साहित्य चक्र

20 August 2018

।।..ममत्व..।।

लेखक: कुसुम


कॉलेज की छुट्टियां स्टार्ट हो चुकी है।सुशीला ने अभी-अभी बीए प्रथम वर्ष की परीक्षा दी हैं।अब वो गांव आ गयी है घरवालों से मिलने।सुशीला को चार-पांच दिन ही हुए हैं गांव में।तभी सुशीला अपनी बड़ी मां से कहने लगी बड़ी मां प्लीज प्लीज मुझे भैया-भाभी (बड़ी मां के बेटे-बहू जो कि शहर में रहते हैं) के यहां भेज दे।क्योंकि उसकी मां तो छः या सात बर्षे की ही छोडकर ऊपर चली गयी थी। इसलिए मां की जिम्मेदारी बड़ी मां पर आ गयी थी। इसपर बड़ी मां कहती है का करेगी शहर जाकर गांम  में रहके गांम को काम सीख यही काम आवेगो।तेरे ससुर आये तो कहके गये हैं कि बहू को बेटे के साथ (सुशीला के पति जो कि शहर में जॉब करते हैं )नी रखना बहु हाथ से निकल जाएगी।घर में सुशीला के पति की कम ही चलती है।सो मानना भी पड़ेगा ससुर का फरमान।ये सब सुनकर सुशीला परेशान..क्योंकि उसने तो कुछ और ही सपने देखे थे..कि शहर में रहेगी पति के साथ...इत्यादि।सुशीला को ससुराल के तौर-तरीके बिल्कुल पसन्द नही है क्योंकि वहां बहू का मतलब है काम करो और सबको ऑर्डर फोलो करो।सुशीला कुछ कह भी नही सकती क्योंकि घरवालों ने मना किया है कि चार -पांच महीने ही हुए हैं अभी बिहाय के..मुंह बन्द ही रखियो..फिर चाहे कोई कुछ भी क्यों न कहे।सुशीला अपनी जेठरानी से पूछती है कि क्यों कुछ भी नही बोलती हो गलत होता है तो..उस पर जैठानी बोलती है कि आदत सी हो गयी है...और तू भी आदत ड़ाल ले...अगर रहना है तो।सुशीला तभी तो जल्दी आ गयी ससुराल से।सुशीला मन भारी होता है तब रो लेती है अकेले में।किसी से कुछ नही कहती क्योंकि सब उसे ही सुना देते हैं..मायके में भी।फिर एक दिन सुशीला के भाई (बड़ी मां के बेटे)आ जाते हैं गांव मिलने..तो सुशीला कहती है...भईया प्लीज मुझे अपने साथ ले चलो... यहां शायद उसे अपनापन मिलता हो..अब आ जाती सुशीला शहर ..बडी ही चहक रही है आज ..और अपनी भाभी से कहती है कि भाभी जब भी मैं ससुराल से आया करूंगी आपके ही पास आ जाया करूंगी..ठीक है..।उत्तर मे भाभी हां(सर हिला कर) कह देती है।भाभी मन ही मन सोच  रही है कि मैं बड़ी ही खडूस हूं(अनुशासन में)..और काम भी करवाती हूं खूब.इससे ....फिर भी वह मेरे  के साथ रहना चाहती है..इसे किसी और चीज की जरुरत नही है...सिवाय ममता और प्यार के.....।।

                                                         ।।कुसुम, करौली,राजस्थान।।

29 July 2018

!!!वक्त क्या दिखायेगा कुछ पता नही!!!


दस साल का रोहित अपने पड़ोस में सभी का और अपने घर में सभी का प्यारा था। आसपास के लोग और खुद उसके घर के लोग भी उससे बहुत प्यार करते थे।आस पड़ोस में सबसे अधिक प्यार तो रोहित को पड़ोस में रहने वाली आँटी वीना करती थी। वीना आँटी रोहित से अपने बच्चों की तरह प्यार करती थी।रोहित का बचपन भी काफी समय वीना आँटी के यही गुजरता था।धीरे-धीरे रोहित बड़ा होने लगा।वीना आँटी के बारे में रोहित को सिर्फ इतना ही ज्ञात था कि वह किसी सरकारी नौकरी में किसी अच्छी पोस्ट पर काम करती हैं। सुबह अपने ऑफिस के लिए जाती हैं और शाम को वापस आती है। इतनी ही जानकारी उसके लिए काफी थी।बस उसे तो यह अच्छा लगता था,कि वह उससे बहुत प्यार करती है।अब धीरे-धीरे रोहित अपनी पढ़ाई पूरा करता हुआ बड़ा होने लगा।अब रोहित पढ़-लिखकर पच्चीश साल के युवक के रूप में परिवर्तित हो गया है और वीना आँटी भी अब थोड़ी सी बुजुर्ग हो गई है।पचास साल की उम्र में आज भी उसी तरीके से उसी नित्यक्रम में अपने ऑफिस के लिए जाती है और शाम को आती है।रोहित पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी की परीक्षा दे रहा है।उसकी तैयारी अभी धीरे-धीरे सफलता की ओर बढ़ने लगी हैं और अपने एक साल की मेहनत के बाद रोहित को एक बड़ी सरकारी नौकरी का ऑफर आया और अब उसकी जॉइन करने की तैयारी वह कर रहा था। एक बड़े अधिकारी के रूप में उसका सलेक्शन वहां पर हो गया है रोहित के पहले दिन की जोइनिंग है।अपने ऑफिस में अपनी सीट पर पहली बार बैठते हुए बड़े ही गर्व का अनुभव महसूस करते हुए रोहित अपने जीवन को आगे बढ़ाने की तैयारियां करने लगा किसी कारणवश उसे घंटी दबाकर अपने चपरासी को बुलाना पड़ा। जैसे ही उसने घंटी बजाई, तभी सामने से वीना आँटी एक चपरासी के रूप में उसे आती हुई दिखाई दी।अब क्योंकि वह समझदार हो चुका था तो उसे कुछ भी समय नहीं लगा ये समझने के लिए जिन आँटी को वो आजतक अपनी माँ के रूप में मानता हुआ आया है,वह उसी के आफिस में एक चपरासी का काम करती हैं और अब वह समझ ही नहीं पा रहा था, कि वो किस तरीके से अपनी माँ रूपी आँटी को कुछ भी काम के लिए कहेगा। यही हालत सामने भी उसको दिखाई दे रही है।रोहित इतना व्यतीत हुआ और समझ नहीं पा रहा था कि क्या करना चाहिए।किंतु किसी भी परिस्थिति में काम तो करना ही होगा और धीरे-धीरे रोहित इस माहौल में एडजस्ट होता चला गया।आज वो वीना आँटी को काम कराने के लिए बुलाता भी है और एक अधिकारी के रूप में काम निकालने लगा है शायद यही जीवन की सच्चाई है रिश्ते कब कहां किस मोड़ पर कैसे अपना रूप बदल ले यह किसी को नहीं मालूम।

नीरज त्यागी
ग़ाज़ियाबाद 


25 June 2018

@ हमारी औरतें...!

यह कहना कतई गलत नहीं होगा। कि हमारी औरतें दासी से कम नहीं हैैंं। जी हां..। यह मैं नहीं हमारा समाज मानता है। हमारे समाज में आज भी हमारी औरतें को दासी के रूप में देखा जाता है या समझा जाता है। हमारे समाज में पति के दर्व्यहार से आज हमारे समाज की हर औरत पीड़ित है। चाहे पति कितना ही क्यों नहीं कमाता हो। वहीं हमारे देश में आधे से ज्यादा लड़कियों की शादियां नाबालिग उम्र में ही हो जाती है। जो हमारी औरतें के लिए एक शराब जैसा है। लेकिन अब समय आ गया है। हम सब को मिलकर अपनी महिलाओं को समाज में एक महत्वपूर्ण स्थान देना चाहिए। क्योंकि नारी ही मानव जाति की जननी है। इस विषय पर हमारी औरतों को भी मिलकर सोच-विचार करना होगा। अपने आप पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ लड़ना होगा। आज हम 16वीं सदी नहींं बल्कि 21 वीं सदी में पहुंच चुके है। यहां स्त्री से लेकर हर प्राणी स्वतंत्र है। हर किसी को स्वतंत्र जीने का अधिकार है। हर इंसान को आज अपनी आजादी से जीने की पूर्ण अधिकार मिला है। आज हम एक स्वतंत्र राष्ट्र में जी रहे है। हम आजादी अपने रूप से जीने के लिए। तो फिर हमारी औरतें क्यों नहीं जीए अपनी आजादी से..? 

"नारी ही मानव की जननी है, नारी ही मानव की शक्ति है"
  
  

                                                    लेख- दीपक कोहली

20 January 2018

* मेरी फिर एक नई सुबह *


कवि: दीपक कोहली


सूरज की वो पहली किरण,
पक्षियों का चहचहाना..।
मस्त बयार का चलना,
मन में उमंग,जीवन तरंग 
मेरी फिर एक नई सुबह...।


कुछ नया करता...।
कुछ पुराना समेटना,
कुछ उलझाना, कुछ सुलझाना,
कर्तव्य पथ पर चलते जाना..।
मेरी फिर एक नई सुबह....।।


कुछ अपनी कहना, 
कुछ सबकी सुनना,
कभी मंद-मंद मुस्काना...।
साथ सभी के चलते जाना,
मेरी फिर एक नई सुबह....।।


                                                  कवि: दीपक कोहली


02 January 2018

क्या है जारवा..?

क्या आप जानते हैं...? जारवा क्या है..?  हमारे देश में एक ऐसी भी प्रजाति रहती है..। जिसके अपने नियम और कानून है..। जो किसी भी संविधान को नहीं मानती हैं..। आइए आपको बातते हैं..। आखिर क्या है जारवा प्रजाति और कहां रहते हैं...? जारवा प्रजाति के लोग..। 




'जारवा प्रजाति', हमारे देश के अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह का एक मुख्य जनजाति है..। जिनकी वर्तमान समय में मात्र 300 से 480 तक अनुमानित जनसंख्या हैं..। 'जारवा जनजाति' के लोग गहरे काले रंग के होते है..। इनका कद छोटा होता है..। करीब 1990 तक 'जारवा' जनजाति के लोग  किसी की नज़रों में नहीं आई थी...। 'जारवा जनजाति' के लोग एक अलग तरह का जीवन जीते है..। इनके अपने कानून और नियम है..। 'जारवा' जाति के लोग ना ही संविधान को मानते है और ना ही सरकार इनके विरोध कोई कदम उठती हैं..। एक अलग प्रकार का जीवन जीने वाले 'जारवा जनजाति' के लोग आज भी शिक्षा-ज्ञान से वंछित हैं..। अगर इन्हें 'मानव जाति' का पूर्वज कहां जाएं तो गलत नहीं होगा..। क्योंकि यह जनजाति आज भी आदिमानवों वाला जीवन जीते हैं..। वहीं सरकार इनके रहन-सहन में कोई दखल नहीं देती...। क्योंकि यह जनजाति आज भी बिना कपड़े पहने और बिना पकाएं खाना खाती हैं..। इनका अपना एक अगल समाज हैं..। ये लोग अपने समाज में बाहारी लोगों का आना पंसद नहीं करते हैं..। अगर इनके समाज में कोई जाता हैं, तो ये लोग इसकी हत्या कर देते हैं..। एक सर्वे के अनुसार 1998 के बाद इनके रहन-सहन में कुछ बदलाव महसूस किए गए हैं..।

'जारवा जनजाति' लगभग पांच हजार सालों से यहां निवास कर रही हैं..। 'जारवा जनजाति' के लोग आज भी तीर-धनुष से अपने लिए शिकार करते हैं..। जारवा जंगलों में रहने वाली एक आदिवासी प्रजाति है..। जो शरीर के निचले धड़ में पत्तों और कपड़ों के छोटे-छोटे टुकड़े पहनते हैं..। साल 2012 में 'जारवा प्रजाति' का एक मामला मीडिया में भी खूब उछला था..। जब 'जारवा जनजाति' का एक वीडियो क्लीप मीडिया में सुर्खियां बना हुआ था..। बाद में यह मामला केंद्र सरकार और राज्य सरकार तक पहुंच गया था..। मामला 'जारवा जनजाति' के लोगों का निर्वस्त्र वीडियो बनाकर वायरल करने का था..। जिसके बाद केंद्र सरकार और राज्य सरकार ने मिलकर इस जनजाति के लिए कुछ विशेष नियम बनाएं..। ताकि सरकार इनके लिए कुछ कर सकें..। वैसे यह जनजाति 'अंडमान द्वीप 'के 'हिंद महासागर' के उत्तरी छोर में देखने को मिलती हैं...। 



                                                   रिपोर्ट- दीपक कोहली