साहित्य चक्र

17 October 2026

आज की प्रमुख रचनाएँ- 17 अक्टूबर 2026






मनुष्य और उसकी विराट इच्छाएं

कितना अल्प है मनुष्य,
फिर भी कितनी विराट
उसकी इच्छाएँ हैं…!
मुट्ठी भर साँसों का सफ़र,
और ख़्वाब हैं कि
आसमान से भी ऊँचे हैं।

पाँव टिके हैं धरती पर,
मगर आँखों में पूरा आकाश है,
हाथों की लकीरों में सीमित जीवन,
और मन में अनंत की प्यास है।

थोड़ा-सा सुख मिल जाए,
तो और अधिक पाने की चाह जागती है,
एक मंज़िल पर पहुँचते ही
दूसरी मंज़िल नज़र आती है।

कभी धन की चाह,
कभी यश का अभिमान,
कभी दुनिया को जीतने की ज़िद,
तो कभी अपनों से ही
अपना अस्तित्व स्वीकार करवाने का अरमान।

वह भूल जाता है अक्सर,
कि जिस जीवन को सँवारने में
सारी उम्र लगा देता है,
वही जीवन एक दिन
उसकी मुट्ठी से रेत-सा फिसल जाता है।

जिन चीज़ों को पाने के लिए
वह अपनी शांति खो देता है,
एक दिन उन्हीं चीज़ों के बीच बैठकर
वह शांति को ही खोजता है।

जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि
सब कुछ पा लेना नहीं,
बल्कि उस क्षण को पहचान लेना है,
जब मन कह उठे..
“मेरे पास जो है,
वह भी कम नहीं…
और जो नहीं है,
उसके बिना भी
मेरा जीवन अधूरा नहीं।

- नरेंद्र मंघनानी


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असत्य का भी साथ चाहिए

क्यों कीचड़ ही चाहिए,
कमल के खिलने को?

क्यों ताँबे का साथ चाहिए,
कुंदन को हार में ढलने को?

क्यों युधिष्ठिर को भी असत्य का
सहारा लेना पड़ा,
महाभारत में धर्म की विजय का
इतिहास लिखने को?

क्यों विष की जरूरत है,
विष के प्रभाव को मिटने को?

क्यों कांटा निकले कांटे से,
फिर घी निकाली जाए टेढ़ी उंगली से?

फिर सत्य और असत्य के बीच,
क्यों खिंची है ऐसी रेलमपेल?

कुछ हासिल करने के लिए,
कुछ धर्म निभाने के लिए,
कभी-कभी क्यों अंततः
असत्य का भी साथ चाहिए ?

- रोशन कुमार झा


*****


अध्यापक नहीं मसाल हूं मैं
अध्यापक नहीं मसाल हूं मैं
ज्ञान की लौ जलाने आया हूं
जग से अज्ञान मिटाने
जग को जगाने
भटके यौवन को राह
दिखलाने आया हूं
अध्यापक नहीं मसाल हूं मैं
सिर्फ पढ़ाना मेरा काम नहीं
जीवन जीने की कला सिखाना
छात्रों को अनुशासित बनाना
संघर्षों से हंसते-हंसते लड़ना
सिखलाने आया हूं
अध्यापक नहीं मसाल हूं मैं
छात्रों को चरित्रवान बनाने
छात्रों में आत्मविश्वास जगाने
छात्रों का विवेक कर जागृत
भौतिक जगत से
अन्तर्जगत की ओर
ले आने आया हूं
अध्यापक नहीं मशाल हूं मैं
गीता ,बाइबल और कुरान के
ज्ञान से अवगत कराऊं
वेदों - उपनिषदों के
गूढ़ रहस्यों से परिचित कराऊं
सत्य और आनंद की
वास्तविक परिभाषा बतलाऊं
सिर्फ अध्यापक नहीं बनना मुझे
अभीप्सा है कि
सच्चा गुरु बनने का गौरव पाऊं
अध्यापक नहीं मसाल हूं मैं
ज्ञान की लौ जलाने आया हूं

- प्रवीण कुमार


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सुबह की सैर का आनन्द ही कुछ और है
खत्म हो रहा पैदल चलना, मुश्किल आता दौर है

पहले चिड़ियों की चहक से खुलती थी सुबह, सबकी
अब हर तरफ प्रेशर हॉर्न और धुएँ का ज़ोर है,
आती है शरीर में देखो, चेतना और स्फूर्ति
पैदल चलने में मज़ा ही कुछ और है
साहब! जो पैदल चलता था पहले कभी शान से
आज उसे ही सब कहते हैं - ये कुछ और है,
पहले खुलकर साँस लेते थे तो जी उठते थे,
अब हर साँस में धूल और धुएँ का ही ज़ोर है,
हर कोई भाग रहा है गाड़ी-घोड़े की ओर
सुकून का अब कहाँ किसी को ठौर है,
साहब! पैसों से नापते हैं अब, इज्ज़त यहाँ,
इंसानियत का अब कहाँ दौर है?

शुद्ध मिलती थीं पहले प्राण वायु,
अब हर तरफ मोटर-गाड़ियों का ही शोर है,

नंगे पाँव जो पहले ओस पर चलता था
अब कांटों भरा उसका हर छोर है,

पहले सैर में मिलते थे यार- दोस्त बहुत सारे,
अब हर शख्स मोबाइल में बोर है,

जिस्म थक रहे हैं आज, दिल थक रहे हैं,
सेहत का जनाज़ा उठ रहा,कहते हैं ये तरक्की का दौर है

पहले जो सड़कें थीं अपनों से भरी,
अब वीरान पड़ा हर एक छोर है,

साहब! तरक्की तो बहुत कर ली हमने,
पर सेहत और सुकून कमज़ोर है।

कभी पीपल के नीचे बैठा करते थे शौक से
अब वहाँ भी कंक्रीट का ढेर है,

साहब! हमने बेच दिया सुकून अपना,
ये तरक्की नहीं, विनाश का दौर है।

- बाबू राम धीमान


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छोड़ दीजिए

ज़िंदगी में कोई काम ऐसा हो,
जो आपको अच्छा न लगे, उसे छोड़ दीजिए।
किसी का साथ दिल को रास न आए,
तो ऐसे रिश्ते को भी छोड़ दीजिए।
किसी चीज़ के पीछे यूँ मत भागिए,
जो वक्त पर मिलना हो, उसे वक्त पर छोड़ दीजिए।
कोई काम आपका बन नहीं रहा हो,
तो उसे भी किस्मत पर छोड़ दीजिए।
जो आपको मिलना होगा, मिलकर रहेगा,
इसलिए हर बात की फिक्र करना छोड़ दीजिए।
दूसरों की चिंता में अपनी ज़िंदगी न भूलिए,
अपने लिए भी थोड़ा जीना सीख लीजिए।
जो आपके साथ चले, उसका साथ निभाइए,
जो रास्ते में रुक जाए, उसे छोड़ दीजिए।
हर शिकायत का हिसाब रखना छोड़ दीजिए,
दिल में बोझ बनाकर कुछ भी मत रखिए।
सबके दुख को अपना समझना छोड़ दीजिए,
हर किसी का दर्द अपने दिल में न रखिए।
ज़िंदगी में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं,
जो बुरा है, उसे वहीं छोड़ दीजिए।
जिनसे भी मिलें, उनकी कमियाँ वहीं छोड़ आइए,
हर बात को दिल से लगाना छोड़ दीजिए।
ज़िंदगी बहुत खूबसूरत है, इसे यूँ न गँवाइए,
जो सुकून छीन ले- उसे बस छोड़ दीजिए।

- गरिमा लखनवी


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हे मिर्च! तुम भी बड़ी कमाल की हो
बड़े-बड़ों की सिट्टी-पिट्टी गुम कर देती हो,

छोटी सी, नाज़ुक सी दिखती हो
पर मिज़ाज तीखा रखती हो,

अगर कमाल दिखाने पर आ ही गई,
तो सी-सी करवा कर ही दम लेती हो,
थाली में आते ही, रंग दिखा जाती हो,
जुबां पर लगते ही, आग लगा जाती हो।

कोई कितना भी बने तीस मार खाँ, अपने आपको
एक कुतर में ही,सारी हेकड़ी निकाल देती हो,

दाम तो तेरा कुछ भी नहीं, पर भाव बड़े खाती हो
बिना तेरे हर सब्जी फीकी, ये राज भली भांति जानती हो,

हे मिर्च! कभी हरी, कभी लाल हो जाती हो
मौसम के संग तुम भी तो रंग बदलती हो,

पर जो भी तुझे, एक बार दिल से चख लें,
उसे तुम!उम्र भर याद आती हो,

तेरे बिना चटनी भी, अधूरी सी लगती है,
तेरे बिना हर जायका भी, अधूरा सा लगता है,

तू सबको रूला कर खुद कभी रोती ना हो,
जले तो जुबां सबकी, पर बदनाम तुम ही होती हो,

- बाबू राम धीमान


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पुकारती मधुशाला

पाठकगण की जीभ चाहेगी,
हर पल पीने को यह हाला,
पाठकगण के हाथ चाहेंगे,
पकड़ लेने को यह स्वर्ण प्याला;

कभी न थकेगा अपना साकी,
भरता रहेगा उनका प्याला,
तारीफ करेंगे पीने वाले,
रोज बुलाएगी मेरी मधुशाला।

गली से होकर कोई गुजरेगा,
कदम ठहर जाएंगे पीने को हाला,
बुलाएगा अंदर अपना साकी,
पकड़ा देगा एक नया प्याला;

कुछ लोग देख कर चले जाएंगे,
लक्ष्य महत्वपूर्ण है न कि हाला,
जो ठहर गए उन्हें पिलाएगा साकी,
आवाज देगी सबको मधुशाला।

- प्रणव राज


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ज्ञान का कुआं भरा हुआ है।
प्यासे रील की मधुशाला में डूबे हैं।
कमबख्त! जवानी भोग के सिवाय
सारा कुछ करवा रही है।
दिखावे की बकैती विद्या और
संभोग लक्ष्य (मोक्ष) बन गया है।
चोरी, डकैती सम्मान हो गया है,
सोशल मीडिया समाज हो गया है।
रिश्ते स्वार्थ की माला बन ग‌ए हैं,
जरा खींचे तो बिखर जाएंगे। आज!
इंसान टेक्नो-बिजूका बन गया है।

- दीपक कोहली


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बादलों को देखा है

मैने बदलो को देखा है,
नीले आकाश में तैरते देख है,
कभी सूर्य को छिपा कर छांव देते,
तो कभी घटाओं को काला होते देखा है।

गरजते-तमतमाते हुए आते देखा है,
लोगो को खिड़कियाँ
और दरवाज़े बंद करते देख है,
वहीं, बच्चे छप-छप खेलते हैं,
फिर, बादलों को हवाओं
संग लौटते देखा है।

- प्रणव राज


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देर
भले हो जाए
मगर सच-सच देता है।
जो
पहले विश्वास लेता है
फिर गच देता है।
खुलेगी जब परतें हैं तो
जमाना परतीत नहीं करेगा?
याद
रखना भीष्म का मौन
महाभारत रच देता है।

- राधेश विकास


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हाॅं जनाब! मैं कान हूॅं

हाॅं जनाब मैं कान हूॅं लेकिन आजकल परेशान हूॅं,
मेरी समस्याऍं बहुत सारी है इसीलिए मैं हैरान हूॅं।
मुझको जिम्मेदारियाॅं सिर्फ सुनने की ही दी गई है,
इसीलिए ताली गाली अच्छा बुरा सुनता रहता हूॅं।

मैं अपना दुःख व दर्द किसी को नहीं बता सकता,
न रो सकता न हॅंस सकता न ईसारा कर सकता।
न देख सकता न चल सकता ना गलें लग सकता,
यहाॅं तक कि कोई भी अंग को छू भी ना सकता।

हम दो भाई है पर एक दूजे का मुॅंह तक ना देखा,
बनानें वाले ने भी हमारे संग किया है ऐसे धोखा।
हमारी कोई तारीफ़ नहीं करता नहीं शाबाश देता,
कोई नहीं है हमारे ख़ास और नहीं है कोई सखा।

कभी बाल-कटवाने जातें वहाॅं कान को काट देते,
कोई खूॅंटी समझकर चश्मा पेन-पेंसिल टांग देते।
कभी नर्स कान भींचे कभी शिक्षक ने कान खींचें,
कान में छेदन करके लौंग टोप्स झुमके टांग देते।

फ़ाड़ दिया मेरा पर्दा उस दिन कनपटी पे मारकर,
अब कान नहीं मुझे खूॅंटी बना दिये जानबूझकर।
बीमारी का मास्क भी रखना पड़ता है लटकाकर,
ईयर फोन भी मुझे ही रखना पड़ता सम्भालकर।

होंठों पर लिपस्टिक बालों में बादामी-तेल लगातें,
दांतों के लिए पेस्ट एवं चेहरे के फेसक्रीम लगातें।
इतनी परेशानियाें के बाद भी हम भाई ख़ुश रहते,
नेत्रों का बहुत ख़्याल रखतें उनमें काजल लगातें।

किसी से सुना है मन हल्का हो जाता दर्द बांटकर,
ऑंखें ऑंसू गिराकर नाक बहकर और छींककर।
होंठ चुम्मा लेकर दाॅंत पीसकर मुॅंह जोर से रोकर,
मैं बदनसीब कान किसको सुनाऊॅं व्यथा जाकर।

- गणपत लाल उदय


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आईने जैसी नदी

यह कैसी खींची हुई नदी है
यह कैसी आईने जैसी नदी है
जिसकी सतह पर बर्फ-सफेद चाँद झुका हुआ है।
ठीक है, नदी जिससे तुम अब बचते हो।
ओह! आईने जैसी नदी
यह चिह्नित करने के लिए कि तुम कौन सी नदी हो
मैं अब पानी में ढेला फेंकता हूँ।
नदी, तुम्हारा आईना टूट जाता है
नदी, तुम्हारे सपने को ध्वस्त कर देती है
नदी, तुम्हारा दिल इस तरह टूट जाता है
वहाँ आदमी के चेहरे को सहलाती है।
ओह नदी!दुख तुम्हारे भाग्य में है।

- निर्मल रॉय


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महकने से पहले

क्या होती है जिम्मेदारी,
समय से पहले कली को
फूल बना दे,
फूल बन जाने के बाद महकने
से पहले ही मुरझाने का
मौसम लाए।

दिन और रात का फर्क मिटाये,
हर किसी की पहचान
तुरन्त कराए।
जीने का शौख नहीं, इंसान चैन से
मरने भी न पाए।

जिम्मेदारी जिसके कंधे है,
उसकी शौख कब,
बनती लाचारी उसे नहीं मालूम।

वो बने सहारा सबका,
उसका सहारा बने कौन,
यही सोच उम्र कटी,
रह जाता अकेला, बस
खुद को हौसला देकर,
खड़ा हो मौन।

- रोशन कुमार झा


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ज़ख्म मेरा है, तुम्हारा क्या है।

नशीली नज़र उसकी मेरी जानिब,मैं मुस्कुराया था,
एक हादसा था हुआ, लोगों इसमें तुम्हारा क्या है।

उसको है मुहब्बत,मुझसे, मैं भी उससे प्यार करता हूं।
ज़माने वालों क्यूं परेशान होते हो इसमें तुम्हारा क्या है।

मेरे दर्द की शिद्दतों का अहसास उन्हें क्योंकर होगा।
इश्क़ है,हर पल,पल पल, तस्सव्वुर उसका तुम्हारा क्या है।

कुच ए जानां में जाने से क्यों रोकते हो मुझे तुम हरदम।
दिल मेरा है, मुहब्बत मेरी, ज़ख्म मेरा है, तुम्हारा क्या है।

इश्क़ वालों कब मिली हैं, मंज़िलें मुश्ताक़ मुझे बताओ तो।
अब हुआ मालूम के इश्क़ के दरिया का कनारा  क्या है।

- डॉ. मुश्ताक़ अहमद


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