साहित्य चक्र

15 May 2022

कविताः अच्छे के लिए होता है






राजा और मंत्री शिकार के लिए निकले,
जंगल में आए, बहुत सारी झाड़ी और झीलें,
राजा जी के उंगली मैं चुभ गए,
झाड़ियों में जो थे कांटे नुकीले!

राजा के हाथ कि एक उंगली कटि,
सब कुछ अच्छे के लिए होता है बोला मंत्री,
दर्द में यह बात सुनकर राजा को क्रोध आया,
सेना को कह, मंत्री को कारावास में भिजवाया!

राजा अकेले जंगल में आगे बढ़ा,
कबीले वालों ने बली के लिए राजा को पकड़ा,
देखा राजा का एक अंग है भंग,
राजा को छोड़ दिया उन्होंने, इस कारण!

राजा को मंत्री की बात समझ आई,
वो महल गया और तुरंत मंत्री को जेल मैं आवाज लगाई,
मंत्री को कहा भगवान ने मेरी तो जान बचाई,
लेकिन तुझे क्या फायदा हुआ मेरे भाई?

मंत्री मुस्कुराया और कहा,
अगर मैं आपके साथ होता वहां,
कबीले वाले आपको तो छोड़ देते, लकिन मेरी पक्का बलि ले लेते!

ईश्वर पर रखो पूरा यकीन,
कभी रात है तो कभी दिन,
कभी कोई पाता है, कभी कोई खोता है,
इसलिए जो भी होता है, अच्छे के लिए होता है!


                                    डॉ. माध्वी बोरसे




भगवान ब्रह्मा जी से संवाद


हे ब्रह्मदेव आप समस्त सृष्टि के रचयिता है, ऐसा मैं नहीं बल्कि हिंदू धर्म को मानने वाले लोग कहते हैं। ब्रह्माजी आपने इंसानों को 4 वर्गों में बांटा है। हिंदू धर्म के धर्मगुरु ऐसा कहते हैं। क्या यह बात सत्य है ? अगर यह बात सत्य है तो फिर आपने इंसानों को 4 वर्ग में क्यों बांटा ? कुछ धर्मगुरु कहते हैं कि आपने अपने शरीर से इंसानों को पैदा किया है।

आपने अपने मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, कमर वाले भाग से वैश्य और पैरों से शूद्रों को पैदा किया है। ब्रह्मा जी आपको ऐसी क्या जरूरत पड़ गई कि आपने अपने ही शरीर से इंसानों की उत्पत्ति कर डाली। जब आप सृष्टि के रचयिता हैं तो फिर आपने सिर्फ इंसानों को ही अपने शरीर से क्यों उत्पन्न किया ? क्या अन्य जीवों के साथ आपने भेदभाव नहीं किया ?





हे ब्रह्मदेव आप भगवान होने उसके बावजूद भी आप निष्पक्ष होकर नहीं सोच पाए ऐसा क्यों ? हिंदू शास्त्रों में हमने पढ़ा है कि आप चार शादियां करने के बाद भी अपने द्वारा बनाई गई विद्या की देवी सरस्वती पर आप मोहित हो गए थे। आखिर आप एक सामान्य इंसान तो नहीं थे। इसके बावजूद भी आप अपने ही द्वारा बनाई गई सरस्वती पर कैसे मोहित हो सकते हो ? हे ब्रह्मदेव आंखें खोलो मैं आपसे ही संवाद कर रहा हूं। आप मेरे सवालों का जवाब क्यों नहीं दे रहे हैं ?


हे विष्णु पुत्र ब्रह्मा जी जब आपने अपने शरीर से इंसानों की उत्पत्ति की तो फिर आपने अपने ही बच्चों के साथ भेदभाव क्यों किया ? आखिर आपने उन्हें कर्म के आधार पर क्यों बांट दिया ? आपने अपने बड़े पुत्र को सब कुछ क्यों दिया और अपने सबसे छोटे पुत्र को इतने अत्याचार और पीड़ा क्यों दी ? आप सच में सृष्टि के रचयिता है तो मेरा आपसे निवेदन है अपने छोटे पुत्र पर हुए सदियों से अत्याचार का न्याय करें। हे ब्रह्मदेव मेरे सवालों से आप नाराज मत होना। मैं भटकता आप ही का एक भक्त हूं।


हे सृष्टि के रचयिता और स्वामी मेरी करुणा सुनो। मेरे प्रश्नों का मुझे जवाब दो। अन्यथा मैं समझ लूंगा कि आप सच में सृष्टि के रचयिता हो ही नहीं। हे ब्रह्मदेव कृपा करो और आंखें खोल मुझसे संवाद करो। कुछ लोग कहते हैं कि आपकी हरकतों की वजह से आपकी पूजा नहीं होती है। आखिर आपने ऐसी क्या हरकत की ? मैं जानना चाहता हूं। हे स्वामी मुझे बताओ। मैं आपकी शरण में आया हूं। हे देव! आप भगवान हो मगर आपका रूप तो इंसानों ही जैसा है। क्या भगवान भी इंसानों की तरह दिखते हैं ? अगर भगवान इंसानों की तरह दिखते हैं तो फिर भगवानों का अन्य जीव के साथ यह कैसा भेदभाव है ? भगवान ने सिर्फ इंसानों का ही रूप क्यों धारण किया ? क्या भगवान गधा, गीदड़, सूअर, गेडा का रूप धारण नहीं कर सकता ? अगर कर सकता है तो फिर हम भगवान को सिर्फ मनुष्य के रूप में क्यों पूजते हैं ? अगर भगवान सभी जीवों में है तो फिर हमें मुर्गी, बकरी इत्यादि चीज खाना बंद कर देना चाहिए।


हे प्रभु! मुझे मेरे सवालों का जवाब चाहिए। इस कदर आंखें बंद करके ना बैठो अन्यथा मैं मान लूंगा कि आपका कोई अस्तित्व ही नहीं है। आप सिर्फ काल्पनिक है और कुछ लोगों ने आपको अपने स्वार्थ और अपनी सर्वश्रेष्ठता स्थापित करने के लिए बनाया है। हे ब्रह्मदेव अगर मेरे सवालों से आपका मन दुखी हुआ हो तो मैं इसके लिए क्षमा प्रार्थी हूं।


- भारत हवलदार


नाच न जाने आंगन टेढ़ा



ईश्वर की बनाई इस सृष्टि में भांति भांति के लोग हैं जिनमें विभिन्न प्रकार की कमियां और खूबियां देखने को मिलती हैं। यह जरूरी नहीं कि एक व्यक्ति में सभी प्रकार की कमियां हों और उसी प्रकार यह भी आवश्यक नहीं कि किसी एक ही व्यक्ति में सभी प्रकार की अच्छाइयां देखने को मिले।ईश्वर की बनाई इस दुनिया में सभी लोग अपनी अपनी विशेषताएं लेकर जन्मे हैं।इन विशेषताओं के साथ प्रभु ने प्रत्येक व्यक्ति या यूं कहें कि सृष्टि की हर वस्तु में कोई ना कोई कसर बाकी छोड़ी है।






 ईश्वर की इस लीला के पीछे शायद यही कारण हो सकता है कि यदि ईश्वर ने सभी को सर्वगुण संपन्न बनाया होता तो इस विश्व में किसी को किसी की जरूरत ही ना रह जाती और अहंकारवश सभी जन अपने को ही सर्वश्रेष्ठ मानते और जिसका परिणाम सृष्टि का अंत ही होता। इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न न होने पाए इसलिए परमात्मा ने सभी व्यक्तियों को अलग-अलग खूबियों से नवाजा है। ईश्वर प्रदत्त इन खूबियों और कमियों को हमें दिल से स्वीकार करना चाहिए ना कि अपनी कमियों को छुपाना चाहिए और खूबियों का बढ़-चढ़कर बखान करना चाहिए।



कुछ लोगों की आदत होती है कि वे अपनी कमियों का ठीकरा दूसरों के सिर फोड़ने से बाज नहीं आते अर्थात नाच ना जाने आंगन टेढ़ा वाली कहावत ऐसे ही अवसरों पर चरितार्थ होती दिखाई देती है,जहां लोग अपनी कमियों को छुपाने के लिए दूसरे लोगों में कमियां निकालना शुरू कर देते हैं ।वह अक्सर भूल जाते हैं कि कमी उनके ही भीतर है और परिस्थितियों तथा दूसरे लोगों को दोष देना कदापि उचित नहीं है। जिस प्रकार हम अपनी खूबियों को स्वीकार करना सीख जाते हैं वैसे ही हमें दूसरे की खूबियों को सराहना भी आना चाहिए। दूसरों की अच्छाइयों और खूबियों से हमें कुछ नया सीखना चाहिए और अपनी कमियों को दूर करने हेतु यथासंभव कोशिश करनी चाहिए।



 सभी व्यक्तियों में यदि केवल और केवल अच्छाइयां ही होती तो फिर प्रभु और मानव में अंतर ही क्या रह जाता। ईश्वर की बनाई इस सृष्टि में इस प्रकार की कमियों और खूबियों की वजह से ही तो सरसता देखने को मिलती है।विभिन्न प्रकार के स्वभाव,खूबियों और कमियों के साथ सभी लोग एक दूसरे के साथ सामंजस्य बनाते हुए जीवन चक्र को आगे बढ़ाते हैं।



अपने आसपास हम अक्सर ऐसे लोगों से रूबरू होते रहते हैं जो अपनी खूबियों का बढ़ा चढ़ाकर खूब बखान करते हैं और यदि किसी कारणवश उनके अंदर कोई कमी होती है तो वे उस पर पर्दा डालने से भी नहीं चूकते। अपनी कमियों को छुपाकर शायद वे आत्म संतुष्टि का अनुभव करते हैं।दूसरों को यह जताकर कि वे केवल खूबियों के पुतले हैं, वे न केवल स्वयं को धोखे में रखते हैं,अपितु दूसरों को भी बेवकूफ बनाने का निरर्थक प्रयास करते हैं।निरर्थक प्रयास इसलिए कहा क्योंकि ईश्वर ने सभी को दिमाग दिया है जिसके माध्यम से सभी लोग यह सोचने समझने की सामर्थ्य, क्षमता और शक्ति रखते हैं कि सामने वाला जो कह रहा है उसमें कितनी सच्चाई है क्योंकि दूसरे व्यक्ति को एक सीमा तक ही एक व्यक्ति मूर्ख बना सकता है। समय बीतने के साथ-साथ सभी को वास्तविक स्थिति समझ आने लगती है।


यहां बात दूसरे लोगों को संतुष्ट अथवा खुश करने की नहीं है क्योंकि यदि हम हमेशा दूसरों के बारे में ही सोचते रहेंगे तो स्वयं के विषय में कब सोचेंगे। दूसरों को संतुष्ट करने से पहले हमारा अपने लिए भी कर्तव्य बनता है कि हम स्वयं को संतुष्ट करें। आत्म संतुष्टि सबसे बड़ा धन समझा जाता है। जब तक हम स्वयं ही अपनी किसी बात से सरोकार नहीं रखेंगे,जब अपने किसी निर्णय पर हमें स्वयं ही भरोसा नहीं होगा तो स्वयं में आत्मविश्वास महसूस नहीं कर पाएंगे और आत्मविश्वास ना होने की स्थिति में हम दूसरों के समक्ष ज्यादा देर तक खड़े नहीं रह पाएंगे। इसलिए बेहतर यही होता है कि अपनी कमियों को स्वीकार करें और खूबियों को निखारने का हर संभव प्रयास करें ।अपनी कमियों को सुधारने वाला व्यक्ति उन लोगों से महान होता है जो अपनी खूबियों का नाहक ही बढ़ा चढ़ाकर वर्णन करते हैं और अपनी गलतियों और कमियों को छुपाने का प्रयास करते हैं।


ईश्वर ने जैसा हमें बनाया है ,हमें अपने उस रूप को ही पूरे दिल से स्वीकार करना चाहिए और प्रतिदिन ईश्वर का आभार व्यक्त करना चाहिए कि उन्होंने हमें मनुष्य का जीवन दिया और जिसकी वजह से ही हम इस सुंदर सृष्टि को देख पाए। हां इतना जरूर है कि अपनी कमियों को सुधारने का प्रयास हमें कभी नहीं छोड़ना चाहिए ,साथ ही साथ अपनी खूबियों पर भी कभी घमंड नहीं करना चाहिए क्योंकि रंग रूप अति क्षणिक होता है। समय बदलते देर नहीं लगती, परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है। ईश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए हमें समाज में रहते हुए एक दूसरे की सहायता करनी चाहिए और मानव कल्याण के लिए सदैव प्रयासरत रहना चाहिए।



                                                                       लेखिका- पिंकी सिंघल

अगर जीतना स्वयं को, बन सौरभ तू बुद्ध


(बुद्ध का अभ्यास कहता है चरम तरीकों से बचें और तर्कसंगतता के बीच के रास्ते पर चलना समय की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, चल रहे यूक्रेन युद्ध जहां रूस और नाटो अपने स्वयं के लक्ष्यों को प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं।)





बौद्ध धर्म का एक मजबूत व्यक्तिवादी घटक है: जीवन में हर किसी की अपनी खुशी की जिम्मेदारी है। बुद्ध ने चार आर्य सत्यों को मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में प्रस्तुत किया: जीवन में दुख है; दुख का कारण इच्छा है; इच्छा समाप्त करने का अर्थ है दुख को समाप्त करना; और एक नियंत्रित और मध्यम जीवन शैली का पालन करने से इच्छा समाप्त हो जाएगी, और इसलिए दुख समाप्त हो जाएगा। इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए, बुद्ध ने नोबेल अष्टांगिक मार्ग प्रस्तुत किया: सही विश्वास, सही संकल्प, सही भाषण, सही आचरण, सही व्यवसाय, सही प्रयास, सही दिमागीपन, और सही समाधि-या ध्यान। बौद्ध प्रथा के अनुसार, अष्टांगिक मार्ग का अनुसरण करने से अंततः संसार, पुनर्जन्म और पीड़ा के चक्र से मुक्ति मिल जाएगी।


गौतम बुद्ध की शिक्षाओं पर आधारित बौद्ध दर्शन और सिद्धांत, वास्तविकता और मानव अस्तित्व के बारे में सार्थक अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं। बौद्ध धर्म भोग और सख्त संयम जैसे चरम कदमों का त्याग करते हुए मध्य मार्ग सिखाता है। उनके अनुसार बौद्ध धर्म के व्यक्तिवादी घटक पर बल देते हुए, जीवन में अपनी खुशी के लिए हर कोई जिम्मेदार है। मध्य मार्ग बुद्ध की शिक्षा का मूल है और इसे जीवन के सभी क्षेत्रों में अपनाया जा सकता है।


इसका अनिवार्य रूप से अर्थ है चरम सीमाओं से बचना, जैसे कि आज हम जो देख रहे हैं-संकीर्ण राष्ट्रवाद और बेलगाम उदारवाद, धार्मिक कट्टरता और घटिया धर्म, एक गौरवशाली अतीत के प्रति जुनून और आधुनिक मानी जाने वाली सभी चीजों को सही ठहराना। छ.: पोशाक, भोजन आदि को लेकर एक विशेष आस्था के लोगों के एक वर्ग को आँख बंद करके निशाना बनाना। संक्षेप में, दूसरे के दृष्टिकोण पर विचार किए बिना जो सही है उसमें अंध विश्वास। बुद्ध का अभ्यास कहता है चरम तरीकों से बचें और तर्कसंगतता के बीच के रास्ते पर चलना समय की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, चल रहे यूक्रेन युद्ध जहां रूस और नाटो अपने स्वयं के लक्ष्यों को प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं।


समसामयिक तौर पर देखे तो बौद्ध धर्म में जाति व्यवस्था शामिल नहीं है - यह समानता सिखाता है और यह कि हर कोई व्यक्तिगत सुधार के माध्यम से निर्वाण तक पहुंचने में सक्षम है। बौद्ध धर्म में परिवर्तित होने से, निचली जाति के सदस्य जाति व्यवस्था के तहत होने वाले भेदभाव से बच सकते हैं और अन्य बौद्धों द्वारा उनके साथ समान व्यवहार किया जा सकता है। अस्पृश्यता की प्रथा को भारत के संविधान द्वारा गैरकानूनी घोषित किया गया है। यह मनुष्य के पतन की सबसे पुरानी प्रणाली है। और, यह अभी भी ग्रामीण और शहरी भारत में प्रचलित है। यह भी स्पष्ट है कि पूरे भारत में अनुसूचित जातियों के बीच दावे की डिग्री बढ़ी है। वे हर संभव तरीके से श्रेणीबद्ध पदानुक्रम और असमानता का विरोध कर रहे हैं।


बुद्ध ने स्वयं एक संस्था के रूप में जाति की आलोचना की; और, 20वीं शताब्दी में, कई निम्न-जाति के हिंदुओं ने, अम्बेडकरवादी शिक्षाओं के प्रभाव में, जातिगत भेदभाव से बचने के लिए फिर से खोज की और बौद्ध धर्म में परिवर्तित हो गए। अम्बेडकरवादी आंदोलन बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा सिखाए गए और अभ्यास किए गए लोकाचार से प्रभावित है। 1956 में बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा शुरू किए गए महान धर्मांतरण आंदोलन के बाद यह आंदोलन बौद्ध धर्म से प्रभावित हो रहा है। यही कारण है कि हजारों दलित आज भी बौद्ध धर्म अपनाते हैं। पुनरुत्थानवादी बौद्ध धर्म आधुनिक भारत में आमूलचूल परिवर्तन का प्रतीक है। कई शताब्दियों के अंतराल के बाद बौद्ध धर्म मुख्यधारा का धर्म बन गया है। अनुसूचित जाति के अलावा आदिवासी और ओबीसी धीरे-धीरे इसकी ओर रुख कर रहे हैं। बौद्ध धर्म लोकतंत्र का झंडा पकड़े हुए है।


बौद्ध धर्म उन लोगों को बहुत आवश्यक आत्मविश्वास और सम्मान प्रदान करता है जो जाति-आधारित सामाजिक व्यवस्था द्वारा हीन और निंदा करने के लिए मजबूर हैं। यह आत्मविश्वास जाति के नरक से उनके उत्थान और विश्वास और सम्मान की भूमि में उनके आगमन में स्पष्ट है। बुद्ध ने आखिरकार, सिखाया कि मन और ज्ञान की स्वतंत्रता लोगों के एक वर्ग के लिए गुप्त नहीं है, इसे उन सभी द्वारा प्राप्त किया जा सकता है जो न केवल खुद को, बल्कि अपने आसपास के लोगों को भी बदलने के लिए संघर्ष और प्रयास करते हैं।


बौद्ध धर्म नैतिकता की एक उच्च प्रणाली को विकसित करता है और अष्टांग मार्ग में जो बताया गया है वह सभी व्यक्तियों के लिए एक सरल लेकिन शक्तिशाली मार्गदर्शक है, जिसमें उच्च पदों पर बैठे लोग-राजनीतिक और व्यापारिक नेता, धार्मिक संत, नौकरशाह और पेशेवर शामिल हैं। आज के कड़वे धार्मिक और राजनीतिक संघर्षों, बढ़ती असमानताओं और असमानताओं और बेईमान व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा की दुनिया में, बुद्ध द्वारा निर्धारित 'मध्य मार्ग' ही मानव जाति को घृणा, अपमान और हिंसा की बुराइयों से बचाने का एकमात्र तरीका है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2030 तक प्राप्त किए जाने वाले सतत विकास लक्ष्यों में से एक 'शांति और न्याय' है।


चूंकि शांति और सतत विकास आपस में जुड़े हुए हैं, बुद्ध का प्रिज्म स्थानीय से लेकर वैश्विक संस्थानों और नेताओं तक हर एक हितधारक के लिए मार्गदर्शक रोशनी हो सकता है, जो करुणा और ज्ञान के आधार पर संवाद, सद्भाव और न्याय को बढ़ावा देने के लिए मिलकर काम कर सकता है। बौद्ध शिक्षाएं मनुष्यों में करुणा, शांति और स्थिरता, आनंद पैदा करती हैं और वे मनुष्य और प्रकृति के बीच एक स्थायी संतुलन बनाए रखने में मदद कर सकती हैं। बुद्ध की शिक्षाएँ समाज को उनके बेहतर और अधिक मानवीय रूपों में बदल सकती हैं जैसा कि तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा ने दर्शाया है “20वीं सदी युद्ध और हिंसा की सदी थी, अब हम सभी को यह देखने के लिए काम करने और वार्ता की ज़रूरत है कि 21वीं सदी शांति की है।'


विचलित करते है सदा,मन मस्तिक के युद्ध !
अगर जीतना स्वयं को, बन सौरभ तू बुद्ध !!


लेखक- सत्यवान 'सौरभ'


07 May 2022

क्या अखंड भारत संभव है ?


आपने और हमने अक्सर हिंदू संगठनों द्वारा अखंड भारत की बात सुनी है। आज हम अखंड भारत पर विस्तार से बात कर इसे समझने की कोशिश करेंगे। अखंड भारत यानी अफगानिस्तान, पाकिस्तान, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान तक सिर्फ एक देश और एक सरकार का होना है। अखंड भारत को हिंदू धर्म के लोग हिंदू राजाओं के शासन काल का स्वर्णिम युग कहते हैं। जब हम अखंड भारत की बात सुनते हैं और इतिहास के पन्ने पलटते हैं तो हिंदू संगठनों द्वारा कही गई अखंड भारत की बात इतिहास के पन्नों के आधार पर एकदम अलग नजर आती है।






आप सोच रहे होंगे कि अखंड भारत पर सिर्फ एक हिंदू राजा ने राज किया होगा; मगर ऐसा नहीं है। अखंड भारत कभी था ही नहीं। हां कह सकते हैं कि अशोक ने अपने शासनकाल में बतौर राजा भारत के सबसे अधिक भूभाग पर शासन किया। इसके बाद से जितने भी राजा हुए चाहे महाराणा प्रताप सिंह हो या फिर छत्रपति शिवाजी, मगर कोई भी हिंदू राजा अशोक से अधिक भू-भाग पर शासन नहीं कर सका। भारत का इतिहास बताता है कि हिंदू राजा कभी भी आपस में मिल कर नहीं रहे। इन राजाओं का आपस में मिलकर नहीं रहने के कारण ही भारत में मुगलों सहित अंग्रेजों का शासन हुआ और भारत ने सदियों तक गुलामी की बेड़ियां पहनी।

अगर एक देश के रूप में देखा जाए तो भारत कभी भी एक देश नहीं था बल्कि अलग-अलग खंडों में बांटा अलग-अलग राजाओं का राज्य रहा है। ऐसे में जो लोग अखंड भारत की बात करते हैं या तो शायद उन्होंने भारत का इतिहास नहीं पढ़ा है या फिर वह मानसिक तौर पर बहुत ही कमजोर है। चलिए अब वर्तमान की बात करते हैं क्या वर्तमान में अखंड भारत की कल्पना करना सही है या फिर गलत ?


आज पाकिस्तान हो या फिर अफगानिस्तान या बांग्लादेश या म्यांमार सभी देश अलग अलग राष्ट्र के तौर पर समस्त विश्व में अपनी पहचान बनाए बैठे हैं। ऐसे में मुझे तो समझ नहीं आता कि आप इन देशों को कैसे मनाएंगे और कैसे इन्हें अखंड भारत की कल्पना बताएंगे। आप स्वयं सोच कर देखिए क्या अखंड भारत की कल्पना करना वर्तमान में सही है ? मुझे लगता है कि वर्तमान में अखंड भारत की कल्पना करना मूर्खता भरा सपना है। क्या भारत अखंड भारत के लिए पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार जैसे देशों पर आक्रमण करेगा ? क्या हिंदू संगठनों की कल्पना अखंड भारत को यह सभी देश स्वीकार कर पाएंगे ?


हम मान लेते हैं कि हिंदू संगठनों की कल्पना अखंड भारत को सभी देशों ने स्वीकार कर लिया, मगर उसके बाद अखंड भारत की जनसंख्या में हिंदू, मुस्लिम लगभग बराबरी पर आ जाएंगे। क्या उसके बाद हिंदू धर्म खतरे में नहीं रहेगा ? क्योंकि वर्तमान में हिंदू संगठनों द्वारा भारत के हिंदुओं में भारत में निवास कर रहे 30 करोड़ मुसलमानों का डर बैठाया जा रहा है। अभी भारत में लगभग 100 करोड़ हिंदुओं की जनसंख्या है। अगर अखंड भारत बनता है तो फिर हिंदू और मुस्लिम जनसंख्या में ज्यादा अंतर नहीं होगा। अखंड भारत बनने के बाद फिर हिंदू संगठन मुसलमानों को कौन से देश में भेजेंगे ?


अगर अखंड भारत बन जाता है तो फिर उसे हिंदू राष्ट्र कैसे घोषित किया जाएगा ? अखंड भारत में मुसलमानों की जनसंख्या इतनी अधिक होगी की वह हिंदू राष्ट्र के खिलाफ आवाज उठाएगी। क्या हिंदू संगठनों को अखंड भारत के साथ-साथ हिंदू राष्ट्र भी चाहिए ? जब वर्तमान में 30 करोड़ मुसलमानों का 100 करोड़ हिंदू के ऊपर डर बैठाया जाए रहा है तो फिर अखंड भारत बनने के बाद तो यह डर और अधिक बढ़ जाएगा।


अखंड भारत की परिकल्पना को लेकर हिंदू संगठनों को पुनः विचार करने की आवश्यकता है। नहीं तो यह परिकल्पना सिर्फ परिकल्पना तक ही सीमित रह जाएगी। आज के दौर में भारत के हिंदू संगठनों को अन्य देशों को इतने हल्के में नहीं लेना चाहिए जितने हल्के में भारत के हिंदू संगठन भारत के दलितों और मुसलमानों को लेते हैं।


- दीपक कोहली