साहित्य चक्र

03 January 2024

कविताः इंतजार



दस्तक देना बेकार है ,
वो खाली सा दिखता है ।

यादें पड़ी हर कोने मे ,
दिल भरा सा लगता है ।

जिस्म उस मकान सा ,
साँसें है किराया ।

कागज़ मेरे नाम के ,
फिर भी मै पराया ।

जा खोल दरवाजा
क्यूँ चौखट पे तू खड़ा ।

मिल लेना खुद को ,
जहां से तू हुआ था बड़ा ।

दस्तक नही ,
वो मन की पुकार है ।

तुझको शायद ,
खुद का ही इंतजार है ।


                                      - मैथिली रमेश


02 January 2024

नववर्ष- 2024




स्वागत है नववर्ष तुम्हारा,आओ फिर इक बार।
बीत गया यह साल पुराना, देकर खुशी अपार।

मस्तक तिलक लगाकर प्यारे,आना तुम इस बार।
कोई दुखी न रहने पाये,ऐसा दो उपहार।

माँ की ममता मिले सभी को,मिले पिता का प्यार।
जीवन सफल बने सभी का , दुःखों से हो पार।

सौंधी-सौंधी खुशबू लाना,लाना प्यार बहार।
महके दुनिया की फुलवारी,जगत रहे गुलज़ार।

मैं भी महकूँ तुम भी महको, महके हर घर द्वार।
जूही ,चंपा ,बेला बनना, बनना हरसिंगार।

चमक उठे यह सारी दुनिया, ऐसा हो आभिसार।
मन-मन उल्लासित हो सबका,रहे न कोई खार।

कूहू-कूहू कोयल बोले,चातक करे गुहार।
बन बासंती वृद्धा नाचे, जीवन रंग फुहार।

मूक,बधिर भी बोल उठें,सुनकर तेरी पुकार।
ऐसा रंग जमाना प्यारे ,बाँछें खिलें हज़ार।


- अनामिका कली

नये साल के नये हिसाब




आओ... नए साल पर कुछ हिसाब -किताब कर ले ।
 जिंदगी ने लम्हा -लम्हा कितना घटाव दिया।
 उस सब का जोड़ कर ले ।
 जो दर्द कई गुना बढ़ते ही गए।
 आओ... चंद उम्मीदों से उन्हें भाग कर ले ।।
आओ नए साल पर कुछ हिसाब -किताब कर ले ।

जिंदगी बड़ी तेजी से निकल जाती है ।
जबकि लगता है यह गुजराती ही नहीं  है।
इसी बात पर फिर से वहीं बात कर ले।
 घूम -घाम कर,  फिर से उसी घेरे में घूमती है जिंदगी।
हम खड़े किसी त्रिकोण में जिंदगी को, 
फिर से नई उम्मीद से वर्गाकार कर ले ।
आओ नए साल पर कुछ हिसाब -किताब कर ले ।

जो लोग....कहते है।
यह करेंगे... वह करेंगे रेजोल्यूशन तो एक भुलावा  है ।
जबकि हम भी जानते हैं ।
पिछले बीते हुए  तमाम सालों में कौन -सा खंबा उखाड़ डाला है।
आओ फिर भी  ...फिर से एक नई उम्मीद कर ले ।
आओ नए साल पर कुछ हिसाब -किताब कर ले ।

पिछले सालों की बजाय इस साल कुछ नया होगा।
 इसी बात पर पुराने साल को नए साल के स्वागत में विलय कर ले।
 जमा-घटाव तो चलते ही रहेंगे।
अपनी हिम्मत से हर हार को जीत में बदलने का ऐलान कर ले।


                                                         - प्रीति शर्मा 'असीम'


शीर्षक- मां



पल पल बदलती इस दुनियां में
कुछ बातें,कुछ रस्मों रिवाज
और कुछ मुलाकाते
आज भी वहीं ठहरी हुई हैं

जैसे मां का प्यार
चाहे दुनियां इधर की उधर हो जाएं
कभी नहीं बदलता
जब भी घर से बाहर

निकलो तुम
मां दही शक्कर की कटोरी लिए
हमेशा तुम्हें दरवाजे पर खड़ी मिलेगी
और घर लोटते वक्त
मां दरवाजे पर इंतजार करती हुई मिलेगी

जब भी तुम बहुत सुंदर
दिखती हो
मां काला टीका लगाना नहीं भूलती
मां आज भी सहेज कर

रखती है तुम्हारे बचपन की यादें
तुम भूल जाओ
किंतु मां को समर्पित की हुई
तुम्हारी ट्रॉफी को
मां अलमारी में सजा कर रखती हैं

तुम्हारी हर जीत पर
सबसे ज्यादा खुशियां
मां ही तो मनाती हैं
जैसे मां के लिए ये सब रिवाज है
जिन्हें हर मां
बरसों से निभाती नजर आती हैं


- जया वैष्णव, जोधपुर, राजस्थान



नूतन वर्ष का अभिनंदन






चांदनी मुस्कराई तुम्हारे लिए,
वर्णमाला गुनगुनाई तुम्हारे लिए,
तुम्हारे आगमन पर सखें,
मेरे हृदय की बधाई तुम्हारे लिए।

चांद बन तुम जियो,
नेह की नूतन छुवन बन जियो,
भावना से भरे इस हृदय में,
तुम हमारे नयन में सुमन बन जियो।

मेरे परिचय बन तुम जियो,
मेरा मुकाम बन तुम जियो,
जिंदगी अपनी पूरी सफल बन जियो,
नूतन वर्ष का अभिनंदन कर,
अपने कर्मों से अभिमान बन जियो।

गीत बन तुम जियो,
गजल बन तुम जियो,
अनुपम सृजन का भाव बन जियो,
प्यार की राशि मन में समेटे हुए,
तुम हमारे लिए राशिफल बन जियो।


                                                - अंशिता दुबे त्रिपाठी