साहित्य चक्र

16 June 2019

“बाल श्रम और मैं”


“मैं खुश थीं
मेरा बच्चा जहां जन्मा
वहां खुली सांस लेने की पूरी आजादी थी
कोई दहशत की रातें न थी
कोई बुरे खबरों के जैसे हालात न थें
मैं खुश थीं
मेरा बच्चा अपनी नीदों में सपने बुन रहा हैं
चन्दा मामा को बुला
दूध –भात खा रहा हैं
ज्जबातों में उसके गुड्डे –गुड़ियों का खेल हैं
शक्तिमान बन आसमां में उड़ने का मन हैं
बारिश की बूंदें छप छपा रहा हैं
किन्तु!
कहीं कोई पीछे से उसे तांक रहा हैं
अपने सपनों को पूरा करने के लिए
कोई हवस मिटाने के लिए
तो कोई मजदूरी करवाने के लिए
तो कोई पैसों के लिए बेच देने का ऐलान कर रहा हैं
मैं इन बातों से अनजान
ममता का गीत गा रही हूं
और वह अपनी आंखों से दहशत फैला रहा हैं
तो कभी लालच दे रहा हैं
और मेरी ममता भी उस मासूमियत पर हंस रही हैं
तो कभी सपने देख रही हैं ..
मेरी ममता भी शायद गरीबी में कहीं दब गई हैं
आज मेरा बच्चा /बच्ची
मजदूरी कर रहा और मैं !
अज्ञानी की भांति गौरवान्वित हो रही हूं
आज आसमां का चांद भी टूटा हुआ हैं मुझे देख कर
और मैं ‘मैं’ हूं या वहीं मासूम बच्चा/बच्ची
इस पर खुद से सवाल कर निः शब्द हो खुश हूं ।।"

रेशमा त्रिपाठी


मन के हारे हार है मन के जीते जीत



हरदम चहकती निशा बलात्कार की शिकार होने के बाद एकदम बदल गई थी ।उसका चैन उसकी खुशियां सब उससे छिन गईं थी। उसका भविष्य भी अंधकारमय हो गया था ।वह अपनी ही नज़रों में गिर गई थी।अब ना उसे किसी से बात करना अच्छा लगता था ना कुछ खाना पीना। डिप्रेशन ने उसे इस कदर घेर लिया था कि बस अब उसे मरना ही एकमात्र सहारा दिखता था। उसकी ऐसी हालत देख कर उसके घर वाले भी बहुत परेशान थे ।उसकी मम्मी उसे बार-बार समझाती थीं कि जिस में तेरा कोई दोष नहीं है उसकी सज़ा अपने आप को क्यों दे रही है पर उस पर समझाने का कोई असर ही नहीं हो रहा था। तब उसके पेरेंट्स उसे शहर के जाने-माने मनोचिकित्सक के पास ले गए ।

डॉक्टर ने निशा से विस्तार से बातें करीं और उसके बाद उन्होंने फोन करके किसी को जल्दी ही उनकी क्लीनिक पहुंचने के लिए कहा। थोड़ी ही देर में दो लड़कियां उनकी क्लीनिक पर आ पहुंची। डाॅक्टर ने निशा से उन दोनों का परिचय कराया एक थी आन्या और दूसरी थी मीमांसा ।डॉक्टर ने आन्या और मीमांसा से अपने आपबीती सुनाने को कहा।आन्या बोली, निशा मुझे देख कर तुम डर तो नहीं गईं।बहुत से लोग तो आज भी मुझे बड़ी हैरानी से देखते हैं ।एक सिरफिरे आशिक ने एकतरफा प्यार में पागल होकर मेरा सारा शरीर तेज़ाब से जला दिया था।

सबसे ज्यादा प्रभावित मेरा चेहरा ही हुआ था। मैं तो अपना हाल देखकर बिल्कुल टूट गई थी , असहनीय पीड़ा थी। मैं तो बिल्कुल भी जीना नहीं चाहती थी पर तब डॉक्टर साहब ने ही मेरे मन में जोश भर दिया था और फिर मेरे मन में अपराधी को सज़ा दिलाने कीललक जाग उठी ।मुझे उबरने में भी बहुत समय लगा पर मैंने अपनी दृढ इच्छाशक्ति से विजय पायी।आज वह जेल में है और मैं अपना छोटा सा होटल चला रही हूं ।अब मेरे मन में बहुत तसल्ली है और मेरे होटल की खास बात यह है कि वहां पर सभी वर्कर किसी ना किसी के सताए हुए हैं पर अब आत्मनिर्भर होकर अपनी जीविका चला रहे हैं ।जब हमने कोई गलत काम किया ही नहीं तो हम उसकी सज़ा अपने आप को क्यों दें।

आन्या की बात खत्म होने के बाद मीमांसा बोली मुझे तो मेरी ससुराल वालों ने बहुत सताया। हर वक्त कम दहेज का ताना देकर मेरी पिटाई किया करते थे। मुझे भूखा भी रखते थे ।एक बार तो मुझे ज़हर भी दे दिया पर मैं बच गई ।जब उनका मुझ पर किसी तरह ज़ोर नहीं चला तो एक दिन सबने पकड़ कर मुझ पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी । मैं जब चीखी चिल्लाई तो पड़ोसियों ने किसी तरह मेरी जान बचाई ।मैंने भी ठान लिया था कि अब अपने ससुरालियों को उनके किए की सज़ा दिलाकर ही रहूंगी ।मुझ पर ससुरालियों ने बहुत दबाव डाला पर मैं उनके बहकावे में नहीं आई। मुझे ठीक होने में बहुत समय लगा।आज भी उस समय को याद करती हूं तो कांप जाती हूं।खाल तो बिल्कुल झुलस गयी थी।लेटना भी भारी था पर मन में जीने की ललक और ससुरालियों को सज़ा दिलाने की तड़प ने मुझे टूटने नहीं दिया। बस अब वो तो जेल में सड़ रहे हैं पर मैं आन्या दी के होटल में काम करके खुशी से अपना जीवन बिता रही हूं।

डॉक्टर,आन्या एवं मीमांसा की बात सुनकर निशा में भी जोश आ गया और बोली मैं क्यों शर्म से घर में दुबकी बैठी हूं जबकि शर्मसार तो उसे होना चाहिए जिसने यह कुकर्म किया है। वह आगे बोली कसूरवार को तो मैं भी सज़ा ज़रूर दिलवाकर रहूंगी। उसकी बात सुनकर उसके पेरेंट्स के चेहरे पर चमक आ गई । सबका धन्यवाद अदा कर एवं डॉक्टर साहब से दवा लेकर निशा एवं उसके पेरेंट्स घर आ गए ।घर आते ही निशा ने अपनी किताबों को संभाला अब वह अपनी पढ़ाई पर ध्यान देकर अपना साल बचाना चाहती थी ।अब बलात्कारी के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराने की भी उसे बहुत जल्दी थी ताकि उसे सज़ा दिलाकर वो सुकून से जी सके और अपने लिए जो सपने देखे थे उन्हें साकार कर सके। किसी ने ठीक ही कहा है मन के हारे हार है मन के जीते जीत।

                                                              - वंदना भटनागर



संसार में हस्ती

घर-द्वार के सुंदरता की शान है पिता
संसार में हस्ती बड़ी महान है पिता
क्या कर दूं बच्चों के लिए सोचता हरपल
संघर्षरत की बच्चों का भविष्य हो उज्ज्वल 
वो स्तम्भ है नातों का सभी रिश्तों का हमदम
बच्चों की सफलता के सपने देखता हरदम
बच्चों के सभी ख्वाब की उड़ान है पिता
संसार में हस्ती बड़ी महान है पिता
आस की शमाएं वो पिघलने नहीं देता
गलत राह पर बच्चों को चलने नहीं देता
संतान को उदास देख खुद होता है दुखी
मांगता ईश्वर से सदा बच्चे रहे सुखी
बच्चों के लिए खुशियों की दुकान है पिता
संसार में हस्ती बड़ी महान है पिता
आशा की किरण भरोसे का धूप है पिता
पृथ्वी पर तो उस ईश्वर का ही तो रुप है पिता
बच्चों के लिए जाने क्या - क्या दर्द उठाता
बच्चों के सभी सपनों को खुद ही सजाता
खुदा का करम ईश्वर का वरदान है पिता
संसार में हस्ती बड़ी महान है पिता
बन जाओ गर कुछ तो कभी भी फूलना नहीं
त्याग को उनके कभी भी भूलना नहीं 
फर्ज बेटे होने का कर देना तुम अदा
पूजना भले नहीं कद्र करना सदा
पिता सा नि:स्वार्थ कोई दूजा ना है
स्थान तो उनका पूजे जाने का है 
पृथ्वी पर जो आया वो भगवान है पिता
संसार में हस्ती बड़ी महान है पिता
संसार में हस्ती बड़ी महान है पिता

                                                   विक्रम कुमार


15 June 2019

पत्थर के शहर

ग्लोबल वार्मिंग 

मानव कुछ नहीं समझ रहा है,
काट  हरे भरे पेड़ काट रहा है।
पत्थर के शहर बना रहा है,
जीना  अपना दूभर कर रहा है।
जब गर्मी बढ़ती है तो कहते है,
हाय पेड़ क्यों नहीं लगाए,
पानी क्यों  नहीं बचाया,
धरती का पारा बढ़ रहा है।
मानव उसमे झुलस रहा है,
फिर भी हम पेड़ न लगाएंगे,
ईंट पत्थरों का घर बनायेंगे।
फिर क्यो हम भगवान को कोसते हैं,
भगवान कुछ नहीं कर रहा है।
जो कर रहे हैं हम कर रहे हैं,
कहीं बाढ़ तो कहीं सुनामी आयेगी,
प्रकृति से खिलवाड़ किया तो वो हमें सतायेगी।
एसी जरूरी है, पेड़ नहीं,
गाड़ी जरूरी है, हवा नहीं।
सबको दोष दे देंगे,
अपना दोष दिखाई नहीं देगा।


                                गरिमा


मानव कुछ नहीं समझ रहा है...!

ग्लोबल वार्मिंग 

मानव कुछ नहीं समझ रहा है,
काट  हरे भरे पेड़ काट रहा है।
पत्थर के शहर बना रहा है,
जीना  अपना दूभर कर रहा है।
जब गर्मी बढ़ती है तो कहते है,
हाय पेड़ क्यों नहीं लगाए,
पानी क्यों  नहीं बचाया,
धरती का पारा बढ़ रहा है।
मानव उसमे झुलस रहा है,
फिर भी हम पेड़ न लगाएंगे,
ईंट पत्थरों का घर बनायेंगे।
फिर क्यो हम भगवान को कोसते हैं,
भगवान कुछ नहीं कर रहा है।
जो कर रहे हैं हम कर रहे हैं,
कहीं बाढ़ तो कहीं सुनामी आयेगी,
प्रकृति से खिलवाड़ किया तो वो हमें सतायेगी।
एसी जरूरी है, पेड़ नहीं,
गाड़ी जरूरी है, हवा नहीं।
सबको दोष दे देंगे,
अपना दोष दिखाई नहीं देगा।

                                          गरिमा