साहित्य चक्र

09 September 2024

कविताः ऐयाश मुर्दो



ऐयाश मुर्दो सा जीवन जीते हो
न हंसते हो न रोते हो।

मूक जीवन की सत्ता पर
गुंगे बन तुम
बहरों की तरह फिरते हो।

बेईमानी की परत पर
सदाचार की तावीज़ पहन कर
खुद को खुदा घोषित करते हो।

गणतंत्र की तिरछी राह पर
अपनी अधूरी मूर्त लेकर
जगह- जगह तुम फिसलते  हो।

तट की खोज में
ज़माने की पगडंडी पर चल
भविष्य के भूत से डरते हो ।

ऐयाश मुर्दो सा जीवन जीते हो
न हंसते हो न रोते हो।

                                             - डॉ.राजीव डोगरा

भारतीय संस्कृति में लातों की परम्परा एक लघु गवेषणा


भारतीय संस्कृति अपने आप में रोचक ओर सनातन परम्पराओं की सूचक है जिसका हर पल मूल्यांकन तथा पुनर्मूल्यांकन करने वाले अनेक विद्वानों ने यथेष्ठ निवर्तनीय निर्विवाद सत्यों का उद्घाटन किया है। मानव मात्र की अपनी सीमायें हैं, अपनी संस्कृति है जिसकी व्याख्या समय, परिस्थिति, घटना ओर विषयपरक अध्यात्म अथवा जीवन के प्रसंगों के सभी महत्वपूर्ण पहलुओं पर वह करता रहा है। मनुष्य का शरीर एक ब्रह्मांड माना है जिसमें पंचतत्व, पंचमहाभूत आदि सारा जगत समाहित है। हम यहा शरीर का विशेष ओर महत्वपूर्ण अंग पाद की बात करना चाहेंगे। लात-जिसे पैर, पाँव, गोड़, पद, चरण तथा टाँग, पाद आदि अनेक रूपों से यथा स्थान जरूरत अनुसार पुकारा गया है, न सिर्फ हमारी देह का ही बल्कि हमारी संस्कृति का ही अविच्छिन्न अंग रहा है। फिर प्रश्न उठता है कि इसका क्या कारण है? यह क्यों हुआ? फिर यहीं उत्तर मिलता है कि अनेक अनिर्वचनीय सत्यों की ही भाँति यह भी एक सत्य है कि यदि मानव के पास लात न होते तो वह एक जड प्राणी होता किन्तु इसी जड़ता ने हमें चेतनता की ओर ले जाने वाला साधन यही लात दी है। निश्चय ही हमे यह बात दोहरानी पड़ेगी कि लात ही प्रगति और जीवन का चिन्ह है। लात में सौन्दर्य ओर भक्ति की दिव्यता भी देखी जा सकती है ओर लात को देख वासना आने पर नैतिक पतन एवं मानवीय भाव के तिरोहित होने पर पेड़ पौधे पहाड़ जैसे जड़ता अथवा क्रूरतम पशु बन पाशविकता की चर्मोत्कृष्टता भी कलंक के रूपं में सामने होती है।



आप भी संतुलित ढंग से और बिना पूर्वाग्रहों को मन में लात को एक युगान्तरकारी अस्त्र मानकर स्थान देने का मन बना ले तो लात के विषय में आप जागरूकता होंगे ओर निर्णय लेने को विवश होंगे की सच में ही लात युगांतर करने वाला अस्त्र है जो जाने भूले-भटकों को राह सुझाने वाला एक सशक्त माध्यम रहा है। लात से ही विकास क्रम का मार्ग निकलता है । मानव की प्रगतिशीलता का प्रतिनिधित्व इन्हीं लातों ने किया ओर चाँद तारों सहित अन्तरिक्ष में अपनी विजय का डंका बजाने ये ही लातें पहुंची है किन्तु सर्वत्र अपना लोहा मनवाने वाली इन लातों को हमेशा उपेक्षा ही मिली है ओर साहित्य जगत भी इन लातों के अपने विचारों से लात मारकर उपेक्षित ही किए है। भारतीय संस्कृति में लातों को लेकर अनेक प्रसंग है किन्तु क्या हमारी यह संस्कृति लातों के साथ हुये पक्षपातों ओर पुरोगामी संस्कृति के व्याख्याकारों की उपेक्षाओं का उत्तर देने का साहस करेंगे, शायद कदापि नही। इन्हीं तथ्यपरक विचार में हमारा शीर्षक विषय होने से ये अत्यन्त आवश्यक हो जाता है कि संस्कृति की पूर्ण व्याख्या करते समय हमें लातों की परम्परा पर भी एक दृष्टिपात कर लेना चाहिये । संस्कृति क्या है ? यह सवाल सभी के मन में उठता है ओर मन ही इसका उत्तर देता है की संस्कृति वह है जिसे बिना सोचे विचारे हम बिना झिझक करते है ओर उसके कारण में नहीं झाँकते है। हम से तात्पर्य समाज की वह बिखरी ओर संगठित इकाई है जो एक हो जाये तो अगाध शक्तिशाली हो जाती है ओर यही शक्ति जन जन में प्रवाहित होने लगती है जो संस्कृति का रूप ले लेती है ओर कालांतर में यही वैचारिक जनधारा सबकी चिरपरिचित होने से सभी के लिए सुगम हो जाती है ओर फिर आवश्यक नही की सभी जन एक साथ मिलकर या विचार कर इस परंपरा को अपनाए, सभी इस परंपरा की बन चुकी पगडंडियों पर पूर्व की तरह बिना विचारों पर चलते रहेंगे।

आप सभी सुधिपाठक जन को स्मरण ही होगा कि सुप्रसिद्ध मुनि भृगु ने क्षीर सागर में शेषनाग पर लेटे ओर लक्ष्मी के पैर दबाते समय समस्त लोको के स्वामी सत्ताधारी श्रीहरि विष्णु को जो लात मारी थी और उससे उनका जो कुछ खोया था, सो उसका आज तक पता नहीं चल पाया है, यह सतयुग की बात कलियुग के उनके एक भक्त रहीम ने स्वीकारी है -का रहीम हरि को गयो, जो भृगु मारी लात ? अर्थात् जो भृगु ने लात मारी उससे हरि का क्या गया। यदि शब्दों की आत्मा होती है, तो लात की भी अपनी आत्मा है। लात कहने मात्र से ही एक स्फूर्ति एक आनन्द का बोध होता है। लात ही एक ऐसा शब्द है जो कर्ता भी है कर्म भी है, क्रिया भी है ओर विशेषण आदि भी है जो सभी भाषाओं के विविध रंग रूपों में प्रयोग होता है। इस प्रकार के शब्दों की अवहेलना करना अपनी संस्कृति को ही अस्वीकार कर देने के बराबर समझा जा सकता है।


लात का अपना ही सौन्दर्य है। अगर लात स्त्री की, या पुरुष की बात की जाये तो उसकी सुंदरता के चित्रण में स्त्री की लात का अप्रतिम सौंदर्य को शृंगार रस में अभिव्यक्त करते करते कितने ही दीवाने हो चुके होंगे, कितने बाबा बैरागी हो चुके होंगे, कितने पागल हो चुके होंगे ओर कितने काव्य मर्मज्ञ होंगे इसकी प्रमाणित जानकारी कहीं उपलब्ध नहीं है ओर न ही यह जुटाने का प्रयास किसी ने किया है, आप यह समझने की भूल न कीजिएगा की जो किसी ने नहीं किया है वह मैं आपको करके दूंगा ? यह शोध मेरा विषय नहीं, मैं तो लात खाने वाले, लात मारने वाले, लातों के नीचे दबे कुचले लोगों की पीड़ाए सुनने के बाद यह लातों की परंपरा पर लिखने बैठ गया वरना यह समझ लीजिये यह विषय एक जन्म में पूरा लिखा जाना संभव नहीं है, इसलिए मैं इस विषय को छूकर आगे निकल रहा हूँ। अब लात की बात शुरू करता हूँ, लात तो लात जैसी ही होती है किन्तु उसे सुदरता या कुरूपता की कसौटी पर कसने का काम विवेक पर निर्भर करता है। हमारा विवेक वैचारिकता के मकड़जाल में अगर यथार्थ को देख अन्य कुमार्गी विचारों के संसर्ग में हो तो सुंदरता उसके लिए कुरूप भी हो सकती है तब वह लात मैं सौंदर्य नहीं वासना देखेगा। यहा सुंदरता नही कुरूपता है किन्तु कुरूपों के लिए कुरूपता भी सुंदरता दिखाई देती है। देखा जाये तो भारतीय संस्कृति में लातों को समस्या भी निरूपित किया जाकर सभी की वैचारिकता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया जा सकता है अथवा लातों को वैचारिक क्रांति की धारा में मोड़कर पदानुवंदन किया जा सकता है।



लात से मोक्षप्राप्ति के मार्ग को रामायण में गोस्वामी तुलसीदास जी ने सुंदर व्याख्या से समझाया है कि अहिल्या को भगवान श्रीराम कि चेतनापुंज लात के स्पर्श से शिला से नारी बनी अर्थात राम के स्पर्श से जड़ता मानवता में परिवर्तित हो गई यानि लात के स्पर्श से मोक्ष प्राप्त किया। इसलिय पाँव का वंदन को मैंने पदानुवन्द्न कहा है। इस उदाहरण के बाद ध्यान रहे लात किसी वर्ग विशेष का प्रतिनिधित्व नहीं करती है, बल्कि यह संदेश देती है कि लात एक जीवित शक्ति का उदाहरण बन सकती है, इसलिए लातों के महत्व को कम नहीं आँका जा सकता है। निशाचर राज साम्राज्यवादी रावण ने अपने भाई विभीषण के देशद्रोही विभीषण को जब देश निकाला का दण्ड, बिना मुकदमा चलाये हुये ही दे दियो तो लात के माध्यम से ही यह क्रिया सम्पन्न हुई थी। त्वयं गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसकी पुष्टि करते हुए लिखा है- 'तात-लात रावन मोहि मारा यानि पाँव का वंदन को ही पदानुवन्द्न कहा गया है।



अंत में यह भी बताना चाहूंगा कि हम ओर आप चौबीसों घंटे अपने अपने लेखन में एक दूसरे को लात मारना, लतियाना, लात खाना, दुलत्ती झाड़ना यह सब किसी न किसी रूप में करते आ रहे है ओर अपना नाम उजागर नही होने देना चाहते है। हिन्दी साहित्य जगत में कोई बहुत ही सूक्ष्म रूप में ओर कोई विराट रूप में लात मारते खाते आ रहे है। अनेक साहित्यकारों और कलाकारों के जीवन में लात ने जो विलक्षण व्याकुलता, भावों की टकराहट, चेतना तथा प्रकाश भर दिया है, उससे उऋण होना असम्भव है। प्रसिद्ध है कि तुलसीदास को उनकी पत्नी ने इसी माध्यम से समझाया था। सूरदास को भी चिन्ता-मणि नामक वेश्या के यहाँ इसी प्रकार के मुहावरे का सामना करना पड़ा था। कहा जाता है कि भौजाई की दुलत्ती ने रीतिकाल में भूषण की कविता को जन्म दिया। आधुनिक काल में भी लातों के सौजन्य से प्राप्त अनेक कृतियाँ हमारे साहित्य को गौरवान्वित कर रही है। वस्तुतः सत्य यहीं है कि जब तक कलाकार के मन पर कोई ठेसात्मक अनुभूति नहीं होती तब तक उसमें मानवीय करुणा की भावना का संचार हो ही नहीं पाता ! साहित्य की वाणी का दर्द इत्ती लात के ही माध्यम से फूटता है। यही सच्चे दर्द की कसौटी है।


- आत्माराम यादव


कविताः एक शहर




अस्पताल के दरवाजे पर
हक, सच, ईमान और कद्रें,
जाने कितने ही लफ्ज़ बीमार पड़े हैं
इक भीड़ सी इकट्ठी हो गयी है,
जाने कौन नुस्खा लिखेगा
जाने यह नुस्खा लग जायेगा,
लेकिन अभी तो ऐसा लगता है
इनके दिन पूरे हो गये।
इस शहर में एक घर
घर कि जहां बेघर रहते हैं
जिस दिन कोई मजदूरी नहीं मिलती
उस दिन वे परेशान रहते हैं
बुढ़ापे की पहली रात
उनके कानों में धीरे से कह गयी
कि शहर में उनकी
भरी जवानी चोरी हो गयी।
कल रात बला की सर्दी थी
आज सुबह सेवा समिति को
एक लाश सड़क पर पड़ी मिली है
नाम व पता कुछ भी मालूम नहीं
शमशान में आग लग रही है
लाश पर रोने वाला कोई नहीं
या तो कोई भिखारी मरा होगा
या शायद कोई फलसफ़ा मर गया।
किसी मर्द के आगोश में-
कोई लड़की चीख उठी
जैसे उसके बदन से कुछ टूट गिरा हो
थाने में एक कहकहा बुलंद हुआ
कहवाघर में एक हंसी बिखरी
सड़कों पर कुछ हॉकर फिर रहे हैं
एक एक पैसे में खबर बेच रहे हैं
बचा खुचा जिस्म फिर से नोच रहे हैं।
गुलमोहर के पेड़ों तले
लोग एक दूसरे से मिलते हैं
जोर से हंसते हैं गाते हैं
एक दूसरे से अपनी अपनी
मौत की खबर छुपाना चाहते हैं
संगमरमर कब्र का तावीज है
हाथों पर उठाये उठाये फिरते हैं
और अपनी लाश की हिफाजत कर रहे हैं।
दिल्ली इस शहर का नाम है
कोई भी नाम हो सकता है ( नाम में क्या रखा है)
भविष्य का सपना रोज रात को
वर्तमान की मैली चादर
आधी ऊपर ओढ़ता है
आधी नीचे बिछाता है
कितनी देर कुछ सोचता है, जागता है,
फिर नींद की गोली खा लेता है।

- अमृता प्रीतम


लघु कथाः बंटवारा (जुदा, न्यारा)

प्राचीन समय से ये प्रथा बड़े नैतिकता के साथ चली आई है और जिसे नियत भी समझा गया है की हर एक व्यक्ति का परम कर्त्तव्य और कार्य भी है की अपने पूर्वजों से चली आ रही संपति का संरक्षण एवम् विस्तार करना ही जीवंत है और इसे साबित भी करना पड़ता है ताकि आने वाली पीढ़ी भी उस प्रक्रिया से रूबरू हो सके और अपनी परंपरा को अबाध गति से चलायमान रख सके।





इस पड़ाव तक पहुंचने में लगभग जीवन का पचास फीसदी समय व्यतीत हो जाता है लेकिन उसके बाद भी बड़ी परीक्षा से गुजरना पड़ता है। जीवन के बहुत सारे पड़ाव हैं पर उनमें से सबसे व्यथित जो पड़ाव है वह है बटवारा, जुदा,या फिर न्यार(गढ़वाली शब्द) वो कितनी अजीब बात होगी की जिस कार्य को पहले बड़े मिल जुल के साथ हास्य विनोद के साथ एवम कभी बडे़ आक्रोश के साथ किया जाता था ,जिसे पूरी संपति के रखा रखाव के लिए कठिन परिश्रम किया जाता था घर के लिए हर एक आवश्यक सामग्री जुटाई जाती थी, हर एक रिश्ते को अदब के साथ स्वीकारा जाता था, अंत में एक ऐसा भी मोड़ (परिवर्तन) आता है की केवल अपना हक और सब कुछ संपति रिश्ते सब धरे के धरे रह जाते हैं।और आकांक्षा होती है तो केवल अपनी वस्तु की ,तब वो सब कुछ विस्मृत हो जाता है जिसके लिए जीवन का अमूल्य समय बलिदान किया है । जिसके लिए हर एक वस्तु का त्याग किया।

और वो अटूट विश्वास एवम बंधन जो अपनों के बीच एक विशेष प्रकार की शक्ति प्रदान करता है।उससे विरक्ति यही कटु सत्य है जीवन का जिसके कारण हर एक पायदान से गुजरना पड़ता है और वो भी देखना पड़ता है किसको किसके प्रति कितना अनुराग है । परिवार के सभी सदस्य जब आपस मे मिलजुलकर रहते हैं प्रत्येक कार्य की सामूहिक रणनीति तैयार की जाती है तो वो अभिव्यक्ति उर में एक विशेष प्रकार की शक्ति प्रदान करती है , जिससे कार्य करने में किसी भी प्रकार की असुलभता नहीं होती, लेकिन कार्य वही पर रण नीति अकेले तैयार करनी हो तो बात थोड़ा मार्मिक हो जाती है। 




     अब बात विषय की करते हैं जो मेरा मुख्य उद्देश्य है की बटवारा क्यों इतना संतप्त करता है।क्योंकि बटवारे की परिधि असीमित है जो हर एक व्यक्ति हृदय से उसे स्वीकार नहीं करता क्योंकि जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अंश है जुदा होना ,क्योंकि बचपन में दादा - दादी, माता - पिता, चाचा - चाची , बडे़ भाई - बहन  सबके मुंह से एक ही बात सुनने को मिलती है की सभी एक साथ रहो ,मिलजुलकर कर रहो आपस में किसी प्रकार की वैमनस्यता को मत पालो सबका आदर सत्कार करो और कंधे से कंधा मिलाकर चलो लेकिन जैसे जैसे वक्त गुजरता जाता है वैसे वैसे जीवन में परिवर्तन आते रहते और उन्हीं बदलाओं में एक बदलाव आता है बटवारा जो जीवन शांत जीवन को भी झकझोर देता है।

    जब एक थाली में खाकर दो भाई पले बढ़े हो और फिर उस थाली को भी हक दे दिया जाय तो ऐसा प्रतीत होता की अगर धरती फटती तो उसमें समा जाता लेकिन नियति है टूटे मन और दग्ध हृदय से स्वीकारना पड़ता है ,वो चौक जिसमें घुटनों के बल से पूरा भ्रमण किया जाता था, प्रभृति खेल खेला करते थे और अब जब उसके भी हिस्से किए जाते तो उस चौक की भी वो दयनीय स्थिति देखी नहीं जाती, वो कक्ष (कमरा) जिसमें रात भर एक दूसरे के साथ लड़ाई झगड़ा खेल करते थे वो जब किसी एक के हिस्से में आता तो उसे देख कर और उन सारी पुरानी यादों को याद करके आंसू छलक पड़ते, वो मवेशी जिनके साथ दोनो साथ जाया करते थे और जब उनको भी बांट दिया जाता है तब उनकी दशा देखकर भी मन संतप्त हो उठता है और  जो दुख की अनुभूति होती है वो कल्पना के परे है जिससे मन व्याकुल हो उठता है। 

वो खेत खलिहान जिनमें सभी मिलजुलकर खेती करते हल चलाते खेत में बैठ कर मां के द्वारा बनाए गए भोजन को बड़े चाव के साथ खाते और फिर उन थके हारे बैलों को भी खिला कर घर लाते आज जब वही खेत कई हिस्सों में तब्दील दिखता और खेतों में अकेले अकेले काम करती भाभियां बहुएं दिखती तो सीना फटने को आता, जब घर-बार  खेत खलिहान पशु आदि को बांट दिया जाता तब अंत में  वो सबसे व्यथित करने वाली अनुभूति को विभाजित करने की बारी आती जो कभी उनके द्वारा भी नहीं सोचा गया होगा और जो सीख उनके द्वारा कभी नहीं दी गई होगी की अब अंत में माता पिता के बंटवारे की बारी है, जिन्होंने जीवन इस हिस्सेदारी के लायक बनाया आज उनका भी हिस्सा किया जाएगा की कौन कब और कैसे किसके साथ रहेगा क्योंकि दोनों को साथ नहीं रखा जाता, अब माता पिता को भी वो सजा दी जाती है जो मृत्यु से भी परे है और  तब बेटे और बहू मासिक किस्तों के आधार पर माता पिता को भी बांट लेते हैं ,माता पिता का वो जीवन सबसे कारुणिक होता है जब दोनो को कई माह अलग रहकर अपनी इच्छाओं का गला घोंट कर जीवन यापन करना पड़ता है ।अपनी खुशियों का बंटवारे के लिए न्योछावर करना पड़ता है। 

और अतीत के वो क्षण हर पल कचोटते रहते हैं की माता पिता के द्वारा दी गई सीख आज क्यों धूमिल होती नजर आती है। मन में यही प्रश्न उठता रहता है की बच्चों को किस प्रकार से शिक्षित करूं आज सामंजस्य पूर्ण जीवन के लिए या फिर आने वाले भविष में होने वाले जुदा के लिए।ये अभिव्यक्ति अत्यधिक मार्मिक है जो अंत में जीवन को कुंठा की राह के साथ साथ अपनों से भी विरक्त कर देती है।

                                                         - कैलाश उप्रेती "कोमल"


पारिवारिक कर्तव्य के रूप में पितृ ऋण से मुक्ति पाने का माध्यम हैं श्राद्ध

श्राद्ध भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है। इसे पितरों (पूर्वजों) की आत्मा की शांति और संतुष्टि के लिए किया जाता है। श्राद्ध संस्कार का उल्लेख प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों जैसे कि वेद, पुराण, और स्मृतियों में किया गया है। इसे एक पारिवारिक कर्तव्य के रूप में देखा जाता है, जो पितृ ऋण से मुक्ति पाने का माध्यम है। ।वैसे तो पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए भारत में कई जगहें हैं लेकिन फल्गु नदी के तट पर स्थित गया शहर का अपना विशेष महत्व है। वायु पुराण, गरुड़ पुराण और विष्णु पुराण में भी गया शहर का महत्व बताया गया है। इस तीर्थ पर पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है इसलिए गया को मोक्ष की भूमि अर्थात मोक्ष स्थली कहा जाता है। गया शहर में हर साल पितृपक्ष के दौरान एक बड़ा मेला लगता है, जिसे पितृपक्ष का मेला भी कहा जाता है। गया शहर हिंदुओं के साथ साथ बौद्ध धर्म के लिए भी पवित्र स्थल है । 





धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सर्वपितृ अमावस्या के दिन गया में पिंडदान करने से 108 कुल और 7 पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है और पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। साथ ही पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है इसलिए इस स्थान को मोक्ष स्थली कहा जाता है। पुराणों में बताया गया है कि प्राचीन शहर गया में भगवान विष्णु स्वयं पितृदेव के रूप में निवास करते हैं।गया के बारे में एक पौराणिक कथा के अनुसार गया में गयासुर नामक एक असुर ने कड़ी तपस्या की थी और ब्रह्माजी से वरदान मांगा था। गयासुर ने ब्रह्माजी से वरदान मांगा था कि उसका शरीर पवित्र हो जाए और लोग उसके दर्शन कर पाप मुक्त हो जाएं। इस वरदान के बाद लोगों में भय खत्म हो गया और पाप करने लगे।।बड़े बड़े पापी भी स्वर्ग पहुंचने लगे। पाप करने के बाद वह गयासुर के दर्शन करते और पाप मुक्त हो जाते थे। ऐसा होने से स्वर्ग और नरक का संतुलन बिगड़ने लगा। इन सबसे बचने के लिए देवतागण गयासुर के पास पहुंचे और यज्ञ के लिए पवित्र स्थान की मांग की। गयासुर ने अपना शरीर ही देवताओं को यज्ञ के लिए दे दिया और कहा कि आप मेरे ऊपर ही यज्ञ करें। जब गयासुर लेटा तो उसका शरीर पांच कोस में फैल गया और यही पांच कोस आगे चलकर गया बन गया। गयासुर के पुण्य प्रभाव से वह स्थान तीर्थ के रूप में जाना गया। 

गया में पहले विविध नामों से 360 वेदियां थी लेकिन अब केवल 48 ही शेष बची हैं। गया में भगवान विष्णु गदाधर के रूप में विराजमान हैं। गयासुर के विशुद्ध शरीर में ब्रह्मा, जनार्दन, शिव तथा प्रपितामह निवास करते हैं। इसलिए पिंडदान व श्राद्ध कर्म के लिए इस स्थान को उत्तम माना गया है।हिंदू धर्म में मान्यता है कि हर व्यक्ति पर तीन प्रकार के ऋण होते हैं—देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। श्राद्ध कर्म पितृ ऋण से मुक्ति का एक महत्वपूर्ण साधन माना जाता है। कोई नहीं बता सकता कि इसमें कितनी सच्चाई है अथवा इसे करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और वे मोक्ष की ओर अग्रसर होते हैं,लेकिन हिन्दू धर्म में इसे किये बिना पितरों की मुक्ति नहीं हो सकती ऐसा माना जाता है।

अत्रिसंहिता के अनुसार 'पुत्र, भाई, पौत्र (पोता), अथवा दौहित्र यदि पितृकार्य में अर्थात्‌ श्राद्धानुष्ठान में संलग्न रहें तो अवश्य ही परमगति को प्राप्त करते हैं।पितृ पक्ष में 16 दिनों तक श्राद्ध कर्म होते हैं। ऐसा माना जाता है कि जिस परिवार में किसी सदस्य का देहांत हो चुका है उन्हें मृत्यु के बाद जब तक नया जीवन नहीं मिल जाता तब तक वे सूक्ष्म लोक में वास करते है। ऐसा विश्वास है कि जो व्यक्ति श्राद्ध का आयोजन करता है, उसके परिवार में समृद्धि और शांति बनी रहती है। इसके विपरीत, जो श्राद्ध नहीं करते, उन्हें पितृ दोष का सामना करना पड़ता है, जिसके परिणामस्वरूप परिवार में आर्थिक, मानसिक और शारीरिक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।श्राद्ध करना एक धार्मिक कर्तव्य भी है, जो हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है। 





यह हमारे पूर्वजों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का एक तरीका है, और इससे हमें अपनी सांस्कृतिक धरोहर की सुरक्षा और उसे आगे बढ़ाने का अवसर मिलता है। श्राद्ध से जीवित व्यक्ति और उसके पूर्वजों के बीच एक आध्यात्मिक संबंध स्थापित होता है। यह अनुष्ठान उस कड़ी को मजबूत करता है, जो पितरों और उनके वंशजों के बीच होती है। पुराने समय में श्राद्ध को बहुत साधारण तरीके से किया जाता था क्योंकि सबके पास संसाधनों का अभाव होता था लेकिन अपनी सामर्थ्य के अनुसार सभी लोग अपने पितरों का श्राद्ध करते थे।आजकल देखादेखी में श्राद्ध का तरीका बदल गया है।

दिखावा अधिक हो गया है। ऐसा भी देखा गया है कि जीते जी माता पिता की सेवा नहीं की जाती तथा उनको सम्मानित ज़िन्दगी जीने से वंचित रखा जाता है लेकिन मरने के बाद लोक लाज के लिए तथा दिखावे के लिए लोगों को बुलाकर श्राद्ध किया जाता है। पुराने समय में श्राद्ध को सामूहिक भोज का आयोजन न करके केवल कुछ ब्राह्मणों को तथा जिसका श्राद्ध होता था उसके साथियों को व दोस्तों को बुलाकर भोजन करवाया जाता था तथा कौओं को भी दूध,चावल व खीर आदि परोसी जाती थी।।उसके साथियों या दोस्तों को बुलाने के पीछे केवल उसके साथ जुड़ाव व आत्मीयता ही होती थी जिनके शामिल होने से उसके साथ बिताए पलों के स्मरण करके दिवंगत को श्रंद्धांजलि हो जाती थी।उसके साथ बिताए पलों के संस्मरण भी याद के रूप में ताजा हो जाते थे।उस समय श्राद्ध के दिनों में कौवे बहुत संख्या में घरों के आसपास आकर अपना भोजन ग्रहण करते थे लेकिन आज हम अपने गांवों में देखते हैं कि श्राद्ध के दिनीं में भी कौवे बहुत कम नज़र आते हैं।


 श्राद्ध के लिए एक पवित्र और शांतिपूर्ण स्थान का चयन किया जाता है। इसे किसी भी दिन किया जा सकता है, लेकिन पितृ पक्ष (अश्विन मास के कृष्ण पक्ष) का समय विशेष रूप से शुभ माना जाता है। इस दिन ब्राह्मण या आचार्य को आमंत्रित किया जाता है, जो श्राद्ध की प्रक्रिया को संपन्न करता है।श्राद्ध का पहला चरण तर्पण होता है। इसमें व्यक्ति अपने पितरों को जल अर्पित करता है। यह प्रक्रिया विशेष मंत्रों के साथ संपन्न होती है। जल में काले तिल, दूध, और कुशा (एक पवित्र घास) मिलाकर पितरों को अर्पित किया जाता है। तर्पण के दौरान, व्यक्ति का मुख दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए, क्योंकि इसे यम की दिशा माना जाता है। तर्पण के बाद पिंडदान किया जाता है। इसमें चावल, जौ, तिल, घी, और शहद के मिश्रण से बने पिंड (गोलाकार आटे के गोले) बनाए जाते हैं और पितरों को अर्पित किए जाते हैं। पिंडदान का उद्देश्य पितरों की भूख को शांत करना और उन्हें तृप्ति प्रदान करना होता है। 

पिंडदान के समय भी विशेष मंत्रों का उच्चारण किया जाता है।पिंडदान के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है। यह भोजन सात्विक,साफ सुथरा और शुद्ध होना चाहिए। भोजन के साथ-साथ ब्राह्मणों को वस्त्र, अनाज, और अन्य आवश्यक वस्तुएं दान की जाती हैं। यह दान पितरों की आत्मा को संतोष और शांति प्रदान करता है। ब्राह्मण भोजन के बाद पितरों की आत्मा की शांति के लिए हवन किया जाता है। इस हवन में घी, तिल, जौ, और समिधा (विशेष प्रकार की लकड़ी) का प्रयोग होता है।  हवन का धुआं पवित्र और शुद्ध होता है, जो पितरों की आत्मा तक पहुंचता है और उन्हें संतुष्टि प्रदान करता है ऐसा माना जाता है।




श्राद्ध कर्मकांड के बाद, परिवार के सभी सदस्य एक साथ भोजन करते हैं। इस भोजन को पवित्र और संतुष्टि से भरा माना जाता है, क्योंकि इसे पितरों के आशीर्वाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। श्राद्ध कई प्रकार से किये जाते हैं।नित्य श्राद्ध:-यह श्राद्ध का एक प्रकार है जो नियमित रूप से किसी विशेष दिन पर किया जाता है। इसे वार्षिक श्राद्ध भी कहा जाता है। यह उस दिन किया जाता है जिस दिन पितर का निधन हुआ था। पार्वण श्राद्ध:-इसे पितृ पक्ष में किया जाता है, जो अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में आता है। यह श्राद्ध 15 दिन तक चलता है और इसमें सभी पितरों के लिए श्राद्ध कर्मकांड किए जाते हैं।एकोद्दिष्ट श्राद्ध:-यह श्राद्ध एक विशेष पितर के लिए किया जाता है, जो हाल ही में दिवंगत हुआ हो। इसे उसकी मृत्यु के बाद के पहले साल में किया जाता है।सपिंडीकरण श्राद्ध:- यह श्राद्ध विशेष रूप से माता-पिता की मृत्यु के बाद किया जाता है, जिसमें उनकी आत्मा को अन्य पितरों के साथ मिलाया जाता है।

श्राद्ध केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह हमारे पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने का एक तरीका है। यह हमें हमारे पितरों के साथ जुड़े रहने और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रयासरत रहने की प्रेरणा देता है। श्राद्ध के माध्यम से हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर और पारिवारिक परंपराओं को भी संरक्षित रखते हैं। यह अनुष्ठान न केवल पितरों की आत्मा को शांति प्रदान करता है, बल्कि हमें भी मानसिक और आध्यात्मिक संतोष का अनुभव कराता है। यह एक ऐसा अनुष्ठान है, जो हमारी संस्कृति की गहराई और हमारी धार्मिक आस्थाओं की पुष्टि करता है। श्राद्ध को उसकी पूरी विधि और शुद्धता के साथ करने से न केवल पितरों की आत्मा को शांति मिलती है, बल्कि हमारे जीवन में भी सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है। इस प्रकार, श्राद्ध हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है और हमें अपने पूर्वजों के प्रति हमारे कर्तव्यों की याद दिलाता है।


                                                                             - रवींद्र कुमार शर्मा