साहित्य चक्र

03 April 2022

कविताः सुख की ओर



दुःख सहकर सुख की ओर चलना होगा,
फूलों से अगर करनी है दोस्ती तो काॅंटों को सहना होगा। 

दर्द बढ़ता है तो बढ़ने दे, बस मुस्कराना होगा, 
व्यथित हृदय उल्लास से भरना होगा।

धीमे-धीमे गुजर जायेंगी काली गम भरी रातें,
नित कर्म पथ पर अडिग रहना होगा।

झूठ, कपट, छल, धोखों का बाजार गरम,
सबसे बचना होगा, बच-बचकर चलना होगा।

बेदर्द जमाना भारी, सहयोग नहीं सलाह देगा
नयनों से अश्रु पोंछ, सुन जग की मन का करना होगा।

भीतर से मिटा दुर्गुण सारे आज - अभी 
पुष्पों सा खिलना होगा, जग महकाना होगा।

औरों की पीर मिटा, दीपक सा जलना होगा,
दुःख सहकर सुख की ओर चलना होगा।


                                                   - मुकेश कुमार ऋषि वर्मा


कविता- बदलते रंग



बदलते हुए रंगों के साथ
बदलते हुए
अपने लोग देखे हैं।
चेहरे पर नकाब ओढ़े
सीने पर वार करते
अपने ही लोग देखे हैं।

हरे रंगों जैसी
अब लोगों के दिलों में
हरियाली कहाँ ?
अपने ही लोग
खंजर फेर
ह्रदय तल को
बंजर करते देखे हैं।

रंगों की बौछार
फैली है हर जगह
फिर भी
गिरगिट की तरह
रंग बदलते
अपने रिश्तेदार देखे हैं।

करते होंगे मोहब्बत वो
शायद किसी और से,
हमने अपने लिए  तो
उनके चेहरे पर
नफ़रत के बदलते
नए-नए रंग देखे हैं।

                                     - राजीव डोगरा


कविताः ईश्वर की रचना




हाँ मैं ईश्वर की रचना हूँ।
सोकोमलांगी नारी हूँ।

परंतु आज के युग की नारी हूं। 
मैं आज पुरूषों के सभी।

कठोर,कठिन कार्य।
करने में सक्षम हूं।

हां मैं ईश्वर की रचना हूं।
मैं कार, स्कूटर, मोटरसाइकिल। 

ऑटोरिक्शा, जहाज,हवाई 
जहाज, रेल, बस सब कुछ।

चला सकती हूँ, चलाती भी हूं।
हां मैं ईश्वर की रचना।

सुकोमलांगी नारी हूं।
मैं आज एक डॉक्टर,वकील। 

इंजीनियर, ज्योतिष सभी।
कुछ हूँ, मुझमें ईश्वर ने सारी। 

शक्तियां समाहित की है।
हां,मैं आज की नारी।

ईश्वर की सुंदर अदभुत रचना हूँ।


                                         - संगीता सूर्यप्रकाश



अगले जनम मोहे नारी ही कीजो!



अगले जनम मोहे नारी ही कीजो,
दोबारा मेरे माता-पिता को, 
प्यारी सी बिटिया ही दीजो,
फिर चाहे, हमेशा की तरह, हर एक मोड़ पर, 
मेरी लाख परीक्षा लीजो,
फिर भी मोहे, अगले जन्म नारी ही कीजो !


खुशियों से महका दू दोनों परिवार,
देश के लिए तत्पर खड़ी रह कर करूं, 
रानी लक्ष्मीबाई सा वार,
ना संहू कोई अत्याचार,
ना मानू जिंदगी से हार,
और लाऊं खुशियों की बहार !


वह सोनिया की जीत दीजो,
कल्पना चावला सा विश्वास दीजो,
वह किरण बेदी सी ताकत दीजो,
हां अगले जन्म मोहे नारी ही कीजो !

ऐश्वर्या सा आकर्षण दीजो,
पार्वती सा आदर्शन दीजो,
मदर टेरेसा सी करुणा दीजो,
मैरी कॉम सा प्रण दीजो,
अगले जन्म मोहे नारी ही कीजो !

                                           डॉ. माध्वी बोरसे


कविताः महत्व




जीवन में हर चीज का अपना महत्व होता है, पर
हम उसे अपने जीवन में कितना महत्वपूर्ण मानते हैं ।
यह हम पर निर्भर होता है जैसे

दुःख है , तभी तो सुख का आनंद है,
आलोचना है, तभी तो प्रशंसा का महत्व है,
उद्देश्य है , तभी तो योजनाएँ बनती है,
घृणा है , तभी तो प्रेम को अर्थ मिलता है ।

पराए हैं , तभी तो अपनों का अस्तित्व है,
दुश्मन हैं , तभी तो दोस्तों का ज्ञान होता है,
सामान्य बुद्धि वाले हैं, तभी तो तीक्ष्ण बुद्धि का मान है,
झगडालू प्रवृति वाले हैं , तभी तो शांति प्रिय लोगों आवश्यकता है ।

असफलता है , तभी तो सफलता की चाहत है,
समय नहीं है, तभी तो समय की कीमत जानते हैं,
निर्गुण है,, तभी तो गुणों की कीमत जानते हैं
असंतोष हैं, तभी तो संतोष चाहते है सब ।

सीधी,सरल और स्पष्ट  बात है ,
संतुष्ट जीवन का मंत्र है, महत्वाकांक्षी बने रहना
और जीवन की हर बात को महत्वपूर्ण मानना ।।


                               डॉ. सारिका ठाकुर