साहित्य चक्र

27 February 2022

काव्य खंडः "एक गुफ्तगू जिंदगी से" का लोकार्पण

राजस्थान के उदयपुर में लोक जन सेवा संस्थान की ओर से महाराणा भोपाल सिंह जी की जयंती के मौके पर पांच दिवसीय समारोह का आयोजन किया गया।

समारोह के चौथे दिन राजस्थान विद्यापीठ के आईटी सभागार में आयोजित प्रतिभा सम्मान समारोह के अवसर पर विमल शर्मा की अध्यक्षता और मुख्य अतिथि 108 श्री श्री वैभव दास जी महाराज विजयपुर, चित्तौड़गढ़, विशिष्ट अतिथि लेफ्टिनेंट जनरल एन के सिंह राठौर जी, सीजी गॉडविन रडार, सरकार विश्वराज सिंह जी की मौजूदगी में श्रीमती नूपुर बासु और श्रीमती रंजना मजूमदार द्वारा संकलित संपादित साझा काव्य संकलन "एक गुफ्तगू जिंदगी से" का लोकार्पण किया गया।






इस पुस्तक की समीक्षा डॉक्टर करुणा दशोरा जी द्वारा की गई है। इस अवसर पर श्रीमती उमंग सरीन, पदमा पगारिया, राजकुमार बैरवां आदि लोगों द्वारा काव्य पाठ किया गया। 


इस समारोह में विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाले 36 महानुभावों का सम्मान किया गया। संपूर्ण देश से आयी प्रतिभाओं के साथ-साथ शहर के सम्मानित काव्य प्रेमियों, साहित्यकारों के सानिध्य में उक्त कार्यक्रम संपन्न हुआ। इस लोकार्पण समारोह का संचालन उदयपुर की जानी-मानी कवयित्री श्रीमती सुनीता निमिष सिंह द्वारा किया गया।


26 February 2022

यौन अपराध और रेप जैसी घटनाओं पर रोक कब ?

जिस तेजी से हमारे देश में यौन अपराध और रेप, महिला उत्पीड़न इत्यादि घटनाएं हो रही है। उससे एक बात का अंदाजा साफ-साफ लगाया जा सकता है कि हमारा देश महिला उत्पीड़न और यौन अपराध जैसी घटनाओं के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा रहा है। आज हम एक आधुनिक दुनिया में है और कई तकनीकी चीजों से हम परिपूर्ण हो चुके हैं। इसके बावजूद भी हमारे भारतीय समाज में महिला उत्पीड़न और हिंसा जैसी घटनाएं कम होने का नाम नहीं ले रही है। 


यह विषय हम भारतीयों के लिए बेहद सोचनीय और विचारणीय है। महिला उत्पीड़न और हिंसा का शिकार अशिक्षित और घरेलू महिलाएं ही नहीं बल्कि पढ़ी लिखी और शहरों में रह रही महिलाएं भी हो रही। हर रोज अखबारों में रेप, महिला हिंसा और उत्पीड़न खबरें छपी है। कभी आरोपी को देश का भविष्य बता कर छोड़ दिया जाता है तो कभी आरोपी की जाति देखकर रिहा कर दिया जाता है। 


इतना ही नहीं बल्कि सोशल मीडिया पर एक दूसरे के धर्म की महिलाओं का रेप, अहिंसा और उत्पीड़न करने जैसी धमकियां हर रोज पोस्ट होती है और सोशल मीडिया पर महिलाओं को गंदे गंदे कमेंट और इनबॉक्स में आकर गंदी गंदी फोटो इत्यादि भेज कर परेशान किया जाता है। सोशल मीडिया का जितना हमारे समाज में अच्छा प्रभाव नहीं हुआ है, उससे अधिक हमारे समाज में सोशल मीडिया का बुरा प्रभाव हुआ है। सोशल मीडिया के कारण कई महिलाओं ने अपनी जान दी है और कई महिलाओं का यौन शोषण और मानसिक शोषण हुआ है।



हमारे देश में महिला उत्पीड़न जैसी घटनाओं पर भी जाति, धर्म की राजनीति की जाती है। जहां ऊंची जाति के किसी महिला के साथ रेप या यौन उत्पीड़न जैसी घटनाओं पर पूरे देश में आक्रोश और न्याय की आवाज उठती है, तो वही किसी मुस्लिम और अन्य जाति धर्म के महिला के साथ रेप जैसी घटनाओं पर सन्नाटा पसर जाता है। आखिर हमारे देश और समाज का एक जैसी घटना पर यह दोहरा चरित्र क्यों ? 


एक सुरक्षित राष्ट्र का निर्माण तब तक नहीं हो पाता है, जब तक वहां की महिलाएं अपने आप में पूर्ण रूप से सुरक्षित महसूस ना करें। हमारे देश में महिलाओं में भी धर्म, जाति का भूत इस प्रकार से सवार है, जिसका आप और हम अंदाजा तक नहीं लगा सकते हैं। कई महिलाएं धर्म और धार्मिक मान्यताओं के कारण अपने पति या पुरुषों का अत्याचार चुपचाप सहती रहती है और कई महिलाएं दूसरे धर्म, जाति की महिलाओं के लिए फेसबुक व अन्य सोशल मंच पर खूब गन्दी गन्दी गालियां और नफरत फैलाती रहती है। 


महिला उत्पीड़न और यौन उत्पीड़न जैसी घटनाओं के लिए सिर्फ पुरुष ही नहीं बल्कि महिलाएं भी जिम्मेदार है। हम सभी लोगों को यौन उत्पीड़न और महिला उत्पीड़न जैसी घटनाओं के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए, तभी हम एक अच्छे समाज और राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं अन्यथा आज किसी दूसरे की मां, बहन, बेटी शिकार हो रही है तो कल को आपका और हमारा नंबर भी आ सकता है। 





आइए महिला उत्पीड़न और यौन हिंसा जैसी घटनाओं के खिलाफ आवाज उठाकर अपने समाज में जागरूकता फैलाते हैं। 'नर-नारी हम सब समाज के अधिकारी' के नारे के साथ शपथ लेते हैं कि हम अपने घर और आसपास में हो रहे महिला उत्पीड़न और हिंसा इत्यादि घटनाओं पर आवाज उठाएंगे और समाज को जागरूक करेंगे। 


हमारे और आपके द्वारा उठायी गई आवाज से ही सरकार और सत्ता में बैठे लोगों के कान खुलेंगे, जिससे सख्त कानून बनेंगे और आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा होगी। बस हर महिला उत्पीड़न, हिंसा इत्यादि घटनाओं पर आवाज उठाते रहिए।


हिंदी की पांच कविताएँ एक साथ पढ़िए

।। पहली रचना ।।

 लगता है तुम आ रहे हो।




खुशबू का यूं फिजाओं में बिखरना...
ओंस की बूंद का मोती बन ठहरना..
लगता है अब तुम आ रहे हो।

सर्द हवा और बारिश का बरसना...
मुरझाए पौधो में फूलों का खिलना..
लगता है अब तुम आ रहे हो।

बरसाती शाम और सावन का महीना..
गुनगुनाती धूप और शाम का ढलना..
लगता है तुम आ रहे हो।

दिल में उमड़ रहे जज्बातों का थमना..
आंखो से आंसू का बहना..
लगता है अब तुम आ रहे हो।

होठों पे मेरी मुस्कुराहट का उभरना..
धड़कनों का तेजी से धड़कना..
लगता है अब तुम आ रहे हो।


                                             लेखिकाः सोना मौर्या 



।। दूसरी रचना ।।


जनता जाए भाड़ में


देशभक्ति की आड़ में
कुछ लोगों ने अपने लिए जुटाई
सारी सुख-सुविधाएं,
बाकी बची जनता सब वस्तुओं पर
टैक्स भर-भरकर
झोंकती रही खुद को भाड़ में।

राष्ट्रवाद की आड़ में
कुछ लोगों ने अपनी तानाशाही
सबके ऊपर चलाई,
बाकी बची जनता आपस में
लड़-झगड़कर
झोंकती रही खुद को भाड़ में।

जनसेवा की आड़ में
कुछ लोगों ने सिर्फ धनिकों के लिए
हितकारी नीतियां बनाई,
बाकी बची जनता अभावों से
निपट-निपटकर
झोंकती रही खुद को भाड़ में।

धर्म-रक्षा की आड़ में
कुछ लोगों ने इंसान-इंसान के बीच
जमकर नफरत फैलाई,
बाकी बची जनता उसकी आग में
जल-जलकर
झोंकती रही खुद को भाड़ में।


                                 लेखकः जितेन्द्र 'कबीर'


।। तीसरी रचना ।।


मैं



काश मैं भी होती
एक पुस्तक की भांँति तो
पढ़कर समझ पाती अपने गुजरे हुए कल
आने वाले वर्तमान और भविष्य से
और सुधार पाती मैं अपनी
गलतियों को अतीत के पन्नों से
काश मैं भी होती एक पुस्तक की भांँति...

समझ पाती अपनी वर्तमान की परिस्थितियों को
और गढ़ पाती अपने स्वर्णिम भविष्य को
काश मैं भी समझ पाती उन रिश्तों को
जो कहने को तो अपने हैं पर बस कहने को
और समझ पाती अपने लिए उनके विचारों को
काश मैं भी होती एक पुस्तक की भाँति...

कुछ सीख लेती यदि मैं अपने
गुजरे हुए कल और वर्तमान से
तो सरल, सहज और व्यक्तित्व विकास के लिए
गढ़ लेती अपने लिए एक सुंदर भविष्य को
काश मैं भी होती एक पुस्तक भाँति...

                             लेखिकाः डॉ.सारिका ठाकुर "जागति"



।। चौथी रचना ।।


अंतिम मित्र



सुनो! अपने मित्रो की सूची में 
मेरा नाम अंतिम पंक्ति में रखना
मेरे नाम के बाद कोई नाम ना हो।
भगवान ना करे कभी तुम्हें
कोई परेशानी घेर ले ,और 
दूर-दूर तक कोई उम्मीद की 
किरण नज़र ना  आये।
जब सब अपनो को 
तुम परख लो।
तब तुम बेझिझक हक से
मुझको याद करना।
अपनी अंतिम उम्मीद के साथ 
 मुझको याद करना।
 मेरा वादा है
 एक दोस्त का दूसरे दोस्त से 
 तुम को मैं कभी 
निराश नहीं करूंगा ।
तुम्हारी तकलीफों , परेशानियों को
 अस्त कर , मैं तुम्हें
 नया सवेरा , नई किरण देने का 
प्रयास करूंगा , पूरा पूरा प्रयास करूंगा।

                               लेखकः कमल राठौर साहिल



।। पाँचवी रचना ।।


रंग बिरंगी होली आयी




रंग -बिरंगी देखो आज होली है आयी,
सबके चेहरे पे आजखुशियां है लायी।
सब बच्चों को होलीआज खुब है भारी,
सुबह से  शुरू हो हमारी जाती होली।
भक्त प्रहलाद की बात  याद है  आयी,
अवगुणों पर  गुणों की  जीत फरायी।
इन रंगों ने प्रेम स्नेह की गंगा हैं बहायी,
खुशियों की सुबह है आज देखो आयी।
रंगों के रंग में सजी दुनिया आज सारी,
बच्चें बुढ़े सब कर रहे होली की तैयारी।
काव्य सम्मेलन की सज गई महफ़िल,
सब मिलजुल कर बनो प्यार से होली।
नफरतों को भुलाकर सबने मिस्री घोली
पिचकारी लिए निकल पड़े सारी मंडली
छुन्नु मुन्नू की टोली आज हुई  मतवाली,
देवर भाभी जी  संग करें आज ठिठोली
रंग बिरंगी देखो आज  होली  है  आयी,
देवर भाभी जी संग खुब होली  खेली।
रंग बिरंगी देखो आज होली है  आयी,
सबके चेहरे पे आज खुशियां है छायी।।


                                           लेखिकाः कुमारी गुड़िया गौतम



22 February 2022

कविताः हृदय की झंकार सुन




तुझ में कौशल, हो जा निपुण,
सतर्क रहकर लक्ष्य को चुन,
ललकार की है, तुझ में एक धुन,
हृदय की झंकार सुन

एक नया सा, तुझ में जुनून,
साथ में भी रख सुकून,
समय का तू कर ना खून,
हृदय की झंकार सुन

जिंदगी रंग बिरंगा ऊन,
एक नया सा ख्वाब बुन,
हर सपने को कर दे तू पूर्ण,
हृदय की झंकार सुन

मधुर सी ध्वनि, तुझ में करे गुनगुन,
खुशनुमा सा, तू एक शगुन,
बेशुमार तुझ में है गुण,
हृदय की झंकार सुन

तुझ में कौशल, हो जा निपुण,
सतर्क रहकर अपनों को चुन,
ललकार की है, तुझ में एक धुन,
हृदय की झंकार सुन


                       लेखिकाः डॉ. माध्वी बोरसे


कविताः गृहणी




बहुत कड़वा है यह अनुभव, सोच और सच्चाई का।
दोष  किसका है यहां पर, केवल अपने आप का।
सब को सुला कर सोना, सबसे पहले जागना।
सबको खुश रखना पर अपना ही ध्यान न  रखना।।

सास ससुर पति और बच्चे बस परिवार को संभालना।
फरमाइशें पूरी करते,अपने अरमानों को कुचलना।
कर रही हूँ हद से बढ़ कर, नहीं है जिसका कोई मोल।
घर में उसको कौन चुका सकता , जो है पूर्णतः अनमोल।।

तभी तो कहा गया है 
सम्पूर्ण गृह है जिसका ऋणी।
वही तो कहलाती है गृहणी।


अर्चना लखोटिया