साहित्य चक्र

01 July 2019

आख़िर पकड़ा गया वो दरिंदा....!

नजर में फिर नजर नहीं आया नजर लगानें वाला,
आख़िर पकड़ा गया वो दरिंदा शहर जलानें वाला,

खुद  को खुदा मानकर बिना खौफ के जीने वाला,
मर गया एक दिन फिर खुद को खुदा बताने वाला,


भरोसा उसका भी टूटा  जो, कभी  भरोसे  की मिशालें    देता   था,
नींद से जाग ही गया आख़िर,वो गहरी नींद से सबको जगाने वाला,

नफरतों के शहर में रहने वाला,जब पंहुचा मोहब्बत के शहर में एक दिन,
खुद से ही नफ़रत कर बैठा उस दिन से वो नफरतों को उगाने वाला,

प्यार को व्यापार समझने वालों प्यार की कद्र किया करों,
बड़ी मुश्किल से मिलता है प्यार करने और निभानें वाला,

धर्म,जाति,मजहबों  के  नाम  पर अब लड़ना बंद करों,
हमें आपस में लड़ा कर मजे लेता है फिर वो उकसाने वाला,

इस जहां आये हो तो काम ऐसा कुछ  कर  चलों,
कि याद रखें हमेशा ये जहां,और जहां में फिर आने वाला,

              -शिवांकित तिवारी "शिवा"


#पीर_धरा_की#


पूछती 
जीवनदायिनी 
प्यासी धरा!
कब तक 
दोहन करोगे,
इस प्रवृत्ति से 
अपने को कब 
मुक्त करोगे?

लेते-लेते 
अपनी संस्कृति का 
मूलमंत्र ‘देना’ भूल गए
शुष्क, रीतती धरा की 
व्यथा ही भूल गए,
सोच लो!
इस स्वार्थी 
मनोवृत्ति के चलते 
एक दिन ऐसा आयेगा
पानी के लिए 
हाहाकार मच जायेगा
अपने हाथ में 
कुछ नहीं रह जायेगा,
आने वाली पीढ़ियों के लिए 
अपने कर्तव्य को समझो 
पानी अनमोल है 
इसकी बूँद-बूँद को अमृत समझो 
अमृत कृपणता से 
व्यय किया जाता है 
भविष्य के लिए 
सहेजा जाता है,
क्या मैं मान लूँ 
तुम मेरी वेदना समझोगे?

कल ले लिए 
आज अनमोल पानी का 
मोल समझोगे?


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डा० भारती वर्मा बौड़ाई


मेरी भी बेबसी सुन लो


मुझे तुम क्यूं रुलाते हो
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मेरी भी बेबसी सुन लो
मेरी तुमसे शिकायत है
मेरी यादों में आकर तुम
मुझे यूं क्यूं सताते हो..।।


बुलाता हूँ तुम्हें जब मैं
कभी तो पास आओ तुम
नहीं आते हो अक्सर तुम
बेवजह रूठ जाते हो..।।


मेरा ये प्रेम निर्मल है
सफ़र जीवन का जब तक है
कभी तो मुस्कराओ तुम
मेरा क्यूं दिल जलाते हो..।।


मेरी है आरजू तुमसे
कभी तो मान जाओ तुम
मेरा भी मान हो जाये
मुझे तुम क्यूं रुलाते हो..।।
मुझे तुम क्यूं रुलाते हो..।।


***विजय कनौजिया***
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बाल रेडियो


‘वर्तमान समय के सिनेमा जगत ने बच्चों की जिज्ञासा नामक प्रवृति पर मानों ग्रहण सा लगा दिया हैं । आज के बाल कलाकार, बाल साहित्यकार वा अन्य बच्चें चलचित्र के माध्यम से स्वयं के गीत, गजलों वा संगीत पर लय,ताल के साथ थिरकते हैं। जैंसे मानों कोई अभिनेता अभिनय कर रहा हो । यहीं प्रथा सभी भाषाओं और कथाओं के साथ बनती जा रही हैं । जैंसे कि किसी सोती हुई सुन्दरी का आकर्षक नृत्य राग– रागिनियों  पर आधारित होकर भी  वह पूर्णतः शास्त्रीयता के भार से मुक्त प्रतीत होती हैं।    


वहीं वर्तमान समय में आकाशवाणी पर प्रसारित होने वाले बाल नृत्य ,गीत, ध्वनियाॅँ मानों विलुप्त सी होती प्रतीत हो रही हैं । जो कि सर्वथा अनुचित हैं क्योंकि आकाशवाणी का बाल कार्यक्रम बच्चों को कहानी ,कथा ,नाटक के माध्यम से जिज्ञासु और कल्पनाशील बनाने का  कार्य   करता हैं। इसलिए बच्चों को जिज्ञासु बनाए रखने के लिए हमें बच्चों को शिक्षा प्रद कहानियों और नाटकों के  प्रति श्रव्य दृश्य सामग्री के  माध्यम से उनमें नई ऊर्जा का संचार करने का विचार विमर्श करना चाहिए । जिससे बच्चे कल्पनाशील,कर्मठ, और जिज्ञासु प्रवृत्ति के हो सकें । जो कि वर्तमान समय के बदलते दौर के साथ नितान्त आवश्यक हो गया हैं ।’

                                                                रेशमा त्रिपाठी 


हृदय विदारक क्षण



काश सुरा से औषधि की,
अदला-बदली कर लेते 
मादकता की बोतल हटा ,
दवा की शीशी रख देते 


याद करो वो दिन,जब माँ बहनें रोती थीं ,
शाराबी पत्तियों के जुल्मों को सहती थीं 


अपने सुशासन के पथ पर 
तुमने ऐसा पलटवार कीया 
आय की सबसे बड़ी स्रोत पर 
तब  तुमने  प्रहार  किया 


आज हर माँ का हृदय 
चीख़-चीख के कहता है 
पता नहीं था दारू के 
पैसों   राज्य  चलता  है 


वो  दर्द -दुःख  सभी  अन्याय  हम सह लेते 
तो आज अपनें लल्ला को दुर नहीं जाने देते 


काश सुरा से औषधि की
अदला-बदली कर लेते 
मादकता की बोतल हटा 
दवा की शीशी रख देते !


                                    सेवाजीत अभेद्य