितना दुष्कर था। वास्तव में इंटरनेट के उदय से पहले लेखन का इतिहास अप्रकाशित पाण्डुलिपियों के ज़ख़ीरे से भरा हुआ है। आज लिखने की सुविधा हर किसी को प्राप्त है- पुस्तक ना सही तो पोस्ट ही सही, किसी पोस्ट पर कमेंट ही सही- किंतु आज से बीस साल पहले प्रकाशित लेखन एक लगभग एक्सक्लूसिव परिघटना थी। तब लेखन का सबसे प्रचलित माध्यम चिटि्ठयाँ ही थीं और लोग बड़े मनोयोग से पत्र लिखते थे। कोई लेख, कविता या कहानी लिखी तो उसे किसी पत्रिका या समाचार-पत्र को भेजते थे, उसे प्रकाशित करने का निर्णय सम्पादक के पास सुरक्षित रहता था। कोई पुस्तक लिखी तो उसकी पाण्डुलिपि भेजते थे, जिसके प्रकाशन का निर्णय प्रकाशक के पास सुरक्षित था। सम्पादक और प्रकाशक का वर्चस्व था, लगभग एकाधिकार था- इस प्रक्रिया में बहुत कम चीज़ें ही प्रकाशित हो पाती थीं। 

अख़बार में पाठकों के पत्र स्तम्भ में प्रकाशित होना भी तब बड़ी बात होती थी। आज जब सोशल मीडिया ने लेखक के लिए प्रकाशन सर्वसुलभ बना दिया है, उसे अपने लिखे पर तत्काल पाठक मिलते हैं और पाठकों की बड़ी संख्या उसकी पुस्तकों के प्रकाशन का पथ-प्रशस्त करती है- तब लेखक के अस्तित्व का प्राथमिक प्रयोजन- यानी अच्छे से अच्छा लिखना और अधिक से अधिक पाठकों तक पहुँचना- कहीं सरलता से सध जा रहा है। इसके लिए उसके मन में कृतज्ञता का भाव होना चाहिए। तब लेखक का यह कहना कि इसके लिए मुझको पैसा चाहिए, इसीलिए एक अर्धसत्य है क्योंकि इसमें यहाँ पर वह इस बात को छुपा ले जा रहा है कि उसके लिए प्रकाशित होना और पाठकों तक पहुँचना कितना बड़ा सौभाग्य है। और अगर यह ना होता तो वह अपनी रचना को लिए भीतर ही भीतर घुटता रहता।

लेखन की प्रकृति ऐसी है कि उसे दूसरी लोकप्रिय कलाओं- जैसे सिनेमा, रंगमंच, नृत्य या संगीत- की तुलना में कम प्रसार मिलेगा। शेखर एक जीवनी पढ़ने और सराहने के लिए एक विशेष प्रकार की शैक्षिक पृष्ठभूमि की आवश्यकता है, जो कोई नाच-तमाशा देखने, गाने-बजाने का आनंद लेने के लिए ज़रूरी नहीं। एक चलताऊ उपन्यास तक पाठक को खींचकर लाना भी एक सामान्य दर्शक को सिनेमाघर में ले जाने की तुलना में कहीं अधिक दुष्कर है। एक लेखक अपनी कला से कभी भी उतना सफल और धनाढ्य नहीं हो सकता, जितना कि एक फ़िल्म अभिनेता, खिलाड़ी, संगीतकार या नर्तक हो सकता है, बशर्ते देशकाल-परिस्थितियां उसके पक्ष में हों। 

नोटफ्री आंदोलन के कर्णधार इन तमाम तर्कों और तथ्यों को नज़रंदाज़ कर देते हैं। इतना ही नहीं, वो यह कहकर परिप्रेक्ष्यों को विकृत भी करते हैं कि लेखक जब किसी कार्यक्रम में जा रहा है तो वो अपना समय दे रहा है, जिसकी क़ीमत उसे मिलना चाहिए। जैसे कि जो आयोजक वह कार्यक्रम कर रहा है, उसके समय का कोई मूल्य नहीं है, या वह निठल्ला है? लेखक यह जतलाता है कि आयोजक को उसकी ज़रूरत है, पर वो यह छुपा जाता है कि उसे भी आयोजक की उतनी ही ज़रूरत है! उसे भी मंच चाहिए, विज़िबिलिटी चाहिए, नए पाठक और नए प्रशंसक चाहिए, उसे भी महत्व चाहिए, जो उस कार्यक्रम से उसे मिल रहा है। 

यह कार्यालय में काम करने जैसा नीरस नहीं है, जो लेखक यह तर्क देता है कि वह कार्यालय से छुट्‌टी लेकर आ रहा है, इसलिए उसे इसके ऐवज़ में पैसा चाहिए। लेखक को वैसे कार्यक्रमों में जो मान-सम्मान, महत्व-प्रचार मिलता है, उसे हासिल करना आज लाखों का सपना है (और जब लेखक युवा था और अख़बारों में अपनी कविताएं प्रकाशित करने भेजता था और उनके छपने की प्रतीक्षा करता था, तब यह उसका भी सपना हुआ करता था), लेकिन इस सपने को जीने का अवसर जब उसे मिलता है, तो लेखक यह जतलाता है मानो इसका कोई मूल्य ही ना हो, जैसे इसके लिए उसे स्वयं कुछ ना चुकाना हो, उलटे उसे इसके बदले में पैसा चाहिए ?

जब लेखक यह कहता है कि मैं पैसा लिए बिना किसी कार्यक्रम में नहीं जाऊंगा तो वह मन ही मन यह रूपरेखा भी बनाता ही होगा कि कितना पैसा? वह अपना एक रेट तय करता होगा। एक बार यह रेट तय होते ही यह निश्चित हो जाता होगा कि कुछ ही आयोजक उसे अफ़ोर्ड कर सकेंगे। किंतु ये जो आयोजक उसे अफ़ोर्ड करेंगे, वो लेखक में निवेश की गई राशि का रिटर्न कैसे पाएँगे (क्योंकि कोई भी लन्च फ्री में नहीं मिलता, यह नोटफ्री आंदोलन के कर्णधारों का प्रिय वाक्य है)। 

क्या कोई पूँजीपति अपनी जेब से पैसा लगाकर लेखक को एक दिन की वह सितारा-हैसियत दिलाएगा, या वह किन्हीं प्रायोजकों की मदद लेगा? ये प्रायोजक तब उस कार्यक्रम को कैसे प्रभावित करेंगे? क्या लेखक कविता या कहानी-पाठ के बीच में रुककर किसी प्रायोजक के उत्पाद (गुटखा या जूते?) का विज्ञापन भी करेगा? क्योंकि जब पैसे को ही सबकुछ मान लिया तो शर्म-लिहाज़ कैसी? जो आयोजक लन्च दे रहा है, होटल में रूम बुक कर रहा है, हवाई जहाज़ का टिकट दे रहा है, प्रोग्राम के लिए ऑडिटोरियम बुक कर रहा है और आपको लिफ़ाफ़ा भी दे रहा है- वो ख़ुद क्या यह सब फ्री में करेगा, क्या नोटफ्री  में उसका स्वयं का विश्वास नहीं होगा ?

मैं देख रहा हूँ कि नोटफ्री आंदोलन युवाओं में विशेषकर लोकप्रिय हो रहा है, क्योंकि ये पीढ़ी ही येन-केन-प्रकारेण सफलता की भाषा में सोचती है। किंतु दौर बदलने से दस्तूर नहीं बदल जाता। लेखक क्यों लिखता है, किसके लिए लिखता है, लेखक लेखन से क्या चाहता है- ये बुनियादी प्रश्न अपनी जगह पर तब भी क़ायम रहते हैं- इन्हें कोई बदल नहीं सकता।

मेरी पुस्तक बिके और मुझे उसका पैसा मिले- यह एक बात है- और मेरी पुस्तक कितनी बिकी, उससे मुझे कितना पैसा मिला, यही मैं रात-दिन सोचता रहूँ और पैसा कमाने के लिए ही लिखूँ- ये एक नितांत ही दूसरी बात है।

कोई आयोजक मुझे बुलाए, मान-सम्मान-मंच प्रदान करे और चलते-चलते अपनी सामर्थ्य से मुझे कुछ पैसा भी दे दे- यह एक बात है- किंतु मुझे पैसा दिया जाएगा तो ही मैं आऊँगा, यह भी नहीं देखूँगा कि मुझे बुलाने वाला कौन है, उसकी क्या क्षमता है, उसकी क्या प्रतिष्ठा है, उसके पास कितने उच्चकोटि के निष्ठावान श्रोता हैं- यह एक दूसरी ही बात है। और इन दोनों बातों में ज़मीन-आसमान, आकाश-पाताल का भेद है! 

जिस लेखक में इन दोनों में अंतर करने का विवेक नहीं, वो समाज को क्या मूल्य देगा? उसको तब कोई दुकान ही लगा लेना चाहिए, लेखन वग़ैरा उसके बस का रोग नहीं।


                                                       - प्रफुल्ल सिंह