साहित्य चक्र

02 May 2021

तुम मुझ मैं

वक्त की दौड़ में
वक्त की हौड़ में
सब कुछ
बहता चला जा रहा है।
सिवाए मेरे हृदय में
खनखनाती हुई तेरी
स्थिर यादों के।

वक्त के शोर में
वक्त के हिलोर में
सब जगह
खामोशी का एक सन्नाटा
बिखरे जा रहा है।
सिवाए मेरे अंतर्मन में
तेरी गुनगुनाती यादों के।

                           राजीव डोगरा 'विमल'



बेचारे बच्चे



गाय के दूध से
पलते हैं
इंसानों के बच्चे,
तरसते रह जाते हैं
उनके बछड़े।

मुर्गी के अण्डों से
भरते हैं
इंसानों के पेट,
अजन्में रह जाते हैं
उनके चूज़े।

जानवरों के मांस से
सजते हैं
इंसानों के मेज,
इंतजार में रह जाते हैं
उनके बच्चे।

मजदूर के लहू से
बनते हैं
अमीरों के महल,
बेघर रह जाते हैं
उनके बच्चे।

किसान के अन्न से
कटते हैं
साहूकारों के ब्याज,
बंधुआ रह जाते हैं
उनके बच्चे।

कोई आश्चर्य नहीं
कि संसार में चलते
आ रहे
अन्याय के इस दस्तूर
की कीमत
सबसे ज्यादा चुकाते हैं
यहां के बच्चे।


                             जितेन्द्र कबीर


कोरोना पहाड़ा



दो एकम दो,साबुन से 
बार  -  बार   हाथ  धो ।

दो दूनी चार,कोरोना के
लक्षण सर्दी,खांसी सांस 
में तकलीफ,तेज बुखार ।।

दो तिया छः , बाहर है 
कोरोना , घर  पर  रहें ।

दो चौके आठ,सावधानी
से  कोरोना  को  दे  मात ।।

दो  पंजे  दस , मास्क  के 
आगे  वायरस   है  बेबस ।

दो छक्के बारह , डटकर
कोरोना   को  हैं   हराना ।।

दो सत्ते चौदह , प्राकृतिक
ऑक्सीजन के लिए लगाओं पौधा ।

दो अठे सोलह , हमारे प्राण 
बचा  रहें  हैं कोरोना  योद्धा ।।

दो  नमे  अठ्ठारह ,  वैक्सीन 
लगाओं   जीवन   हैं  प्यारा ।

दो दहाई बीस , संयम  रखें
मिलेगी  कोरोना   से  जीत ।।

                         गोपाल कौशल

जनता ने अहंकार की फूंक दी उतार


बहुत जोर लगाया उन्होंने
दीदी ओ दीदी जोर जोर से बुलाया
जनता ने भाई की आवाज नहीं सुनी
एक बार दीदी को फिर ताज पहनाया
एक तरफ थी अकेली नारी
दूसरी तरफ थी पूरी सरकार
सत्ता प्राप्त करने के लिए
हो रही थी घटिया तकरार
दोनों ओर से हो रहे थे प्रहार
कोई भी मानने को नहीं था हार
दीदी ने खेला कर दिखाया
दीदी हुई हुई सौ के पार
जनता ने दिखा दिया सब को
झूठ पर होता है हमेशा सच्च भारी
हराने के लिए सबने लगा लिया ज़ोर पूरा
सब पर पड़ गई भारी इक नारी
झूठ एक बार सबको भटकाता है
गलत राह पर लेकर जाता है
सच्च का मुकाबला कोई नहीं कर सकता
झूठ तो सबको रुलाता है
लोकतंत्र में जनता बादशाह है
जिसको चाहे उसको सत्ता दिलाती है
खाक में मिला देती है हेकड़ी पल में
बड़े बड़ों को औकात दिखाती है
दीदी ने ऐसा किया राजनीति में वार
दो सौ तो दूर बहुत नहीं पहुंचे सौ के पार
शीशा जो कह रहा था वो देख नहीं पाये
जनता ने अहंकार की फूंक दी उतार

                                               रवींद्र कुमार शर्मा


" चल मुसाफिर चल "


चल मुसाफिर चल भले ही रास्ता कठिन,
चल मुसाफिर चल कि होगी जीत एक दिन।

मुश्किल चाहे जितनी भी आ जाए तो,
तेरी हिम्मत से भी थर्रा जाए वो,
अंधेरे से निर्भीक हो लड़ना सीखो तुम,
नन्हे से जुगुनू सा चमकना सीखो तुम।

चूम लेगी तेरे कदमों को मंजिल एक दिन,
चल मुसाफिर चल भले ही रास्ता कठिन।

शीतल छाया में भी तुम इतराना ना,
कड़ी धूप हो चाहे तुम घबराना ना।

जीवन की  बाधाओं से ऊपर उठकर,
आशा और विश्वास के दीप जलाना तुम।

हार कर भी जीत लोगे बाज़ी एक दिन,
चल मुसाफिर चल भले ही रास्ता कठिन।


                                        प्रियदर्शिनी तिवारी