साहित्य चक्र

19 April 2022

हे ! वाग्वादिनी माँ


हे ! वाग्वादिनी माँ
हे ! वाग्वादिनी माँ
तू हमें ज्ञान दें
तू हमें ध्यान दें।

भटक रहें हम
जीवन पथ पर
आकर हमें तू अब थाम लें।

तू ब्राम्ह की माया
तू ही महामाया
हम फंसे मोहजाल
आकर हमें तू अब निकाल लें।

तू ज्ञान की मुद्रा
तू ध्यान की मुद्रा
हम गिरे अज्ञान में
आकर हमें तू अब ज्ञान दें।

तू सुर की वन्दिता
तू ही सुरवासिनी
हम हो रहें बे-सुरे
आकर हमें तू सुर का ज्ञान दें।

तू विद्या की धात्री
तू ही विद्युन्माला
हम धंस रहें अविद्या में
आकर हमें तू विद्या का वरदान दें।

हे ! वाग्वादिनी माँ
हे ! वाग्वादिनी माँ
तू हमें ज्ञान दें
तू हमे ध्यान दें।

                                             लेखक- राजीव डोगरा



गिरगिट तो यूँ ही बदनाम है



यूँ ही बदनाम किया था गिरगिट का
आदमी कर रहा गिरगिट का काम है
दिन में कई रंग बदलते हैं आजकल लोग
गिरगिट का नाम तो यूँ ही बदनाम है

समय के साथ रंग बदलते रहते है
कुछ लोग तो रंग बदलने में अभिनेता हैं
रंग बदलना सबके बस की बात नहीं
सबसे ज़्यादा रंग बदलते नेता हैं
अफवाहें भी बहुत फैलाते हैं
जरूरत पड़ती है जब कभी
तब तो बहुत गिड़गिड़ाते हैं
किसी से उधार वापिस मांगे
तो अपना रंग दिखाते हैं

झूठ का लेते हैं बहुत सहारा
पकड़े जाने पर गलती हो गई कहते
बार बार वही गलती दोहराते है

आजकल के गिरगिट न केवल रंग बदलते हैं
उसी को काटते हैं जिसका खाते हैं
पीठ पीछे करते रहते है छुप कर वार
बाहर से बहुत अपनापन दिखाते हैं
चुनाव जब आते हैं गिरगिट बहुत नज़र आते है
हड्डी चूसने की आदत पड़ी लार बहुत टपकाते हैं
हरा लाल पीला नीला भगवां जो भी मिले
उसी रंग में रंग जाते हैं


लेखक- रवींद्र कुमार शर्मा


कविताः दोमुंहे सांप



वो लोग 
जो जहर उगलते हैं
सार्वजनिक मंचों पर हर समय
दूसरों के लिए,
होते होंगे क्या इतने ही जहरीले
अपनी निजी जिंदगी में भी
सबके लिए?

अगर होते होंगे
तब तो बड़ा मुश्किल होता होगा
उनके परिजनों, पड़ोसियों और
रिश्तेदारों को
उनके साथ निबाहने के लिए,
लेकिन अगर नफरत का यह चोला
रखा होगा उन्होंने
सिर्फ दूसरों के लिए,
अपने करीबी लोगों से
वो भी करते होंगे प्यार,
फिक्रमंद रहते होंगे वो भी
अपने परिजनों के कुशल-मंगल के लिए,
तो समझना चाहिए उन्हें
कि उनका उगला जहर बन सकता है
अमंगल का कारण
न जाने कितनों के प्रियजनों के लिए,
उन्हें समझना चाहिए कि
बेकाबू आग लील जाती है खुद को ही
चाहे वो लगाई गई हो 
किसी दूसरे के लिए,
उन्हें समझना चाहिए कि
नफरत का सांप दोमुंहा है,
जितनी नफरत करोगे तुम किसी दूसरे से
पाओगे उतनी ही खुद के लिए।


                                          जितेन्द्र 'कबीर'


कविता- विवाहित स्त्री और प्रेम



विवाहित स्त्रियाँ जब होती हैं प्रेम में
तो उतनी ही प्रेम में होती हैं
जितनी होती हैं कुँवारी लड़कियां
प्रेम कुँवारेपन और विवाह को नहीं जानता
केवल मन के दर्पण को देखता
मन के राग को सुनता है
विवाहित स्त्रियाँ भी समाज से डरते हुए
करती जाती हैं प्रेम
किसी अमर बेल की तरह
क्योंकि प्रेम के बीज बोये नहीं जाते
वे स्वत ही हृदय की नम सतह पाकर
कभी भी कहीं भी किसी क्षण
प्रेम बनकर अंकुरित हो उठते हैं
प्रेम में हो जाती हैं वे भी
सोलह सत्रह बरस की कोई नयी सी उमंग
ललक उठता है उनका भी मन
प्रेमी की एक झलक पाने को
दैहिक लालसा से परे होता है उसका प्रेम
वे आलिंगन के स्पर्श से ही मात्र
आत्मा के सुख में प्रवेश कर जाती है
वे भी बिसरा देती है अपना हर एक दुख
प्रेमी की आँखों में डूबकर
उसकी हर आहट से हो जाती है वो मीरा
तार तार बज उठता है उसके मन का संगीत
प्रेमी की एक आवाज से
सोलहवें सावन सा मचल उठता है
भावनाओं का बादल
खिल उठती है वह पलाश के चटक रंगों की तरह
लहरा उठती है उसकी खुशियां
बसंत के पीले फूलों की फसलों की तरह
नहीं चाहतीं वह अपने प्रेम पर
समाज का कोई भी लांछन
नहीं चाहती कोई कुल्टा कहकर
उसके प्रेम का करे अपमान
बनी रहना चाहती है अपने बच्चों सबसे अच्छी माँ
और पति की कर्तव्यनिष्ठ पत्नी
वह विवाह के सामाजिक बंधनों के दायित्वों से
नहीं फेरना चाहती अपने कदम
वह बनी रहना चाहती है
अपनी इच्छाओं के समर्पण से एक सुंदर मन की स्त्री
जैसे बनी रहना चाहती है कुँवारी लड़कियाँ
अपने भाई की लाडली बहन
और माँ बाप की समझदार बेटी
अपने प्रेमी की होने के सपनों के साथ
विवाहित स्त्रियाँ भी अपने प्रेमी का हर दुख
अपने आँचल में छुपा लेना चाहती है
अपनी हर प्रार्थना में करती हैं
उनके सुख की कामना के लिए आचमन
परन्तु कुँवारी प्रेमिकाओं की तरह
उसके सपनों की कोई मंजिल नहीं होती
वह अपने सपनों में जीना चाहती है
अपने प्रेमी के साथ एक पूरा जीवन
गाड़ी के दो पहिए की तरह चलता है
उसका प्रेम और उसकी गृहस्थी
रात के बैराग्य मठ पर नितांत अकेले
वे पति की पीठ पर देखती हैं प्रेमी का चेहरा
पाना चाहती है प्रेमी की भावनाओं में
अपनेपन की छाँव और जीवन की विषमताओं में
उसकी सरलता का साथ।
कुँवारी लड़कियाँ प्रेमी के संग
बंधना चाहती है परिणय सूत्र में
जबकि विवाहिता स्त्रियाँ प्रेमी को नहीं चाहती खोना
बंध जाना चाहती है विश्वास के अटूट बंधन में
वे विवाहिता होने की ग्लानि में
प्रेम की आहूति नहीं देती
बल्कि संसार की सारी प्रेमिकाओं की तरह
अपने प्रेमी को मन प्राण से करती जाती है प्रेम।


लेखिकाः अनामिका चक्रवर्ती


कविताः आखिर क्या कसूर था मेरा



आखिर क्या कसूर था मेरा
जो पैदा होते ही कचरे में फेंक दिया गया,
नवजात शिशु को नए कपड़े पहनाए जाते हैं
आखिर क्या कसूर था मेरा
जो मुझे पॉलिथीन में लपेट दिया गया,
अपनी खुशियों की खातिर हर बंधन तोड़ डाला
अपनी ग़लती का ठीकरा मेरे सपनों पर फोड़ डाला,
बस एक बार तो बता दो मां
आखिर क्या कसूर था मेरा 
अरे वो तो अंजान था उस एहसास से
रखा है ख़ुदा ने दूर उसे उस मिठास से,
लेकिन तुम तो एक मां थी।

अपने हर इक निवाले से तुमने, डाली मुझमें जान थी
कैसे भूल गई तुम, मैं अंश थी तुम्हारा
बस यही कसूर था ना कि नहीं चला सकती थी वंश तुम्हारा,
एक मौका दे कर तो देखती मां मुझे
तू कभी नहीं कहती कि चाहिए इक बेटा मुझे
इस दुनिया में इतना नाम कमाती
कि तेरी ज़िन्दगी में किसी चीज़ की कोई कमी ना रह जाती।

अफसोस कि ना सुन सकी मैं इस दुनिया की बातें
खुलने से पहले ही बन्द हो गई मेरी ये आंखें
ऊपर जाऊंगी तो ख़ुदा से रो रो कर करूंगी फ़रियाद
ऐ ख़ुदा ना देना कभी किसी को नाजायज़ औलाद।

वरना होते रहेंगे बार बार ये गुनाह
ना मिलेगी हम मासूमों को किसी आंचल में पनाह,
आख़िर क्या कसूर था मेरा
कि पैदा होते ही मुझे फेंक दिया गया
कभी कचरे में, तो कभी आश्रम में, 
मौत की अग्नि में झोंक दिया गया।


                                                   रूखसाना नारू