साहित्य चक्र

07 May 2022

क्या अखंड भारत संभव है ?


आपने और हमने अक्सर हिंदू संगठनों द्वारा अखंड भारत की बात सुनी है। आज हम अखंड भारत पर विस्तार से बात कर इसे समझने की कोशिश करेंगे। अखंड भारत यानी अफगानिस्तान, पाकिस्तान, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान तक सिर्फ एक देश और एक सरकार का होना है। अखंड भारत को हिंदू धर्म के लोग हिंदू राजाओं के शासन काल का स्वर्णिम युग कहते हैं। जब हम अखंड भारत की बात सुनते हैं और इतिहास के पन्ने पलटते हैं तो हिंदू संगठनों द्वारा कही गई अखंड भारत की बात इतिहास के पन्नों के आधार पर एकदम अलग नजर आती है।






आप सोच रहे होंगे कि अखंड भारत पर सिर्फ एक हिंदू राजा ने राज किया होगा; मगर ऐसा नहीं है। अखंड भारत कभी था ही नहीं। हां कह सकते हैं कि अशोक ने अपने शासनकाल में बतौर राजा भारत के सबसे अधिक भूभाग पर शासन किया। इसके बाद से जितने भी राजा हुए चाहे महाराणा प्रताप सिंह हो या फिर छत्रपति शिवाजी, मगर कोई भी हिंदू राजा अशोक से अधिक भू-भाग पर शासन नहीं कर सका। भारत का इतिहास बताता है कि हिंदू राजा कभी भी आपस में मिल कर नहीं रहे। इन राजाओं का आपस में मिलकर नहीं रहने के कारण ही भारत में मुगलों सहित अंग्रेजों का शासन हुआ और भारत ने सदियों तक गुलामी की बेड़ियां पहनी।

अगर एक देश के रूप में देखा जाए तो भारत कभी भी एक देश नहीं था बल्कि अलग-अलग खंडों में बांटा अलग-अलग राजाओं का राज्य रहा है। ऐसे में जो लोग अखंड भारत की बात करते हैं या तो शायद उन्होंने भारत का इतिहास नहीं पढ़ा है या फिर वह मानसिक तौर पर बहुत ही कमजोर है। चलिए अब वर्तमान की बात करते हैं क्या वर्तमान में अखंड भारत की कल्पना करना सही है या फिर गलत ?


आज पाकिस्तान हो या फिर अफगानिस्तान या बांग्लादेश या म्यांमार सभी देश अलग अलग राष्ट्र के तौर पर समस्त विश्व में अपनी पहचान बनाए बैठे हैं। ऐसे में मुझे तो समझ नहीं आता कि आप इन देशों को कैसे मनाएंगे और कैसे इन्हें अखंड भारत की कल्पना बताएंगे। आप स्वयं सोच कर देखिए क्या अखंड भारत की कल्पना करना वर्तमान में सही है ? मुझे लगता है कि वर्तमान में अखंड भारत की कल्पना करना मूर्खता भरा सपना है। क्या भारत अखंड भारत के लिए पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार जैसे देशों पर आक्रमण करेगा ? क्या हिंदू संगठनों की कल्पना अखंड भारत को यह सभी देश स्वीकार कर पाएंगे ?


हम मान लेते हैं कि हिंदू संगठनों की कल्पना अखंड भारत को सभी देशों ने स्वीकार कर लिया, मगर उसके बाद अखंड भारत की जनसंख्या में हिंदू, मुस्लिम लगभग बराबरी पर आ जाएंगे। क्या उसके बाद हिंदू धर्म खतरे में नहीं रहेगा ? क्योंकि वर्तमान में हिंदू संगठनों द्वारा भारत के हिंदुओं में भारत में निवास कर रहे 30 करोड़ मुसलमानों का डर बैठाया जा रहा है। अभी भारत में लगभग 100 करोड़ हिंदुओं की जनसंख्या है। अगर अखंड भारत बनता है तो फिर हिंदू और मुस्लिम जनसंख्या में ज्यादा अंतर नहीं होगा। अखंड भारत बनने के बाद फिर हिंदू संगठन मुसलमानों को कौन से देश में भेजेंगे ?


अगर अखंड भारत बन जाता है तो फिर उसे हिंदू राष्ट्र कैसे घोषित किया जाएगा ? अखंड भारत में मुसलमानों की जनसंख्या इतनी अधिक होगी की वह हिंदू राष्ट्र के खिलाफ आवाज उठाएगी। क्या हिंदू संगठनों को अखंड भारत के साथ-साथ हिंदू राष्ट्र भी चाहिए ? जब वर्तमान में 30 करोड़ मुसलमानों का 100 करोड़ हिंदू के ऊपर डर बैठाया जाए रहा है तो फिर अखंड भारत बनने के बाद तो यह डर और अधिक बढ़ जाएगा।


अखंड भारत की परिकल्पना को लेकर हिंदू संगठनों को पुनः विचार करने की आवश्यकता है। नहीं तो यह परिकल्पना सिर्फ परिकल्पना तक ही सीमित रह जाएगी। आज के दौर में भारत के हिंदू संगठनों को अन्य देशों को इतने हल्के में नहीं लेना चाहिए जितने हल्के में भारत के हिंदू संगठन भारत के दलितों और मुसलमानों को लेते हैं।


- दीपक कोहली


30 April 2022

कविताः बादल आएँ


बादल का एक टुकड़ा
आज आसमान में दिखाई दिया
उस बादल को देख
पूरा गांव प्रसन्न हो उठा
दादी बोली अरे बेटा !
बनाओ पकोड़े और चाय
आ रही हमारी बारिश देवरानी
लाई होगी
राहत चाचा को भी साथ
अब गर्मी मौसी
जल्द जाएगी ससुराल
आखिर कैसी हो ग‌यी
यह गर्मी विकराल...

- दीपक कोहली


बंद मुट्ठी लाख की, खुल गई तो खाक की कहावत सटीक क्यों सही है ?

भारतीय संस्कृति में बड़े बुजुर्गों की कहावतों की व्यवहारिक सटीकता, हमारे दैनिक जीवन में प्रमाणित होती है। वैश्विक सृष्टि की रचना जब अलौकिक शक्तियों से अलंकृत शक्ति ने की होगी तो, उसके अंश भारत पर विशेष कृपा, रहमत बरसाई होगी!! और अद्भुत संस्कारों, सभ्यता, मान सम्मान से ऐसी कौशलताओं की महक कर कृपादृष्टि बरसाई होगी कि भारत माता की मिट्टी में अद्भुत गुण समाहित हो गए और यहां जन्म लेने वाले हर जीव की देह में समाहित होकर बौद्धिक कौशलता से उपयुक्त गुणों की ज्योति पीढ़ी दर पीढ़ी जगाते रहते हैं जो, पीढ़ियों से हमारे बड़े बुजुर्गों को मिली और उसी वैचारिकता का हम लाभ उठा रहे हैं।





साथियों आज हम उन वैचारिकताओं के एक अंश, बड़े बुजुर्गों की कहावतों पर चर्चा करेंगे। वैसे तो कहावतें बहुत हैं जैसे दाने-दाने को मोहताज, ढाक के तीन पात, बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला, घर का भेदी लंका ढाए, बंद मुट्ठी लाख की खुल गई तो फिर खाक की सहित हजारों कहावतें हमें मिलेगी पर आज हम चर्चा इस उपरोक्त कहावत पर करेंगे।


साथियों बात अगर हम इस कहावत की करें तो हमें पारिवारिक,सामाजिक,व्यसायिक औद्योगिक, राजनीतिक सहित अनेक क्षेत्रों के संदर्भ में यह कहावत सटीक फिट होते हमारे व्यवहारिक जीवन में या या अन्यों के ऊपर लागू होते हम देखते रहते हैं मेरा मानना है कि उपरोक्त हर क्षेत्र में उनकी इस कहावत से उनकी अंदरूनी ताकत या बड़ी कमजोरियां निश्चित रूप से छिप जाती होगी, जिसे सार्वजनिक करना उनके लिए अति हानिकारक हो सकता है!! क्योंकि हर क्षेत्र की अपनी अपनी रणनीतियां होती है, कुछ सीक्रेट से होते हैं, जिन्हें सार्वजनिक करना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने के बराबर होता है क्योंकि वह उनके लिए प्रतिष्ठा, साख, ताकत, रोब का काम करते हैं!! हमारी मुट्ठी अगर बंद रहेगी तो हमारे सिवा किसी को यह कमजोरी पता नहीं चलेगी , कि उसमें क्या है ?


साथियों बात अगर हम आधुनिक परिपेक्ष में पारदर्शिता की करें तो यह इस कहावत की विरोधाभासी है! फिर भी इसे अपवाद के रूप में छूट है! क्योंकि वैश्विक स्तरपर रक्षा सहित उपरोक्त क्षेत्रों में अनेकों ऐसी बातें पारदर्शिता के दायरे से मुक्ति पाने की हकदार है इसलिए ही कानून विशेषज्ञ या जानकारों को मालूम होगा कि कानूनों में प्रोवीसो, बशर्ते, सिवाएं, अपवाद, छूट, लागू नहीं जैसे अनेकों शब्दों के बल पर कानूनी रूप से भी करीब-करीब सभी कानूनों में भी छूट रहती है ?


साथियों बात अगर हम, खुल गई तो फ़िर ख़ाक की, इसपर करें तो हम उसे उनकी हकीकत सामने आने के परिपेक्ष में देखते हैं, जो उपरोक्त हर क्षेत्र के लिए लागू है याने जो बात किसी को पता नहीं हो वह सबको पता चल जाती है जिससे उस क्षेत्र के, उस पक्ष की प्रतिष्ठा साख़ सहित सभी सकारात्मक स्थितियां नकारात्मकता में बदल जाती है जो उनकी बदहाली का कारण बनती है। परंतु हमें इस कहावत का अर्थ सकारात्मक में लेनें की ज़रूरत है। किसी गैर कानूनी या सृष्टि के किसी भी जीव को नुकसान या छल, धोखा पहुंचाने की दृष्टि से नहीं लेना चाहिए, यह नियम हर कहावत पर लागू होता है।



साथियों बात अगर हम इस कहावत के उदय की एक पौराणिक कहानी की करें तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कुछ सज्जनों द्वारा यह कहानी डाली गई है कि, एक समय एक राज्य में राजा ने घोषणा की कि वह राज्य के मंदिर में पूजा अर्चना करने के लिए अमुक दिन जाएगा। इतना सुनते ही मंदिर के पुजारी ने मंदिर की रंग रोगन और सजावट करना शुरू कर दिया, क्योंकि राजा आने वाले थे। इस खर्चे के लिए उसने दस हज़ार रुपए का कर्ज लिया। नियत तिथि पर राजा मंदिर में दर्शन, पूजा, अर्चना के लिए पहुंचे और पूजा अर्चना करने के बाद आरती की थाली में एक रुपया दक्षिणा स्वरूप रखें और अपने महल में प्रस्थान कर गए। पूजा की थाली में एक रुपया देखकर पुजारी बड़ा नाराज हुआ, उसे लगा कि राजा जब मंदिर में आएंगे तो काफी दक्षिणा मिलेगी। बहुत ही दुखी हुआ कि कर्ज कैसे चुका पाएगा, इसलिए उसने एक उपाय सोचा।


गांव भर में ढिंढोरा पिटवाया कि राजा की दी हुई वस्तु को वह नीलाम कर रहा है। नीलामी पर उसने अपनी मुट्ठी में एक रुपया रखा पर मुट्ठी बंद रखी और किसी को दिखाई नहीं। लोग समझे कि राजा की दी हुई वस्तु बहुत अमूल्य होगी इसलिए बोली दस हज़ार से शुरू हुई, बढ़ते बढ़ते पचास हज़ार रुपए तक पहुंची और पुजारी ने वो वस्तु फिर भी देने से इनकार कर दिया।


यह बात राजा के कानों तक पहुंची। राजा ने अपने सैनिकों से पुजारी को बुलवाया और पुजारी से निवेदन किया कि वह मेरी वस्तु को नीलाम ना करें। मैं तुम्हें पचास हज़ार की बजाय एक लाख रुपए देता हूँ। इस प्रकार राजा ने एक लाख रुपए देकर अपनी प्रजा के सामने अपनी इज्जत को बचाया।तब से यह कहावत बनी- बंद मुट्ठी लाख की खुल गई तो खाक की। यह मुहावरा आज भी प्रचलन में है।


अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि बंद मुट्ठी लाख की खुल गई तो फिर खाक की। पारिवारिक, सामाजिक, व्यवसायिक, राजनीतिक सहित अनेक क्षेत्रों के संदर्भ में बंद मुट्ठी लाख की खुल गई तो खाक की कहावत सटीक फिट है। भारतीय संस्कृति में बड़े बुजुर्गों की कहावतों की व्यवहारिक सटीकता हमारे दैनिक जीवन में प्रमाणित होती है।


- एड किशन भावनानी 


शीर्षक: छुट्टी वाला रविवार कब आएगा




वर्तमान युग की भागदौड़ वाली जिंदगी को जितना चाहे आसान बनाने की कोशिश कर ली जाए,परंतु फिर भी अपने हिस्से का वक्त यहां कोई इंसान निकाल ही नहीं पाता। जिस भी शख्स से बात करो,बस यही सुनने को मिलता है कि यार, समय ही नहीं होता, पूरा दिन कुछ ना कुछ चलता ही रहता है।







कहने का मतलब यह है कि आज के आधुनिक युग में प्रत्येक व्यक्ति की जिंदगी आपाधापी वाली और बहुत ही फास्ट हो गई है ।किसी के पास किसी के लिए वक्त ही नहीं है। किसी और की तो बात छोड़ो यहां लोगों के पास आज खुद के लिए भी वक्त निकाल पाना लगभग असंभव सा होता जा रहा है ।लोग जिंदगी तो जी रहे हैं परंतु मन से नहीं।अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए लोग आगे ही आगे बढ़ने की अंधाधुन दौड़ में इस कदर पागल होते जा रहे हैं कि उन्हें यह एहसास ही नहीं होता कि इस भागदौड़ और आगे बढ़ने की चाह में वे कितना कुछ खोते जा रहे हैं। 


यह सभी को पता होता है कि बीता समय कभी लौट कर वापस नहीं आता, फिर भी ना जाने क्यों हर इंसान समय को पीछे छोड़ने की जहदोजहद में लगा रहता है। कम समय में अधिक हासिल करने का जुनून आज हर इंसान के सिर पर सवार है ।कम समय में अधिक पाने की लालसा ने ही आज हर व्यक्ति के जीवन की उमंगों और खुशियों पर जैसे ताला ही लगा दिया है। आज इंसान अपनी जरूरतों से अधिक कमा रहा है परंतु इतना होने के पश्चात भी वह सुखी नहीं है !!कारण? कारण सिर्फ यही है कि इंसान किसी स्तर पर जाकर संतोष का अनुभव ही नहीं करता। वह दिन दुगुनी और रात चौगुनी उन्नति करने के स्थान पर दिन आठ गुणी और रात सौलह गुणी उन्नति करने के ख्वाब सजाता है।


वैसे तो आपाधापी भरी दिनचर्या के महिला और पुरुष दोनों ही बराबर के शिकार देखे जाते हैं,परंतु आज मेरे इस लेख का मुख्य केंद्र महिलाएं हैं। बात यदि रविवार की छुट्टी की की जाए तो अधिकतर महिलाओं के हिस्से में रविवार कभी आता ही नहीं है ,जिसे वे छुट्टी मानकर इंजॉय कर सकें। विशेष रूप से कामकाजी महिलाएं तो रविवार शब्द ,जिसका उन्हें पूरे सप्ताह बेसब्री से इंतजार रहता है, का अर्थ ही भूल गई हैं,क्योंकि पूरे सप्ताह भागम भाग करने के पश्चात जब सप्ताह के अंत में रविवार आता है तो उनके पास जिम्मेदारियों और कामों की एक बड़ी मोटी गठरी पहले से ही बंध कर तैयार होती है जिसे वह शायद ही 1 दिन जिसे लोगों ने रविवार का नाम दिया है ,को पूरा कर पाती है।इन कामों में ; घर के बिखरे सामान को संभाल कर रखना ,बच्चों के स्कूल कॉलेजों का पेंडिंग काम निपटवाना, घरवालों के लिए उनकी पसंद की अलग अलग डिशेज बनाना,रिश्तेदारों का आना जाना, बाजार जाकर पूरे सप्ताह के लिए राशन पानी और अन्य जरूरतों का सामान जुटाना आदि आदि।


तो आखिर क्या करें एक नारी ?? जिसके हिस्से में पूरे साल में कोई ऐसा दिन नहीं आता जिसे वह अपने तरीके से इस्तेमाल कर खुद को हल्का और अच्छा महसूस करवा सके।इसका प्रत्यक्ष संबंध उसके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य से है। वह चाहते हुए भी अपने मन की नहीं कर पाती और हर वक्त अपने स्थान पर अपनों के ही हिसाब से जिंदगी जीना शुरु कर देती है।इसका परिणाम यह होता है कि वह स्वयं को जैसे भूल ही जाती है और इस वजह से उसका मानसिक विकास अवरुद्ध होने लगता है, वह समय से पहले स्वयं को वृद्ध मानने लगती है ,उसके मन से उमंग और उत्साह का ह्रास होने लगता है , वह कम काम करने के बाद भी बहुत अधिक थकने लग जाती है।सारा समय भाग भागकर जिम्मेदारियों को निभाते निभाते फिर एक स्थिति ऐसी भी आती है ,जब वह अंदर से चाहने लगती है कि काश!!! इस थका देने वाली दिनचर्या को छोड़कर कहीं दूर शांत अकेले एक टापू पर अपना बसेरा बना पाना संभव होता।


यह स्थिति महिलाओं के लिए किसी भी प्रताड़ना और सजा से कम नहीं हो सकती।कोई भी महिला या पुरुष इस प्रकार की नकारात्मक स्थिति का शिकार ना होने पाए, इसलिए परिवार के सभी लोगों को मिलजुलकर परिवार की जिम्मेदारियों का बीड़ा उठाना होगा और महिलाओं के हिस्से का समय उन्हें हर हाल में देना ही होगा ।माना कि पुरुष और स्त्री दोनों ही मिलजुलकर गृहस्थी को चलाते हैं, वे एक दूसरे के पूरक भी कहे जाते हैं ,परंतु, हकीकत कुछ और ही होती है।अधिकतर घरों में आज भी घर बाहर की अधिकतर जिम्मेदारियों को निभाने का जिम्मा महिलाओं का ही होता है।


एक दूसरे की परवाह करते हुए पुरुषों और महिलाओं को घर की जिम्मेदारियों में एक दूसरे का हाथ बंटाना चाहिए और एक दूसरे के स्वास्थ्य और खुशियों को सर्वोपरि रखते हुए ही परिवार रूपी संस्था का विकास करना चाहिए ।

स्मरण रहे ,एक खुशहाल परिवार सच्चे मायनों में तभी खुशहाल कहला सकता है जब उस घर की नींव अर्थात उस घर की महिलाएं स्वस्थ हों,प्रसन्न हों। महिलाएं चाहे कामकाजी हों अथवा गृहणियां, दोनों को ही सप्ताह में 1 दिन उनकी मनमर्जी के मुताबिक बिताने की छूट दी जानी चाहिए ताकि उस 1 दिन में वे स्वयं के लिए जिएं और अपने जीवन से जोश उमंग और उत्साह को कभी खत्म ना होने दें।



                                               लेखिका- पिंकी सिंघल


22 April 2022

देश के नागरिकों को सुरक्षित कल की गारंटी देता है आपराधिक प्रक्रिया पहचान विधेयक- 2022



आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) विधेयक संसद द्वारा पारित किया गया है और यह कैदियों की पहचान अधिनियम, 1920 को निरस्त करने का प्रयास करता है। यह विधेयक उन सूचनाओं के दायरे का विस्तार करता है जो सरकार दोषियों, गिरफ्तार व्यक्तियों और आदतन अपराधियों जैसे अन्य व्यक्तियों से एकत्र कर सकती है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य देश में दोषसिद्धि दर में सुधार करना, नागरिकों के मानवाधिकारों की रक्षा करना और समाज में अपराध के खिलाफ कार्रवाई का एक मजबूत संदेश देना है। इस विधेयक ने संसद और देश भर में व्यापक बहस को आकर्षित किया है, जो मौलिक अधिकारों और कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए सरकार द्वारा सुनिश्चित किए गए नियंत्रण और संतुलन से संबंधित महत्वपूर्ण चिंताओं को उठाती है।







कैदियों की पहचान अधिनियम 1920, पुलिस अधिकारियों को दोषियों और गिरफ्तार व्यक्तियों सहित व्यक्तियों की कुछ पहचान योग्य जानकारी (उंगलियों के निशान और पैरों के निशान) एकत्र करने की अनुमति देता है। किसी अपराध की जांच में सहायता के लिए, मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति की माप और तस्वीर लेने का आदेश दे सकता है। उसके अनुसार एक बार जब व्यक्ति को छुट्टी दे दी जाती है, तो सभी सामग्री को नष्ट कर दिया जाना चाहिए। डीएनए प्रौद्योगिकी में महत्वपूर्ण प्रगति के साथ, अपराध के आरोपी व्यक्तियों की माप के लिए वैकल्पिक तरीकों को लागू किया जा सकता है जो जांच प्रक्रिया को तेज कर सकते हैं। इस संदर्भ में, डीएनए प्रौद्योगिकी (उपयोग और अनुप्रयोग) विनियमन विधेयक, 2019 जो लोकसभा में लंबित है, एक रूपरेखा प्रदान करता है।


1980 में, भारत के विधि आयोग ने कैदियों की पहचान अधिनियम 1920 की जांच की और पाया कि जांच के आधुनिक रुझानों को देखते हुए अधिनियम को संशोधित करने की आवश्यकता है। आपराधिक न्याय प्रणाली के सुधारों पर विशेषज्ञ समिति ने डीएनए, बाल, लार और वीर्य के लिए रक्त के नमूने जैसे डेटा के संग्रह के प्राधिकरण के लिए मजिस्ट्रेट को सशक्त बनाने के लिए कैदियों की पहचान अधिनियम 1920 में संशोधन की सिफारिश की। यह बिल निजता के अधिकार के साथ-साथ समानता के अधिकार का उल्लंघन करने की  प्रवृत्ति को आकर्षित करता है। बिल के कुछ प्रावधान व्यक्तियों के व्यक्तिगत डेटा के संग्रह की अनुमति देते हैं जो किसी व्यक्ति के निजता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं जिसे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई थी।


यह कानून के अनुच्छेद 14 की आवश्यकताओं को निष्पक्ष और उचित और कानून के तहत समानता पर भी चोट है। डेटा न केवल दोषी से बल्कि जांच में सहायता के लिए किसी अन्य व्यक्ति से भी एकत्र किया जा सकता है। बिल 75 वर्षों तक डेटा को बनाए रखने की अनुमति देता है और इसे किसी अपराध के लिए गिरफ्तार किए गए व्यक्ति के अंतिम निर्वहन पर ही हटाया जाएगा। जांच के लिए संभावित उपयोग के आधार पर केंद्रीय डेटाबेस में डेटा का प्रतिधारण, भविष्य में, आवश्यकता और आनुपातिकता मानकों को पूरा नहीं कर सकता है। एनसीआरबी डेटा के प्रतिधारण के लिए केंद्रीय भंडार होगा और इसे अन्य कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ साझा किया जा सकता है। यह पेश किए गए कानून के दुरुपयोग के लिए ढेर सारे विकल्प बनाता है।


जैविक नमूनों का संग्रह इस अपवाद को जोड़ता है कि ऐसे नमूने जबरन एकत्र किए जा सकते हैं यदि अपराध महिलाओं और बच्चों के खिलाफ निर्देशित किया जाता है। उदाहरण के लिए, यह किसी महिला के खिलाफ जांच के नाम पर चोरी हो सकती है जिसके आधार पर दोषी के जैविक नमूने एकत्र किए जा सकते हैं। ऐसा प्रावधान उन व्यक्तियों के बीच कानून की समानता का उल्लंघन करता है जिन्होंने एक पुरुष और एक महिला से कोई वस्तु चुराई है। डेटा एकत्र करने के लिए अधिकृत अधिकारी के स्तर को कम करके व्यक्ति को मनमाने ढंग से हिरासत में लेने से बचाने के लिए कई सुरक्षा उपायों को कमजोर कर दिया गया है।


आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) विधेयक, 2022 के संबंध में तर्क डेटा सुरक्षा के संबंध में लोगों की सबसे बड़ी चिंता को उजागर करते हैं। यही कारण है कि विशेषज्ञ नागरिकों को राज्य द्वारा निगरानी के व्यापक और मुक्त दायरे से बचाने के लिए संसद में एक मजबूत डेटा संरक्षण विधेयक पेश करने की वकालत करते हैं। जैसा कि बिल में डेटा संग्रह के दायरे का विस्तार करने की परिकल्पना की गई है, जो अब न केवल बायोमेट्रिक नमूनों के संग्रह की अनुमति दे रहा है, बल्कि जांच के लिए सहायता के रूप में "व्यवहार संबंधी विशेषताओं" के तहत किसी व्यक्ति की लिखावट पर विचार किया जाता है। यह राज्य को भारी शक्तियाँ सुनिश्चित करता है जिसके लिए यह सुझाव दिया जाता है कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों के लिए ठोस सुरक्षा उपाय होने चाहिए जो पारित कानून के साथ हाथ से काम करेंगे।


75 वर्षों के लिए अभिलेखों को बनाए रखने की समय अवधि का आकलन करने के लिए बिल पर फिर से विचार करने की आवश्यकता है जो कि एक भारतीय नागरिक की जीवन प्रत्याशा के विपरीत है जो कि 69.6 वर्ष है। इस प्रावधान का एक उपयुक्त तर्क के साथ विश्लेषण किया जाना चाहिए। उचित जांच और संतुलन सुनिश्चित करने वाले वरिष्ठ अधिकारियों और कानून प्रवर्तन अधिकारियों की देखरेख में उचित प्रशिक्षण और पुलिसिंग द्वारा मजबूत सुरक्षा का एक पारिस्थितिकी तंत्र, वैज्ञानिक साक्ष्य के आधार पर एक आपराधिक जांच की एक मूर्खतापूर्ण प्रणाली बनाएगा और वास्तव में लाभ प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करेगा। 


                                                                                - सत्यवान 'सौरभ'