साहित्य चक्र

18 September 2020

हे परमेश्वर हे दाता....




हे परमेश्वर हे दाता
 हे दया सिंधु प्रदाता 
हे गुण निधान हे मुक्तेश्वर 
 हे निराकार है परमात्मा ।

तू मुक्तिधाम तू शक्तिधाम ,
तू त्रिलोकीनाथ है अमरनाथ 
तू पालनकर्ता तू रचयिता
तू शांति धाम तू परमधाम।

 हे मानव तू चितकार ना कर
 इस देह का तू अभिमान ना कर
 शून्य में था और शून्य में ही मिल जाएगा 
निज मानव हित धरती पर कुछ कल्याण तो कर।
 हे परमेश्वर हे दाता.... 

तुझे प्रेम मिला परिवार मिला 
सुख वैभव का संसार मिला
 तू भूल गया निज मानवता 
तूने प्रकृति का परिहास किया।
 हे परमेश्वर हे दाता... 

तू मूलाधार तू शिष्टाचार 
है जग निधान करुणानिधान 
तू दिव्य चक्षु तू कल्पवृक्ष 
तू आत्मरूप परमात्म रूप ।

हे मानव अब अंधकार मिटा 
सच्चे मानव का फर्ज निभा 
तू भूल गया निज आत्मज्ञान 
अभिमान का अब अवशेष मिटा
 हे परमेश्वर हे दाता..।


                                      किरन पंत 'वर्तिका'


।। नैनीताल ।।



नैनीताल ख़तरे में है, क्या आप सभी ये जानते हैं।
इस हालत का जिम्मेदार, बताओ किसे मानते हैं।

बिल्डिंगे ज्यादा हो गई, हरियाली कम हो गई।
हर जगह कूड़ा- कचरा, ख़ुशहाली कम हो गई।

अवैध निर्माण हाईकोर्ट की, नाख नीचे हो रहे।
प्राधिकरण के अधिकारी तो, सालों से सो रहे।

यहाँ लोगों की पहले झोपड़ी, फिर घर बन जाते हैं।
अवैध निर्माण तोड़ने पर, लोग सड़क में उतर आते हैं।

झील यहाँ  केवल, बरसात में ही भर पाती है।
साफ है कारण पर, नज़र किसकी जाती है।

नैनीताल के जल श्रोत, हर दिन अब घट रहे हैं।
लेकिन पानी के कनेक्शन, हर रोज बट रहे हैं।

कोई कहे झील में छेद है, कोई श्राप कहता है।
लेकिन नैनीताल दर्द अपना, साफ- साफ कहता है।

अब ज्यादा भार नहीं सह पाऊँगी, ये झील कह रही।
कभी सूख रही है, तो कभी इसकी दीवार ढह रही।

रोज प्रदूषण, बढ़ती गाड़ियां, हरियाली घटने लगी है।
लगातार नैनिताल में खतरे की घण्टी, बजने लगी है।

अब भी समय है जागो, नैनीताल को तुम बचा लो।
या फिर जल्द ही तुम यहाँ, मौत को गले से लगा लो।

                                                 संदीप कुमार


17 September 2020

कैसा मजाक किया..?




आज ज़िन्दगी ने मेरे साथ देखो ना…! 

कैसा मजाक किया..?

 

मैंने पाई-पाई कर जो पूंजी जोड़ी 

देखो ना..! आज कैसे वह धूँ-धूँ  करके जली..।


मैंने हर रोज सुबह से शाम तक ईंटें ढोएँ

ऐ दुनिया वालों आज देखो ना…!

जिंदगी ने मेरे साथ कैसा मजाक किया..?


मेरे ही आँखों के सामने धूँ-धूँ कर जल गई

मेरे मेहनत और पसीने की मेरी मड़ई


माना मैं गरीब था, मगर इतना भी नहीं.. 

कि कोई मेरी झोपड़ी को खरीद सकता था।


मैं हैरान था, जब मेरा आशियाना जल रहा था।

ना जाने क्यों मुझे कहीं से पैसों की बू आ रही थी।


बस यह सोच मेरी दिल हैरान था..

क्या चंद चीजें ही मेरी पहचान थी। 


आखिर उन्हें ऐसा क्यों लगा कि मेरी मड़ई

महज उनके भीख की चंद रूपयों की भई…


हाँ हमारी मड़ई हमारी पहचान हैं

उनसे जाकर बोल हम भी इंसान है...


आज ज़िन्दगी ने मेरे साथ देखो ना…! 

कैसा मजाक किया..?


पूजा कांडपाल


13 September 2020

देश के असली हीरो


मैं कोई डॉक्टर तो नहीं...
मैं कोई सैनिक तो नहीं...
मैं कोई राजनेता तो नहीं...
मैं कोई अभिनेता तो नहीं...



मगर हां मैं अपने परिवार का एक हीरो हूं। यह मुझे मेरे परिवार के लोग तब कहते है, जब मैं हर रोज देश की गंदगी साफ कर घर जाता हूं। होने को मैं एक मामूली इंसान हूं, मगर फिर भी मैं अपने परिवार के लिए महान हूं। मेरे बिना एक चपरासी से लेकर प्रधान सेवक तक का काम नहीं हो सकता है। मुझे फिर भी अपने कार्य पर घमंड और अहंकार नहीं है। हां दुख जरूर है, क्योंकि मेरा समाज मुझे एक अलग निगाहों से देखता है। पता नहीं मैंने ऐसा क्या किया हां बस बिना सोचे समझे सीवर लाइन और टंकी में कूद जाता हूं। शायद मेरा काम है मेरे लिए श्राप और कुछ लोगों के लिए पाप है।


मैंने लोगों को अपने अधिकारों के लिए लड़ते हुए देखा है। मगर आज तक हमारे अधिकारों की लड़ाई किसी ने नहीं लड़ी चाहे वह राजनीतिक पार्टियां हो, मीडिया हो या फिर एनजीओ हो। सिर्फ दो वक्त की रोटी के लिए, बिना सुरक्षा उपकरणों के हम सीवर लाइन और टंकी में कूद जाते हैं। कभी-कभी तो वहीं दम तोड़ जाते हैं, ना लाश घर वालों को मिल पाती है, ना ही कोई आर्थिक मदद मिलती है। मैंने लोगों को अपने काम पर घमंड करते हुए और शान से बोलते हुए देखा है। जब भी मैं बोलता हूं तो लोग दूर भागना शुरू कर देते हैं। मुझे आज तक समझ नहीं आया आखिर मेरे साथ ऐसा अन्याय क्यों होता है..?




हां मैं किसी मंदिर का पुजारी और किसी मस्जिद का मौलवी तो नहीं हूं। जो करता तो कुछ नहीं है, फिर भी लोग उसे पता नहीं क्यों इतना बढ़कर समझते हैं। मैं कर्म का पुजारी हूं अपना कर्म करता हूं। मेरी श्रद्धा भी अपने कर्म पर ही है। अपने कर्म के लिए दिन-रात संघर्ष करता हूं और लड़ता हूं, मगर कभी भी किसी से भिक्षा नहीं मांगता हूं। नहीं आता मुझे पाखंड के नाम पर लोगों को मूर्ख बनाना। कभी-कभी सोचता हूं क्यों इतनी मेहनत करूं..? किसी स्थान पर दो पत्थर खड़े कर अपने पाखंड का खेल शुरू कर दूं। फिर सोचता हूं मेरी आने वाली पीढ़ी मुझे विकलांग और कर्म हीन कहकर अपमानित ना करें। भले ही यह समाज मेरे से कितनी ही घृणा ही क्यों ना करें..?


दीपक_कोहली


बेशर्म आदमी


बेशर्म आदमी! हो तुम,आज यह भी दुनिया ने बोल दिया,
ऐतबार था जिन पर मुझे उन्होने भी राज अपना खोल दिया।

नज़ाकत से कहते है कि सबकी तरह तुम चुप क्यों नही रहते,
निज स्वार्थ मे सबकी तरह मस्त तुम क्यूँ नही रहते?

सच्चाई का आईना तुम सबको क्यों दिखाते हो?
जानते हो? इसलिये तुम पीठ पीछे बहुत कोसे जाते हो।

छोड़ दो जिन्दगी की सच्चाई और यह वसूलो पर चलना,
खाली हाथ रह जाओगे तुम्हे कुछ भी न है फिर मिलना।

सुनता रहा,सहता रहता और अन्त मे सबसे यह कह उठा,
राजा हो या रंक अन्त मे यह भी मिटा और वह भी मिटा।

अभिषेक शुक्ला 'सीतापुर'