साहित्य चक्र

25 June 2018

@ हमारी औरतें...!

यह कहना कतई गलत नहीं होगा। कि हमारी औरतें दासी से कम नहीं हैैंं। जी हां..। यह मैं नहीं हमारा समाज मानता है। हमारे समाज में आज भी हमारी औरतें को दासी के रूप में देखा जाता है या समझा जाता है। हमारे समाज में पति के दर्व्यहार से आज हमारे समाज की हर औरत पीड़ित है। चाहे पति कितना ही क्यों नहीं कमाता हो। वहीं हमारे देश में आधे से ज्यादा लड़कियों की शादियां नाबालिग उम्र में ही हो जाती है। जो हमारी औरतें के लिए एक शराब जैसा है। लेकिन अब समय आ गया है। हम सब को मिलकर अपनी महिलाओं को समाज में एक महत्वपूर्ण स्थान देना चाहिए। क्योंकि नारी ही मानव जाति की जननी है। इस विषय पर हमारी औरतों को भी मिलकर सोच-विचार करना होगा। अपने आप पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ लड़ना होगा। आज हम 16वीं सदी नहींं बल्कि 21 वीं सदी में पहुंच चुके है। यहां स्त्री से लेकर हर प्राणी स्वतंत्र है। हर किसी को स्वतंत्र जीने का अधिकार है। हर इंसान को आज अपनी आजादी से जीने की पूर्ण अधिकार मिला है। आज हम एक स्वतंत्र राष्ट्र में जी रहे है। हम आजादी अपने रूप से जीने के लिए। तो फिर हमारी औरतें क्यों नहीं जीए अपनी आजादी से..? 

"नारी ही मानव की जननी है, नारी ही मानव की शक्ति है"
  
  

                                                    लेख- दीपक कोहली

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